बुधवार, 4 दिसंबर 2019

या के बणी

या के बणी
दिल्ली मैं इन दिनां मैं खूब उठा-पटक होई सै। भाजपा नै सारे नियम, कायदे कानून, सिद्धान्त ताक पै धर दिये अपणी कुर्सी बचावण की खात्तर। तलै ए तलै कई पार्टियां मैं पाड़ ला लिया। पाड़ लावण के तरीके भी सारे ए इस्तेमाल कर के गेर दिये। साम दाम दण्ड भेद सब क्यांएका सहारा लिया ज्याहे तैं तै वोट पड़ण तै पहलम् ताहिं भाजपा न्यों दंगालै थी अक वोटां का गणित उसके हक मैं सै अर घणखरे लोगां कै या बात जंचै भी थी अक एम पी खरीद खराद कै भाजपा अपणी गिणती पूरी कर लेगी।
म्हारले नेता जी भी बहोतै स्याणे बणकै दिखावैं थे इबकै फेर भाजपा नै बता दिया अक तम डाल डाल सो तै हम पात-पात सां। पहलम तै म्हारे नेता जी नै भाजपा तै समर्थन उल्टा लेवण का सांग करया अक क्यूकरै ममता कै जयललिता की ढालां उसके भी भा बध ज्यां। कई बै घर मैं कोए माणस रूस ज्या अर रोटी ना खावै अर घरके उस नै मनावैं नहीं तै दो बखत पास करने मुश्किल हो जाया करैं इसे माणस नै। वाहे बणगी म्हारे नेता जी गेल्यां अर हार फिर कै अखबारां मैं खबर दी अक समर्थन उल्टा ले लिया फेर जै कोए करड़ा बखत आया तै वोट हम भाजपा ताहिं ए देवांगे। नेता जी तै कोए बूझै अक जै न्योंए करनी थी तै समर्थन उल्टा क्यों लिया था? खैर आड़े ताहिं बी देखी गई। हरियाणे की जनता और थोड़ी फालतू उदास होगी। फेर यो विश्वास मत थोंप दिया जयललिता नै भाजपा पै तै म्हारे नेता जी का सारा कुण्बा कुकाया अक ईब बेरा पड़वा द्यांगे भाजपा नै अक तीन च्यार एम पी आली पार्टियां की कितनी औकात सै। टी.वी. मैं अखबारां मैं, दिल्ली मैं, चंडीगढ़ मैं सारे कै काटकड़ तार दिया अक हम भाजपा के विश्वास मत के विरोध मैं मतदान करांगे। टी.वी. आल्यां नै दो दो तीन-तीन बै बूझया अक यो आखिरी फैसला सै थारा? म्हारा नेता बोल्या अक यो पक्का फैंसला सै म्हारा। हरियाणे की जनता कै थोड़ा सांस में सांस आया अक नेता नै म्हारी लाज का थोड़ा घणा ख्याल तै ले आखिर मैं करे लिया। आज के जमाने मैं कूण लिहाज शर्म जिसी चीजां का ख्याल राखै सै ऊंतै पर म्हारे नेता जी की मेहरबानी अक उसनै म्हारी लिहाज शर्म राखण की सोची।
फेर खुराना जी पहोंचे म्हारे नेता जी धोरै। बेरा ना कूणसी दुखती रग का बेरा सै खुराना साहब नै अक म्हारे नेता तै बातचीत करण की जिम्मेवारी उसे ताहिं दी भाजपा नै। फेर किमै ढीले से पड़ते दीखे म्हारे नेता जी। आगले दिन फेर किमै करड़े से होगे। लोगां नै फेर राहत की सांस ली।
चाणचक दे सी प्रकाश सिंह बादल अर उसके छोरे कै बीच मैं बैठकै म्हारे नेता जी ने फेर पास्सा पलट लिया अक हम भाजपा के प्रस्ताव के हक मैं वोट गेरांगे। किसान नेता प्रधानमंत्री बणावण की सोचां थे ओ बणता कोण्या दिखाई दिया ज्यां करकै भाजपा का समर्थन करांगे। कोए बूझणिया हो अक वाजपेई नै किसानां की घणी झोली भरदी जो म्हारे नेता जी उसकी मदद मैं तिसाये होगे? बखत की करनी अक भाजपा फेर बी मूंधे मुंह पड़ी जाकै। सबतै पहलम म्हारे ताऊ जी के बख्ता मैं एक दो एम एल ऐ करकै यो आया राम गया राम का सेहरा म्हारे हरियाणा के सिर पै बंध्धा था। फेर भजनलाल जी तैं पूरी ए पाल्टी नै लेकै कांग्रेस मैं कूद गे थे। इन सारे सौद्यां मैं एक खास बात थी अक सौदेबाज नेता मगर बलि के बकरे थे उनके पाछै लागे औड़ एम.एल.ए.। पर इबकी बरियां एक औरै नजारा साहमी आया सै अर ओ सै अक नेता नै छोडकै उसके एम.पी. भाजगे। क्यूं भाजगे? कितने मैं भाजगे? किसके कहे तैं भाजगे? के सोच कै भाजगे? इन पै न्यारी-न्यारी अटकल लाई जावण लागरी सैं। फेर एक बात तै साफ होगी अक वे भाजगे थे अर म्हारे नेता जी नै तै बस अपनी लाज बचावण खातर समर्थन का दिखवाया ए कर्या, समर्थन तै भीतरै-भीतर हो लिया था। ईब हटकै फेर यूनाइटिड फ्रंट की बात कही सै। फेर कोए यकीन ना करै। हरियाणा की जनता मायूस बहोत होई सै। जो माणस म्हारे नेता के म्हां कै म्हारे ताऊ नै देख्या करते उनमैं तै और बी निराशा आई सै। इस निराशा के कारण जनता और कोए नेता टोहण की सोचै सै फेर कोए ठह्या सा नेता ए ना दीखता हरियाणे की जनता नै। या जनता करै तो के करै?

नया साल किसा हो

नया साल किसा हो
इस बात मैं कोए शक की गुंजाइश कोन्या अक बीसवीं सदी मैं विज्ञान नै ताबड़तोड़ तरक्की करली। फेर आज महत्वपूर्ण सवाल यौ सै अक इस दुनिया के दुख-दर्द कम करण मैं कितना काम आया विज्ञान? उल्टा यू दुख-दर्द बधा तो नहीं दिया इस विज्ञान नै? आज दुनिया के 100 करोड़ के लगभग लोग (महिला-पुरुष) बुनियादी जरूरतों ज्यूकर रोटी, कपड़ा अर मकान तै महरूम सैं। आए साल दुनिया के लगभग 80 लाख बालकां की मौत, भूख, कुपोषण, पीने के साफ पानी की कमी, उचित आवास की कमी बख्त पै मामूली चिकित्सा सेवा ना मिलने के कारण होज्या सै। जो ये परिवार इतने गरीब न होन्ते अर उनकी बुनियादी जरूरतें पूर हो जान्ती तो इन मौतां पर काबू पाया जा सकै था। आई किमै समझ मैं अक ‘किस्मत म्हारी’ कैहकै पार बोलोगे।
आए साल मैं लगभग 4 लाख महिलावां की मृत्यु बालक होवण के बख्त होज्या सै। कारण सै अक ठीक खाणा नहीं, खून की कमी होज्या अर जच्चा-बच्चा को वांछित स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिलती। फेर के कर्या जा? इसपै ढंग तै सोच्या जा आण आले नये साल मैं अक बेहतर दुनिया क्यूकर बनाई जा। या बेहतर दुनिया क्यूकर बनाई जा सकै सै? दुनिया मैं सारे महिला-पुरुषां की जरूरतां नै पूरा करण की खातर प्रतिवर्ष 40 अरब डालर और चाहिए। फेर किततैं आवै इतना पीस्सा? सोच्ची सै कदे अक ताश खेलण तै फुरसत कोन्या अर कै इन छुटभैये सफेदपोशां के बस्ते ठावण के बोझ तलै सांस चढ़े रहवैं सैं? बेरा सै केवल यूरोप मैं शराब पर एक साल मैं 105 अरब डालर खर्च होज्यां सैं। म्हारे देश के आंकड़े तो कोन्या फेर हरियाणा मैं दारू तै घर तो कोए बच नहीं रह्या फेर कोए माणस बचर्या हो तै बैरा ना? तो फेर के कर्या जा? पहलम तो पूरी समस्या आच्छे ढाल जान ली जावै अर फेर सोच्या जावै अक हम के चाहवां सां अर के करना चाहिए हमनै? हम नहीं चाहते किसे की आजीविका खोसना।
एक इन्सान का दूसरे इन्सान को लूटणा गल्त सै। दौलत की खातर दरिद्र का कूटणा गल्त सै। लूटमान अत्याचार हम कोन्या चाहते। हां, हम जरूर चाहवां सां मजदूर का मुस्कराना, किसानां का अपनी फसल देख कै खिलजाणा, हर झोंपड़ी, हर गांव मैं बालकां का खिलखिलाणा, इस नाबराबरी का दुनिया तै खात्मा जरूर करना चाहवां सां। हम कोन्या चाहते नये साल मैं ये जातिभेद अर रंगभेद। कोन्या चाहिये बेटियों के जन्म पै प्रकट होन्ता दुख-खेद, इस तरियां के भेद भाव जो करदें समाज मैं छेद, इन्सानियत का इसा अपमान कोन्या चाहिये। हां, आज हमनै चाहिये उनकी समानता जो तलछट मैं पड़े सैं, बेटी नै मौका मिलै अर वा तय कर सकै हर रास्ता, शूद्र भी शिखर छू सकै उसनै मिलै या मान्यता, काले रंग नै कृष्ण आला सम्मान मिलै या हम चाहवां सां। हम नहीं चाहते पड़ौसियों तैं रूठणा, एक ही परिवार मैं दीवारों का खींचणा, मजहबों के नाम पर किसी के घरों को रोंदणा, किसी के दिल नै तोड़णा हम कोन्या चाहन्दे।
हां, हम जरूर चाहवां सां टूटे दिलां नै जोड़णा, बहम अर बैर की हर दीवार नै तोड़णा, भटके औड़ हर कारवां नै प्यार की गली मैं मोड़णा, भजनां मैं कव्वाली की मिठास घोलणा चाहवां सां। हम नहीं चाहन्दे अक घरां पै गिरै कोए कहर, देखो हवा पानी मैं फैल रहे कितने जहर, बीमारियों, आपदाओं की या बढ़ती लहर, आबो हवा का यो प्रदूषण कोन्या चाहिये। हां हम जरूर चाहवां सां कोयलां का कूकणा, मृग शावक का विचरना वन बालिका तै खेलणा, चरवाहों की बांसुरी पै टहनियां का झूमणा, मुक्त नदी की खेल ठिठोली देखणा हम चाहवां सां। हम नहीं चाहन्दे मूक प्राणियों पै अत्याचार, विलासिता इसी करे जो पशुओं मैं हाहाकार, वो कैसा विकास जहां इन्सानों से हो मारामार, ताकत का दुरुपयोग हमनै कोनी चाहिये। हम नहीं चाहन्दे कि युद्ध तै हो ईब विनाश, अणु बम की गर्जना जो पुकारै बस नाश-नाश, धरती पै सन्नाटा हो अर रोवै आकास, ना ना इसी तबाही नहीं चाहन्दे। एक छोटा सा चमन हो, हर इंसान को अमन हो, बहै जड़ै सच्चाई का पवन हो, इसी दुनिया हम चाहवां। नया साल मुबारक।
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सांच्ची बात कटारी लाग्गै

सांच्ची बात कटारी लाग्गै
हिन्दुओं के इतिहास मैं राम का बहोत ऊचा स्थान रहया सै। आजकाल भी राम राज्य का खूबै जिकरा रहवै सै। वो राम राज्य कीसा होगा जिसमैं एक शूद्र शम्बूक का बस योहे अपराध था अक ओ धर्म कमावण की खात्तर तपस्या करण लागरया था अर इस कारण राम जीसे अवतार राजा नै उसकी नाड़ काट ली। ओ राम राज्य कीसा रहया होगा जिसमैं किसे आदमी के कहे तै राम नै गर्भवती सीता ताहिं जंगल मैं छोड़ दिया? राम राज्य मैं दास दासियां का कति तोड़ा नहीं था। ठारवीं और उन्नीसवीं शताब्दी ताहिं दुनिया मैं दास प्रथा कितनी क्रूरता के साथ प्रचलित रही सै इसका हमनै पूरा ग्यान सै। उन बख्तां मैं (राम राज मैं) स्वेच्छा पूर्वक अपने आप नै अर अपनी संतान नै सिर्फ बेच्या ए नहीं जाया करता। बल्कि समुद्र अर बड्डी नदियां के कांठ्यां पै बसे गामां मैं तो आदमियां नै पकड़ कै ले जावण की खात्तर बाकायदा हमले हुया करदे। डाकू गाम पै छापा मारया करते अर धन-माल की साथ-साथ उड़े के काम करण जोगे आदमियां नै पाकड़ के ले जाया करते। हर साल इस तरियां के गुलाम पोर्त्तुगीज पकड़ कै बर्मा के अराकन देश मैं बेच्या करते। राम राज्य मैं जै इस ढाल की लूट अर डाकेबाजी नहीं बी होगी तो भी दास प्रथा तो जरूरै थी। मिथिला मैं ईब बी कितने ए घरां मैं वे कागज सैं जिनमैं बहिया (दास) की खरीद-फरोख्त दर्ज सै। दरभंगा जिले के तरौनी गांम मैं दिगंबर झा के परदादा नै कुल्ली मंडर के दादा को किसे दूसरे मालिक तैं खरीदया था अर दिगंबर झा के दादा नै पचास रुपइये के फायदे के साथ ओ आगै बेच दिया। इैबै तीन पीढ़ी पहलम अंग्रेजी राज तक मैं या प्रथा मौजूद थी। साच्ये धार्मिक हिंदू हों चाहे मुसलमान, दोनूं जब अपनी मनुस्मृतियों और हदीसों मैं दासां के ऊपर मालिकां के हक के बारे पढ़ैं सैं तो उनके मुंह मैं पाणी आये बिना नहीं रैहन्ता।
आवां राम राज्य की दास प्रथा की एक झांकी देखां। एक साधारण सा बाजार सै जिसमैं निखालस दास-दासियां की बिक्री होवै सै। लाखां पेडां का बाग सै। खाण-पीण की दुकान सजरी सैं। भेड़-बकरियों अर शिकार करे जानवरां तै न्यारा उच्च वर्ग के माणसां के भोजन की खात्तर मांस बेच्चा जावण लागरया सै। जागां-जागां पै सफेद दाढ़ी आले ऋषि अर दूसरे ब्राह्मण, क्षत्रिय अर वैश्य अपणे पड़ाव घालें पड़े सैं। कोए नया दास कै दासी खरीदण आया सै। किसे के दिन बिगड़ गे ज्यां करकै ओ अपणे दास-दासी बेच कै कुछ पीस्से का जुगाड़ करण आरया सै। कुछ पुराने दास बेच कै नये दास लेवण आरे सैं। म्हिने पहलम दास-दासियां की सेवा शुरू होज्या सै अक बढ़िया दामां मैं बिक ज्यावैं। उनके सफेद बाल काले रंग दिये। बढ़िया लत्ते कपड़े पहरा के बिठावैं सैं। कितै-कितै सौ-सौ दास सैं कितै एकाध दास आले मालिक सैं। खरीदण आले कहवैं सैं, ईबकै तो बाजार बहुत म्हंगा गया। पाछले साल अठारा बरस की हट्टी-कट्टी सुंदर दासी दस रुपइए मैं मिल जाया करती, ईबकै तो तीस मैं बी हाथ कोन्या धरण देन्ते। दान्त ताहिं देख्या करदे। कोए चालीस बरस की नै बीस बरस की बतावै। कोए कहवै म्हंगी कित सै। महाराज रामचंद्र के यज्ञ मैं दक्षिणा मैं हरेक ऋषि ताहिं एक-एक तरुण दासी दी जावैं सैं। कितनी दासियां के बालक उनतै कोसां दूर चाले जावैं सैं, कितनी दासियां के प्रेमी उनतै बिछड़ ज्यावैं सैं इसकी उड़ै किसनै चिंता नहीं थी। यो सै राम राज्य मैं आदमी के एक भाग का जीवन। अर यो सै राम राज्य मैं मरद-औरत का मोल। इसे पर हमनै नाज सै। ईब ताहिं तो हमनै आदमी की ढालां रैहना भी नहीं सीख लिया सै। पास पड़ौस मैं सफाई की अवहेलना मैं तो हम जानवरां तै भी गये बीते सां। म्हारे गामां जीसे गंदे गाम दुनिया के किसे देश मैं दीवा लेकै बी टोहे कोन्या पावैं। या म्हारे गांम की ए खूबी सै अक एक आन्धा माणस बी एक मील पहलमै म्हारे गाम नै पिछाण लेवै सै क्योंकि उसकी नाक बदबू नै पिछाण ले सै। तो म्हारा इतिहास कई ढाल की यादां तै भरया पड़या सै। हमनै देखना पड़ैगा अक कौन सी आज के हिसाब मैं ठीक बात सै अर कौन सी गलत सै। अन्धभगत हो कै अपने पुराने इतिहास की झोल्ली भरकै काम कोन्या चालै। आई किमैं समझ मैं?

फलाणे की बहू बहोत नेक सै भाई

फलाणे की बहू बहोत नेक सै भाई
म्हारे हरियाणा मैं घूंघट बिना बहू की मूर्त पूरी कोण्या मानी जान्दी। पुराणे बख्तां मैं घूंघट की जकड़ बहोतै कसूती थी। यो घूंघट कद सुरू हुया, क्यों सुरू हुया इन बातां पर भी बिचार करण की जरूरत सै। मेरे हिसाब तै लुगाई नै काबू मैं राखण खातर घूंघट का सांग रच्या गया। औरत नै अपणे परिवार, अपणे गाम अर अपणे देस की तरक्की मैं फैसले करण तै रोकण खातर घूंघट का हथियार बणाया गया। 1893 मैं एक अंग्रेज नै लिख्या सै अक इस इलाके मैं घूंघट ना करण का मतलब सै अक वा औरत बदकार है, वा नैतिकता की सीमा पार करगी ज्यां करकै इसनै घर तै बाहर कर द्यो। नैतिकता मैं लपेट के घूंघट पहरा दिया म्हारे बड़े बडेरयां नै।
आज इसी बात तो कोण्या रही पर ईब बी बिना घूंघट आली बहू का नाम नंगी काढ़ दिया जा सै। बिना घूंघट अर बेसरम औरत मैं कोए फरक नहीं रैहन्ता। कई माणस तो उसनै बदमास बी समझण लागज्यां सैं। उसपै न्यों बोल मारैंगे अक रै फलान्यां की बहू तै छाती दिखान्ती हांडै सै। जै कोए औरत हिम्मत सी करकै पर्दा हटाणा बी चाहवै तै मर्द माणस छोह मैं आज्यां अर जै वा जिद करले तै उसकी पिटाई बी जम कै होज्या। बालकां अर माणसां की मौजूदगी मैं अपणे पति तै घूंघट करना, रिस्ते मैं अर उमर मैं गाम के बड्डे ठेर्यां तै घूंघट करना अर कुछ बुजरग औरतां तै घूंघट करना जरूरी मान्या जा सै।
हरियाणे मैं घर की कलह की जड़ बहू मानी जावै सै अर कै पूरी इस लुगाई जात कै यो दोष लाया जा सै। न्यों मानकै चाल्या जा सै अक इस कलह पै काबू राखण खातर बी यो घूंघट जरूरी है। एक सर्वे के हिसाब तै हरियाणा की 72 61 प्रतिशत महिला घूंघट की सिकार सैं। कमाल की बात सै अक हरियाणा मैं ना तै आर्य समाज नै अर ना पढ़े लिखे बुद्धिजीवियां नै अर ना दूसरे समाज सेवियां नै बड्डे पैमाने पै घूंघट कै खिलाफ जनअभियान चलाया। घूंघट छोटा होग्या, घूंघट ऊपर नै सरकग्या फेर घूंघट आज बी खत्म नहीं हो लिया।
घूंघट हरियाणा मैं आज्ञाकारिता का, सुद्ध चरित्र का, औरत की पवितरता का, उसकी सालीनता का एक सामाजिक पैमाना बणा कै उढ़ा दिया गया। लुगाइयां कै बी इसकी चतुराई अर इसका काइयांपन समझ मैं नहीं आया। लुगाइयां भी घूंघट के ये हे मतलब मान बैठी अर पल्ले कै गांठ मारली। पढ़ी लिखी औरत बी गाम मैं जावैंगी तो पर्दा करैंगी अक सासू उसकी बड़ाई करै अक देख इतना पढ़ लिख कै बी पर्दा करै। जिब सुसरा, ज्येठ के और कोए गाम का माणस सहर मैं आज्या तै भी पर्दा करै। जो पर्दा करैगी उसने गाम आले कैहंगे - फलाणे की बहू बहोत नेक सै भाई। गाम मैं रैहवण आली इसी औरतों नै कोए साबासी कोण्या देवै। गाम मैं तै मान के चाल्या जा सै अक बहू पर्दा करै ए करैगी।
पढ़े लिख्यां नै बी इसका विरोध क्यों ना करया या सोच्चण की बात तै सै ए। महिला की लिहाज (मोडैस्टी) उसकी आंख की सरम मानी जावै सै अर ज्यां करकै घूंघट तारकै बात करण की बात तै दूर रही उस ताहिं तै माणस तै आंख तै आंख मिलाकै बात करण की बी इजाजत कोण्या। और तै और चपाड़ के धोरे कै जागी तो बी घूंघट करैगी अर चपाड़ मैं चढ़ण की बी इजाजत कोण्या। कोए मरज्या तै उसकी अर्थी गेल्यां समसान घाट मैं बी जाण की मनाही सै। घूंघट की जागां ढाठा मारण की छूट बी बालक चिलक आली बड्डी उम्र की लुगाइयां खात्तर सै। घूंघट इस बात नै तय करदे सै अक घर मैं, गाम मैं, अर बाहर किसकी बात ऊपर रैहगी। घूंघट औरत कै बेड़ी सै। साफ दिखण लागरी सै अक उसके हक उसनै ना मिल सकैं ज्यां तै बहू ताहिं घूंघट पहरा दिया। यो इतना ए गुणकारी सै तै बतौर लड़की या बाहन के उस ताहिं घूंघट क्यों नहीं पहराया गया? उसके घूंघट की बेड़ी काटण की जागां उसनै घर मैं कैद करण की त्यारी होण लागरी सैं। बचियो! किमै करियो!!



गंठे की आत्मकथा

गंठे की आत्मकथा
मनै गंठा कैहदे कोए प्याज़ कैहदे अर कोए अनियन कैहदे। मनै लेकै पाछले एक साल तै सबके पासने पाटरे सैं अर भाजपा आल्यां के तो कैहने ए के सैं। इननै आठ म्हिने हो लिए राज करते। आठे म्हिने मैं सबकी म्यां बुलां दी इननै। जनता की चूल हिला कै धरदी। मनै सोच्ची अक सरकार ताहिं सबक तो सिखाणा ए चाहिए। मेरा सीधम सीध तो ब्यौंत नहीं था किमै करण का तो मनै बैरी का हथियार बैरी पै चला दिया। घोड़े के तनाल लागती देखकै मिंडक नै बी पां ठाया। मतलब मेरी गेल्यां आलू, टमाटर, धनिया अर मिर्च ये सारे के सारे स्पीड पकड़गे। बाजपेई जी नै अपणी सफाई देवण मैं कसर नहीं घाली अर मेरे दाम तले नै ल्यावण की खातर बहोतै ताने तुड़वाये फेर कोण्या बात बणी अर जनता नै मध्य प्रदेश, राजस्थान अर दिल्ली मैं भाजपा की सफाई करदी।
बात न्यों बणी अक पाछले दिसम्बर की मेरी जितनी फसल होनी चाहिये थी उतनी कोन्या हुई। जिब मार्च मैं मेरी दूसरी फसल आई तै वा भी उम्मीद तै कम थी। यो इसा मौका था जित भाजपा सरकार चूकगी अर मेरा एक्सपोर्ट बन्द कोनी कर्या। मेरी पैदावार 15 प्रतिशत कम थी पर फेर बी सरकार ने अपने मुंह लागते ब्यौपारियों का भोभा भरण की खातिर मेरा 250,000 टन का (फसल का 8 प्रतिशत) एक्सपोर्ट कर दिया। सारे देस मैं हा हा कार माचग्या। हाय गंठा! हाय गंठा! सोमपाल जी बोल्या अक गंठे के भा बधवा के किसानां नै फायदा होगा। दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री बोले अक म्हारे प्राचीन ग्रन्थां मैं लिख्या सै अक प्याज खाये तै गुर्दे की पत्थरी होज्या सै ज्या करकै जनता नै प्याज नहीं खाणा चाहिये।
जून के म्हिने मैं सरकार के एक विभाग ने मेरे एक्सपोर्ट पै बैन लावण की सिफारिस बी करदी थी। फेर बाजार मार्किट दुनिया की का अपणे चहेत्यां ताहिं मजा दिवाण खातर सरकार नै कोण्या गोली या बात। सोमपाल जी के ब्यान मैं भी थोथ पाई। किसान कै भा बधण का फायदा कोण्या हुआ पर ब्यौपारी काच्ची काटगे। अर मेरी कीमत पचास पै पहोंचगी। करोड़ां करोड़ के वारे न्यारे होगे। जनता की जीभ बाहर लिकड़याई।
जित मेरी आत्मकथा नै जनता के ढीड ल्यादी उड़ै जनता नै भाजपा कै कील ठोक दी। फेर जनता ताहिं इस गंठाराम की एक अपील और सै अक जनता की ठुकाई ईबै पूरी नहीं होली सै। सब्जी मंडी नै देख कै ईब नाज मंडी बी रंग बदलती आवै सै। एक बै मुनाफा जिसके मुंह लागज्यागा फेर उसनै चैन तै कोनी बैठण देवै। पंजाब मैं जीरी की फसल बी कम होई सै। अक्तूबर मैं कुल सरकारी खरीद का 30 प्रतिशत लिया जाया करै फेर ईबकै यो कोटा घणा कम सै। ब्यौपारियां नै अपणे गोदाम भर लिये जीरी गेल्यां। क्यों भर लिये? इननै बेरा ला लिया अक इन्डोनेशिया अर बंगला देश मैं जीरी की फसल बहोत खराब गई सै। फिलीपीन की चावल की मांग घणी सै। पहलम थाइलैंड इन देशां नै चावल भेज्या करता पर ईबकै उसकी फसल की हालत बी आच्छी नहीं बतान्ते।
म्हारले देस के ब्यौपारी नै म्हारी चिन्ता कोण्या उसनै अपणे मुनाफे की चिन्ता फालतू सै ज्यां करकै चावल खरीद के गोदाम भर लिये। चावल भाजपा सरकार की आवण आले दिनां मैं ‘अग्नि परीक्षा’ लेगा। चावलां के भा मेरे भा तै भी ऊंची छलांग मारैंगे। दखे मेरे खाये बिना तै लोगां की सधगी थी पर चावलां बिना तै लोग एक दूसरे नै बुड़कम बुड़क्यां खावण लागज्यांगे।
1960 के जमाने में महंगाई का कारण था अक सूखा पड़ग्या था। पर ईब की महंगाई सै म्हारे ब्यौपारियों के मुनाफे की भूख करकै अर सरकार की नीति करकै। बस मेरा तै इतना ए कैहणा सै अक मैं जनता का था, जनता का सूं, अर जनता का रहूंगा।

अधखबड़ा माणस - म्हारा खरना

अधखबड़ा माणस - म्हारा खरना
कई बै जिब बात चालै तै बुद्धिमान माणस हरियाणे के बारे मैं न्यों कहवैं सैं अक आड़ै गिहूं की अर चावल की पैदावार तै बधगी अर लोगां धोरै रातू रात पीस्सा (काला धन घणा अर धोला धन थोड़ा) बी बधग्या पर सांस्कृतिक स्तर पै तो विकास कोण्या हुआ अर या बात सुणकै कई आडू न्यों कहवैंगे अक या झूठी बात सै। हरियाणा तै संस्कृति के मामले मैं पूरे भारत का पथ प्रदर्शक रह्या सै अर वे गिणवा देंगे कुरुक्षेत्र का कर्मक्षेत्र जड़ै महाभारत खेल्या गया अर गीता रची गई अर और बेरा ना के के। फेर झकोई आज के हिसाब मै कदे नहीं दिमाग पै जोर देकै सोच्चण की कोशिस करैं अक आज का हरियाणा के सै? न्यों तै कदे देश मैं नालन्दा अर तक्षिला मैं दूसरे देसां के लोग पढ़ण आया करदे फेर आज कड़ै सै ओ नालन्दा? आज का बिहार कित खड्या सै? हरियाणे मैं मनै दीखै सै अक आड़ै जुबान की भाषा का विकास तै होए नहीं लिया सै। आड़ै तै ईब ताहिं लठ की भाषा चालती आई सै, आज बी चालै सै अर बेरा ना और कितने दिन चालैगी? सुरड़ेपन तै, फुहड़पन तै जै कोए नेता कै अफसर रहवै तै न्यों कहवैंगे अक भाई कति ऑरिजनल सै। अपने पुराने रीति रिवाजां पै न्यों का न्यों टिकरया सै। हरियाणवी शिक्षा नै नौकरी तै दिवादी पर शिक्षित अर सभ्य माणस तै कोण्या पैदा करया। इसनै पैदा कर्या अधखबड़ा माणस। ये अधखबड़े माणस कई नेता होगे अर अफसर बणगे। काम चलाऊ, लंगड़ी लूली अर अधखबड़ी शिक्षा पनपी हरियाणा मैं। माणस नै माणस बणावण आली अर सूहर सिखावण आली, तर्क शक्ति बढ़ावण आली शिक्षा तै दूर-दूर ताहिं बी ना टोही पावन्ती आड़ै।
इसी कल्चरल बैकवर्डनैस का जीता जागता सबूत सै महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय। जिस दिन तै इसकी नींव धरी गई है उसे दिन तै यो पहलवानां का खाड़ा बणाकै छोड़ दिया। या लाइफ साइंसिज बणती बणती आज की बिचारी यूनिवर्सिटी बणा दी शेरां नै। आड़ै च्यार पांच पोस्ट सैं - पीएटू वायस चान्सलर, इस्टेबलिस्मैंट की शाखा का ए.आर., सीक्रेसी का ए.आर. अर दो एक और। इन पांच छै पोस्टां पै हर कौम के भाइयां नै कब्जा करकै अपनी अपनी कौम का अर यूनिवर्सिटी का सुधार करण के सपने देखे पर पूरे नहीं होए। फेर बी शेर जात्यां की कोली भरे बैठे सैं। आड़ै पहला वायस-चान्सलर आया बतरा साहब फेर सरकार नै उसकी टर्म पूरी नहीं होण दी। फेर डा. जे.डी. सिंह पी.वी.सी. बणकै आया। उसनै अपणा लठ पूरी यूनिवर्सिटी पै घुमाया अर बखत आवण तै पहलमै सरकार नै उसपै अपना लठ घुमा दिया। भाई नै बी टांडा टीरा ठाकै जाणा पड्या। फेर हरद्वारी लाल जी पधारे। उननै लोग खूब नचाये। सरकार नै ओ खूब नचाया अर सरकार अर हरद्वारी लाल दोनूं कचहरी नै नचाए। बीच मैं जे.डी. गुप्ता जी आये। उननै अपने करतब दिखाये। एस.एन. राव जी बी किमै सेवा कर पाये। हटकै हरद्वारी लाल जी नै फेर आकै पैर जमाये। राम गोपाल जी बी साल डेढ मैं तार बगाये। फेर कमान ले. जे.सी. अग्रवाल ताहिं दी अर अधम बिचालै खोस ली। फेर ब्रिगेडियर साहब का नम्बर आया इननै बी जमकै गुल खिलाया। एकाध टीचर इसा लाया जिसनै आज ताहिं नहीं पढ़ाया। तीसरे साल मैं बान्ध इनकै बी ला दिया था सरकार नै। फेर विवेक शर्मा जी आये। उस ताहिं ताहवण खातर छात्र बी भड़काये अर दूसरे तीर बी चलाये। कोर्ट कचहरी मैं जाकै पैंडा छुटवाया। फेर कौशिक साहब नै लगाम सम्भाली अर अपणा फौजी डण्डा घुमा दिया। अधम बिचालै सरकार नै फेर खूंटा गाड दिया अर खेमका साहब रजिस्ट्रार बणा दिये। जंग जारी सै।
सवाल यू सै अक चाहे कोए बी सरकार रही हो; सारी सरकारों का एकै सा ब्यौहार क्यों सै? चाहे किसा कसूता बुद्धिमान माणस इस वायस चान्सलर की कुर्सी पै आ बैठै उसका तौर तरीका एकै ढाल का क्यों रहया? उसनै अपणा लठ खूब घुमाया अर जिब सरकार नै लठ घुमाया तै चिल्लाया। दोनूआं की लठ की भाषा क्यों? आड़ै आकै जुड़ै सै ओ कल्चर अखरने का सवाल। हरियाणा नै तरक्की तै करली आर्थिक स्तर पै पर कल्चरल स्तर पै तै न्यों का न्यों पुराना खरना सै। अधखबड़े माणस, लठमार भाषा, झोटे आली गस, राज की ताकत का नसा ये सारी मिलकै आज का नजारा पेस करैं सैं। जै यूनिवर्सिटी मैं अर हरियाणा मैं बदलाव ल्याणा सै तै पहलम इस पुराने खरने नै बदल के आधुनिक, उदारवादी, प्रगतिशील खरने का विकास करना होगा। पर करैगा कूण?
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लड़ाई ही लड़ाई

लड़ाई ही लड़ाई
थामनै कई ढाल की लड़ाईयां के बारे में पढ्या होगा, सुण्या होगा अर देख्या होगा। घर मैं लड़ाई किसे ना किसे बात पै आपां रोजै करां सां। कितै मां बेटे की तकरार, किते भाई भाईयां मैं मारममार, कितै मुसलमानां पै होन्ते वार, कितै देवर भाभी मैं पड़ै सै दरार। बस बुझो मतना। फेर हिन्दुस्तान मैं एक न्यारे नमूने की लड़ाई शुरू होती दीखै सै। या किसी लड़ाई सै बेरा ना? संसद तै बाहर तै कांग्रेस अर भाजपा एक दूसरे के खून की प्यासी दीखै सै, एक दूसरे की खाट खड़ी करण मैं कसर नहीं छोड़ती फेर संसद मैं दोनूआं की एकै भाषा, एकै राग लागै सै। एक पाछै एक आवण आले विधेयकां - बीमा विधेयक, महिला आरक्षण विधेयक, पेटैंट विधेयक पै तै इन दोनू पार्टियां की गजलोट हुई दीखै सै। पर बीमा आले विधेयक पै भाजपा अर आर.एस.एस. मैं लड़ाई छिड़गी। बेरा ना या दिखावटी सै अक या असली सै? दूसरे कान्हीं अकाली दल मैं बादल अर टोहरा नै हथियार पिना लिये। छूट छुटावण करवाणिये अपने नम्बर बणावते हांडैं सैं। इनका यो बी नकली सौदा सै अक असली सै बेरा ना? एक और चाला देख्या लोगां नै तै बाट थी अक जयललिता वाजपेयी का धुम्मा ठावैगी फेर उसनै तै आपणा ए मोर्चा तोड़ कै धर दिया। ईब डण्ड बैठक काढ़ण लागरी सै बेरा ना किसनै तोड़ैगी अर किसनै बणावैगी? मुलायम सिंह यादव नै कांग्रेस कै खिलाफ तलवार खींच ली अर कांग्रेस नै राबड़ी देवी पै तीर कमाण कर राख्या सै तीर बेरा ना कद कमान मां तै छूटज्या। बीजू जनता दल वाले आपस मैं ए कब्ड्डी घालरे सैं। बेरा ना चाण चक दे सी यो के होग्या? ये नये-नये पाले खींचगे। किसके पाले मैं कौण जा खड़या होगा कुछ नहीं कह्या जा सकदा। गिरगिट की ढालां रंग बदलते वारै कोण्या लान्ते। पहलम आली सारी कतार बन्दियां बदलती दीखै सैं।
इलैक्शनां की जंग कांग्रेस अर भाजपा बिचालै लड़ी गई। कांग्रेस नै राजस्थान, मध्यप्रदेश अर दिल्ली मैं फेर पैर जमा लिये। कैहवणिया तो न्यों बी कहवैं सैं अक या लड़ाई गंठे अर बम्ब के बीच लड़ी गई। पर असल मैं या लड़ाई महंगाई अर जनता के बिचालै लड़ी गई। भाजपा तै महंगाई के रथ पै असवारी होरी थी अर कांग्रेस नै जनता अपणे कान्ध्या पै ठारी थी। तुलसीदास नै भी कह्या सै अक रावण रथी था ज्यां करकै ओ रथ पै सवार था अर रघुवीरा विरथ थे। ऊंह धोरै किसे रथ थे। रघुवीरा तै बांदरां के अर भालुआं के दम पै लड़या था। पर उस लड़ाई मैं तै रथी हारया था अर विरथी जीतया था। म्हारे प्राचीन संस्कृति के वाहक तै बिना रथ के कोए बी लड़ाई कोन्या लड़ते। बेशक वे रघुवीरा के भक्त सै फेर लैक्शन की पाछली लड़ाई तै उननै रथ यात्रा की बदोलतै जीती थी। जै आडवाणी जी रथ पै सवार नहीं होन्ते तो दो सांसद आला यो सीमित सुखी परिवार इतना बड्डा कुणबा क्यूकर बणता? ईब या न्यारी बात सै अक इसतै म्हारी पुराणी संस्कृति गैल्यां खिलवाड़ हुया अक नहीं हुया? इबकै भी आडवाणी जी महंगाई के रथ पै सवार हो लिए। रथ तो रथै हो सै या बात न्यारी सै अक यो पहलड़े रथ बरगा टोयटा आला रथ नहीं था जिसकी तामझाम तै सौ कोस तै बी दीखै थी। पर इबके रथ मैं महंगाई भव्य थी। जिसी आडवाणी जी के रथ नै हा हा मचाई थी कुछ उसे ए ढाल की हालत इस महंगाई नै बणादी। फेर उस हा हाकार नै तो आडवाणी जी पै वोटां की बरसात करदी थी अर इस बर की नै चुनावी हार का तमगा दे दिया।
इस चुनावी लड़ाई पाछै इसा लागण लाग्या था अक ईब साचली लड़ाई शुरू होवैगी। महाभारत का युद्ध जणो तै हटकै नै लड़या जागा। पाले बंदी बदलैगी। नये मोर्चे बनैंगे। सरकारी मोर्चा टूटैगा अर नया मोर्चा सरकार बणावैगा। फेर सरकारी मोर्चा तै न्यों का न्यों सै हां बिचारी जयललिता का मोर्चा जरूर टूटग्या। लोग बाट देखैं थे अक वाजपेई जी आज गया कै काल गया। जयललिता जी तै न्यारा भला और कोण तोड़ सकै सै सरकारी मोर्चे नै? जार्ज साहब तै-समता बेशक टूटो पर भाजपा की सरकार बच ज्याओ - इस अभियान पै जोर तै मंडरे सैं। काम जार्ज ताहिं देश की रक्षा का सौंप राख्या फेर आण्डी रक्षा वाजपेई की सरकार की करण लागरया सै। समता पार्टी मैं कई जणे मंत्री बणन के नाम पै सिंगरे हांडैं सैं फेर नम्बर कोन्या आ लिया सै भाइयां का। वे बड़े दुखी सैं अक जार्ज अर नीतिश कुमार तै मंत्री होगे अर हम सूके के सूके राख राखे सां।
उननै दुख इस बात का भी सै अक वाजपेई जी आपणे तै तीन मंत्री बणा लिये अर बाकी सबनै भूलगे। बड़ा चाला कर दिया। साहब सिंह जी वर्मा नै भूलगे उस तांहि तै उननै अपणें हाथ तै चिट्ठी लिखकै मंत्री बणण का न्यौता दिया था। जै वाजपेई जी न्यों न्यौते निधारां मैं गड़बड़ करैगा तै जनता बिगड़े बिना नहीं मानैगी। फेर वाजपेई जी बी किस किस नै याद राखैं?
एक चीज समझ मैं कोण्या आई इस लड़ाई की अक लड़णा तै भाजपा अर कांग्रेस आई नै चाहिये था। पर ये दोनूं तै नेड़े नेड़े नै आवंते दीखैं अर भाजपा गैल्यां जिननै घी खिचड़ी रैहना चाहिए था वे भाजपा तै दूर होन्ते जावैं सैं, इसकै खिलाफ बोलैं सैं। 11 दिसम्बर की हड़ताल मैं कांग्रेस नै समर्थन करणा चाहिये था पर कोनी करया। जयललिता नै समर्थन करया अर बीजू जनता दल नै करया। संघ परिवार भी इन विधेयकां नै ले कै भाजपा सरकार कै खिलाफ आण डट्या मैदान मैं। इननै तो कठ्ठा रहणा चाहिये था आपणी परंपरा निभाणी चाहिये थी। पर ये आपस मैं लड़ण लागरे सैं। बीजेपी तै अनुशासन आली पार्टी बताई जा थी तो यो चौड़े सड़क पै ईब के होण लागरया सै? यो हो के रहया सै? या किसी लड़ाई सै? न्यों कहया करैं अक झोटे-झोटे लड़ै अर झाड़ां का खोह। इन राजनेतावां नै या जनता ईब झाड़ बोझड़े समझनी छोड़ लेनी चाहिये। जनता रैफरी बण कै इस सारी लड़ाई नै देखण लागरी सै। जनता की रैफरसिप बड़े बड़यां नै रैफरसिप सिखा दे सै फेर भाजपा, कांग्रेस, मुलायम, कांशी अकाली, लालू अर जयललिता किस खेत की मूली सैं? देश की जनता अपणे अनुभव तै सीखण लागरी सै अर एक बख्त इसा जरूर आवैगा जिब जनता की राजनीति करणियां की जीत जरूर होगी।