युवाओं, दलितों और महिलाओं से उम्मीदें
गांव की इज्जत के नाम पर होने वाली जघन्य हत्याओं की हरियाणा में बढ़ोत्तरी हो रही है। समुदाय, जाति या परिवार की इज्जत बचाने के नाम पर महिलाओं को पीट-पीट कर मार डाला जाता है। उनकी हत्या कर दी जाती है या उनके साथ बलात्कार किया जाता है। एक तरफ तो महिला के साथ वैसे तो इस तरह का व्यवहार किया जाता है जैसे उसकी अपनी कोई इज्जत ही न हो, वहीं उसे समुदाय की इज्जत मान लिया जाता है और जब समुदाय बेइज्जत होता है तो हमले का सबसे पहला निशाना वह महिला और उसकी इज्जत ही बनती है। अपनी पसंद से शादी करने वाले युवा लड़के लड़कियों को इस इज्जत के नाम पर सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटका दिया जाता है। यहाँ के प्रसिद्ध सांगियों व लोक कवियों हरदेवा, लख्मीचंद बाजे, भगत, मेहर सिंह, मांगेराम, चंद्रवादी, धनपत, खेमचंद व दयाचंद की रचनाओं का आलोचनात्मक गुणगान तो बहुत किया गया या हुआ है मगर उनकी आलोचनात्मक समीक्षा की जानी अभी बाकी है। रागनी कंपीटीशनों का दौर एक तरह से काफी कम हुआ है। आडियो कैसटों की जगह, सीडी लेती जा रही है जिनकी सार वस्तु में पुनरुत्थानवादी व उपभोक्तावादी मूल्यों का तालमेल साफ नजर आता है। हरियाणा के लोकगीतों पर भी समीक्षात्मक काम कम हुआ है।
गहरे संकट के दौर में हमारी धार्मिक आस्थाओं को सांप्रदायिकता के उन्माद में बदलकर हमें जात, गोत्र व धर्म के ऊपर लड़वा कर हमारी इन्सानियत के जज्बे को, हमारे मानवीय मूल्यों को विकृत किया जा रहा है। गऊ हत्या या गौरक्षा के नाम पर हमारी भावनाओं से खिलवाड़ किया जाता है। दुलीना हत्याकाण्ड और अलेवा काण्ड गऊ के नाम पर फैलाए जा रहे जहर का ही परिणाम हैं। इसी धार्मिक उन्माद और आर्थिक संकट के चलते हर तीसरे मील पर मंदिर दिखाई देने लगे हैं।
सांस्कृतिक स्तर पर हरियाणा के चार पांच क्षेत्र हैं और इनकी अपनी विशिष्टताएं हैं। हर गाँव में भी अलग-अलग वर्गों व जातियों के लोग रहते हैं। जातीय भेदभाव गहरी जड़ें जमाए है। आर्थिक असमानताएं बढ़ रही हैं। सभी सामाजिक व नैतिक बन्धन तनावग्रस्त होकर टूटने के कगार पर हैं। बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ी है। मजदूरी के मौके भी कम से कमस्तर होते जा रहे हैं। मजदूरों का जातीय उत्पीड़न भी बढ़ा है। दलितों पर अन्याय बढ़ा है। कुएँ अभी भी अलग-अलग हैं। परिवार के पितृसत्तात्मक ढांचे में परतन्त्रता बहुत तीखी हो रही है। पारिवारिक रिश्ते नाते ढहते जा रहे हैं। जनतान्त्रिक परिवार बन नहीं पा रहे। इस सबके चलते महिलाओं और बच्चों पर काम का बोझ बढ़ता जा रहा है। मजदूर वर्ग सबसे ज्यादा आर्थिक संकट में है। खेत मजदूरों, भट्ठा मजदूरों, दिहाड़ी मजदूरों व माइग्रेटेड मजदूरों का जीवन-संकट गहराया है। लोगों का गाँव से शहर को पलायन बढ़ा है। कृषि में मशीनीकरण बढ़ा है। तकनीकवाद का जनविरोधी स्वरूप ज्यादा उभर कर आया है। जमीन की ढाई एकड़ जोत पर 80 प्रतिशत के लगभग किसान पहुँच गया है। ट्रैक्टर ने बैल की खेती को पूरी तरह बेदखल कर दिया है। बैल गया तो गाय की महत्ता भी गिर गई। थ्रेशर और हारवेस्टर कम्बाइन ने मजदूरी के संकट को बढ़ाया है। श्यामलात जमीन खत्म हो गई है। कब्जे पर ले ली गई या बाँट ली गई है। अन्न की फसलों पर संकट है। पानी की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है। नए बीज, नए उपकरण, रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाओं के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की दखलन्दाजी और मनमानी लूट ने इस सीमांत किसान के संकट को बहुत बढ़ा दिया है। किसान वर्ग के इस हिस्से में उदासीनता गहरे पैठ गई है और एक निष्क्रिय परजीवी जीवन ताश खेल कर बिताने की प्रवृत्ति बढ़ी है। हाथ से काम करके खाने की प्रवृत्ति का पतन हुआ है। साथ ही साथ दारू व सुलफे का चलन भी बढ़ा है और स्मैक जैसे नशीले पदार्थ की खपत बढ़ी है। सच में कहें तो युवा को नशे के माध्यम से दिशाभ्रमित करने का जाल बिछाया जा रहा है। मगर बड़े हिस्से में एक बेचैनी भी बखूबी देखी जा सकती है। मल्टीनेशनल मालामाल हो रहे हैं, भारतीय कारीगर भुखमरी की ओर जा रहा है। आसामी सिल्क, बालूचेरी की कारीगरी, कटकी, पोचमपाल्ली या बोकई के कारीगरों को मल्टीनेशनल की होड़ में खड़ा कर दिया गया है। अब इस गैरबराबरी की होड़ में भारतीय कारीगर चाहे वह किसी भी क्षेत्र का हो, कैसे टिक पायेगा? दुनिया का 1/8 भाग भूखा है। अब मैकडोनाल्ड को ही लिया जाए यह महानगरों तक कहाँ सीमित है? अब तो शहर शहर, गली-गली में मैकडोनाल्ड, हमारे बच्चों को बर्गर, पिज्जा-बर्गर के उपहार देकर खाने की आदत डालेगा, रिझायेगा, फंसाएगा ताकि कल को वह पूरी, पराठा, इडली-डोसे भूल जाएं और ‘‘बर्गर-पिजा’’ के बगैर रह ही न पाए। बच्चे ही देश का भविष्य हैं जिसने उनको जीता उसी की तूती बोलेगी कल पूरे देश में। आज भारत में युवा की संख्या सबसे ज्यादा है। पहले जैसे साम्राज्य स्थापित करने के लिए देश विशेष की संस्कृति कारीगरी, हुनर, व्यवसाय एवं शिक्षा को नष्ट किया जाता था ताकि साम्राज्य की पकड़ देश विशेष पर और मजबूत हो। इसी प्रकार व्यवसाय, शिक्षा एवं संस्कृति पर ही हमला बोला जा रहा है और हमारे मीडिया इस हमले में मल्टीनेशनल की भरपूर सहायता कर रहे हैं।
हरियाणा में अब गुंथा हुआ आटा, अंकुरित मूंग, चना, बाजरा, मक्की इत्यादि भी विदेशी कम्पनियाँ लाया करेंगे। कुकीज, चाकलेट व केक हमारे घर की शोभा होंगे, जलेबी और रसगुल्ले अतीत की यादगार होंगे। भारतीय कुटीर उद्योग के साथ-साथ अन्य कम्पनियां भी मल्टीनेशनल के पेट में चली जाएंगी। सवाल यही है कि क्या बिना किसी विचार के इतना अन्याय से भरा असमानताओं पर टिका समाज टिका रह सकता है? यदि नहीं तो इसके ठीक उलट विचार भी अवश्य है जो एक समता पर टिके न्यायपूर्ण समाज की परिकल्पना रखता है। उस विचार से नजदीक का संबंध बनाकर ही इस बेहतर समाज के निर्माण में हम अपना योगदान दे सकते हैं। इसके बनाने के सब साधन सी दुनिया में मौजूद हैं। जरूरत है उस नजर को विकसित करने की। आज मानवता के वजूद को खतरा है। यह एक देश का सवाल नहीं है। पूरी दुनिया का सवाल है। जिस रास्ते पर दुनिया अब जा रही है इस रास्ते पर मानवता का विनाश निश्चित है। नव दुनिया यह सब समझ रही है। हरियाणावासी भी समझ रहे हैं। मानवता अपनी गर्दन इस वैश्वीकरण की कुल्हाड़ी के नीचे नहीं रखेगी। मानवता का जिन्दा रहने का जज्बा और मनुष्य के विचार की शक्ति ऐसा होना असम्भव कर देगी। हरियाणा में नव जागरण ने अपने पाँव रखे हैं। युवा लड़के-लड़कियां, दलित और महिलाएं इसके अगवा दस्ते हैं और समाज सुधार का काम अपनी दिशा अवश्य पकड़ेगा। मानवता को नष्ट नहीं होने दिया जाएगा।
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