रमलू एक दिन ठमलू नै बोल्या - मेरे एक बात समझ म्हं नहीं आन्ती अक ये वामपंथी इन आर्थिक नीतियां के पाछै क्यूं हाथ धोकै पड़रे सैं? ठमलू बोल्या - ‘बेरा तो मनै बी कोण्या घणा-सा एक बात सै इनकी बात ईब साची सी लागण लागली। पहलम तो जंच्या नहीं करदी फेर ईब जेजावट होन्ती आवै सै।’ रमलू - वा क्यूकर भाई? दीखै सै थोड़ा घणा असर इन वामपंथियां का तेरै भी हो लिया। ठमल्यू बोल्या - ‘मैं तो वामपंथी कोण्या।’ तो फेर ’’ यू आर्थिक सुधार, सुधार की जागां समाज म्हं बिगाड़ पैदा कररे सैं तूं इस बात की हिम्मात क्यूं करै सै? रमलू नै फेर टोक दिया ठमलू। सारे गाम पै नजर मारकै देख्ख ली जो इन आर्थिक सुधारां के नफे नुकसान के बारे म्हं बता सकै फेर कोए माणस नहीं पाया। रमलू बोल्या - चाल रोहतक चालांगे उड़ै ज्ञान-विज्ञान आल्यां धोरै बूझकै आवांगे इनके बारे म्हं। ठमलू बोल्या - रोहतक जावण का भाड़ा लेरया सै? रमलू चुप होग्या। थोड़ी-सी वार म्हं फेर बोल्या - अपणे गाम की वा सुरते की बहू नहीं सै हो सकै सै उसनै किमै बेरा हो इसके बारे म्ह। ठमलू बोल्या - गाम के किसी बी मर्द नै नहीं बेरा तो उस बहू नै क्यूकर बेरा हो सकै सै? रमलू बोल्या - मेरे पक्की जंचै सै, उसनै बेरा सै पर उसतै बात क्यूकर करांगे? ठमलू बोल्या - बात तो कर ल्यांगे फेर करण कूण देवै सै? पांच मिनट चुपचाप बैठे रहे। रमलू बोल्या - रै ठमलू भाभी नै ले चाल अपणी गेल्यां फेर कोए कुछ ना कहवै। तीनूं चाले गये सरोज के घरां। बात शुरू होगी। सरोज नै टूटी फूटी भाषा म्हं बताया। फेर जो बताया उसनै रमलू ठमलू के दिमाग के सारे पट खोल दिये। बेरा ना थारे खुलैंगे अक नहीं खुलैंगे।
एक बात या अक 1998 के जुलाई के महीने ताहिं 1308 आइटमां पर तै आयात पाबंदी हटा ली थी जिसका घरेलू उत्पादन पै सत्यानााशी असर पड़या। दूसरा बीमा, दवा, होटल, पर्यटन, हवाई अड्डे, बंदरगाह आदि म्हं सौ फीसद बदेशी पूंजी की लूट खात्तर दरवाजे खोल दिये। दूरसंचार म्हं 75 फीसद अर बैंकां म्हं 49 फीसद प्रत्यक्ष बदेशी निवेशां की इजाजत दे दी। रक्षा उत्पादन म्हं भी बाड़ ली ये बदेशी कंपनी 26 पीस्से का हिस्सा दे कै। यू तो घणा नाजुक मसला हो सै। तीसरा, कोयले के बेरोक-टोक आयात की इजाजत दे दी। म्हारी अपणी खानां के बंद होवण का खतरा पैदा होग्या। बदेशी कंपनियां ताहिं कोले की खाण अर कोले के उत्पादन के अधिकार भी थम्बा दिये शेरां नै। चौथी बात अक इस्पात मतलब स्टील के आयात की इजाजत देकै स्टील कंपनियां कै कंपकंप चढ़ा दी। पांचवीं बात अक बिजली की जो दुर्गति करी सै वा सबकै साहमी सै। एनरॉन नै किसी लूट मचाई अर फेर भाज खड़ी हुई। 13 दिन के शासन काल म्हं हटकै इस कंपनी ताहिं यू ठेका दिया था भाजपा नै। छठी बात अक तेल की खोज की खात्तर 48 ब्लाक बदेशी कंपनियां कै हवाले कर दिये। घरेलू उत्पाद घटग्या अर बाहर तै तेल मंगवाण के कारण भुगतान संतुलन की दाब बधगी। जो पेटेंट का कानून हटकै बणाया सै उसतैं दवाईयाँ की कीमत खासकर बधगी। लघु उद्योग तो धड़ाधड़ बंद होवण लागरे सैं। इन सारी बातां के असर का अंदाजा इस बात तै लाया जा सकै सै अक वित्त वर्ष दो हजार के आखिर म्हं भारत सरकार की कुल देनदारियां 11,20,049 करोड़ रुपइयां की थी। मतलब देश के सकल घरेलू उत्पाद के 57.23 फीसद कै बरोबर। पाछले तीन बरस म्हं ए इन देनदारियां म्हं तीस हजार करोड़ रुपइयां की बढ़ोतरी होगी। इन देनदारियां पै ब्याज-ब्याज का भुगतान 12,20,00 करोड़ रुपइये सालाना तै ऊपर जा लिया। रमलू और ठमलू सरोज की बात सुणकै ठगे सै रैहगे। उल्टे आवन्ते आवन्ते सोचैं थे अक के बेरा था इतना कर्जा होरया सै म्हारे देश पै। चालदा रमलू बोल्या - भाई ज्ञान विज्ञान की कार्यकर्ता नै ज्ञान बहोत सै। न्यों काई सी छांटदी। ईब तै म्हारे पै सै इसका समाधान टोहवण का काम।
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