बुधवार, 22 मार्च 2017

SAMBHALO

सम्भलो 
संभालो बारूद के ढेर पर बैठे हैं हम ।  फांसी का कर या गोली से हो जाती हैं कई जान कम । गाँधी के देश में कैसे और क्यों उगी बंदूकों की फसल ? भारतीय संस्कृति  क्यों हो रही विफल ? कहाँ गयी हम सब की वह भारतीय अक्ल ।  गाँधी को भी भुला दिया ज्यों ही किया क़त्ल । छोटे हथियारों का मामला दूजा नंबर था कुछ दिन पहले अब पहला नंबर  हो गया हथियारों की खरीद में ।  कानून 1858 का आज भी हमारा है ।  मुझे बदल दो मैं तो हो गया नाकारा हूँ वह बोल रहा ।  उन्नीस सौ बासठ के बस एक संसोधन का सहारा है ।  सब चलता है यारो यहाँ सब मत खाओ गम । एक तरफ ये नारा होड़ ख़त्म हो हथियारों की ।  दूजे तरफ नुमाईश लगाई दुकानदारों की ।  छह सौ देशी और विदेशी से ज्यादा इनके ही सरदारों की ।  हथियारों को बनाया तो चलेंगे किते ना किते तो जरूर कहीं पर ।  चलैंगे तो ज्यान भी लेंगे पास कै  फेर दूर किते ।  हथियार ख़त्म हों नारे बस हवा में घुमते रहते हैं अब कभी कभी , हथियारों का व्योपार बढ़ रहा है । बारूद के ढेर पर बैठे सां हम ।  तो के किया जावै ? म्हारे बच्चों को तो ट्यूशन तैं  फुरसत कोणी , पड़ौसी का बच्चा भगत सिंह  ज्यावै ।  अर इस गंदे समाज नै ठीक करने का बीड़ा ठा लेवै । सौ दो सौ रपिये की मदद साल छह मिहने मैं म्हारे तैं भी आकै लेज्यावै । इन जालिमों की हकूमत कब तक चलेगी रै ? गरीबों की बात कदे तो बनैगी रै । सवाल यु सै अक  बारूद के ढेर पर तो भारत देश बैठाया सै फेर करया जावै तो के करया जावै ? एक कवी की लिखी कुछ बातें शायद इस बख्त सही हों -- भारत को सही तस्वीर की फिलहाल जरूरत सै ।  बुराई फैलती जा रही थी इस भारत के समाज मैं ।  सावित्री बाई फुल्ले और ज्योतिबा फुल्ले उभरे थे नए अंदाज मैं । दोहों वाले उस कबीर की फिलहाल जरूरत सै ।  अंडी फंडी पाखंड के खिलाफ जमकै 
लड़ी लड़ाई जिसनै उस आंबेडकर फ़कीर की जरूरत सै । 1857 मैं हजारों फांसी का फंदा चूम गए  । राज गुरु सुख देव  आजादी की खातर झूम गए । उस भगत सिंह  रणधीर की फिलहाल जरूरत है । जालियां वाले बाग़ मैं जिसने गोलियां चलायी देखो ।  जालिम डायर पै लन्दन मैं गोली चलायी देखो । उस उधम सिंह बलबीर की जरूरत सै । मजदूर किसान की खातर जिंदगी ही गुजार दई ।  मार्क्स नै दुनिया बारे एक नयी विचार दई  ।   मार्क्सवादी सूरवीर की की फिलहाल जरूरत है । महिला दलित का दोस्त हो जो आज चाहिए समाज इसा । पूंजीवादी राज अन्यायी खत्म हो मंदी का राज ईसा । इसकी तोड़ने की जंजीर  फिलहाल जरूरत सै । पूरा समाज रसातल की तरफ धकेल जा रहा है यो । तलछट पे फैंके  लोगों को समझ आ रहा है यो । एक पैनी नजर गंभीर की फिलहाल जरूरत सै । आज बख्त पीस्से आल्याँ का सै बाजार का सै ।  फेर बख्त गरीब मानस का जरूर आवैगा ।  हैवानियत के उप्पर इंसानियत एक दिन जीत जरूर दर्ज करवावैगी ।  फेर यूं अपने आप कोन्या होवै ।  समझदार अर ईमानदार लोगों नै आगै  आना पड़ेगा । आज के सिस्टम का गोरख धंधा समझना और समझाना  पड़ैगा  ।  संघर्ष का बिगुल  मिलजुल कै और तेज़ी तैं बजाणा पड़ै गा ॥ 
रणबीर 
22 . 3 . 2017 

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