गुरुवार, 5 जनवरी 2017

कुत्ता अर माणस


मेरे याड़ी की कार जिब कोठी मैं बड़ली तै उतरती हाणां मनै बूझै लिया, ‘‘कुत्ता तै नहीं पालरे सैं?’’
मेरा याड़ी बोल्या, ‘‘के बात सै? इतना डर क्यों लागै सै कुत्ते तैं?’’ मनैं अपणी बात ऊपर राखण ताहिं जवाब दिया, ‘‘आदमी की शक्ल मैं कुत्ते तै डर कोण्या लागता मनै। उसतै तै मनै निबटना आवै सै। पर साच माच के नसली कुत्ते तै बहोत डर लागै सै।’’
असल मैं कुत्त्यां आले घर मनै आच्छे कोण्या लागदे। कुत्ते आले घरां मैं सबतै पहलम कुत्ता स्वागत करैगा भों भों करकै। तुड़ाइया कर देगा छाती पै चढ़ण खातर। घरक्यां तै ‘राम रमी’ तै हुई ना होन्ती फेर कुत्ता गाली देवण लागज्या सै।’’ आया स्साला बटेऊ। सिफारिस करवानी होगी कै रिश्वत देणी होगी। भाजज्या आड़े तै।’’ इसा लागैगा जणों भों भों करकै ओ नसली कुत्ता म्हारे भीतर की बात जाण कै हमनै नसीहत करण लागरया हो। मनै तो कुत्ते के काटण का सिंह के टपके तै भी फालतू डर लागै सै। असल मैं डर सै उन चौदा टीक्यां का जो डाक्टर पेट मैं घुसेड़ै सै। वरना तै कुत्ते के काटण तै कोण डरै सै चाहे दो बर बुड़का भर ले कुत्ता तै। आजकाल पेट की जागां बांह मैं लागण आले टीके आगे। पर पेट आले टीके तै मुफ्त लाग्या करते। पर ये बांह आले टीके तै तीन सौ रुपइयां का एक लागै सै अर सात लुआणे पड़ैं सैं। यो टीका तै पूरे कुण्बे पै मार करै सै।
फेर एक बात देखण मैं आवै सै अक कुछ माणस तै कुत्ते तै भी जहरीले हों सैं। एक माणस कै कुत्ते नै दांत गड़ा दिये। दूसरा बोल्या, ‘‘बस मिर्च बान्ध द्यो इसकै। बाकी कुछ ना होवै। उस कुत्ते की सम्भाल करो, इसका कुछ नहीं बिगड़ैगा। टीके लुआणे सैं तै उस कुत्ते कै लुआओ। कई बै कइयां के घरां के दरवाज्यां पै लिख्या पावैगा अक कुत्यां तै सावधान। ईब बेरा ना उन घरां मैं माणस रहैं सैं अक निरे कुत्ते ए रहवैं सैं? यो सवाल खामैखा का सवाल कोण्या। कोए कोए माणस तै कुत्ते तै बी गुजरया हो सै। किसे विचारक नै लिख्या सै अक जै थाम किसे कुत्ते नै रोटी खवा द्यो तै ओ थामनै कोनी काटै। माणस मैं अर कुत्ते मैं योहे असली फर्क सै। माणस सब किमै खाकै बी कितने बुड़के भरदे इसका कोए भरोसा नहीं।
म्हारे पड़ौस मैं एक साहब सैं उनका सै झबरू कुत्ता। ऊंची कद काठी, काला भूरा रंग, कान खड़े, लाम्बी पूंज। उस ताहिं तीन किलो दूध रोज का प्याया जा सै। म्हारे घरां हम पांच माणस सां ढाई किलो दूध हांग्या पुगै सै। 50-60 करोड़ माणस तै म्हारे देस मैं इसे बी होंगे जिनका ब्यौंत एक किलो रोज का दूध लेवण का भी कोण्या। उस अलसैसन कुत्ते ताहिं हफ्ते मैं तीन किलो मीट ख्वाया जा सै। म्हारे घर मैं तै आज ताहिं मीट बण्या ए नहीं सै बस कितै पार्टियां मैं दां लाग ज्या तै मुर्गे की एकाध टांग थ्याज्या सै। कम तै कम 70-80 करोड़ माणस तै इसे होंगे जिननै मुर्गी खाकै देखण का मौका ए ना मिल्या हो।
एक बै यो अलसैसन बीमार होग्या तै सारे कुण्बे के पासने पाटरे कदे इस डाक्टर नै बुला अर कदे उस डाक्टर नै बुला। कुत्ते के खाज की बीमारी होगी थी। बड़ी मुश्किल तै काबू मैं आई। दसियां हजार का बिल बैठ ग्या। डांगरां आला डाक्टर बी आण्डी ए था कोए। कुत्ते कै खाज किसके तै लागी इसकी खोज करण लागग्या शेर। पन्दरा दिन गाल दिये खोज करण मैं। फेर आखिर मैं बेरा लाग्या अक घर के मालिक कै खाज होरी थी उसके तै कुत्ते कै बी लागगी। कई डाक्टरां का बड़ा बढ़िया काम चालरया सै इन पालतू कुत्त्यां के कारण। कई लोगां नै तै कई नसली कुत्तिया पाल राखी सैं। उनतै बढ़िया नसल के पिल्ले बणावैं सैं अर पांच तै लेकै दस हजार ताहिं बेचैं सैं एक पिल्ला। मांग आल्यां की लाइनै टूट कै नहीं देन्ती। या न्यारी बात सै अक जो माणस इन कुत्त्यां की दिन रात सेवा करै सै उस ताहिं बारह सौ रुपइये म्हिने के भी कोण्या मिलते। साल मैं मालिक की कमाई यो करवादे एक लाख तै ऊपर अर इसनै साल के दस हजार (एक कुत्ता) भी नहीं मिलते।
आज के जमाने मैं यो कुत्ते पालण का शौक़ सबके बसका कोण्या। किसके बसका सै या दुनिया आच्छी ढाल जाणै सै। एक कुत्ते पालण का शौक सै अर एक कुत्ता पालण की मजबूरी सै। इन दोनूं बातां मैं जमीन आसमान का अन्तर हो सै। जिस दिन इस अन्तर की असलीयत का जनता नै बेरा लाग ज्यागा उस दिन चाला ए पाटैगा।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें