सोमवार, 26 सितंबर 2016

हरया भरया हरियाणा

हरया भरया हरियाणा
आज तै दस-बारा साल पहलम के हरियाणा की तसबीर कुछ और थी फेर आज की तसबीर बहोत घणी बदलगी। अर और बी तेजी तै बदलती जावण लागरी सै। ठीक सै समाज परिवर्तनशील बताया सै म्हारे बड़े बडेर्यां नै। बदल भी दो ढाल की बताई सै - एक पाछे नै जावण की अर दूसरी आगे नै जावण की। ईब न्यों क्यूकर तय होवै अक आपां आगे नै जावण लागरे सैं अक पाछे नै। एक बात याद आगी। एक बै भैंसवाल मैं गाम के लोगां नै राय बना ली अक या चौपाड़ ठीक जागां पै कोन्या इसनै दूसरी जागां पै लेजावांगे। गाम कट्ठा होकै लाग्या धकावण चौपाड़ नै एक रात नै। इसी हुई अक मींह बरसग्या अर जोर लावणिये माणसां के पैर फिसलण लागगे तो उननै समझी अक चौपाड़ सरकण लागरी सै। लागे रहे सारी रात धक्के मारण। तड़का होग्या तो देख्या अक चौपाड़ तो एक इंच बी ना सरक री थी। न्यों ए राजस्थान मैं जिब रूपकंवर ताहिं सती के नाम पै जिन्दा जलाया गया तो इसका विरोध करया गया पूरे हिन्दुस्तान मैं। फेर सती जिसी कुप्रथा नै अपनी बढ़िया परम्परा बता कै डेढ़ लाख लोग कट्ठे होकै न्यों बोले - हम तो जलावांगे औरतां नै। ईब जै यो आगै बढ़ना सै तो फेर के कह्या जा सकै सै ?
इन सालां मैं एक नई बला और आई सै अर वा सै वैश्वीकरण अर उदारीकरण की। या विकासकारी सै अक विनाशकारी सै, फेर इसनै अपने पत्ते खोलने शुरू कर दिये सैं। यों सब किमै इतनी रफ्तार तै होवण लागर्या सै अक इसनै ठीक-ठीक ढंग तै अर सही तरीके तै देख पाणा अर समझ पाणा बहोत मुश्किल होत्ता जावण लागर्या सै। इन नये उपनिवेशवादी बुलडोजर नै अपने करतब दिखाने शुरू कर दिये सैं। म्हारे ढेर सारे प्राकृतिक संसाधनां पै अर सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन पै कसूता हमला बोल राख्या सै अर इननै काबू में लेत्ता जावण लागर्या सै। अपने मनमाने ढंग तै इननै लूटण की कोशिश दिनों दिन बढ़ा दी सैं। अर हम ताश खेलण ला दिये अक हमनै इनके खेल का बेरा ना लागज्या। पहलम तै केन्द्र सरकारै इनके इशायरयां पै नाचया करदी फेर ईब तै ये राज्यां की सरकार भी सधे-सधाये तरीके तै विश्व बैंक अर बहुराष्ट्रीय निजी निगमां की धुनां पै नाच्चण लागली।
म्हारा हरियाणा कृषि प्रधान देश रहया सै। इस क्षेत्र मैं राज्य के समर्थन अर सुरक्षा के माहौल मैं आड़े के किसान नै अर खेत मैं काम करण आले मजदूर नै अपने खून-पसीने की मेहनत तै हरित क्रान्ति के दौर में खेती की पैदावार को एक हद ताहीं बढ़ाया। इस हरित क्रान्ति करकै हरियाणा के एक तबके मैं सम्पन्नता आई पर ज्यादा बड़ा हिस्सा इसके फल प्राप्त नहीं कर सक्या। ईब यो समर्थन अर सुरक्षा का तान-बाना टूट लिया अर हरियाणा मैं कृषि का ढांचा बैसकण लागरया सै, असल मैं तो बैसकै लिया। अर इसनै बैसकण तै बचावण के नाम पै जो नई कृषि नीति परोसी जावण लागरी सै उसके पूरी तरियां लागू होयां पाछै आवण आले बख्तां मैं ग्रामीण आमदनी, रोजगार, मजदूरी अर खाद्य सुरक्षा की हालत बहोत भयानक रूप धारण करण आली सै। दूजै कान्हीं जै गौर करके देखां तै सेवा क्षेत्र मैं छंटनी अर असुरक्षा का आम माहौल बनता जावण लागरया सै। कई हजार कर्मचारियों के सिर पै छंटनी की तलवार चाल ली अर बाकी कई हजारां के सिर पै लटकण लागरी सै। सैंक्ड़यां फैक्टरी बंद होली, सैंक्ड़या कारखाने पलायन करकै दूसरे प्रदेशां मैं चाले गये अर छोटे-छोटे कारोबार चौपट होवण लागरे सैं। संगठित क्षेत्र सिकुड़ता जावण लागरया सै अर असंगठित क्षेत्र का तेजी तै विस्तार होता जावण लागरया सै। शिक्षा के अर स्वास्थ्य के क्षेत्र मैं बाज़ार व्यवस्था का लाचली अर दूषणकारी खेल सबकै साहमी ईब आणा शुरू हो लिया। जो ढांचे समाज नै अपने हाथां तैं खड़े करे थे उनको ध्वस्त करण की कै बेच्चण की मुहिम तेज होती जावण लागरी सै।
हरियाणा के जीवन के आगामी मानचित्र मैं गरीब अर कमजोर तबकों, दलितों, युवाओं और खासकर महिलाओं का अशक्तीकरण, इन तबकों का और बी हासिये पै फेंक्या जाना साफ तौर पर उभर कै साहमी आवण आला सै। इन तबकों का अपनी जमीन से उखड़ने व दरिद्रीकरण का भगदड़ भर्या दौर शुरू हो लिया अर आवण आले बख्त मैं और तेज होवण आला सै। हरियाणा मैं इस बख्त शिक्षित, अशिक्षित अर अर्द्धशिक्षित युवा लड़के व लड़कियां मारे-मारे घूमते फिरैं सैं।
पाछले सालां मैं हुये बदलावों के साथ-साथ आई छद्म सम्पन्नता, सुख भ्रान्ति अर नए-नए सम्पन्न तबकों की सांस्कृतिक दरिद्रता को दूर करने के लिए पिछड़ी सोच अपनी जगह बनाती जावण लागरी सैं। धींगामुश्ती, कुनबापरस्ती, जात-गोतवाद, गरीबों की बेदखली, शामलात जमीनों पर कब्जे, स्त्रियों के साथ छेड़छाड़, बलात्कार अर हत्या, बेहयाई अर मौकापरस्ती, साम्प्रदायिक अर जातिवादी हिंसा, स्वयंभू पंचायतां के महिला विरोधी तालिबानी फतवे आदि आड़े के इन तबक्यां के राजनीतिक, सामाजिक अर सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा बन लिये सैं। इसे करकै इन तबक्यां के फतवे चालैं सैं। इन तबक्यां की या वर्चस्ववादी संस्कृति हरियाणा के सामाजिक पिछड़ेपन पै टिकरी सै। आई किमै समझ मैं अक गई सिर पर कै? छोड़दे ये ताश खेलने अर सोच किमैं। बीस-बीस लाख के किल्ले बिकैंगे तेरे अर तों चा मैं आकै बेचैगा। फेर एकबै दिल्ली के तले के गाम आल्यां की जो आज तैं तीस साल पहलम धरती बिकी थी उनका बेरा पाड़ले के हाल होया सै उनका।
जिस राह पै दुनिया ईब जावण लागरी सै इस तरह पै मानवता का विनाश निश्चित सै। या वैश्वीकरण की प्रक्रिया भी नष्ट हो ज्याणी। फेर दुनिया समझण लागली इन सारी बातां नै। मानवता आपनी नाड़ इस वैश्वीकरण की कुल्हाड़ी कै तलै कोन्या धरै। मानवता का जिन्दा रहवण का जज्बा अर माणस के विचार की ताकत इसा होना असंभव कर देगी। हरेक माणस नै अपने स्तर पै मानवता बचावण की खातर अर गैल अपने आप नै बचावण की खातर मिल-जुल कै किमै ना किमै करना पड़ैगा जिबै हरया भरया हरियाणा बच सकै सै।

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