बहुत दुःख है
बहुत दुःख की बात है कि सरकार शिक्षा मैं आरक्षण लागू कर रही है। ऊंची जातियों वाले, अमीर परिवार वाले दुःखी हैं। मीडिया वाले, कारपोरेट वाले दुःखी हैं। राजनीति में पक्ष-विपक्ष वाले दुःखी हैं। सब ज्ञानीजन दुःखी हैं। ऐसा लगता है कि इस समय दुःख ही देश की कथा है।
ऊंची जातियों वाले दुःखी हैं कि हमने क्या बिगाड़ा था वी पी सिंह का और क्या बिगाड़ा था अर्जुन सिंह का। पहले उन्होंने मंडल लागू किया। अब ये मंडल लागू कर रहे हैं। पहले उन्होंने नौकरियों में पिछड़ों को आरक्षण दिया। अब ये शिक्षा में पिछड़ों को आरक्षण दे रहे हैं। यह दुःख उनका है जिन्हें शिक्षा और रोजगार में सदियों से आरक्षण हासिल रहा। सत्ताईस या उनचास फीसद नहीं। पूरे सौ फीसद।
खैर, उनका यह दुःख धीरे-धीरे गुस्से में बदलता है। गुस्से में वे जूते पालिश करने लगते हैं और सड़कों पर झाडू. लगाने लगते हैं। वे दिखाना चाहते हैं कि देखो आरक्षण लागू हुआ तो हम ऐसे ही घटिया काम करने को मजबूर होंगे। यह गुस्सा उनका है जिन्हें कभी इस अन्याय पर, इस समाज व्यवस्था पर गुस्सा नहीं आया कि कोई सदियों से झाडू. लगा रहा है और उनकी गंदगी साफ कर रहा है, कि कोई सदियों से उनके जूते पालिश कर रहा है।
फिर उनका यह गुस्सा नस्लवादी अहंकार में बदलता है। वे ऐंठते हुए कहते हैं कि ये पिछड़े, दलित और आदिवासी तो ऐसे ही रहेंगे। वे शिक्षा में हमारी बराबरी कैसे कर लेंगे? वे मैरिट में हमारा मुकाबला कैसे कर लेंगे? वे योग्यता में हमारे सामने कहां टिकेंगे। यह अहंकार उनका है जो कभी कोई कबीर पैदा नहीं कर सके, कभी कोई रैदास पैदा नहीं कर सके, रामचरितमानस के रचयिता तुलसी बाबा को जिन्होंने मस्जिद में शरण लेने पर मजबूर किया और भूले से भी ज्ञान की बात सुनने वाले शूद्रों के कानों में पिघला शीशा डलवाया।
पिछड़ों के लिए आरक्षण के खिलाफ यह दुःख, यह गुस्सा, यह नस्लवादी अहंकार उन लोगों का है जिन्होंने प्राइवेट मैडिकल और इंजीनियरिंग कालेजों में पैसे वालों के लिए सौ फीसद आरक्षण का कभी विरोध नहीं किया। कभी जुलूस नहीं निकाला, कभी कोई प्रदर्शन नहीं किया। वहां मैरिट नहीं होती। थैली होती है। यह दुःख, यह गुस्सा और यह अहंकार उन लोगों का है जिन्होंने डालर वाली एनआरआई औलादों के लिए जितना मांगो, उतने आरक्षण का कभी विरोध नहीं किया। वहां भी मैरिट नहीं होती। डालर होते हैं। यह दुःख, यह गुस्सा और यह अहंकार उन लोगों का है जो कहते हैं कि मैरिट और प्रतिभा का आदर नहीं किया गया तो घटिया डॉक्टर और इंजीनियर ही पैदा होंगे। मैरिट के इन दावेदारों ने प्राइवेट मैडिकल और इंजीनियरिंग कालेजों में कभी मैरिट नहीं मांगी। इन कालेजों से कितने योग्य डॉक्टर और इंजीनियर निकल रहे हैं, पूछिए।
आज वे पैसेवाले भी दुःखी हैं, जो हजारों-लाखों का डोनेशन देकर अपने बच्चों का अंग्रेजी स्कूलों में दाखिला कराते हैं। लाखों रुपए फीस और हजारों रुपए ट्यूशन देते हैं। हजारों रुपए कोचिंग सेंटरों में खर्च करते हैं ताकि उनके बच्चे मैरिट ले आएं। डाक्टर बनें, इंजीनियर बनें, वकील बनें, मैनेजर बनें। पर आरक्षण मिल गया दलितों को, आदिवासियों को और पिछड़ों को। उन्हें लगता है जैसे उनके सामने रखी नोटों की गड्डियां दलित, आदिवासी और पिछड़े ले उड़े।
मीडिया वाले भी दुःखी हैं कि देखो फिर से मंडल आ गया। वीपी सिंह गया तो अर्जुनसिंह आ गया। उनका दुःख है कि उस मंडल जैसा मंडल तो आया, पर उस मंडल जैसा मंडलविरोध नहीं आया। आत्मदाह तक नहीं हो रहे। कोई विजुअल ही नहीं मिल रहा। उन्होंने बड़ी स्टोरियां छापीं कि जिन्हें आरक्षण मिल रहा है, वे ही आरक्षण नहीं चाहते। कि आरक्षण से दाखिला पाने वाले चल ही नहीं पाते और वे बीच में ही छोड़कर भाग जाते हैं। उन्होंने बड़ी स्टोरियां छापी कि आरक्षण के विरोध में छात्र सड़कों पर उतर रहे हैं। एसएमएस अभियान चल रहा है। सारे देश के आरक्षण विरोधी छात्र दिल्ली में इकट्ठा हो रहे हैं। उन्होंने गुब्बारे में खूब हवा भरने की कोशिश की। ये दुःख उन लोगों का है जिनका दावा है कि वे प्रगतिशील हैं, न्याय के पक्षधर हैं।
कारपोरेट वाले भी दुखी हैं कि देखो इससे मैरिटवाले प्रतिभावान लोग आगे नहीं आ पाएंगे। इससे विकास और प्रगति पर बुरा असर पड़ेगा। अभी हम आर्थिक महाशक्ति बनने जा रहे हैं। दुनिया में अपने झंडे गाड़ने जा रहे हैं। यह दुःख उन लोगों का है जिन्हें कदम-कदम पर आरक्षण चाहिए। इनसेंटिवों के नाम पर। जिन्हें सरकारी बैंकों से कर्जे लेकर डकार जाने का आरक्षण चाहिए। जिन्हें सरकारी कारखाने और कंपनियां मिट्टी के मोल हथिया लेने का आरक्षण चाहिए।
सरकारी पक्ष दुःखी है। कमलनाथ दुःखी है। कपिल सिब्बल दुःखी है। वे कहते हैं कि हम आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं। पर यह प्रतिभा की कीमत पर नहीं होना चाहिए। विपक्ष दुःखी है। भाजपा तो बहुत ही दुःखी है। तब वाले मंडल का मुकाबला तो रथयात्रा से कर लिया था, पर अब वाले मंडल का मुकाबला कैसे करें। अब तो रथयात्राओं को बीच में छोड़ना ही पड़ रहा है। वे कहते हैं कि समाज बंटना नहीं चाहिए। वैसे हम आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं। यह दर्द उनका है, जिन्हें पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों का वोट बैंक अवश्य चाहिए।
अब तो ज्ञानीजन भी दुःखी हो गए। ज्ञानीसम्राट सैम पित्रोदा कह रहे हैं कि ज्ञान उपयोग के आठ में से छह ज्ञानी आरक्षण के खिलाफ हैं। वे कहते हैं कि वैसे हम आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, पर ऐसे आरक्षण के हम खिलाफ हैं। यह दुःख उन सैम पित्रोदा का है, जो भारत के नागरिक तक नहीं हैं।
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