सोमवार, 26 सितंबर 2016

म्हारी खेती वैश्वीकरण की गिरफ्त मैं

म्हारी खेती वैश्वीकरण की गिरफ्त मैं
अखबारां मैं खबर छपी अक छाछरोली मैं 1000 एकड़ तै फालतू धरती मैं जरोटा की खेती करण की खातर उन गामां की पंचायतां तै बदेशी कंपनियां नै सीधा एमओयू साइन करया सै। वाह रै म्हारे देशभक्त देशवासियों! पहलम तै हरियाणा मैं मुश्किल तै धरती नीलाम होवण तै बचाई थी किसान की। ईबकै बेरा ना के हो? बदेशी कंपनियां कै गहणै धरण लागगे धरती नै लोग बिना आगा-पाछा देखे। अर यू म्हारे देश का नहीं घणखरे देशां का यू हाल सै। खेती करना लगातार महंगा होत्ता आवै सै। खेती मैं काम आवण आली चीजां के ज्यूंकर पानी, खाद, बीज अर बिजली के दाम लगातार बधते जावण लागरे सैं। अर इन सब पर तै किसान की पकड़ खत्म होत्ती जावण लागरी सै। घणखरे देशां मैं खेती तै पैदा होवण आले उत्पादां की कीमतां मैं बढ़ोतरी की रफ्तार बहोत धीमी सै। इसतै खेती लगातार घाटे का धंधा बनती जावण लागरी सै। पूरी दुनिया का किसान इस घाटे करकै कर्जे के चक्रव्यूह मैं फंसता जावण लागरया सै। (म्हारी सरकार नै भी भारत के किसान ताहिं करजे देवण खातर बजट बढ़ाया सै)। बैंक, वित्तीय संस्थाएं, स्थानीय साहूकार अर अंतर्राष्ट्रीय साहूकारां नै (विश्व बैंक बरगे) कर्जे का इसा सिलसिला शुरू करया सै जिसके चक्रव्यूह मैं किसान फंस लिया पूरी तरियां।
किसानां मैं बढ़ती आत्म हत्यावां की प्रवृति इसी नजर तै देखे जावण की जरूरत सै। पूरी दुनिया मैं छोटा किसान लगातार अपनी जमीन तै बेदखल होवण लागरया सै। या बेदखली दो तरियां होवण लागरी सै। एक तै किसान छोटी जोत नै अलाभकारी मान कै खुद बेच्चण लागरया सै अर दूसरे कान्हीं विकास के नाम पै इन देशां की सरकार उनकी धरती नै अवाप्त (एक्वायर) करकै उननै जमीन तै बेदखल करण लागरी सै। पूरी दुनिया का किसान इस बख्त आंदोलनरत सै। किते पानी के सवाल पै, कितै बिजली के सवाल पै, कितै फसलां के बाजिब दामां पै, कितै सरकार की किसान विरोधी नीतियां के नाम पै। सोच्चण की बात सै अक दुनिया भर मैं खेती अर किसानां की गेल्यां इसा क्यों होवण लागरया सै। आखिर इन सारे देशां मैं अर खास करकै तीसरी दुनिया के देशां मैं इसा के घटण लागरया था सै अक जिसतै किसानां के साहमी जीवन का संकट पैदा होग्या। इस बात की गहराई मैं जाकै समझण खातर हमनै विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक अर इसीए और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थावां के क्रियाकलापों की जानकारी लेना बहोत जरूरी सै। इन संस्थावां की नीतियां के कारण ईब पूरी दुनिया के गरीबां अर किसानां के साहमी जीवन का संकट आण खड़या हुया। किमै सुणैगा डब्ल्यूटीओ के बारे मैं अक ताश खेलें जावैगा।
यूं तेरा अर म्हारा अहदीपना बी इसकै खूब सूत आरया सै। विश्व व्यापार संगठन द्वारा बनाये गये कानून सबतै ऊपरले कानून सैं आज दुनिया मैं चाहे ये पूरी दुनिया के देशां के हितां के खिलाफ क्यूं ना हों। इसके मैम्बर देशां की संसद बी विश्व व्यापार संगठन कै साहमी बौनी होगी। इन मैम्बर देशां धौरे दो राह सैं इब - कै तो विश्व व्यापार संगठन के कानूनां नै मानकै अपने देश की जनता के जीवन का संकट बधात्ते रहवां। दूसरा राह सै अक इस विश्व व्यापार संगठन तै बाहर कूद जावां। इस करकै बाहर आये देश नै हो सके सै कुछ आर्थिक प्रतिबंध झेलने पड़ैं फेर सहज-सहज देश सही राह पै आज्यागा अर जवान पीढ़ी तबाह होवण तै बच ज्यागी। म्हारे भारत नै कूद मारदा देख कै हो सकै सै दुनिया के और गरीब देश बी कूद कै बाहर आ ज्यावैं इस डब्ल्यू टी ओ तै। ना तै भाई विश्व व्यापार संगठन का दायरा बढ़ता जावण लागरया सै अर ईब बौद्धिक सम्पदा, शिक्षा, स्वास्थ्य, बीमा, बैंक, पानी आदि घणखरी चीजां का ब्यौपार हो सकैगा जो ईब ताहिं नहीं हुआ करदा। जै किसे देश की सरकार कै उस देश का कानून इस ढाल के चीजां के ब्यौपार पै रोक लावैं सै तो उस देश नै अपना कानून बदलना पड़ैगा। अर सोने पै सुहागा यो अक जिब कदे अंतर्राष्ट्रीय ब्यौपार अर देशी कानूनां मैं कोए कानूनी झगड़ा होगा तो उसका निराकरण विश्व ब्यौपार संगठन का विवाद निपटारा आयोग करैगा जो किसे बी देश के उच्चतम न्यायालय तै ऊंचा होगा। आई किमै समझ मैं?
म्हारे सत्यानाश की जड़ यू डब्ल्यूटीओ सै। कई इसके हिमायती बी पावैंगे म्हारे बीच मैं। वे क्यूं सैं इसके हिमायती इसपै बी गहराई तै सोच्चण की जरूरत सै। अमरीका की सरकार कै बाकी विकसित देशां की सरकार बदेशी कंपनियां के हित साधण मैं लागरी सैं। डब्ल्यूटीओ की बैठकां मैं ये सरकार इन कंपनियां ने फालतू तै फालतू मुनाफा दिवावण आले कानून पास करवावैं सैं। जै विश्व व्यापार संगठन के बणे पाछै के दस सालां का लेखा-जोखा जोड़ कै देख्या जावै तो या बात साबित करी जा सकै सै अक विश्व व्यापार संगठन नै जमा बड्डी-बड्डी बहुराष्ट्रीय कंपनियां ताहिं फालतू तै फालतू मुनाफा दिवावण की दिशा मैं ए कदम बढ़ाये सैं।
कुछ लोगां का यू भी ख्याल सै अक इसकै भीतर रैहकै किसानां के हक की लड़ाई लड़नी चाहिए भारत नै। सौ का तोड़ यो सै अक इस डब्ल्यूटीओ की किसान विरोधी अर गरीब विरोधी नीतियां कै खिलाफ कठ्ठे होकै भीतर बी लड़ना पड़ैगा अर बाहर बी लड़ना पड़ैगा। अरै फांसी खा कै मरण तै तो आच्छा सै इस डब्ल्यूटीओ कै दूण मारकै मरां आपां। आण आली पीढ़ी का बचाव इस तरियां हो सकै सै। ना तो हमनै तो मरना ए मरना सै अर या जवान पीढ़ी बी हमनै गाल बकैगी अर म्हारे की ढाल फांसी खाकै कै सल्फास की गोली खाकै आत्महत्या बड़े पैमाने पै करैगी। करो मिलकै किमै जुगाड़ म्हारी खेती नै वैश्वीकरण की गिरफ्त मैं तै काढण का। जै आपां सारे मिलकै सोचां तो किमै ना किमै राह गोन्डा काढ़ सकां सां आपां। निराश हो कै हाथ पै हाथ धरकै बैठण की बात नहीं सै। कहया सै ना अक ‘जहां चाह उड़ै राह’।

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