पूंजी के सै अर किसकी सै
खेती में, कारखाने में काम करते हैं हम। उनसे भांत-भांत की चीजें पैदा करने में खून-पसीना एक करते हैं हम। लेकिन मुनाफाखोर पैसे वाला उन चीजों का मालिक बन जावै सै। वह उन चीजां नै बाजार में भेजै सै। उड़ै बाजारां मैं बेच कै मुनाफा कमावै सै। जो चीज बाजार में बिकने की खातर भेजी जावै सै उननै माल (कमॉडिटी) कह्या जावै सै। मालिक माल बेच कै पीसा मतलब मुनाफा पैदा करता है। माल को बनाकै तैयार करण की खातर मालिक ने कच्चा माल खरीदना पड़ता है ज्यूंकर कपड़ा बनाने की खातर कपास या रूई। अर जिन लोगों को जुटा करकै वह कपास बनवाता है उन ताहिं भी मजदूरी देनी पड़ती है। जिन मशीनों या औजार का इस्तेमाल करकै माल तैयार किया जावै सै वो भी कुछ घिसते हैं, कुछ और खरच भी होन्ता होगा। कच्चा माल मजदूरी अर मशीन की घिसन पर दूसरे खरचे निकाले पाछै माल बेचने से जो पैसा मिलता है वह उसका मुनाफा होता है।
ज्यूंकर एक जोड़ी धोती की तैयार करने मैं एक रुपया कपास, दो रुपये मजदूरी तथा 50 पीस्से मशीन की घिसाई अर दूसरे खरचों में लग जाते हैं। इस ढाला धोती के एक जोड़े पर 3 रुपये 50 पीस्से कुल खरच बैठ्या। अर बाजार मैं धोती का वोह जोड़ा 10 रुपये मैं बिक्या तो मुनाफा कितणा हुआ? आया हिसाब किमै समझ मैं, अक नहीं? कितना हुया मुनाफा भला? छह रुपये पचास पीस्से। पूंजी वा हो सै अक मुनाफा कमावण की खातर कुछ पीस्सा लाया जावै सै अर उत्पादन के साधनां का इस्तेमाल कर्या जावै सै। मजदूरों की मेहनत लगती है तब माल तैयार होता है। इसे माल तैं मुनाफा कमाया जावै सै। एक जोड़ी धोती आली मिशाल नै एक बार फेर देखां तो यदि मुनाफे की छह रुपये 50 पीस्से की रकम को फिर रोजगार में लगा दिया जाता है तो यो पूंजी बन जायेगा। या पंूजी भी दो ढाल की हो सै। एक इसी हो सै जिससे उत्पादन के साधन - जगह, ज़मीन, कल-कारखाने, औजार आदि खरीदे जावैं सैं। इसनै स्थिर पूंजी कहवैं सैं। दूसरी पूंजी वा होसै जिसे लगाकै मजदूर की मेहनत खरीदी जावै सै अर्थात् मजदूरी के रूप में दी जावै सै। इसी पूंजी अस्थिर कही जावै सै। इस पूंजी की आड़ मैं मुनाफाखोर मजदूरां नै लूटते रहवैं सैं। या के आच्छी बात सै? आच्छी हो चाहे भूंडी मुनाफा बचैगा तो उद्योग बधैगा अर उद्योग बधैगा तो विकास होवैगा।
यो तो किस्मत का खेल सै। म्हारी किस्मत मैं पूंजी लाना सै तो मुनाफा कमावण का अधिकार भी म्हारा सै। इस मुनाफे पै अधिकार पूंजी के मालिक का होगा। फेर असल बात तो या सै अक पूंजी तो मेहनत तै पैदा हुई अर मालिक नै कदे मेहनत नहीं करी तो इस मुनाफे आली पूंजी पर हक तो मेहनत करने आले का सै। पर न्यों कह्या जावै सै अक या पूंजी हमें भगवान नै दी सै उपयोग करने की खातर। हम कहते हैं कि या पूंजी थामनै अर थारे पुरखों नै मेहनत करने वालों के द्वारा पैदा करी औड़ मुनाफा लूट-लूट कै इकट्ठा करी सै। इस मुनाफे इस लूट की पूंजी का हकदार मालिक कदे नहीं हो सकता। यह बात मेहनतकश कै समझ आज्यागी उस दिन समाज का रंग रूप बदल ज्यागा। टिकाऊ विकास अर समतावादी समाज का आधार फेर तैयार होवैगा। किसान भारत का फांसी खावण नै मजबूर नहीं होवैगा।
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