सांप के कान नहीं होन्ते
सते फते नफे सरिता कविता सरिता अर भरपाई फेर कठ्ठे होगे शनिवार नै। सविता बोली - आज तो गाम मैं टिटाना गाम की बीन बजाने वालों की टीम आरी थी। बहुत गजब की बीन बजावै सैं। कई तो बहोतै पुरानी धुन सुनाई उननै। सते बोल्या - टहलगी होगी तूं तो बीन के लहरे पै। सरिता बोली - इतने मैं कड़ै साधी। हम तो नाच्ची भी खूब बीन के लहरे पै। फते बोल्या - फेर तो हम दो चीजां तै महरूम रहगे। एक तो बीन का लहरा अर दूसरा थारा नाच। म्हारे ताहिं ना बताई थामनै। कविता बोली - हमनै बालक भेजे थे फेर थाम खरखौदे जारे थे किसे काम तै। सरिता बोली - उड़ै तो फेर कई सांप बी कठ्ठे होगे होंगे बीन का लहरा सुणकै नै। सते बोल्या - सांप कै कान कोन्या होन्ते। सांप सुण कोन्या सकदा। भरपाई बोली - सते सरिता नै के समझावै सै। मेरी गेल्यां बात कर। मैं 60 साल की बुढ़ी हो ली अर कम तै कम 30-40 बार मनै बीन पै सांप नाचते देखे। तो फेर वे क्यूकर नाच्यैं सैं? सते बोल्या - ताई भरपाई तेरी बात सोलां आन्ने साच्ची सै। तनै सांप बीन के लहरे पै नाचते जरूर देखे होंगे। फेर इतनी ए साच्ची या बात सै अक सांप के कान नहीं होन्ते। धरती द्वारा आवण आली पैरां की खटपट सांप नै उसकी चमड़ी द्वारा सुनाई देज्या सै। मदारी की बीन की हरकतां पै सांप अपनी नजर टिका लेवै सै। इस तरियां जब मदारी अपनी बीन नै घुमावै सै तो सांप भी उसी दिशा मैं अपना सिर हिलावण लागज्या सै। लोग न्यों समझैं सैं अक बीन की आवाज नै सांप को नाच्चण नै विवश करया सै। फेर या बात साच्ची कोन्या। भरपाई एक बै फेर बोली - देख सते तेरी बात सुणकै मेरा दिमाग तो तेरी बातां का जवाब नहीं दे सकता फेर मेरा दिल इबै बी न्यों ए कहवै सै अक सांप बीन का लहरा सुनकै ए उसपै नाच्चै सै। सते बोल्या - ताई तेरा कसूर कोन्या। म्हारे हरियाणा मैं दिमाग अर दिल नै न्यारे न्यारे करकै सोच्चण आले माणसां का टोट्टा कोन्या। पढ़े-लिखे माणस बी दिमाग की बात ना मानकै दिल की बात मानैं सैं। सरिता बोली - सांप अपने तै मोटे चूहे ने क्यूंकर निगल ज्यावै सै? सारे एक-दूसरे के मुंह कान्ही देखैं। आखिर मैं सते बोल्या - घणा तो मनै बेरा ना फेर बात या सै अक सांप का मुंह तो छोटा हो सै। फेर उसका जबड़ा पीछे काफी लाम्बा हो सै अर साथ मैं लचकदार बी हो सै अर इसे करकै इसकी फैलण की क्षमता बहोत हो सै। इसे तरियां सांप का बाकी शरीर बी भीतर तै रबड़ की ढालां फैल सकता है। इसे करकै सांप अपने तै मोटे चूहे ने निगल जावै सै।
भरपाई बोली - सांप की केंचुली तो मनै बी देखी सै फेर सांप केंचुली क्यों तारै सै अर क्यूकर तारै सै इसका बेरा कोन्या अर कदे पहलम सोच्ची बी कोन्या इसी बात। फेर सारे चुप। किसे नै बी कोन्या बेरा था। सविता की ड्यूटी लागगी अक आगली बरियां वा बेरा पाड़कै ल्यावैगी अक सांप केंचुली क्यूकर अर क्यों तारै सै। बिनती सै मेरी हरियाणा के जिल्यां की साक्षरता समितियां तै अक वे इन अंधविश्वासां के खिलाफ सतत शिक्षा के केन्द्रां में चर्चा करवावैं अर विज्ञान सम्मत रूझान नै बढ़ावा देवण मैं मदद करैं। इस सवाल पै चर्चा होनी चाहिये अक यज्ञ करे तैं बरसात नहीं होन्ती। एक बात और सै म्हारे समाज मैं अक हवन करे तै शुद्धि हो सै वातावरण मैं। विज्ञान की समझदारी या सै अक जिब बी कोए चीज जलैगी तो कार्बनडायक्साइड पैदा होवैगी आक्सीजन नहीं। तो वातावरण की शुद्धि क्यूकर होगी? बस शुद्धि होवै सै या विश्वास की बात सै। म्हारे ग्रन्थों में लिख राख्या सै। इसे तरियां यो अंधविश्वास अक पीपल का पेड़ रात नै आक्सीजन पैदा कर सकै सै इसका विज्ञान ने ईब ताहिं तो बेरा कोन्या। फेर दो-दो घंटे बहस करेंगे अक ना पीपल रात नै आक्सीजन छोड्डै सै। विज्ञान की ईब ताहिं की खोज कहवै सै अक सूर्य की रोशनी मैं पौध्यां मैं अर पेड्डां के हरे पत्यां मैं मौजूद क्लोरोफिल मैं रसायनिक प्रक्रिया होवै सै जियां तै आक्सीजन पैदा होवै सै। रात नै कोए पेड़ क्यूकर आक्सीजन छोड्डै सै। बूझां अक क्यूकर? तो कहवैंगे न्यों तो बेरा ना फेर छोड्डै सै जरूर। किस किताब मैं लिख राखी सै? बेरा ना। कै न्यों कहवैंगे म्हारे पुराने ग्रंथां मैं जिकरा सै इन बातां का। अर म्हारा विश्वास बी सै अक पीपल ज्याहें तै तो देवता मान्या ज्यावै सै।
हां तो बात थी सांप की। तो सविता बोली - मैं कित तै बेरा पाड़ कै ल्याऊंगी? सते बोल्या जै बेरा लावण का मन बणावैगी तो बेरा किते ना किते तै लागे ज्यावैगा। नफे बोल्या - एक न्यूं बी कहवै था अक सांप उड़ बी सकै सैं। मेरै जंची कोन्या बात अक बिना पंखां के सांप क्यूकर उड़ सकै सै। सते बोल्या - सांप उड़ तो कोन्या सकदे फेर सांपां की कुछ प्रजातियां इसी सैं जो वृक्षों से उतरते बख्त गलाईडरां की ढालां सहज-सहल तले ने आवैं सैं। इस ढाल वे ऊंची टहनियां पर तै नीची टहनियां पै आ ज्यावैं सैं। गलाइड करने के लिए सांप अपनी पूंछ की सहायता लेवै सैं। भरपाई बोली - सारे जहरी नहीं होन्ते बताये। सते बोल्या - हां कुछेक सांप जहरी होवैं सैं बाकी नहीं। सविता बोली - ताई या बात तो हमनै देखनी सै अक म्हारी परम्परावां मैं म्हारे ग्रन्थां मैं कोणसी बात सही सै अर कौनसी गलत सै। महात्मा बुद्ध भी कैहगे अक किसे बात नै इस करकै मत मानो अक वा म्हारे ग्रन्थां मैं लिखी सै अक वा म्हारे गुरुआं ने बताई सै बल्कि इस करके मानो अक वा विवेकसम्मत सै अर संसार के ज्यादातर लोगां के हक मैं सै। म्हारी परम्परा मैं तो सती प्रथा भी जरूरी अर गौरव करण आली बात बता राखी सै तो के हम सती प्रथा की हिमायत करण लागज्यां। पहलम परम्परा थी अक बालक होवण पै ओरनाल जंग लागे ओड़ दान्त तै काट्या करते अर बालक टैटनस होकै मर ज्याया करदे। तो ईब बी निभावां कै या परम्परा?
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