सोमवार, 26 सितंबर 2016

दारू अर दहेज

दारू अर दहेज
जै कोए महिलावां धोरै उनकी दिक्कतां के बारे मैं बूझै वे मुसीबतां के अम्बार लादें सैं फेर इस अम्बार मैं ते सबतै वजनी दिक्कत वे दारू अर दहेज नै बतावैं सैं। एक ढाल सोचैं तो इसा लागै सै जणों ये दोनूं बीमारी लाइलाज सैं। दारू की लत कितनी बुरी हो सैं या दारूबाज नै औटनियां ए जानै सैं। लागज्या तो छुट्टण का नाम नहीं लेती। आजकल हरियाणा के गामां मैं दारू की मार तै घर तै कोए बच नहीं रह्या। हां, हो सकै सै घर मैं कोए माणस बचरया हो। सांपले तै पी कै चालैगा टुन होकै। अपणे गाम मैं पहोंच कै जिब हरिजनां के घर पहलम सी आवैंगे तो ठाड्डू बोलैगा - म्हारै साहमी कूण बोलैगा, देख ल्यांगे एक-एक नै। थोड़ी दूर चाल कै स्वर्ण जात के घर आज्यांगे तो आवाज नीची करकै बोलैगा - अपणे भाई सैं। ज्यान दे द्यांगे भाइयां खातर। अपने घरां पहोंच कै उसकी आवाज फेर ऊंची हो ज्यागी अर कहवैगा - ये सूके टीक्कड़ क्यूंकर खाऊं? साग क्यूं ना बनाया? साग भाई नै चटनी दीखैगा। जिब घरआली कहवै अक यू रह्या साग तो न्यों कैंहकै अक उल्टी बोलै सै मंड ज्यागा लात घूंसे मारण। म्हारे परिवारां मैं भी आपां छोरियां नै इसी शिक्षा देवां सां अक पति परमेश्वर हो सै। जिसा भी हो उसकी गेल्यां निभाणी चाहिये। ब्याह पाछै छोरी की ल्हास सुसराड़ की देहली पर तैं बाहर लिकड़नी चाहिये। घर की बात बाहर जावैगी तो महिला की बेइज्जती सै। इसी शिक्षा दे कै खंदावां सां आपां तो छोरी बी अपनी सुसराड़ मैं चुपचाप सहें जावै सै या मार पिटाई। गात पै लीले-लीले लील पड़रे होंगे कई जागां पिटाई करकै फेर कोए बूझै तो न्यों कैह देगी - पड़गी थी ठोकर लाग कै। कई बै बात बातां मैं न्यों बी कहवैंगी - करां तो के करां। राह तो कोए बी कोन्या दीखता। कित जावां? इस कित जावां का जवाब किसी धोरै सै तो मेरे धोरै भी लिख कै भेज दियो। किसेनै कह्या सै - आजकाल मकान तो बहोत बड्डे-बड्डे बणण लाग्गे फेर इनमैं रहण आल्यां के दिल बहोतै छोटे होगे। ये मकान सैं घर कोन्या। सरकार की बी बात समझ मैं कम आवैं सैं। एक कान्हीं तो कहवै अक दारू मतना पिया करो। या बहोत बुरी चीज सै। दूजै कान्ही रोज नये दारू के ठेके खोलती जावण लागरी। कोए इस पै एतराज करै तो कहवैगी अक विकास की खातर पीस्सा कित तै आवै? कोए न्यूं बूझनिया हो अक विनाश की चीजां तै पीस्सा कमा कै विकास किसा होगा? एक कान्हीं दारू के ठेके अर दुजे कान्हीं दारू छुटवावण के नशा मुक्ति केंद्र। दोनों सरकारी। सदकै जाऊं!
दूसरी बात दहेज की। दहेज तै मेरे हिसाब तै लड़की होवण सजा सै। यो धुर तै चाली आवै सै। या बात म्हारी परंपरावां अर धार्मिक संस्कारां तै बी भीतर ताहिं जुड़री सै। बहोत जणे कैहते पाज्यांगे अक इसका बी कोए इलाज नहीं या लाइलाज सै। आज म्हारे समाज की हालत देख कै लागै सै अक ये औरत ठीकै कहवै सैं, ‘‘दहेज की मांग के हमले कै आगै सारे हथियार फेल होकै ढेर होज्यां सैं।’’ सबनै बेरा सै अक दहेज लेना अर देना अपराध सै। सोने पै सुहागा यू सै अक हम सब अपराधी बणकै यू अपराध करते ए रहवां सां। इसमैं पूरा का पूरा समाज शामिल सै। यू एक इसा अपराध सै जिसमैं करणियां अर भुगतनियां दोनों बराबर के दर्जे के अपराधी माने जावैं सैं जबकि देवणिया की मजबूरी हो सै कई बै। फेर चारों कान्ही तै इसनै स्वीकृति प्रदान सै। जिब यो जुर्म करया जावै सै तो कोए एफआईआर नहीं लिखी जात्ती, कोए गिरफ्तार नहीं करया जात्ता। थाना पुलिस कचहरी की लिखा पढ़ी तो तब शुरू होवै सै जब इस शुरू के जुर्म हुये पाछै इसकै कारण कोए हिंसक घटना जुड़ै सै। गज़ब की बात तो या सै अक इस प्रथा नै धार्मिक संस्कार बतावण आले, माणण आले अर धार्मिक संस्कारां के ज्ञानी कोए नहीं बतात्ता अक इस दहेज का जिकरा कौन से शास्त्र मैं या किस वेद पुराण मैं सै? महिलावां नै अधिकार के काबिल ना होवण की मान्यतावां तै भरी मनुस्मृति मैं भी महिलावां के एक अधिकार का जिकर बतावैं सैं। अर वो सै स्त्री धन जिसपै स्त्री का इकलौता अधिकार सै। मनुस्मृति का बी यो कहना सुण्या सै अक ब्याह के बख्त कन्या नै उसके मायके अर ससुराल की तरफ तै जो कुछ भी मिलै सै वो उसका स्त्री धन सै जिसपै निखालस स्त्री का हक बताया। इसे स्त्री धन ताहिं दहेज भी कह्या जा सै फेर दहेज का जो आधुनिक रूप सै वो स्त्री धन तै बहोत दूर की बात सै। आधुनिक दहेज वर पक्ष की विवाह की खातर राखी गई बातां का नतीजा हो सै अर इस नाम तै जो कुछ दिया जावै सै उस पै स्त्री का कोए हक नहीं होत्ता आगल्यां का ए हक हो सै। इसा लागै सै अक मनुस्मृति के बख्तां में भी लड़कियां अर औरतां का स्तर परिवार अर समाज मैं लड़कों अर पुरुषों के बराबर नहीं था। चूंकि लड़की ताहिं उसे बख्तां ते ‘पराया धन’ समझया जाया करता इस करकै उस ताहिं पैतृक संपत्ति मैं भी हिस्सा नहीं दिया जाया करदा। आज के दौर मैं देखां तो देश के हर कोने, हर समुदाय अर जाति मैं यू दहेज महामारी की ढालां फैलता जावण लागरया सै। पहल्यां यू स्वर्ण जातियां मैं ए हुआ करदा। इसका कारण यू लागै सै अक यू जो आधुनिक बाजार का चलन बधण करकै दहेज का चलन भी बधग्या। आपां ने सोचना पड़ैगा अक इस दारू अर दहेज तै समाज का पैंडा क्यूकर छूटै? फेर आपां सोचांगे क्यूकर? आपां नै ताश खेलण तै कड़ै फुरसत सै। सोचांेगे तो राह बी काढांगे। गेर रै गेर पत्ता गेर! सोचलेंगे सोच्यण आले। झकोई इतनै तूं नहीं सोचैगा उतनै पार कोन्या पडै़।

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