म्हारी शिक्षा
वैश्वीकरण अर उदारीकरण के दौर मैं शिक्षा नव उपनिवेशवाद की चुनौतियां तै दो-दो हाथ करण लागरी सै। शिक्षा के व्यापारीकरण का अर साम्प्रदायीकरण का एजेंडा इतनी बारीकी तै आपस मैं गूंथ राख्या सै अक म्हारे थारे बरगे माणसां नै इसके तार जुड़े औड़ कोन्या दीखते। ‘सबकी खातर शिक्षा’ नै मौलिक अधिकार बणावण का सांग भरणियों नै बाजार की दूसरी चीजां की ढालां शिक्षा नै भी ‘माल’ अर अंग्रेजी मैं कहवां तो ‘कोमोडिटी’ बणावन की खातर गोड्डी घाल राखी सैं। इनका सरगना सै ‘विश्व बैंक’ जिसके मुंह तै लिकड़या औड़ एक शब्द की पात्थर की लकीर सै म्हारी खातर। इसे करकै शिक्षा नै गैट के अंतर्गत ल्यावण की चरचा जोरां पै सै। इंजीनियरिंग, चिकित्सा, बहुतकनीकी, प्रबन्धन, कंप्यूटर, सूचना प्रौद्योगिकी, चिकित्सा क्षेत्र के डिप्लोमा पाठ्यक्रम, अध्यापक प्रशिक्षण कालेज अर यूनिवर्सिटी के लेवल की उच्च शिक्षा के साथ-साथ विद्यालय शिक्षा क्षेत्र मैं भी धन्ना सेठों के लाभ की खातर ये क्षेत्र खोले जावण लागरे सैं। म्हारी केन्द्र की यूपीए सरकार ने बी अपणे न्यूनतम सांझा कार्यक्रम मैं शिक्षा पै सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत खर्च करण की बात का वादा करया था। फेर कहया करैं ना अक ‘कसमें वादे प्यार वफा, बातें हैं बातों का क्या।’ तो 6 की जागां 4 प्रतिशत खर्च बी बहोत मुश्किल तै करया सै अर यो तो जब सै जब शिक्षा की खातर 2 प्रतिशत का विशेष उपकर भी ला दिया।
एक बर की बात सै एक घर मैं सांझ नै बात चालदी अक ईबकै तो एक भैंस खरीदांगे। घरआली कैहन्दी - भूरी होगी। बालक कैहन्दे - रूढ़ी होगी। बालकां का बाबू कैहन्दा - 20 किलो दूध आली ल्यावांगे। दूसरा बालक बोल्या - हमतै काली झोटी ल्यावांगे। जड़ पूरा म्हिणा होग्या रोज सांझ नै भैंस ल्यावण का जिकरा होज्या अर बालक दूध पीवण की आस मैं सोज्यावैं। एक दिन छोरी बोली - बाबू भैंस तो ल्याणी सै कोन्या फेर खामखा की बात करकै क्यूं भकाया करो। बाबू नै बात करनी बंद करदीं। बालक फेर परेशान होगे। छोरी एक दिन बाबू नै बोली - बाबू भैंस तो कोन्या ल्यावै फेर भैंस ल्यावण की बात तो कर लिया कर। तो बात थी अक जिब देश आजाद हुया तो म्हारे देश के संविधान मैं आपां नै लिख्या था एक नीति निर्देशक सिद्धांत-45 मैं अक चौदह बरस के बालकां ताहिं जरूरी अर मुफ्त शिक्षा दी जावैगी सन 1960 ताहिं फेर 60 मैं कहया 70 ताहिं अर सत्तर मैं बोले 80 ताहिं अर 80 पाछै तो जिकरा ए बंद होग्या। यो तै सन् 1993 मैं हटकै केपी उन्नी कृष्णन के मामले मैं सर्वोच्च न्यायालय मतलब सुप्रीम कोर्ट नै 14 बरस ताहिं के बालकां की खातर पढ़ाई मौलिक अधिकार के रूप मैं बताई अर इस पाछै यू सारा मामला हटकै गर्माग्या। इस सारे सवाल नै जै ‘शिक्षा का अधिकार बिल-2005’ के चौखटे तै बाहर काढ़ कै देखां तो साफ होज्या सै अक किसे बी लोकतांत्रिक समाज व्यवस्था मैं टिकाऊ विकास सुनिश्चित करण की खातर सबकी भागीदारी जरूरी सै।
म्हारे देश की आज़ादी की लड़ाई जिब लड़ी जावण लागरी थी तो ‘सबकी खातर शिक्षा’ एक जरूरी मुद्दा बण लिया था। भगत सिंह से वीरा नै कुर्बानी दी अक आजाद भारत मैं ‘सबनै शिक्षा’ मिलै अर सबनै स्वास्थ्य सुविधा मिलैं। फेर देश की आजादी पाछै शिक्षा के जगत मैं जो सार्वजनिक ढांचा बना, उसनै खड़या करण की खातर अर मजबूती देवण की खातर लोगां नै जमीन अर धन दे कै अर श्रमदान करकै योगदान दिया। हरियाणा मैं बाजे भगत बरगे सांगियां नै भक्त फूल सिंह की गेल्यां मिलकै गुरुकुल खानपुर खातर खूब चन्दा कठ्ठा करया था। घणखरे स्कूलां की बिल्डिंग उन बख्तां मैं हमनै अपने खून-पसीने की कमाई तै बनाई थी। देश की बड़ी आबादी की पहली पीढ़ी नै इन शिक्षण संस्थावां मैं पढ़कै आईएएस, आईपीएस, वकील, डाक्टर, इंजीनियर, नेता आदि के रूप में अभिजात वर्ग मैं शामिल होवण का मौका मिल्या। रिटायर्ड फौजियां नै अर आर्य समाज नै हरियाणा मैं शिक्षा के प्रसार मैं महत्वपूर्ण योगदान दिया। गामां के स्कूलां मैं पढ़े औड़ बहोत लोग बड्डी-बड्डी नौकरियां पै पहोंचे। फेर या रफ्तार धीमी पड़ती गई। फेर खडौत आई अर विपरीत दिशा पकड़ा दी। अर ईब सुधारीकरण के नाम पै ‘शिक्षा का निजीकरण’ का नारा गूंजा दिया शेरां नै। फेर म्हारे ताश खेलण आले भाईयां नै बेराना बेरा सै अक नहीं सै अक ‘शिक्षा का निजीकरण’ आम आदमी के आगै बढ़ण के न्यूनतम अवसरां नै खतम करण की कसूती साजिश रच राखी सै।
‘राइट टू एजुकेशन बिल-2005’ का जो मसौदा 86वें संविधान संशोधन के आधार पै तैयार करया गया सै वो सरकार की संवैधानिक बाध्यता और शिक्षा नै ‘माल’ बनावण के विश्व बैंक के नुस्खे के बीच की दुविधा बहोत काम्मल ढालां दिखावै सै जै कोए इसनै देखना चाहन्ता होवै या देखी जा सकै सै। बिल मैं 6-14 साल की उम्र के बालकां नै शामिल करकै इसमै 0-6 उम्र के सात करोड़ बालकां के खाते ए बंद कर दिये दीखै सैं गरीब अमीर परिवारां के सारे बालकां की खातर समान अवसरां की समानता उपलब्ध करवावण के मामले मैं ‘कॉमन स्कूल प्रणाली’ लागू करण पै भी बिल चुप्पी खींचग्या। बालकां नै स्कूल ना भेज पावण के लिए माता-पिता नै दंडित करण के प्रावधान की जागां हरेक बस्ती/गांव मैं स्कूल खुलने चाहिये अर इनपै सामाजिक नियंत्रण भी होणा चाहिये। इन आईएएस अफसरां की एसीआर जिला परिषद् के चेयरमैन द्वारा लिखी जावै। शिक्षा पै हमला घणां भारी सै, मनै लागै कमजोर त्यारी सै। ताश खेलना छोड़ दवो ना तै दुर्गति म्हारी सै।
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