आरक्षण पीस्से का
‘दलितों के अर पिछड़यां के आरक्षण पै तो गैहटा तार राख्या सै सबनै फ़ेर पीस्से आले आरक्षण के खिलाफ कोए बी कोनी बोलदा’ - सत्ते ने बात चलाई। सविता ने सत्ते की बात सुनी कुछ देर सोचती रही फेर बोली - सत्ते सही कहवै सै। पीस्से आले आरक्षण पै बात करने के नाम पै तो सबकै सन्नपात सा मार ज्या सै। पीस्से आले का बालक बढ़िया स्कूल मैं जावैगा। फीस चाहे कितनी बी होवै। घर में आकर पांच-सात नौकर हों सै उसके आगै पाछै घुम्मण की खातर। जितने घंटे चाहवै पढ़ ले, जिब चाहवै खेल ले, जिब चाहवै सोज्या। स्कूल की पढ़ाई तै बी पेट कोनी भरदा। कविता बोली - सविता, एकै ए सांस मैं कहवैगी के सारी बात। माड़ा-सा सांस तो ले ले। कमला बोली - सांस कूण लेवण देवै सै म्हारे बरगे गरीबां नै। पीस्से आल्यां के घर एयर कंडीशन्ड, उनकी कार एयर कंडीशन्ड, उनके स्कूल एयर कंडीशन्ड, उनके बाजार एयर कंडीशन्ड। सारी बनावटी दुनिया सै उनकी। फत्ते नै कमला बीच मैं टोक दी अर बोल्या - जिननै गरमी सरदी कदे ना देखी वे ये एयरकंडीशन्ड बापां के एयरकंडीशन्ड बेटा-बेटी आईएएस के इम्तिहान मैं पास होकै म्हारे पै राज करैं सैं। इन एयरकंडीशन्ड डाक्टरां नै के मतलब म्हारी बीमारी तै? सत्ते बोल्या - स्कूल का रोल्ला फेर ट्यूशन का रोल्ला। ट्यूशन पाछै पीएमटी टैस्ट मैं बैठण खातर दिल्ली जाकै 40 हजार की कोचिंग का रोल्ला। फेर मैनेजमैंट कोटे का रोल्ला। 30-40 लाख तै तलै डाक्टरी में ये दाखिला नहीं देवैं। दाखिले पीछे 3-4 लाख की फीस का रोल्ला साल मैं। कविता ने कहा - कोई बताये तो म्हारे बालक कित जावैं? सविता बोली - एनआरआई की सीट बिकैं सैं 35 लाख मैं। बेचकै दो किल्ले धरती अर दिवादे दाखिला।
फत्ते बोल्या - बाकी घर फेर क्यूकर चालैगा? अर जिसकै पांव टेकणनै धरती कोन्या वे कित जावैं? कविता बोली - धड़ाधड़ प्राइवेट कालेज खोलण लागरे सैं। म्हारा तो ब्यौंत नहीं उनमें अपणे बालक पढ़ावण का। सत्ते बोल्या - मैं गया था अपने दोस्त की गेल्यां अंबाला। उड़ै एक नया मेडिकल खुल्या सै। उड़ै उसकी छोरी पढ़ै सै। वा बतावै थी उड़े के हाल। न्यौं कहवै थी वा तै अक आड़ै तै पढ़ावणिया डाक्टरां का बहोतै टोट्टा सै। जब कोए टीम इंस्पैक्शन करण आवै तो डाक्टरां नै बेरां नै कित तैं घेर घोट कै पाकड़ ल्यावैं सैं। इंसपैक्सन खत्म अर पढ़ावण आले डाक्टर गायब। म्हिने के कई हजार लेवैं सैं कुछ तो फेर चार-पांच दिन तै फालतू कोनी आंते। बिना पढ़ावणिया किसी पढ़ाई? ट्रस्टी उड़े के बहोत स्याणे सैं। इम्तिहान मैं परचे का बेरा पाड़लें सैं अर फेर उसनै बी बेचैं सैं। पीस्से दे कै पास होवण आल्यां की बी लाम्बी लाइन होज्या सै। बिना पीस्सा आल्यां नै बी एक-दो सवाल बता दें सैं। फेल किसे नै नहीं होवण देन्दे। कविता बोली - ये डाक्टर बणकै फेर म्हारे बालकां का इलाज किसा करैंगे? सत्ते बोल्या - इलाज की मतना बूझै। या बात तो साफ सै अक जो इतने पीस्से खरच करकै डाक्टर बणैगा ओ मरीज का मुफ्त मैं इलाज तो करने तै रह्या। मरीज की खाल इसी खींचैगा अक मरीज सारी उम्र याद राखैगा। फेर मनै तो एक दूसरी बात का बी डर सै अक उसनै पूरी बीमारियां का बी बेरा होवैगा अक नहीं? वा छोरी तो न्यों बी कहवै थी अक मरीज बी कोए-कोए आवै सै उड़ै इलाज करवावण। इंसपैक्सन की टीम नै दिखावण खातर तो उननै छह बस ला राखी सैं गामा मां तै मरीज ल्यावण खातर अर रोज के 200-300 मरीज कागजां मैं दिखा बी देवैं सैं फेर असल मैं तो कोन्या इतने मरीज। डाक्टरी कोर्स के बालक जिब ताहिं न्यारी-न्यारी ढाल की बीमारी के मरीज नहीं देखैंगे तो इलाज क्यूकर करैंगे? सविता - ये तो क्वालिटी के डाक्टर बनैंगे। फिसड्डी डाक्टर तो दूसरे आरक्षण आले बणैंगे जो कुछ बी ना जाणते। फत्ते बोल्या - आज इस बहस मैं कोन्या पड़ते अक दलित अर पिछड़े आरक्षण पै आये डाक्टर किसे होंगे। आज तो इन पीस्से आले बढ़िया क्वालिटी के डाक्टरां पैए बात राखां तो सही सै। कमला बोली - बात तो इनपै बी होनी चाहिए। इनकी पढ़ाई का ब्यौंत ना। इननै समाज मैं बराबरी का दरजा मिल्या ना। फेर बी इनके आरक्षण कै पाछै लाठा लेकै पड़रे ये पीस्से आले। फत्ते इसपै फेर किसे दिन चर्चा कर ल्यांगे। आज तो याहे चर्चा सै अक इस पीस्से आले आरक्षण पै लोग क्यूं ना बोलते? क्यूं सांप सूंघ रह्या सै लोगां मैं? वा छोरी तो न्यों बी कहवै थी अक जिसकी तनखा 40-50 हजार महीना सै उन मां-बापां का बी कोए ब्यौंत कोनी अपने बालकां नै इसे कालेजां मैं पढ़ावण का।
कमला बोली मनै ट्रिब्यून अखबार मैं जयभगवान के लेख मैं पढ्या था अक गुड़गामा के एक डैंटल कालेज मैं तो सौ मा तै पन्दरा नम्बरां आले बालक पीस्से लेकै दाखिल कर लिये (50 नंबर ओपन मैं अर 40 रिजर्व मैं कम तै कम नंबर चाहिए थे) वे किसे मैरिट आले थे? उनकी मैरिट तो पीस्सा ए थी ना? सविता बोली - ये बात तो सारी ठीक सैं अक आजकाल पीस्से का रोल्ला सै। फेर कर्या के जा? यू पीस्से का खेल म्हारे बालकां की शीक्षा मैं अर म्हारे स्वास्थ्य मैं इसे ढाल दखलंदाजी करता रह्या तो हम तो मर लिये। सत्ते - हम-हम नहीं न्यूं मान कै चालो अक 100 मां तै 90 माणस मर लिये। सविता बोली - फेर कर्या के जा? सत्ते बोल्या - ताश खेले जावैं अर सांझ नै दारू पीए जावैं और के कर्या जा? कै दलितां के अर पिछड़यां के आरक्षण का विरोध कर्यां जावैं। और के बसका सै म्हारै? सविता फेर बोली - इस पीस्यां आले आरक्षण पै कुछ बी कोन्या के करण की खातर? म्हारे बालकां के पढ़ण के मौके खत्म होन्ते जावण लागरे सैं अर आपां ताश खेलण लागरे सां। कितनी माड़ी बात सै। सारे बालकां नै बढ़िया शिक्षा मिलै इस खातर क्यूं ना सोचदे आपां। इन प्राइवेट कालेजां पै सामाजिक कंट्रोल तो होणा ए चाहिए। इस खातर कानून की बी जरूरत हो तै कानून बी बनाना चाहिए। सरकारी कालेज उच्च शिक्षा की खातर और खोले जावैं। फत्ते - सौ का जोड़ यो सै अक जनता नै आगै आना पड़ैगा अर समझाना पड़ैगा म्हारे राज करनियां ताहिं अक थाम म्हारे कान्ही सो अक पीस्से आल्यां कान्हीं? कमला बोली - हमनै फेर किसे बात पै लड़वा देंगे अर आप दिल्ली मैं बैठकै ऐश करैंगे। कविता नै कहा - हमने फूंक फूंक कै पां टेकना पड़ैगा। मर तो ऊंबी लिये। फेर अगली पीढ़ी के भले की खातर मरांगे लड़ते-लड़ते तो बात दूसरी सै। सविता बोली - लड़ते तो आपां रहवां सां फेर ठीक बात पै लड़ां सां अक गलत पै इसका फैसला कूण करै? कविता बोली - जो बात मानवता के हक की हो अर सौ मां तै 90 लोगों के हक की हो वा बात सही होगी। अर दखे कुछ लोग न्यंू बी कहवैं थे अक या हरियाणवी माड़ी अष्टी सै पढ़ण मैं दिक्कत आवै सै। कहियो रणबीर नै इसपै बी सोचै किमै।
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