सोमवार, 26 सितंबर 2016

संकट परिवार का

संकट परिवार का
आजकाल परिवारां का संकट खुल करकै साहमी आवण लागरया सै। एक्सटैंडिड एकल परिवार तै हम एकल परिवार की तरफ बढ़े थे फेर इसकी खातर जरूरी सपोर्टिव स्टरक्चर के विकसित ना होने तै परिवार मैं स्वस्थ जनतांत्रिक मूल्यों के विकास के अभाव मैं एकल परिवार मैं तनाव और टूटन का माहौल बढ़या सै। देखल्यो भीतर झांक कै ईब्बी बख्त सै। इसके कारण पूरी परिवार संस्था पर सवालिया निशान लाग लिया सै। आज इसके विकल्प के तौर पै या तो हम अपने संयुक्त परिवार की तरफ देखां सां कै फेर विदेशां मैं अमेरिकी कै कैनेडियनां की नकल करण नै उतावले नजर आवा सां। दोनों जागी पै आज के संकटग्रस्त एकल परिवार या परिवार संस्था का विकल्प नजर नहीं आन्ता। तो फेर असली विकल्प या तीसरा विकल्प के हो? एक मत यो भी सै अक या वर्तमान विवाह संस्था भी अलोकतांत्रिक सै, इसका विखंडन तो ज़रूरी सै।
इसी विमर्श के चालते आजकल या बात भी सामने आरी सै अक बख्त की साथ-साथ परिवार का स्वरूप बदलता रहया सै। आज का जमाना जनतंत्र का जमाना सै तो समाज और परिवार मैं जनतांत्रिक मूल्यों का समावेश बख्त का तकाजा सै। इस प्रक्रिया मैं आये या अड़ाये गये व्यवधान ही हमारे एकल परिवारों के तनावग्रस्त होने के कारक दीखें सैं। इस विमर्श के चालते आजकल परिवार के जनतंत्रीकरण पै काफी जोर दिया जा रया सै। आड़ै भी एक खास बात ध्यान देवण आली सै अर वा या सै अक यो जनतंत्रीकरण भी अमरीकी फ्रेमवर्क मैं ए देखा जारया सै। या यूं भी कहया जा सकै सै अक पूंजीवादी जनतंत्र के चौखटे मैं धरकै ही परिवार के जनतंत्र को सोचा-समझा जारया सै। समाजवादी जनतंत्र की भी बात चलती रही सै। तर्क सै अक समाज के जनतंत्र और परिवार के जनतंत्र नै न्यारा-न्यारा करकै देखना मुश्किल सै।
इस समाज में जनतंत्र, समता, स्वतंत्रता अर बंधुत्व की बातें तो की जावैं सैं लेकिन असल मैं ये सब चीजें वंचित तबकों तक नहीं पहुंच पायी क्योंकि डेमोक्रेसी भी एक प्रकार की वर्गीय तानाशाही सै। परिवार के स्तर पै या तानाशाही संयुक्त परिवार में भी होवै सै अर एकल परिवार में भी। साथ-की-साथ परिवार मैं पितृसत्ता पूरी ढाल जड़ जमाए बैठी सै। इस ढाल जिब हम परिवार के जनतंत्रीकरण की बात करां सां तो कई ढाल के सवालां का उठना स्वाभाविक सै। एक सवाल तो योहे सै अक इस परिवार की पितृसत्ता नै अर तानाशाही नै चुनौती देना परिवार के जनतंत्रीकरण का हिस्सा माना सां अक नहीं।
घणे लोग इस ढांचे नै चुनौती दिये बिना इस ढांचे के भीतरै जनतंत्र की बात करना अर वर्तमान परिवार नै अधिक व्यवस्थित ढंग तै चलावण की मशक्कत करना चाहवै सैं। इसकी साथ-साथ एक और मूलभूत धारणा परिवारां नै लेकै म्हारे दिमागां मैं बैठी होई सै अक परिवार स्त्री-पुरुष के जैविक संबंधों के आधार पै बनी एक प्राकृतिक संरचना सै जो शाश्वत सै अर समाज के विकास या प्रगति के नियमां तै निरपेक्ष सै। इसलिए परिवार के ढांचे मैं परिवर्तन की बात करना एक बेवकूफी सै। फेर ऐतिहासिक संदर्भों के अनुभव पै आधारित एक मान्यता दूसरी भी सै अक सामाजिक परिवर्तनां की साथ-साथ परिवार का ढांचा भी बदलता रहया सै। एक तीसरी जगह या भी सै अक स्त्री-पुरुष के जैविक संबंधां तै जो पितृसत्ता पैदा होवै है वा सामाजिक रूपांतरण के बावजूद यानी उत्पादन की पद्धति बदल जावण के बावजूद कायम रहवै सै। इसका मतलब यो हुया अक समाज का रूप बदल कै चाहे कुछ हो ज्या पर परिवार का रूप कुछ ऊपरी परिवर्तनों के बावजूद लगभग अपने मूल रूप मैं अपरिवर्तित रहवै है। क्या ये सभी प्रस्थापनाएं ठीक सैं? यदि ये ठीक नहीं सैं तो फेर ये म्हारे समाज मैं प्रस्थापित क्यूंकर हो पाई? इनतै कैसे निजात पाई जा सकै सै अर मानवीय संबंधां नै और फालतू मानवीय क्यूंकर बनाया जा सकै सै। इन सब सवालों तै रूबरू हुए बिना कोई बना-बनाया तीसरा रास्ता नहीं सोच्चा जा सकता।
ज्यों-ज्यों परिवारों का संकट बढ़ रहया सै त्यों-त्यों पुनरुत्थानवादी ताकतें, जिनमैं इब आर्य समाज का भी एक हिस्सा शामिल होग्या लागै सै अर ये स्वयंभू पंचायतें भी इस संकट के बख्त परिवार के जनतंत्रीकरण पै बातचीत करण की बजाय किसे अमूर्त प्राचीन भारतीय आदर्श परिवार की कल्पना करते हुए कति जनतंत्र के विरोध मैं जा खड़े हुए। टीवी चैनल पै इस ढाल की बात बहोत सुनण नै मिलै सै अर सतसंगां मैं भी इसी ढाल का पुनरुत्थानवादी विवेचन प्रस्तुत करया जा सै। परिवारां के भीतर और बाहर आज के समाज मैं स्त्रियों के बढ़ते हुए शोषण अर दमन के बीच एक तरफ स्त्रियों का घरेलूकरण किया जा रह्या सै तो दूसरी तरफ उनको असंगठित क्षेत्र में बड़े पैमाने पै धकेला जा रह्या सै, इस ढाल उनका सर्वहारीकरण हो रह्या सै। इन सबके चाल्ते परिवार मैं असली जनतंत्र की प्रक्रिया के रहैगी इस पै इब्बे ज्यादा विचार-विमर्श की जरूरत सै। स्त्री-पुरुष के संबंधां पै बातचीत किये बिना अर दहेज प्रथा, बाल विवाह, खर्चीली शादियों, यौन उत्पीड़न आदि पर विमर्श किये बिना परिवार मैं जनतंत्र की बात सोचना मुमकिन नहीं सै। परिवार के जनतंत्रीकरण का मसला केवल महिलाओं या युवाओं के अधिकारों का मसला नहीं सै इसका जनतंत्रीकरण इसके व्यक्तिवादी आत्मकेंद्रित चरित्र नै छोड़कै एक समाजोन्मुखी चरित्र बनाने तै जुड़ रया सै। परिवार केवल व्यक्तिगत स्वार्थों की सिद्धि और अन्य उपभोक्तावादी स्वार्थों को पूरा करने के लिए नहीं बल्कि बेहतर मानवीय मूल्यों के विकास अर सामाजिक योगदान की खातर होना चाहिए। इसमें कोई शक नहीं अक पुरुषों को स्त्रियों का समर्थन और सहयोग करने आला साथी होना चाहिए। यह गुण किस प्रकार हासिल किया जा सकै सै वो गंभीर मामला सै। खापां आल्यां कै तो समझ मैं आणा और बी मुश्किल सै।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें