कोल्हू का बछेरा
पुराने जमाने की बात सै। एक गाम में एक व्यापारी रहया करता। उसके पास एक घोड़ी थी। घोड़ी पर सवार होकै वो व्यापार करने जाया करता। एक बार व्यापारी घोड़ी पर सवार होकै लम्बे सफर पै चाल पड़या। घोड़ी थी वा गर्भवती। लाम्बी यात्रा करकै घोड़ी मुश्किल तै चाल पावै थी। थकावट बी आगी थी। व्यापारी नै सड़क के किनारै तेल निकालने वाले एक कोल्हू को देख्या। उस बख्त वहां कोई नहीं था और कोल्हू बी बंद था। व्यापारी घोड़ी तै नीचे उतरया अर घोड़ी कोल्हू कै बांध दी। पास के गाम मैं चल्या गया। वहां पेट भरकै खाणा खाया अर घोड़ी की खातर बी जरूरत के हिसाब तै चना ले लिया। इस बीच घोड़ी नै एक सुंदर से बछेरे को जन्म दे दिया अर उस कोल्हू का मालिक बी वहां पहुंच गया। उसने घोड़ी और बछेरे को देखा तो उसने मन मैं लालच आ गया। उसनै घोड़ी के बछेरे को अपने घर ले जाने की सोची। व्यापारी के लौटने से पहले ही वह बछेरे को अपने घर उठा लेग्या। जब व्यापारी वापस आया तो उसको पता चल्या अक कोल्हू का मालिक बछेरे को अपने साथ अपने घर ले गया। वह बछेरे को मांगने के वास्ते कोल्हू के मालिक के घर पहोंच गया। व्यापारी बोल्या - कोल्हू के मालिक मेरा बछेरा मुझे वापस दे दो। कोल्हू का मालिक तेज आवाज मैं बोल्या - यो बछेरा तो मेरा सै। इसे मैं तनै क्यूं द्यूं? व्यापारी नै फेर हाड़े खाये - कोल्हू के मालिक मेरी घोड़ी ने इस बछेरे को जनम दिया सै। मेरा बछेरा मनै दे द्यो। फेर कोल्हू का मालिक बछेरा वापस करने के लिए तैयार नहीं था। कोल्हू का मालिक बोल्या - नहीं यो मेरे कोल्हू का बच्चा सै। इस करकै यो मेरा सै।
इब व्यापारी नै बी गुस्सा आया अर वो बोल्या - कोल्हू कै भी कदे बच्चे पैदा होवैं? तुम मनै बेवकूफ क्यों बनाओ सो। इस पर व्यापारी अर कोल्हू के मालिक के बीच तेज-तेज आवाज मैं बहस होवण लागगी। शोर-शराबा सुन कै गाम वाले भी आगे। झगड़ा निबटावण की खातर पंचायत बुला ली गई। पंचायत के साहमी व्यापारी ने अपना दावा पेश करया और कहा - बछेरा मेरा है क्योंकि मेरी घोड़ी नै इसे जनम दिया सै। कोल्हू के मालिक नै कहया - नहीं मेरा कोल्हू बछेरे का बाप सै। उसनै या बात बड़ी तेज आवाज मैं जोर तै चिल्ला कै कही। गांव में बड़े-बूढ़े सारे चक्कर मैं पड़गे। वे समझ नहीं पा रहे थे अक इस झगड़े का निबटारा क्यूकर करैं? काफी देर तक सोचते रहे इस मामले पर फेर कोए नतीजा नहीं काढ़ पाये। आखिर मैं थक-हार कै उननै कहया - कोल्हू के मालिक तुम म्हारी बात सुणो अर घोड़ी के मालिक थाम बी सुणो। केवल थारे बयान पै हम विश्वास नहीं कर सकते इस करकै गवाह चाहिये। तुम दोनों कल आओ अर साथ अपने-अपने गवाह भी ल्याओ। गवाहों की बात सुनने के बाद ही हम कोए फैसला कर पावांगे। फैसला होने तक बछेरा पंचायत के पास रहेगा। व्यापारी बेचारा जंगल मैं चलया गया। उसनै घोड़ी को घास चरण की खातर छोड़ दिया अर खुद एक पेड़ की छाया मैं लेटग्या। वो असल मैं बहोत परेशान था। उसकी समझ जवाब देगी थी। उस ए बख्त एक लोमड़ी उड़े कै गुजरी। लोमड़ी नै परेशानी मैं घिरया व्यापारी देख्या अर उसतै बूझया - व्यापारी जी बहोत परेशान लागो सो। के बात? व्यापारी ने जवाब दिया - मनै घोड़ी कोल्हू कै बान्धी। घोड़ी नै बछेरा जनम्या। कोल्हू का मालिक बछेरा ठा लेग्या। पंचायत नै गवाह मांगे सैं। कोल्हू का मालिक आड़े का रहवण आला सै वो तै आसानी तै गवाह ले आवैगा। मैं के करूं?
लोमड़ी बोली - व्यापारी तुम परेशान मत होवो। मैं गवाही देउंगी। अगले दिन पंचायत बैठी तो कोल्हू का मालिक एक झूठा गवाह ले आया। गांव वालों ने व्यापारी से पूछा तो व्यापारी बोल्या - लोमड़ी मेरी गवाह सै। इसपै सारे हंस पड़े। बाट देखी लोमड़ी की। कोनी आई। आखिर घणी बाट दिखाकै आई लोमड़ी। वा जोर-जोर की जम्हाई लेवै थी। पंचायत नै पूछया - अरै लोमड़ी, तनै इतनी देर क्यों करदी? लोमड़ी नै नींद मैं जवाब दिया - सम्मानित बुजुर्गों, कल रात समुद्र मैं आग लाग गी अर मनै पात्ती गेर-गेर कै आग बुझाई। सारी रात लागगी। इसे करकै देर तै आई सूं। सारी रात सो नहीं पाई। सारे बूढ़े एक आवाज में चीखे - झूठ, झूठ। लोमड़ी सफेद झूठ बोलगी। मान भी लेवैं अब समुंद्र मैं आग लागगी तो पात्ती तै क्यूंकर बुझाई जा सकै सै? लोमड़ी पंचायत के गुस्से तै डरी कोन्या। अर अपनी बात पै डटी रही। पंचा तै बूझया - जै समुन्द्र मैं आग नहीं लाग सकती, अर जै वा आग पात्ती तै नहीं बुझाई जा सकदी तो बछेरा कोल्हू का बालक क्यूकर हो सकै सै? लोमड़ी के इस सवाल पर पंचायती चुप। कोए जवाब नहीं सूझया। उनकै अपनी गल्ती समझ मैं आगी। उननै व्यापारी का बछेरा वापस कर दिया। पंच परमेश्वर की कहानी मुन्शी प्रेम चंद जी नै लिखी। फेर कड़ै सैं उसे पंच परमेश्वर। हरियाणा के पंचायती तो इन पंचायतियां तै बी दो चन्दे फालतू सैं। इस पंचायत नै तो बछेरा कोल्हू का बालक बणाया फेर म्हारे आजकाल के पंचायती तो बीर-मरद नै बाहण अर भाई एक मिनट मैं बणा दें। चाहे आसण्डा हो, चाहे जौन्धी हो, चाहे नया बास हो। एक खास बात और सै अक व्यापारी की मदद मैं लोमड़ी तो आगी थी। इन पंचायतां के फतव्यां कै साहमी बोलण की हिम्मत कोए नहीं करदा। हरियाणा मैं तो इन फतव्यां के भुक्त भोगियां की लोमड़ी जनवादी महिला समिति दीखै सै जो जाथर थोड़ा होत्ते भी कई सालां तै बहोत घणा बोझ ठावण लागरी सै इन मामल्यां मैं। हरियाणा मैं जब ताहिं तर्क, विवेक अर वैज्ञानिकता की सोच जन-जन मैं पैदा नहीं होवैगी इतनै ये पंचायती न्योंए खेलें जांगे म्हारी जजबातां तै।
पुराने जमाने की बात सै। एक गाम में एक व्यापारी रहया करता। उसके पास एक घोड़ी थी। घोड़ी पर सवार होकै वो व्यापार करने जाया करता। एक बार व्यापारी घोड़ी पर सवार होकै लम्बे सफर पै चाल पड़या। घोड़ी थी वा गर्भवती। लाम्बी यात्रा करकै घोड़ी मुश्किल तै चाल पावै थी। थकावट बी आगी थी। व्यापारी नै सड़क के किनारै तेल निकालने वाले एक कोल्हू को देख्या। उस बख्त वहां कोई नहीं था और कोल्हू बी बंद था। व्यापारी घोड़ी तै नीचे उतरया अर घोड़ी कोल्हू कै बांध दी। पास के गाम मैं चल्या गया। वहां पेट भरकै खाणा खाया अर घोड़ी की खातर बी जरूरत के हिसाब तै चना ले लिया। इस बीच घोड़ी नै एक सुंदर से बछेरे को जन्म दे दिया अर उस कोल्हू का मालिक बी वहां पहुंच गया। उसने घोड़ी और बछेरे को देखा तो उसने मन मैं लालच आ गया। उसनै घोड़ी के बछेरे को अपने घर ले जाने की सोची। व्यापारी के लौटने से पहले ही वह बछेरे को अपने घर उठा लेग्या। जब व्यापारी वापस आया तो उसको पता चल्या अक कोल्हू का मालिक बछेरे को अपने साथ अपने घर ले गया। वह बछेरे को मांगने के वास्ते कोल्हू के मालिक के घर पहोंच गया। व्यापारी बोल्या - कोल्हू के मालिक मेरा बछेरा मुझे वापस दे दो। कोल्हू का मालिक तेज आवाज मैं बोल्या - यो बछेरा तो मेरा सै। इसे मैं तनै क्यूं द्यूं? व्यापारी नै फेर हाड़े खाये - कोल्हू के मालिक मेरी घोड़ी ने इस बछेरे को जनम दिया सै। मेरा बछेरा मनै दे द्यो। फेर कोल्हू का मालिक बछेरा वापस करने के लिए तैयार नहीं था। कोल्हू का मालिक बोल्या - नहीं यो मेरे कोल्हू का बच्चा सै। इस करकै यो मेरा सै।
इब व्यापारी नै बी गुस्सा आया अर वो बोल्या - कोल्हू कै भी कदे बच्चे पैदा होवैं? तुम मनै बेवकूफ क्यों बनाओ सो। इस पर व्यापारी अर कोल्हू के मालिक के बीच तेज-तेज आवाज मैं बहस होवण लागगी। शोर-शराबा सुन कै गाम वाले भी आगे। झगड़ा निबटावण की खातर पंचायत बुला ली गई। पंचायत के साहमी व्यापारी ने अपना दावा पेश करया और कहा - बछेरा मेरा है क्योंकि मेरी घोड़ी नै इसे जनम दिया सै। कोल्हू के मालिक नै कहया - नहीं मेरा कोल्हू बछेरे का बाप सै। उसनै या बात बड़ी तेज आवाज मैं जोर तै चिल्ला कै कही। गांव में बड़े-बूढ़े सारे चक्कर मैं पड़गे। वे समझ नहीं पा रहे थे अक इस झगड़े का निबटारा क्यूकर करैं? काफी देर तक सोचते रहे इस मामले पर फेर कोए नतीजा नहीं काढ़ पाये। आखिर मैं थक-हार कै उननै कहया - कोल्हू के मालिक तुम म्हारी बात सुणो अर घोड़ी के मालिक थाम बी सुणो। केवल थारे बयान पै हम विश्वास नहीं कर सकते इस करकै गवाह चाहिये। तुम दोनों कल आओ अर साथ अपने-अपने गवाह भी ल्याओ। गवाहों की बात सुनने के बाद ही हम कोए फैसला कर पावांगे। फैसला होने तक बछेरा पंचायत के पास रहेगा। व्यापारी बेचारा जंगल मैं चलया गया। उसनै घोड़ी को घास चरण की खातर छोड़ दिया अर खुद एक पेड़ की छाया मैं लेटग्या। वो असल मैं बहोत परेशान था। उसकी समझ जवाब देगी थी। उस ए बख्त एक लोमड़ी उड़े कै गुजरी। लोमड़ी नै परेशानी मैं घिरया व्यापारी देख्या अर उसतै बूझया - व्यापारी जी बहोत परेशान लागो सो। के बात? व्यापारी ने जवाब दिया - मनै घोड़ी कोल्हू कै बान्धी। घोड़ी नै बछेरा जनम्या। कोल्हू का मालिक बछेरा ठा लेग्या। पंचायत नै गवाह मांगे सैं। कोल्हू का मालिक आड़े का रहवण आला सै वो तै आसानी तै गवाह ले आवैगा। मैं के करूं?
लोमड़ी बोली - व्यापारी तुम परेशान मत होवो। मैं गवाही देउंगी। अगले दिन पंचायत बैठी तो कोल्हू का मालिक एक झूठा गवाह ले आया। गांव वालों ने व्यापारी से पूछा तो व्यापारी बोल्या - लोमड़ी मेरी गवाह सै। इसपै सारे हंस पड़े। बाट देखी लोमड़ी की। कोनी आई। आखिर घणी बाट दिखाकै आई लोमड़ी। वा जोर-जोर की जम्हाई लेवै थी। पंचायत नै पूछया - अरै लोमड़ी, तनै इतनी देर क्यों करदी? लोमड़ी नै नींद मैं जवाब दिया - सम्मानित बुजुर्गों, कल रात समुद्र मैं आग लाग गी अर मनै पात्ती गेर-गेर कै आग बुझाई। सारी रात लागगी। इसे करकै देर तै आई सूं। सारी रात सो नहीं पाई। सारे बूढ़े एक आवाज में चीखे - झूठ, झूठ। लोमड़ी सफेद झूठ बोलगी। मान भी लेवैं अब समुंद्र मैं आग लागगी तो पात्ती तै क्यूंकर बुझाई जा सकै सै? लोमड़ी पंचायत के गुस्से तै डरी कोन्या। अर अपनी बात पै डटी रही। पंचा तै बूझया - जै समुन्द्र मैं आग नहीं लाग सकती, अर जै वा आग पात्ती तै नहीं बुझाई जा सकदी तो बछेरा कोल्हू का बालक क्यूकर हो सकै सै? लोमड़ी के इस सवाल पर पंचायती चुप। कोए जवाब नहीं सूझया। उनकै अपनी गल्ती समझ मैं आगी। उननै व्यापारी का बछेरा वापस कर दिया। पंच परमेश्वर की कहानी मुन्शी प्रेम चंद जी नै लिखी। फेर कड़ै सैं उसे पंच परमेश्वर। हरियाणा के पंचायती तो इन पंचायतियां तै बी दो चन्दे फालतू सैं। इस पंचायत नै तो बछेरा कोल्हू का बालक बणाया फेर म्हारे आजकाल के पंचायती तो बीर-मरद नै बाहण अर भाई एक मिनट मैं बणा दें। चाहे आसण्डा हो, चाहे जौन्धी हो, चाहे नया बास हो। एक खास बात और सै अक व्यापारी की मदद मैं लोमड़ी तो आगी थी। इन पंचायतां के फतव्यां कै साहमी बोलण की हिम्मत कोए नहीं करदा। हरियाणा मैं तो इन फतव्यां के भुक्त भोगियां की लोमड़ी जनवादी महिला समिति दीखै सै जो जाथर थोड़ा होत्ते भी कई सालां तै बहोत घणा बोझ ठावण लागरी सै इन मामल्यां मैं। हरियाणा मैं जब ताहिं तर्क, विवेक अर वैज्ञानिकता की सोच जन-जन मैं पैदा नहीं होवैगी इतनै ये पंचायती न्योंए खेलें जांगे म्हारी जजबातां तै।
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