लकीर हाथ की
पंडित देशराज नै धर्मवीर की दाईं हथेली अपने हाथ मैं पकड़ी, उसे ध्यान से सब तरफ से देख्या अर बोल्या - तुम बहोत भाग्यशाली हो। तुम्हारी विद्या रेखा बहोत साफ सै। तुम जरूर डाक्टर बनोगे। नौजवान धर्मबीर ने राज्जी होकै बूझ्या - या कौन-सी लकीर सै? देख या रही - पंडित जी नै दिखाई। धर्मबीर पंडित जी तै बोल्या - फेर या तो लकीर म्हारे लख्मी दादा कै तो कति नहीं रही होगी? मैं जाकै देखूंगा अक मेरी दादी अर दादा कै या लकीर सै अक नहीं सै। वे तो एक हरफ बी कोनी पढ़े। हाथ की लकीरों का इस तरिया मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। यो भी एक विज्ञान सै।
धर्मबीर बोल्या - ना! ना! मैं मजाक नहीं उड़ाऊं था। फेर साच माच का सवाल उठ्या था मेरे मन मैं। आच्छा पंडित जी न्यों बताओ अक मैं कद मरूंगा? पंडित जी नै उम्र आली लकीर की जांच-पड़ताल करी अर बोल्या - 72 साल तै पहलम कोनी मरदा। फेर तेरी मौत कैंसर तै होवैगी। धर्मबीर बोल्या - मैं कितना किस्मत आला सूं। ईब मैं बिल्कुल चिंतामुक्त जीवन जी सकूं सूं। मनै एड्स की बीमारी लगने की भी कोए चिंता नहीं रही। मेरै कोए गोली या बम मारकै मन्ने नहीं मार सकता इस करकै मैं सेना मैं अफसर बन सकूं सूं। पंडित जी कुछ नाराज होगे। धर्मबीर ने तसल्ली देनी चाही - नहीं मैं मजाक नहीं कर रहा। थारी बातां तै साच माच मैं मेरी चिंता दूर होगी। ईब मनै एक और जरूरी बात भी बूझनी सै अक के इसी कोए भी संभावना सै अक मनै पुलिस पकड़ कै ले ज्यावै, मुकदमा चलावै अर जेल की हवा खिलावै?
पंडित जी नै पूरे विश्वास तै जवाब दिया - नहीं कोए संभावना कोनी। तूं एक बड्डा अफसर बनैगा। धर्मबीर बोल्या - बहुत बढ़िया। ईब मैं निडर होकै उस बदमाश की हत्या कर सकता हूं अर फेर सेना मैं भर्ती हो ज्यांगा। पंडित जी नै बूझी - किस बदमाश की? धर्मबीर बोल्या - उस धोखेबाज नर सिंह की। मनै पक्का यकीन है अक मेरा मोबाइल उसनै ए चोरी करया सै। पंडित जी - फेर इतनी छोटी-सी चीज की खातर किसे ताहिं मार देना अपराध सै। जै पुलिस नै बेरा लाग्या तो? धर्मबीर - लेकिन आपने ही तो कह्या सै अक इसी कोए संभावना नहीं अक पुलिस मनै पकड़ सकै। असल मैं अपराध बरगी कोए चीज नहीं होन्ती। पंडित जी - अपराध बरगी कोए चीज नहीं होन्ती? क्या बकते हो? धर्मबीर - हमारे पैदा होने से पहले ही हमारा भाग्य तय हो चुका है। तो अगर मैं उसको मार भी डालता हूं तो यो पहले से तय है। किसे बड्डी ताकत नै तय करया। सारे उस बड़ी शक्ति के आदेशां पै काम करण लागरे सैं।
पंडित जी बोले - मनै बेरा पटग्या अक तूं नास्तिक सै। धर्मबीर - नाराज मत हो। मैं तो मजाक करूं था। किसे नै भी मेरा मोबाइल नहीं चुराया। क्या आपको मालूम है कि हमारी हथेली मैं इतनी लकीरें क्यों होती हैं? पंडित जी - भविष्य बताने के लिए और किस लिए? धर्मबीर - अपना हाथ ढीला करो। अपनी हथेली की चमड़ी को चुटकी मैं पकड़ कै खींचो। या काफी लचीली अर ढीली सै। ईब रेखाओं नै खींच कै देखो। ये नहीं खींचरी क्योंकि रेखाओं पर चमड़ी नीचे की मांसपेशियों से मजबूती से जुड़ी हैं। क्यों? क्योंकि यदि आप हथेली से कुछ भी पकड़ना चाहते हैं तो आपको इसे मोड़ना होगा। मोड़ने से मांसपेशियां फूल जाती हैं और चमड़ी ढीली पड़ जाती है। मगर चमड़ी हर जगह ढीली होगी तो पापड़ की तरह फूल जायेगी अर आप कुछ भी नहीं पकड़ सकोगे। इनसान के विकास के समय ये गोड़ रेखायें बनी थीं। पंडित जी - तो हाथ पढ़ना मूर्खता है? धर्मबीर - मूर्खता नहीं तो क्या है? जरा सोचो मेरे भाई अर मनै बी बताइयो अक जितने हजारों लोग सुनामी मैं मरे उन सबकी एक जिसी आयु रेखा रही होगी के?
पंडित देशराज नै धर्मवीर की दाईं हथेली अपने हाथ मैं पकड़ी, उसे ध्यान से सब तरफ से देख्या अर बोल्या - तुम बहोत भाग्यशाली हो। तुम्हारी विद्या रेखा बहोत साफ सै। तुम जरूर डाक्टर बनोगे। नौजवान धर्मबीर ने राज्जी होकै बूझ्या - या कौन-सी लकीर सै? देख या रही - पंडित जी नै दिखाई। धर्मबीर पंडित जी तै बोल्या - फेर या तो लकीर म्हारे लख्मी दादा कै तो कति नहीं रही होगी? मैं जाकै देखूंगा अक मेरी दादी अर दादा कै या लकीर सै अक नहीं सै। वे तो एक हरफ बी कोनी पढ़े। हाथ की लकीरों का इस तरिया मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। यो भी एक विज्ञान सै।
धर्मबीर बोल्या - ना! ना! मैं मजाक नहीं उड़ाऊं था। फेर साच माच का सवाल उठ्या था मेरे मन मैं। आच्छा पंडित जी न्यों बताओ अक मैं कद मरूंगा? पंडित जी नै उम्र आली लकीर की जांच-पड़ताल करी अर बोल्या - 72 साल तै पहलम कोनी मरदा। फेर तेरी मौत कैंसर तै होवैगी। धर्मबीर बोल्या - मैं कितना किस्मत आला सूं। ईब मैं बिल्कुल चिंतामुक्त जीवन जी सकूं सूं। मनै एड्स की बीमारी लगने की भी कोए चिंता नहीं रही। मेरै कोए गोली या बम मारकै मन्ने नहीं मार सकता इस करकै मैं सेना मैं अफसर बन सकूं सूं। पंडित जी कुछ नाराज होगे। धर्मबीर ने तसल्ली देनी चाही - नहीं मैं मजाक नहीं कर रहा। थारी बातां तै साच माच मैं मेरी चिंता दूर होगी। ईब मनै एक और जरूरी बात भी बूझनी सै अक के इसी कोए भी संभावना सै अक मनै पुलिस पकड़ कै ले ज्यावै, मुकदमा चलावै अर जेल की हवा खिलावै?
पंडित जी नै पूरे विश्वास तै जवाब दिया - नहीं कोए संभावना कोनी। तूं एक बड्डा अफसर बनैगा। धर्मबीर बोल्या - बहुत बढ़िया। ईब मैं निडर होकै उस बदमाश की हत्या कर सकता हूं अर फेर सेना मैं भर्ती हो ज्यांगा। पंडित जी नै बूझी - किस बदमाश की? धर्मबीर बोल्या - उस धोखेबाज नर सिंह की। मनै पक्का यकीन है अक मेरा मोबाइल उसनै ए चोरी करया सै। पंडित जी - फेर इतनी छोटी-सी चीज की खातर किसे ताहिं मार देना अपराध सै। जै पुलिस नै बेरा लाग्या तो? धर्मबीर - लेकिन आपने ही तो कह्या सै अक इसी कोए संभावना नहीं अक पुलिस मनै पकड़ सकै। असल मैं अपराध बरगी कोए चीज नहीं होन्ती। पंडित जी - अपराध बरगी कोए चीज नहीं होन्ती? क्या बकते हो? धर्मबीर - हमारे पैदा होने से पहले ही हमारा भाग्य तय हो चुका है। तो अगर मैं उसको मार भी डालता हूं तो यो पहले से तय है। किसे बड्डी ताकत नै तय करया। सारे उस बड़ी शक्ति के आदेशां पै काम करण लागरे सैं।
पंडित जी बोले - मनै बेरा पटग्या अक तूं नास्तिक सै। धर्मबीर - नाराज मत हो। मैं तो मजाक करूं था। किसे नै भी मेरा मोबाइल नहीं चुराया। क्या आपको मालूम है कि हमारी हथेली मैं इतनी लकीरें क्यों होती हैं? पंडित जी - भविष्य बताने के लिए और किस लिए? धर्मबीर - अपना हाथ ढीला करो। अपनी हथेली की चमड़ी को चुटकी मैं पकड़ कै खींचो। या काफी लचीली अर ढीली सै। ईब रेखाओं नै खींच कै देखो। ये नहीं खींचरी क्योंकि रेखाओं पर चमड़ी नीचे की मांसपेशियों से मजबूती से जुड़ी हैं। क्यों? क्योंकि यदि आप हथेली से कुछ भी पकड़ना चाहते हैं तो आपको इसे मोड़ना होगा। मोड़ने से मांसपेशियां फूल जाती हैं और चमड़ी ढीली पड़ जाती है। मगर चमड़ी हर जगह ढीली होगी तो पापड़ की तरह फूल जायेगी अर आप कुछ भी नहीं पकड़ सकोगे। इनसान के विकास के समय ये गोड़ रेखायें बनी थीं। पंडित जी - तो हाथ पढ़ना मूर्खता है? धर्मबीर - मूर्खता नहीं तो क्या है? जरा सोचो मेरे भाई अर मनै बी बताइयो अक जितने हजारों लोग सुनामी मैं मरे उन सबकी एक जिसी आयु रेखा रही होगी के?
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