रविवार, 28 मई 2017

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग
     सत्ते फत्ते नफे सविता कविता सरिता और भरपाई शनिवार नै फेर चर्चा केंद्र मैं पहोंचगे। उड़ै उनका प्रेरक श्यामू बी था। पहलम तो उननै आठ मार्च पै एक गीत गाया अर फेर सत्ते बोल्या - यो राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के बला सै? नफे बोल्या - होगा किमै हमनै के लेना देना इसतै। सविता बोली - लेना देना क्यूं ना, म्हारे बालकां की आगे की पढ़ाई का सीधा-साधा नाता सै इस आयोग तै। मनै पढ़ी थी इसकी वार्षिक रिपोर्ट जो आयोग नै प्रधानमंत्री ताहिं रिपोर्ट टू द नेशन-2006 के नाम तै पेश करी सै। इसमें कह्या गया सै अक देश का भाग्य उन 55 करोड़ लोगां के हाथां मैं सै जो 25 बरस तै कम उम्र के सैं अर जो ज्ञान संबंधी पहलकदमियां तै सबतै फालतू लाभान्वित होवैंगे। उच्च शिक्षा दुनिया मैं दाखिल होवण आली 18 तै 24 साल की म्हारी आबादी का सिर्फ 7 फीसद हिस्सा ए उच्च शिक्षा मैं दाखिला ले पावै सै। यो आंकड़ा एशिया के औसत का सिर्फ आधा ए सै। इस करकै ज्ञान आयोग नै देशभर मैं 1500 विश्वविद्यालय खोलण की बात कही सै जिस करकै भारत 2015 तक सकल दाखिले का कम तै कम 15 फीसदी हिस्सा हासिल करण मैं सफल हो सकै। नफे सिंह बोल्या - ये तो बहोत बढ़िया सिफारिश कर दी। सविता बोली - या तो सही बात सै अक विश्वविद्यालयां, अंडरग्रेजुएट कालेजां नै प्रतिभा केंद्र बणावण की बात तो करी सै अर हाशिये पै पड़े अर वंचित तबक्यां की शिक्षा तक पहुंच आदि के मामल्यां मैं सुधार करण की सिफारिश बी सैं। नफे सिंह बोल्या - देखियो कितनी बढ़िया बात कर दी राष्ट्रीय ज्ञान आयोग नै। मनै नहीं बेरा था इन बातां का। सविता बोली - फेर इन सिफारिशां मैं एक नुक्ता सै। सरिता बोली - के नुक्ता सै सविता? सविता बोली - एनकेसी ने अपनी रिपोर्ट मैं जो पहलकदमियां सुझाई सैं अर कै जो नुस्खे बताये सैं वे इन बातां कै ठीक उल्टे बैठे सैं। ये नुस्खे उस बिरला अंबानी रिपोर्ट मैं सुझाये गये नुस्ख्यां तै न्यारे कोन्या। इन पै गौर करके देखना पड़ैगा।
     इस रिपोर्ट का असली मकसद उच्च शिक्षा का निजीकरण सै। इसे तरियां वाइस चांसलर सर्वशक्तिमान हो ज्यांगे अर किसे के साहमी जवाबदेह नहीं रहवैंगे। इन हालातां मैं विश्वविद्यालयां का जनतांत्रिक प्रशासन जिस बी हद ताहिं आज मौजूद सै वो खत्म हो ज्यागा। इसे तरियां इस आयोग नै एक इंडिपैंडैंट रेगुलेटरी एथॉरिटी फार हायर एजुकेशन (आईआरएएचई) की स्थापना का प्रस्ताव भी सुझाया सै। इसतै सिंगल विंडो क्लियरेंस का इंतजाम होगा। धक्के खावण तै बच ज्यांगे। यो बहोत ताकतवर होवैगा। इसपै कोए सरकारी नियंत्रण नहीं होगा। इसका मतलब राज्य सरकारां के अधिकार कालेज खोलण के कै विश्वविद्यालय खोलण के खत्म हो ज्यांगे अर इस एथॉरिटी पै आ ज्यांगे। ये कालेज अर यूनिवर्सिटी अपने खर्चे पानी का इंतजाम क्यूकर करैंगे। इस पर भी लीपापोती-सी करकै कह्या गया सै अक ईब सरकार उच्च शिक्षा पै सकल घरेलू उत्पाद का 0.7 फीसदी खर्च करै सै पर सही मैं यो 2 फीसदी नहीं तो 1.5 फीसद तो जरूर होना चाहिए। 2012 ताहिं इतना खर्चा करण का भरोसा-सा दिवाया गया सै। इतनै किततै करैं खर्चा? नफे सिंह बोल्या या बात बी सही सै।
     सविता बोली - आयोग नै तो आड़े ताहिं कैह दिया अक सार्वजनिक विश्वविद्यालय नै अपनी जमीन का इस्तेमाल वित्त के एक स्रोत के रूप मैं करना चाहिए। मतलब यूनिवर्सिटी की धरती बेच कै अपना खर्चा पूरा करना चाहिए। अर न्यों बी कह्या सै अक कायदे तै फीसां तै यूनिवर्सिटी के कुल खर्च का कम तै कम 20 फीसद तो काढ़णा ए चाहिए। मतलब फीस बधाओ पढ़निया चाहे भाड़ मैं जाओ। नफे सिंह बोल्या - फेर होश्यार अर जरूरतमंद छात्र फीस कड़े तै ल्यावैंगे। सविता बोली - आयोग का यू भी सुझाव सै अक जरूरतमंद छात्रां की फीस माफी करी जानी चाहिए अर गेल की गेल उनकी शिक्षा की लागत पूरी करण की खातर वजीफ्यां का इंतजाम भी होना चाहिए। नफे सिंह बोल्या - मास्टर जी तो न्यों बतावैं थे अक वजीफे फालतू करण की बात तो और बी कई कमेटियां नै करी फेर वजीफ्यां खातर तो बजट आये साल घटदा आवण लागर्या सै। ये फीस बधावण की साथ-साथ वजीफ्यां के बधावण की बात बी करैं सैं अक फीस बधावण का विरोध जरूरतमंद छात्र ना करैं। इसे ढाल की निजी निवेश बिना मुनाफे के करण की सिफारिश बी करी सै। फेर किसके सिर मैं खाज होरी सै अक ओ बिना मुनाफे की आस करें शिक्षा जगत मैं 100 करोड़ रुपइये लावैगा।
     सविता बोली - आयोग की रिपोर्ट मैं न्यों बी कह्या गया सै अक विदेशी विश्वविद्यालय भारत मैं आवैंगे तो भारत की शिक्षा की गुणवत्ता बधैगी। गुणवत्ता बधावण की आड़ मैं इन बदेशियों की लूट पै माट्टी गेरण का काम कर्या सै इस राष्ट्रीय ज्ञान आयोग नै। देशी अर बदेशी एकै कानून कै तहत काम करैंगे या भी सिफारिश करी सै। देशी संस्थानां नै सरकारी फंड मिलैं सैं तो बदेशियां नै वे क्यू कर मिल सकैं सैं? असल मैं एनकेसी की इस रिपोर्ट मैं भारत मैं उच्च शिक्षा का जो पूरा ढांचा पेश किया गया सै वो कुलीनतावादी सै अर देश के 25 साल तै कम उम्र के युवाओं के भारी बहुमत की खातर फायदेमंद नहीं होवैगा। यो इसा ढांचा सै जो 2015 ताहिं दाखिल्यां नै 15 फीसद तक बढ़ावण की जागां इननै घटावैगा। तो देखियो मेरे बीरा ताश खेलते खेलते दो बात इस राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की सिफारिशां पै बी कर लियो। समझ ल्यो इसके भीतर की बारीकियां नै अर चलाओ कोए तुरप चाल अक म्हारे बालकां के कालेजां के अर यूनिवर्सिटियां के दरवाजे बंद ना हो ज्यां अर फेर हम न्यों कहवां - ओहले! हमनै के बेरा था न्यों बण ज्यागी?

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