सोमवार, 29 मई 2017

बालकां नै बोझ मत समझो

बालकां नै बोझ मत समझो
आजकाल जिसनै देखो वोहे अपने बालकां की शिकायत करदा पावैगा। जणों मां बाप धोरै और कोए कामै कोन्या रहया करने की खातर। न्यों कहवैंगे अक बालक तो एकदम हाथ तै लिकड़ लिये, बड्यां नै गोलते ए कोन्या, म्हारी कोए बात नहीं मानते। हाईफाई घरां के बालकां की नकल करना सीख गये। उन्हें बरगा खाना-पीना-औढ़ना-पहरना चाहते हैं। वही फरमाइसें फरमाते हैं? उन्हीं की तरियां मौज-मस्ती करना चाहते हैं। स्कूल ताहिं जो बालक थोड़े-घणे तलै रहते हैं वे भी कालेज मैं जाते की साथ पर काढ़ जाते हैं। उननै कालेज जाने अर घूमने के लिए अपनी न्यारी कार चाहिए। कार नहीं तो मोटर बाइक तो जरूर चाहिए। ऊपर तै भारी-भरकम जेब खर्च चाहिए चाहे इसके बोझ तै मां-बाप की कड़ टूट जाओ। घर मैं ढाल ढाल के गैजेट्स तै भरया औड़ अपना न्यारा निखालस कमरा चाहिए। अपना एकांत चाहिए। अपनी आज़ादी चाहिए। मां बाप नै उनको कुछ कहने का, उनसे कुछ पूछण का कोए अधिकार नहीं। फेर उननै यो पूरा अधिकार है अक माता-पिता उनकी सारी मांग पूरी करैं। अर वे अपना यो अधिकार मांग कै नहीं लड़कै लेते हैं। जो माता-पिता उनकी मांगें पूरी नहीं कर पाते तो उनको वे मुंहफट होकर कहते हैं - ‘जै तम म्हारी जरूरत पूरी नहीं कर सको थे तो हम पैदा ए क्यों करे थे? इस दुनिया का मुंह क्यों देखण दिया था। जै पैदा करे सां तो ईब अपनी जिम्मेदारी तै क्यों भाज लिए। चोरी करो अर चाहे डाका मारो फेर हमनै आछी ढालां पालो।’ एक बै तो न्यों लागै सै अक बहोत सही बात सैं ये बालकां के बारे मैं। फेर यू तसवीर का एक पहलू सै। इस ढाल की शिकायत आमतौर पै एक तरफा हों सैं अर बढ़ा-चढ़ा कै कही जावैं सैं। एक बात तो या सै अक ना तो सारे बच्चे ए ईसी मांग करते अर ना सारे मां-बाप ये मांग पूरी कर सकदे। बालक जै हाईफाई बालकां की नकल करते भी हैं तो अपने मां-बाप की सीमा उननै दीखै सैं उनके दायरे मैं रह कै करैं सैं। कई बालक तो पढ़ाई के साथ-साथ कुछ कमाई भी करैं सैं अर उसनै खर्च करना चाहवैं सैं। बालकां नै अपना करिअर बनाने के लिए, इम्तिहान मैं दूसरे तै फालतू नंबर लेने के लिए, दिन-रात पढ़ाई मैं लगे रहना पड़ै सै। घर मैं ए टीवी कंप्यूटर, इंटरनेट अर मोबाइल फोन तै कुछ मनोरंजन कर सकैं तो करलें सैं, बाहर जाकै वार ताहिं मौज-मस्ती करने की फुरसत किसनै सै? अर वे इतने नासमझ, हृदयहीन या गैर जिम्मेदार भी नहीं होन्ते अक माता-पिता की मजबूरियां नै नहीं समझते हों। कई तो उनमैं तै या कोशिश बी करैं सैं अक कोए पार्ट टाइम काम करकै कुछ कमा लेवैं ताकि मां-बाप पै उनका बोझ घणा ना पड़ै। मध्यवर्गीय लड़कियां तो ज्यादातर इतनी समझदार अर जिम्मेदार होवैं सै अक वे खुद इस अहसास से दबी रहती हैं कि वे माता-पिता पै बोझ सैं। जिनके मां-बाप दोनों कामकाजी हों सैं वे लड़कियां तो अपनी पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ घर के काम अर छोटे भाई-बहन की देखभाल भी करैं सैं।
जै दोनों कान्ही का ध्यान करया जावै तो बेरा पाटैगा अक अपने बालकां नै गैर जिम्मेदार बतावण आले मां-बाप खुद कहीं ज्यादा गैर ज़िम्मेदार हों सैं। वे अपने बालकां नै एक बोझ समझैं सैं, एक ईसा बोझ जो मानो जबरदस्ती उनपै लाद दिया गया हो। उनमें से जो ‘समझदार’ होते हैं वे तो जरूरत तै फालतू बोझ ठाते ए कोन्या। वंश चलावण की खातर उननै एक बेटे की जरूरत हो सै इस करकै वे पहलमै गर्भस्थ शिशु की जांच करवा लेते हैं अर जै वा लड़की सै तो उसकी भ्रूण हत्या करवा कै उसतै छुट्टी पा लैं सैं। बेटी जो पैदा बी हो जावै तो वे उसके खिलाने-पिलाने, पढ़ाने-लिखाने, बीमारी मैं उसका इलाज करवाने आदि पै कम तै कम खर्च करैंगे। उसपै करे गये खर्च की भरपाई खातर उसपै ज्यादा तै ज्यादा काम करवायेंगे। अर जितनी जल्दी हो सकै उसका ब्याह करकै अपने सिर तै बोझ तारण की कोशिश करैंगे। कई मां-बाप तो इकलौते बेटे नै भी बोझ समझते हैं। उसका पालन-पोषण उननै झंझट का काम दीखै सै। उनकी आजादी पै असर पड़ता दीखै सै। उननै लागै सै अक बालक के कारण वे अपना कैरिअर बनाने, नौकरियां बदलने, आमतौर पै घर तै बाहर रहने, अपना कामकाज करने अर मौज-मस्ती करने की खातर आज़ाद नहीं रहते। जै उनका ब्यौंत हो सै तो बालकां नै पालण खातर वे अपने मां-बाप, सास-ससुर, नौकर-चाक्कर या बोर्डिंग स्कूल पै गेर कै अपनी आज़ादी खरीद लेवैं सैं। बालक उनके प्यार, साथ अर देखभाल तै वंचित रहता है तो रहवै, उनकी बला तै। इस पै भी वे बालकां नै बोझ समझना अर बताना जारी राखैं सैं। बालक तो अपनी बात कह नहीं सकता अर कहवै भी तो उसकी सुनने वाला कौन है? इस तरियां बालक बोझ समझे जावैं सैं अर इस विचार नै बढ़ावा देवै सै वा अर्थनीति अर राजनीति जो गरीबां नै दुनिया पै लद्या एक बेकार का बोझ मानती है। जनसंख्या नै या राजनीति एक महामारी के रूप मैं पेश करती है। इस करकै आण आला हर बालक दुनिया पै आ पड़ण आला एक बेकार का बोझ-सा लागै सै। असल में अमीर नहीं चाहन्ते अक ये गरीब दुनिया मैं रहवैं फेर उनकी मजबूरी सै गरीबां बिना उनकी अमीरी नहीं टिक सकदी। बात असल याहे सै अक बालक नै बोझ समझना ठीक नहीं। अर बालकां का मां-बाप नै बोझ समझना ठीक नहीं सै। जमाना तेजी तै बदलण लागरया सै। इसकी रफ्तार देखना के के गुल खिलावैगी? बालकां नै अर माता-पिता नै समझण की जरूरत सै।

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