पैरेलल इकोनोमी
सत्ते, फत्ते, नफे, सरिता, कविता, सविता और ताई भरपाई शनिवार नै पहोंचगे जन चेतना केंद्र मैं। सरिता बोली - इस जन चेतना केंद्र मैं हमै हम आवां सां हमनै और माणस बी बुलाने चाहियें। सविता बोली - हम तो शनिवार नै आवां सां। बाकी दिनां मैं भी इसमैं कुछ ना कुछ प्रोग्राम होन्ते रहवैं सैं। म्हारै रविता बतावै थी दस बारा दसमी की छोरी कठ्ठी होकै लाइब्रेरी मैं किताब का वाचन कर्या करैं। पाछले मंगलवार नै सदगति कहानी की किताब पढ़कै चरचा करी थी, उसनै। म्हारी चर्चा मंडल तो इस जन चेतना केंद्र तै भी पुराना सै। खैर आज की बातचीत पै आगे। सत्ते बोल्या - आज पैरेलल इकोनोमी पै चरचा करनी थी अर तैयारी करके आनी थी सविता नै। सविता बोली - इसनै समानान्तर अर्थ व्यवस्था भी कहदे सैं। यह सालाना घरेलू उत्पाद का 40 प्रतिशत मतलब 12,00,000 करोड़ रु. जरूर सै। कविता बोली - हे मनै राम की सूं। इतना घणा काला धन तिजोरियां मैं क्यूकर आवै सै? सविता बोली - 12,00,000 करोड़ रु. धरण की खातर बेरा ना कितने गोदाम बनाने पड़ैंगे? रुपइया धर्या नहीं जाता यो इन्वैस्ट कर्या जा सै - धन्ध्यां मैं कै फेर बैंका मैं। काला धन राखण आले लोग इस धन नै धरती मैं गाड कै कोनी राखते, इस पीस्से तै और धन कमावैं सैं अर ब्याज बणावैं सैं। फत्ते बोल्या - न्यौ क्यूकर? सविता बोली - उसे दुकानदार कै मिल मालिक नै लेल्यां सैं जिसनै बिलटी घोटाले तै काला धन बनाया था। उसनै कई जागां खुद घूस देनी पड़ै सै। सेल्स टैक्स, एक्साइज इंस्पैक्टर, पुलिस, बाबू लोग, लोकल नेता, ये सब सम्भालने पड़ते हैं। पर नकद! काले धन का इस्तेमाल एक समानान्तर नकद अर्थ तंत्र में होता है जड़ै नकद चालै सै।
ताई भरपाई बोली - बोरियां मैं, थैलियां मैं, सूटकेसां मैं - मनै फिल्मां मैं देख्या सै - नकद नारायण। फत्ते - चलो फिल्मां तै कुछ तो सीख मिली तनै। सरिता बोली - और के बैंक मैं खाता खुलवाना हो तो कितने पापड़े बेलने पड़ैं सैं - स्थाई पता, दूसरे खाते आले की सिफारिस आदि। शहरां मैं लाखां का रहवण का ठिकाना ए कोन्या तो बैंक खाता कड़े तै खुलै था। नकद ही बढ़िया सै। सबकी खातर बराबर...। सविता बोली - ठीक कह्या सरिता नै। इसतै न्यारा गाम मैं भी नकद का चलण बहोत सै। भारत के बैंकां मैं कुल जमा राशि लगभग 15 लाख करोड़ रु. सै अर सालाना उत्पाद मतलब एक साल की कृषि, उद्योग अर सब कुछ की उपज ही लगभग 30 लाख करोड़ रु. सै जिसमां तै बचत दर जै 20 प्रतिशत (असल मैं 18 प्रतिशत सै) भी मान ली जा तो इसका मतलब यू हुआ एक साल मैं 6 लाख करोड़ रु. की बचत हैवे सै। मगर बैंका मैं जमा राशि की सालाना बढ़त सिर्फ लगभग 45 हजार करोड़ रु. सै। फत्ते बोल्या - सविता सारा हिसाब किताब आजैए सिखावैगी के। बहोत कसूती तैयारी करकै आरी दीखै सै। न्यों बता या समानान्तर अर्थ व्यवस्था के हमेशा न्यारी रहवै सै? सुन्या सै आज काल काला धन भी सफेद बनाया जा सकै सै?
सविता बोली - तेरे कान तो बहोत तेज सैं फत्ते। तनै ठीक सुन्या सै। काला धन हमेशा काला नहीं रैहन्ता। अनेक रास्त्यां तै गुजर कै बहोत सा काला धन बैंकों मैं आकै सफेद होज्या सै। फत्ते बोल्या - सविता ये बैंक तो सरकारी सैं। ये बैंक इस काले धन नै पकड़ क्यों नहीं लेन्ते? सविता बोली - या बात समझण की सै अक बैंक सरकारी होन्ते हुये भी अलग संस्थान सैं। सरकार का कर विभाग न्यारा सै। बैंकिंग कानून के हिसाब तैं पैसा जमाकर्त्ता तै यो नहीं पूछया जान्ता अक यो धन घोषित सै अक अघोषित सै। साथ-साथ एक बात और सै अक बैंक जै काला धन पकड़ण कै पकड़वावण लागै तो उसके पास पीस्सा जमा कूण करावैगा? सरिता बोली - फेर ये बैंक यो काला धन धंधों मैं क्यूकर लावैं सैं? काला धन्धा तो नहीं करते ये? सविता बोली - एक बर बैंक में जमा हुए पाछै धन काला कै सफेद नहीं, बस धन हो सै। यो व्यापार, उद्योग, कृषि के कामां मैं ब्याज पै उधार दिया जावै सै। सत्ते बोल्या - एक मिनट सविता। पहलम न्यों बता अक यू काला धन बैंकां मैं आवै सै क्यूकर? बोर्यां मैं भरकै जमा कराया जावै सै के? सविता बोली - तम न्यों बूझो सो एक काला धन सफेद क्यूकर होसै? बैंक मैं आण का मतलब सै धन का घोषित हो जाना, सफेद हो जाना। यो बहोत बड़ा ही धन्धा सै। पहली तो बात या सै अक भारत मैं हम 20 हजार रुपये तै ज्यादा की भुगतान नकदी मैं नहीं कर सकदे, बैंक मैं जमा नहीं करा सकदे। बाहर के देशां की बात और सै...। सत्ते - ज्यूकर स्विस बैंक के खाते? सविता - हां, बोरियां मैं ले ज्या कै पीस्से जमा हो सकैं सैं। कैहण का मतलब यू सै अक या पैरेलल इकोनोमी काबू आवण की कोन्या जब ताहिं हम तम सारे इसनै आच्छी ताहि नहीं समझल्यांगे। हमनै ताश खेलण तै फुरसत कोन्या।
सत्ते, फत्ते, नफे, सरिता, कविता, सविता और ताई भरपाई शनिवार नै पहोंचगे जन चेतना केंद्र मैं। सरिता बोली - इस जन चेतना केंद्र मैं हमै हम आवां सां हमनै और माणस बी बुलाने चाहियें। सविता बोली - हम तो शनिवार नै आवां सां। बाकी दिनां मैं भी इसमैं कुछ ना कुछ प्रोग्राम होन्ते रहवैं सैं। म्हारै रविता बतावै थी दस बारा दसमी की छोरी कठ्ठी होकै लाइब्रेरी मैं किताब का वाचन कर्या करैं। पाछले मंगलवार नै सदगति कहानी की किताब पढ़कै चरचा करी थी, उसनै। म्हारी चर्चा मंडल तो इस जन चेतना केंद्र तै भी पुराना सै। खैर आज की बातचीत पै आगे। सत्ते बोल्या - आज पैरेलल इकोनोमी पै चरचा करनी थी अर तैयारी करके आनी थी सविता नै। सविता बोली - इसनै समानान्तर अर्थ व्यवस्था भी कहदे सैं। यह सालाना घरेलू उत्पाद का 40 प्रतिशत मतलब 12,00,000 करोड़ रु. जरूर सै। कविता बोली - हे मनै राम की सूं। इतना घणा काला धन तिजोरियां मैं क्यूकर आवै सै? सविता बोली - 12,00,000 करोड़ रु. धरण की खातर बेरा ना कितने गोदाम बनाने पड़ैंगे? रुपइया धर्या नहीं जाता यो इन्वैस्ट कर्या जा सै - धन्ध्यां मैं कै फेर बैंका मैं। काला धन राखण आले लोग इस धन नै धरती मैं गाड कै कोनी राखते, इस पीस्से तै और धन कमावैं सैं अर ब्याज बणावैं सैं। फत्ते बोल्या - न्यौ क्यूकर? सविता बोली - उसे दुकानदार कै मिल मालिक नै लेल्यां सैं जिसनै बिलटी घोटाले तै काला धन बनाया था। उसनै कई जागां खुद घूस देनी पड़ै सै। सेल्स टैक्स, एक्साइज इंस्पैक्टर, पुलिस, बाबू लोग, लोकल नेता, ये सब सम्भालने पड़ते हैं। पर नकद! काले धन का इस्तेमाल एक समानान्तर नकद अर्थ तंत्र में होता है जड़ै नकद चालै सै।
ताई भरपाई बोली - बोरियां मैं, थैलियां मैं, सूटकेसां मैं - मनै फिल्मां मैं देख्या सै - नकद नारायण। फत्ते - चलो फिल्मां तै कुछ तो सीख मिली तनै। सरिता बोली - और के बैंक मैं खाता खुलवाना हो तो कितने पापड़े बेलने पड़ैं सैं - स्थाई पता, दूसरे खाते आले की सिफारिस आदि। शहरां मैं लाखां का रहवण का ठिकाना ए कोन्या तो बैंक खाता कड़े तै खुलै था। नकद ही बढ़िया सै। सबकी खातर बराबर...। सविता बोली - ठीक कह्या सरिता नै। इसतै न्यारा गाम मैं भी नकद का चलण बहोत सै। भारत के बैंकां मैं कुल जमा राशि लगभग 15 लाख करोड़ रु. सै अर सालाना उत्पाद मतलब एक साल की कृषि, उद्योग अर सब कुछ की उपज ही लगभग 30 लाख करोड़ रु. सै जिसमां तै बचत दर जै 20 प्रतिशत (असल मैं 18 प्रतिशत सै) भी मान ली जा तो इसका मतलब यू हुआ एक साल मैं 6 लाख करोड़ रु. की बचत हैवे सै। मगर बैंका मैं जमा राशि की सालाना बढ़त सिर्फ लगभग 45 हजार करोड़ रु. सै। फत्ते बोल्या - सविता सारा हिसाब किताब आजैए सिखावैगी के। बहोत कसूती तैयारी करकै आरी दीखै सै। न्यों बता या समानान्तर अर्थ व्यवस्था के हमेशा न्यारी रहवै सै? सुन्या सै आज काल काला धन भी सफेद बनाया जा सकै सै?
सविता बोली - तेरे कान तो बहोत तेज सैं फत्ते। तनै ठीक सुन्या सै। काला धन हमेशा काला नहीं रैहन्ता। अनेक रास्त्यां तै गुजर कै बहोत सा काला धन बैंकों मैं आकै सफेद होज्या सै। फत्ते बोल्या - सविता ये बैंक तो सरकारी सैं। ये बैंक इस काले धन नै पकड़ क्यों नहीं लेन्ते? सविता बोली - या बात समझण की सै अक बैंक सरकारी होन्ते हुये भी अलग संस्थान सैं। सरकार का कर विभाग न्यारा सै। बैंकिंग कानून के हिसाब तैं पैसा जमाकर्त्ता तै यो नहीं पूछया जान्ता अक यो धन घोषित सै अक अघोषित सै। साथ-साथ एक बात और सै अक बैंक जै काला धन पकड़ण कै पकड़वावण लागै तो उसके पास पीस्सा जमा कूण करावैगा? सरिता बोली - फेर ये बैंक यो काला धन धंधों मैं क्यूकर लावैं सैं? काला धन्धा तो नहीं करते ये? सविता बोली - एक बर बैंक में जमा हुए पाछै धन काला कै सफेद नहीं, बस धन हो सै। यो व्यापार, उद्योग, कृषि के कामां मैं ब्याज पै उधार दिया जावै सै। सत्ते बोल्या - एक मिनट सविता। पहलम न्यों बता अक यू काला धन बैंकां मैं आवै सै क्यूकर? बोर्यां मैं भरकै जमा कराया जावै सै के? सविता बोली - तम न्यों बूझो सो एक काला धन सफेद क्यूकर होसै? बैंक मैं आण का मतलब सै धन का घोषित हो जाना, सफेद हो जाना। यो बहोत बड़ा ही धन्धा सै। पहली तो बात या सै अक भारत मैं हम 20 हजार रुपये तै ज्यादा की भुगतान नकदी मैं नहीं कर सकदे, बैंक मैं जमा नहीं करा सकदे। बाहर के देशां की बात और सै...। सत्ते - ज्यूकर स्विस बैंक के खाते? सविता - हां, बोरियां मैं ले ज्या कै पीस्से जमा हो सकैं सैं। कैहण का मतलब यू सै अक या पैरेलल इकोनोमी काबू आवण की कोन्या जब ताहिं हम तम सारे इसनै आच्छी ताहि नहीं समझल्यांगे। हमनै ताश खेलण तै फुरसत कोन्या।
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