मंगलवार, 30 मई 2017

लत्ता कोन्या औढूं

लत्ता कोन्या औढूं
आठ-दस किल्ले। चौखा काम चाल रहया। तीन भाई दो बाहण। बड्डे का ब्याह होरया। एक दिन किसे बात पर सल्फास की गोली खा कै जात्ता रहया। मां-बाप बहोत दुखी। छोटा छोरा नफे 16 साल का दसमीं मैं पढ़ै। एक कान्ही तो उस ताहिं न्यों कहया करदे अक बड्डी भाभी मां बरोबर। तेरहवीं आले दिन तै दो दिन पहलम सुगबुगाहट शुरू होगी अक नफे का लत्ता उढ़ावांगे। कमला की उमर 27 साल की अर वो सोलह साल का। कमला नाटगी लत्ता औढ़ण तै। ढाल-ढाल की चरचा। म्हारी परम्परा की नाक कटा दी अर और बेरा ना के-के। कितै और निशाने साध राखे सैं। आजकाल म्हारे जाट गोतां के कुछ भाईयां नै हरियाणा की संस्कृति की चिंता बहोत सतावण लागरी सै। गांव का ताना बाणा छिन्न-भिन्न होत्ता जावण लागरया इसकी बहोत चिन्ता सै। परम्परा का कौण सबतै बड्डा रुखाला इसका बहोत बड्डा कम्पीटिशन-सा होरया सै। 18 तारीख नै रात नै एनडीटीवी चैनल पर तो एक पंचायती नै आड़े ताहिं कह दिया अक हमनै हिन्दुआं की पुरानी किताबां तै कोए लेना-देना नहीं। हमतो आर्य सैं। वैदिक संस्कृति नै मानां सां हम तो। किसे नै कहया अक स्वामी दयानन्द नै तो छुआछूत के खिलाफ संघर्ष करया तो उस पर तो माट्टी गेर दी। पंचातियां धोरै कोए जवाब नहीं था। फेर सवाल आया अक ईब ताहिं एक बी इसा केस हो जित बहन-भाई नै आपस मैं ब्याह करया हो? तो भी घुमा-फिरा कर बात करी, सीधा जवाब कोन्या दिया अक यो केस सै बहन अर भाई के ब्याह का। गाम के गाम मैं अर गोत के गोत मैं ब्याह का भी बस एकला मनोज अर बबली का केस सै ओर कोए इसा केस नहीं बता पाए पंचायती। बार-बार दुहाई दी जा रही थी अक भाईचारे के गोतों में शादी करने से हमारी परम्पराओं का अपमान होता है। खेड़े के गोत का सम्मान करना हमारी परम्परा रही है। सीम कै लागदे दूसरे गोत के गाम मैं भी शादी न करना म्हारी परम्परा रही सै। चार गोतों को छोड़कर शादी करना म्हारी परम्परा रही है। तीन दिन की शादी करना हमारी परम्परा रही है। आर्य समाज के शादी के नियम कहते हैं कि शादी के वक्त बराबरी की हैसियत से लड़का लड़की एक-दूसरे के साथ पति-पत्नी का संबंध स्वीकार करेंगे। विवाह व्यवस्था कसूते संकट मैं सै। गोत-नात जात-पात सब कुछ देख द्याख कै करे औड़ ब्याह एक-दो साल के भीतर तलाक पर आकै खड़े होज्यां सैं। क्यों? के जवाब सै म्हारे धोरै? समाज मैं कुदरतन विकास के कारण जो बदलाव आवैं सैं उनको रोकना ठीक नहीं होत्ता। जनता कै जिब समझ मैं आज्या सै तो वा बदलाव स्वीकार करले सै म्हारे पंचायती भाई स्वीकार करो चाहे मत करो। चाहे कितने ए फरमान जारी करल्यो? फरमान की आड़ मैं कत्ल करने आल्यां नै बचावण की कोशिश करनियां नै या कुदरत माफ कोन्या करै। या जद्दोजहद सदियां तै चालती आई सै इस समाज मैं, इसनै कोए नहीं रोक सकदा। रोक सकदे तो बल्दां की खेती तै के थोड़ा प्यार था हमनै। फेर बख्त बदल लिये। समझदार हैं वो लोग जो वक्त से पहले वक्त की धार पहचान कर अपने आप को बदल लेते हैं। इसलिए लत्ता औढ़ण तै इन्कार करण आली महिला को कुलच्छनी कहने की बजाए उसको शाबाशी देओ अक उसनै आज के बख्ता मैं इस अन्यायकारी परम्परा कै खिलाफ आवाज बुलन्द करी। बेमेल विवाह तो है ही यह। कई बार जवान होने पर देवर अपनी मर्जी की शादी भी कर लेता है। उस औरत को अपनी मर्जी से चुनाव करने का कोई हक नहीं है। इन परम्पराओं की समीक्षा आज के समय की मांग है। लोग इसमें मौजूद अन्याय की जगहों को अब पहचानने लगे हैं। देखना यही है कि इस विवाह संस्था के संकट से हम किस तरह से निबटते हैं। समाज को आगे ले जाने वाले रास्तों का चुनाव करते हैं या पीछे ले जाने वाले रास्तों का?

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