बुधवार, 7 दिसंबर 2016

अधखबड़ा माणस

अधखबड़ा माणस
म्हारे देस मैं अर खास कर हरियाणा मैं अधखबड़े माणसां की गलेट लागै सैं। दो साल पहलम गणेस की मूर्तियां नै दूध पीणा सुरू करया। देस के महानगरां मैं अर बिदेसां मैं ये खबर जंगल की आग की ढालां फैलगी। भौतिक प्रयोगसाला का एक साइंसदान बी दूध प्यावण आल्यां की भीड़ में खड़्या पाया गया। कुछ साल पहलम बम्बई के मसहूर टाटा इन्सिटिच्यूट ऑफ फण्डा मैंटल रिसर्च के एक माने ओड़ खगोल शास्त्री के बारे में चर्चा थी अक ओ ग्रहण लागण के बख्त न्हाण का पाखण्ड कर्या करता। जै इसे अन्धविस्वासी साइंसदान देस मैं वैज्ञानिक नजरिये की एक धुरी सैं तो दूजे छोर पै ओ मोची सै जिसनै टी.वी. पै यो साबित कर दिया था अक उसका तीन टांगा आला औजार भी गणेश की ढालां दूध पी सकै सै। इस बात तै एक बात तै साफ उभर कै आवै सै अक म्हारे देस मैं वैज्ञानिक शिक्षा अर वैज्ञानिक सोच में कोए सीधा रिस्ता नहीं सै। कोए जमाना था जब शिक्षा अर वैज्ञानिक दृष्टिकोण एक प्रक्रिया का हिस्सा थे। मतलब आधुनिकता का हिस्सा थे। पढ़े लिखे माणस अन्ध विश्वासां तै अपणी मुक्ति नै अनपढ़ां के मुकाबले मैं अपणी श्रेष्ठता का कारण बतान्ते हान्डया करते। पर आज वे बातै कोन्या रैहरी। कई माणस वैज्ञानिक दृष्टिकोण नै कुदरत अर व्यक्तिगत जिन्दगी ताहिं ए लागू करैं सैं पर समाज के प्रति उनके दृष्टिकोण नै वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण का हिस्सा कोन्या मानते। बस योहे अध खबड़ापन सै उनका अक वे विज्ञान के नजरिये नै समाज तै न्यारा करकै राखै सैं।
म्हारी आज की संस्कृति नै एक अधखबड़ा माणस तैयार करण का ठेका सा ठा राख्या सै। यो अधखबड़ा माणस एक ढाल तै विचारसील हो सै, वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी हो सै उसका, वैज्ञानिकां आले काम भी सारे करै सै पर दूसरे कान्ही ओ विवेकहीन भी सै अर अवैज्ञानिकता का सिकार भी सै। अर या बात हरियाणे मैं तो हर सहर अर गाम मैं पावै सै पर इसे अधखबड़े माणस सारी दुनियां मैं सैं।
एक डॉक्टर (अधखबड़ा माणस) मरीज का परेसन करकै न्यों कहवैगा अक ले हमनै तो जो करणा था सो कर दिया, ईब बाकी ऊपर आला जाणै। मास्टर जी स्कूल मैं तो बालकां नै पढ़ावैगा अक बरसात बादलां तै हो सै अर घरां आकै अड़ कै बैठ ज्यागा अक बरसात हवन करे तैं हो सै। बताओ इसा मास्टर बालकां मैं किसा वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा करैगा? इन अधखबड़े माणसां नै ब्रूनो नाम का साइंसदान जिन्दा जला दिया था। ब्रूनो का कसूर इतना ए था अक उसनै एक सच्चाई दुनिया के साहमी ल्यावणी चाही थी अक म्हारी धरती सूरज के चारों कान्हीं घूमै सै। इसतै पहलम दुनियां न्यों मान्या करती अक म्हारा सूरज म्हारी धरती के चारों कान्हीं घूमै सै। आज जिब जमाना इतनी आगै जा लिया, विज्ञान नै इतनी तरक्की करली तो भी इन अधखबड़े माणसां नै राजस्थान मैं भंवरी बाई गेल्यां सामूहिक बलात्कार कर्या। उसका कसूर इतना ए था अक उसनै बाल विवाह का विरोध कर्या था। बेरा ना म्हारे संविधान (जिसमें बाल विवाह कानूनन जुर्म मान्या गया सै) के रुखाले भंवरी बाई नै बचावण क्यूं नहीं आये। उल्टा बलात्कारियां के पाले मैं जा खड़े हुए। और भी घणे कारण रहे होंगे इसके पर मनै लागै सै अक ये अधखबड़े माणस थे अर उनकी अधखबड़ी सोच थी जिसनै भंवरी बाई ताहिं न्याय नहीं मिलण दिया।
म्हारे समाज नै, म्हारी मानवता नै, इन्सानियत नै जै सबतै घणा खतरा किसे तै सै तो इस अधखबड़े माणस तै सै इसकी अधखबड़ी सोच तै सै अर उस समाज व्यवस्था तै सै जिसनै ये अधखबड़े माणस बणावण के बड्डे कारखाने ला राखैं सैं।

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