बुधवार, 7 दिसंबर 2016

धरती पुत्तर का नारा - पड्या लोकतन्त्र पै भारया

धरती पुत्तर का नारा - पड्या लोकतन्त्र पै भारया 
सरोज नै बूझया - हे सरती आज कित जाओ सो बेबे? सरती बोली - ए दिल्ली की सरकार के जी जिवासे नै रोकै आवां सां अक कै दिन हो लिये फीजी देश मैं महेन्दर पाल चौधरी कैद कर राख्या अर वा बोल चुप्पाकी बैठी। सरोज नै फैर बूझ लिया - कूण-कूण जाओ ओ? चौधरी के नजदीकी बी जावैं सैं अक नहीं? सरती झट बोली - ए सरोज भाण सारा ए बहू जमालपुर गाम सिंगरया हांडै सै दिल्ली जावण के नाम का। सरोज कै पाछले लैकसन की बात खटकरी थी कोए तै वा फेर बूझ बैठी - तो लोकतन्त्र की इतनी चिन्ता होगी के बहु जमालपुर आल्यां नै? सरती कै बात माड़ी सी कम समझ मैं आई फेर बी उसनै जवाब दिया - बेराना बेबे फेर गाम आले लोग अर लुगाई त्यार तो कैहन्ते की साथ हो लिये। सरोज तै नहीं रहया गया अर बोली - पाछै सी आड़ै विधान सभा के लैकसन मैं जिब वोट पड़े थे तो बोग्गस वोट भुगतावण मैं सबतै आगै था यू गाम अर थारे ये धौल कपड़िये। गरीब जाट अर बाहमनां के वोट ये पहलड़े झटके में गेरगे अर हरिजनां की वोटां का तो जिकरा ए कड़ै था। ईबये हे फीजी के लोकतन्त्र के ठेकेदार होगे। बात घाट समझ मैं आई बेबे सरती। धौरे बैठी मनभरी इनकी बात सुणण लागरी थी वा बोली - महेन्दर पाल चौधरी के बड्डे बुजुर्ग बहु जमालपुर के रहवण आले थे ज्यां करकै ये उसके बचावण खातर कठ्ठे होरे सैं। वो इनका धरती पुत्तर जो ठहर्या। बाकी इननै लोकतन्त्र की घणी सी चिन्ता कड़ै सै? सरोज मन भरी की बात सुणकै बोली - हे मनभरी वे फीजी आले भी तै धरती पुत्तर का नारा देरे सैं अक म्हारी धरती का माणस फीजी का प्रधानमन्त्री होणा चाहिये। तो फेर म्हारे मैं अर उनमैं फर्क के रह्या? सरती नै दिमाग पै जोर देणा पड़या अर बोली - धरती पुत्र का यू नारा पिछड़ी सोच का प्रतीक सै। जिब बी यू दिया जागा उड़ै यू घर घालैगा।
यू नारा फीजी आल्यां कै जो लोकतन्त्र चाहवैं सैं कसूता काम कर सकै सै। इस नारे मैं तानाशाही की बू मारै सै अर कई देशां मैं तानाशाही इसै नारे के कान्धयां पै सवार होकर आई सै। जित बी लोकतन्त्र नै अपणी जड़ डूंघै जमा ली उड़ै दूसरी मूल के लोगां के भी वेहे लोकतान्त्रिक अधिकार सैं जो उड़े के मूल निवासियां के सैं। सरोज फेर ताव सी खागी अर बोली - फेर ये म्हारे गाम आले जो महेन्दर पाल चौधरी का झण्डा ठारे इनकी सोच मैं के धरती पुत्तर की भावना काम नहीं करण लागरी? सरती नै जवाब दिया - करण लागरी सै अर या गलत बात सै। महेन्दर पाल चौधरी तै इन बातां तै घणा ऊपर उठया औड़ माणस सै। उसनै तानाशाही कै खिलाफ फीजी के मूल निवासी भी अर भारत के मूल के निवासी भी कठ्ठे करकै लेबर पार्टी बणा कै संघर्ष करकै लोकतन्त्र की एक साल पहलम स्थापना करी थी फीजी मैं।
मनभरी नै सरती टोक दी - तो इब महेन्दर पाल चौधरी नै के कबाड़ा कर दिया अक यू स्पेट अर मुट्ठी भर लोग उसकै खिलाफ बगावत करकै खड़े होगे? सरती बोली - भारत तै कुछ पीढ़ी पहलम के लोग मुजारे बणकै फीजी मैं गये थे। ज्यूकर पंजाब के किसान कुरूक्षेत्र पेहवे के इलाके मैं मुजारे बणकै आये थे। इन मुजारयां नै उड़ै अपणा खून पसीना एक करकै उड़ै की धरती बोवण खावण जोगी करी। उड़ै इनकी मेहनत रंग ल्याई अर फीजी के लोग जिनकी वा धरती थी वे मालामाल होगे। इन मुजारयां ताहिं वा धरती पट्टे पै दी थी फीजी की सरकार नै। ईब यू पट्टे का बख्त खत्म होवण आला था अर उड़ै मुजारयां की मांग सै अक इतने साल तै जो जमीन बोवैं बाहवैं सैं जमीन पै हक उनका हो। जमीन की माल्कियत मुजारयां की हो। अर ना तै कमतै कम यू पट्टे का बख्त पचास सौ साल और बधाया जा।
महेन्दर पाल चौधरी इन मुजारयां का हिम्माती सै ज्यां करकै इन स्पेट हर नै फीजी मैं धरती पुत्तर का नारा देकै यू तख्ता पल्ट कर दिया अक ये मुजारे बेदखल करे जा सकैं। मनभरी नै फेर टोक दी सरती। इतनी बातां का तनै क्यूकर बेरा लाग्या? सरती बोली - अखबारां मां तै पढ़कै बेरा लाग्या बेबे। सरोज नै बूझया - अक यू कुरूक्षेत्र के मुजारयां ताहिं हरियाणा की सरकार नै पट्टे का हक दिया अक नहीं? जै नहीं दिया तो फीजी की सरकार जै देणा चाहवै थी तो के ठीक करै थी? सरती बोली - हरियाणा मैं तै धरती पुत्तर का नारा देकै वे घणखरे मुजारे उजाड़ दिये थे। फेर एक बात समझ लेणी चाहिये अक महेन्दर पाल चौधरी की सरकार की बहाली की लड़ाई। लोकतन्त्र की बहाली की लड़ाई सै, मुजारयां के हक दिवावण की लड़ाई सै। यो धरती पुत्तर के नारे के खिलाफ लड़ाई सै अर इसमैं या सोच बणाकै हम सब नै अपणा योगदान।

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