या चाल तरक्की की
जुलाई 1992 में सरकार अपने बिदेशी ऋण दातावां नै संतुष्ट करण ताहिं बैंक ऑफ इंग्लैंड की तिजोरी मैं लगभग 47 टन सोना भेजण नै मजबूर होगी थी। कुछ दिन तो सांस आया पर फेर सांस चढ़ा दिये। विश्व बैंक नै एक तरफा डिग्री का नोटिस भेज दिया। भारत एक आंख तै हंसै था अर दूसरी तै रोवै था। और बी कई देशां गेल्यां ईसी ए बणरी थी जणों तै ये सारे एकै आवे के बास्सण हों। जो कर्जा देवै उसकी दाब कर्जा लेवणिया पै कितणी होसै उसनै भुगतभोगी ए बता सकै सै, हम तो अन्दाजा ए ला सकां सां। कर्जा देणिया घरुड़ कै तै ब्याज लावै अर कदे कहवैगा मेरी भैंस नये दूध होसै इसनै लेज्या, कदे हुकम दे देगा मेरा किल्ला बाहदे, कदे कहदे बालकां की मां नै खंदा दिये रोटी पोंचाज्यागी। दारु पीवण का अड्डा बी कर्जा लेवणिया के घर मैं ए बणावैगा अर कई बै तो इज्जत का गाहक बी होज्या। ओं न्यों कहवैगा अक भाई मैं तो सभनै एक आंख तै देख्या करूं। कर्जा लेवणिया उसकी एक-एक रग नै जाणदा हुया बी उसका हुकम मानै अर होंठ बन्द राखै।
इसे ढालां अमीर देश गरीब देशां नै कर्ज देन्ती हाणा बेरा ना के-के शर्त ला देंगे, इननै मानै जिब मरगे अर ना मानै तो कर्ज कोण्या मिलै। ईब कई माणस न्यों कहदें सैं अक कर्ज लेवण मैं हर्ज केसै? फेर उन शर्तां के बारे मैं विचार नहीं करैं, दिमाग पै कती जोर दे कै राजी कोण्या अक ये ब्याज की शर्त केसैं? कई कहदेंगे अक हमनै सारा बेरा सै। क्यों? बेरा सै थामनै अक न्यों ए धूल मैं लठ मारण लागरे सो? कई शेर न्यों कहदें रै हमनै इनकी शर्तां तै के लेना-देना म्हारे तो तीजां केसे कटरे सैं। फेर इन आडूआं नै न्यो कूण समझावै अक घणे दिन काच्चे कोण्या कटैं इस ढालां तो। ये शर्त सैं - सामाजिक सेवा के कामां के खर्च मैं कटौती (शिक्षा अर सेहत), खाद्यान्न पै सब्सिडी का खात्मा, सार्वजनिक क्षेत्र नै निजी क्षेत्र के हाथां बेच्चण का काम, जितने बीमार कारखाने सैं उननै बन्द करण की योजना, बिदेशी पूंजी नै सून्नी छोड़णा, बैंकां अर बीमा क्षेत्र नै बिदेशी कम्पनियां नै देणा। आई किमै समझ मैं अक पढ़दे-पढ़दे नींद आवण लागगी। बेरा सै मनै पर के करूं बातै इतनी गहरी सैं। ये समझणी जरूरी सैं नातै देश फेर गुलाम होज्यागा।
1991 मैं मुद्रा कोष की गैल भारत नै एक ऋण समझौता करया अर गैल की गैल विश्व बैंक का ढांचागत समायोजन ऋण लिया। ये सारे पापड़ बेले तो थे भुगतान संतुलन की कठिनाई दूर करण नै अर वित्तीय घाटा कम करण की खात्तर पर बणगी उल्टी। हम और घणे दाब मैं आन्ते जाण लागरे सां अर म्हारा कर्जा आये दिन बढ़ता जासै। सन् 1998 ताहिं तो करज 95 अरब 70 करोड़ डालर होग्या बताया। इसके रुपइये कितने होगे यो हिसाब तम आप्पै ए ला लियो। इसकी दाब मैंए म्हंगी बिजली बेचै सैं वे हमनै अर और भी कई ढाल बांह मरोड़ैं सै म्हारी।
घरेलू खरीद की ताकत सिकुड़गी अर बिदेशी पूंजी बेरोक-टोक आवै जावै सै। अब इसतै व्यापार का जो संयोग बणै सै ओ भारत के उत्पादकां का दिवालिया काढ़ कै छोड्डैगा। कर्ज भुगतान का बोझा बढ़ता जावण लागर्या सै। कर्ज उल्टा देवण ताहिं और कर्जा लेना पड़र्या सै। ज्याण के लाले पड़रे सैं। गरीब ज्याण बचावण की खात्तर नये ढंग के हथियार पिनावण लागर्या सै। गरीब की पिटाई मैं उसके घणखरे नुमाइंदे भी शामिल सैं।
विश्व बैंक नै बेरा था अक थारी इन नीतियां करकै गरीब मूधे मुंह पडैंगें। ज्यूकर सर्कस मैं जाल हुया करै सर्कस आल्यां की हाड्डी-पसली टूटण तै बचावण की खात्तर। न्यों ए मुद्रा-कोष नै बेरा था अक इस उदारीकरण अर वैश्वीकरण करकै घणे माणसां की कड़ टूटैगी तो इननै एक ‘सेफ्टी नेट’ बणाया पर फेल यो भी होग्या अर हाथ-पां टूटण आल्यां की गलेट लागरी सैं। पर भारत की सरकार खड़ी-खड़ी जुगालै सै। आज सब किमै बाजार की ताकत कै साहमी माथा टेकग्या दिखै सै। थोड़े से अमीरां कै सूत भी खूबै ए आरी सै। बाटा नै पहलम अपणी फैक्ट्री के संगठित मजदूरां ताहिं 80 रुपइये की दिहाड़ी देनी पड़या करती। विश्व बैंक का साहरा लेकै ये मजदूर तो घरां नै चालते कर दिये उसने अर ईब स्वतन्त्र मोचियां धोरै ठेके पै 25 रुपइये दिहाड़ी पै काम करवावै सैं। अमीरां के बालक एयर कन्डीशन्ड घर में रहवैं, एयर कन्डीशन्ड बस मैं एयरकन्डीशन्ड स्कूल मैं पढ़ण जावैं। उननै के बेरा पोह का जाड्डा किसा हुया करै? उन ताहिं हर चीज हाजिर सै। समाज आड़े ताहिं गिर लिया अक औरत की भी बाजार मैं बिठा कै और चीजां की ढालां बोली लुआदी। वाह रै तरक्की तेरे के कहणे? गंगा के पाणी मैं जहर घोलणिये इसकी पवित्रता के ठेकेदार बणे हांडैं सैं। जै याहे रफ्तार रही अर इसे दिशा मैं रही तो आगले दस साल मैं के होज्या कुछ नहीं कहया जा सकता। सत्यानाश होलेगा तो न्यों कहोगे ओहल्ले भाई! हमनै के बेरा था अक न्यू बणज्यागी?
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