बुधवार, 7 दिसंबर 2016

बिना होश का ‘जोश’

बिना होश का ‘जोश’
गाभरू छोरे-छोरिया में ‘जोश’ फिल्म बहोत सराही गई। बढ़िया कलाकार चोखी कहानी, सुरीला संगीत, एक्शन अर चूमा चाटी तै भरपूर मसाले आली या फिल्म बाक्स आफिस पै हिट बतावैं सैं। फिल्म के किस्से मैं दो गिरोह सैं एक ईगल गिरोह सै जिसका सरदार मैक्स (शाहरूख खान) सै उसकी एक जुड़वां बहन (ऐश्वर्या राय) सै अर उसके गिरोह के कुछ और माणस सैं। दूसरे गिरोह का मुखिया (शरद कपूर) सै, उसका एक छोटा भाई सै (चंद्रचूड़सिंह) अर और कुछ गुण्डे। इस गिरोह का नाम बिच्छू सै। गोआ के किसे शहर की तसवीर दिमाग मैं राख कै बणाई गई सै या फिल्म। ईगल अर बिच्छू गिरोह मैं कसूती दुश्मनी सै। इन दोनूं गिरोहां का काम मकान खाली कराणा सै ठेके पै अर छोटे मोटे मसल्यां मैं दादागिरी दिखा कै निबटावण के पीस्से लेवण का सै। यू सिलसिला चालता रहवै सै।
फिल्म नया मोड़ जिब लेवै सै जिब बिच्छू गिरोह के दादा शरद कपूर के छोटे भाई चन्द्रचूड़ सिंह तै ईगल गिरोह के सरदार (शाहरूख खान) मैक्स की बाहन का इश्क शुरू होज्या सै। चन्द्रचूड़ सिंह पिटाई खून खराबे के खिलाफ सै। इसे कारण ओ अपणे भाई नै मजबूर करै सै अक ओ एक दुकान खोल कै ईमानदारी की रोटी खा कमावै। चूड़ का मानना है अक सच के जरिए जीत हासिल करनी चाहिए। ज्याएं करकै औ ईगल गिरोह की कारस्तानी अपने भाई तै कई बै छिपमा राखले सै, बतान्ता नहीं। बात आड़े ताहिं चाली जा सै अक जिब शाहरूख खान उसके भाई शरद कपूर को गोली मारकै खून करदे सै तो ओ कोर्ट मैं ब्यान देवै सै अक मैक्स (शाहरूख खान) नै गोली अपणा आपका बचा करण तांहि चलाई थी। ओ अपणे भाई धोरै आला चाकू भी अदालत मैं पेश करै सै। जिसनै ओ मैक्स नै मारण गया था। चन्द्रचूड़ के इस व्यवहार नै देख कै शाहरूख खान भी या बात मानले सै अक मार पिटाई खून खराबे का यू राह ठीक कोन्या।
असल मैं इस फिल्म के निशाने पै शहर मध्यम वर्ग का नौजवान सै। एक बात और सै अक हालांकि या फिल्म हिंसा कै खिलाफ सन्देश देवै सै फेर जिब गाभरू सिनेमा हाल तै बार लिकड़ैं सैं तो उसपै मैक्स अर बिच्छू की दादागिरी सिर पै चढ़ कै बोलै सै जिस तरीके तै खून खराबा इस फिल्म में दिखाया गया सै वाह चीज गाभरू छोरे-छोरियां पै घणी करड़ी छाप छोड्डे सै बनिबस्त इसके अक खून खराबा बुरी बात सै।
इस फिल्म की सबतै बड्डी कमजोरी याह भी सै अक या फिल्म मैक्स के अर बिच्छू के दादा बणण के असली कारणां पै अपणा कैमरा फोक्स कोन्या करती। इसके राजनैतिक अर सामाजिक कारण सैं फेर उनके तो या फिल्म बारणे के आगे कै बी कोन्या लिकड़ती। आज समाज मैं जो निराशा अर हताशा जगां-जगां पै देखण मैं आवै सै अर नौजवान उस करके हताश सै, उसका बी कितै कोए ‘सीन’ नहीं दीखता पूरी फिल्म मैं। इस हिसाब तै देखां तो या फिल्म पटी तै उतरगी। दिशाहीन होगी। इसके मुकाबले मैं 80 के दसक मैं बणी फिल्म ‘अंकुश’ पै नजर डालां तो इसमैं भी गिरोहबाजी सै फेर बेरोजगारी के कारण पैदा हुई हताशा बी उस फिल्म मैं दिखाई गई थी। शिक्षा जगत अर समाज का भ्रष्टाचार बी दिखाया था।
आज के नौजवानां की भावना गेल्यां घणा कसूता खेल खेलगी या फिल्म अर हम बी उसकी तरज पै मैक्स अर बिच्छू बणण की प्रैक्टिस मैं जुटगे। रोग की असली रग तै दूर कर दिये। वाह रै जोश फिल्म तेरे क्या कहणे।

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