बुधवार, 7 दिसंबर 2016

विकास खात्तर पीस्सा किततै आवै

विकास खात्तर पीस्सा किततै आवै
कई बार बात चालै अक विकास इसा हो जिसका फल गरीब तै गरीब ताहिं पहोंच ज्यावै। फेर कई न्यों कैहन्ते पाज्यांगे अक क्यूकर करै इसा विकास सरकार धोरै पीस्सा तो सै ऐ कोणया अर या पिलजुआ रोज बधण लागरी गिजाई की ढालां। सबतै बड्डा गजब तै इस विकास का यो होग्या अक माणस पिलजुआ अर गिजाई बणा दिया। न्यों कहया जा सै अक किततै आवै इननै ख्वावण खात्तर? फेर येहे वैज्ञानिक अर बुद्धिजीवी न्यों बी कैहन्ते बताए अक ‘विकास सबतै बढ़िया अर टिकाऊ गर्भ निरोधक सै फेर मेरै तो मोटी-मोटी तीन च्यार बात समझ मैं आवैं सैं जिनके करे तै पीस्यां का तोड़ा विकास खात्तर कोण्या रहवै बाकी जै कोए पीस्से ए नै चाबणा शुरू कर देगा तो पूरा कोण्या पाटै।
एक तै हमनै अपणे डायरेक्ट टैक्सां का दायरा बढ़ाणा पड़ैगा। ईब हम अमीरां पै तो टैक्स घटावण लागरे सां। कोरपोरेट टैक्स, वैल्थ टैक्स अर इन्कम टैक्स जिसे टैक्स बधाए बी जाणे चाहियें अर इनकी वसूली भी फेर सख्ती तै होणी चाहिये। कोए लिहाज शरम इनपै नहीं बरती जाणी चाहिये।
दूसरा तरीका सै ब्लैक के पीस्से का राह बांधण का। कोए तो कहवै सै अक ब्लैक का पीस्सा इतने करोड़ सै अर कोए इसनै अरबां खरबां बतावै सै। कोए अन्दाजा ए कोण्या इस काले धन का। किसान की कमाई, मजदूर की कमाई नै जीमगे ये काले बजारिये अर दूसरे देशां मैं जा जमा करवाये पीस्से। यो पीस्सा खोद कै बाहर काढ़णा चाहिये अर विकास के कामां मैं लावणा चाहिये। पर यू काम करै कूण? यो काम करे बिना कितने ए वर्ल्ड बैंक तै उधारे पीस्से ले ल्यां बात बणती कोण्या दीखती।
तीसरा तरीका सै अक म्हारे सरकारी खरच (फिजूल खरच) कम करे जावैं। इसका यो मतलब कति नहीं सै अक नौकरियां की भरती पै पाबन्दी ला दी जावै। इसका मतलब सै अक नौकरशाही के अर मन्त्रीयां के फिजूल खरच पै रोक लाई जावै। भ्रष्टाचार की गांठ बांध कै समन्दर मैं गेर कै आणा पड़ैगा।
चौथा तरीका सै अक बड़े-बड़े कारखाने आल्यां पै बैंकां की 45 हजार करोड़ की देनदारी खड़ी सै। ये कारखानेदार यो पीस्सा देवण तैं नाटैं सैं। एक कारखाने नै दिवालिया करकै दूसरा कारखाना खोल लेवैं सैं। पीस्सा उल्टा देवण का नाम नहीं। हम किसानां की सब्सिडी नै तो रोए जावां सां पर इस रुपइये की वापसी पै अपने चुनाव पत्रां मैं कुछ बी नहीं कैहन्दे। जनता बी कदे नहीं कैहन्दी अक इस 45 हजार करोड़ का हिसाब कूण मांगैगा?
पांचवी बात सै अक दुनिया बम्बां पै अर हथियारां पै इतना पीस्सा खरच करण लागरी सै अक बूझो मतना। जै यू हथियारों पै खरच होवण आला पीस्सा विकास पै खरच होवण लागज्या तो भारत का नक्शा अर दुनिया का नक्शा पांच साल में बदल सकै सै। मैं एटम बम के इस्तेमाल को स्त्रियों, पुरुषों और बच्चों के सामूहिक विनाश के लिए विज्ञान का सबसे शैतानी इस्तेमाल मानता हूं। महात्मा गांधी ने ये शब्द बहोत पहलम कहे थे पर हमनै इनके परखचे उड़ावण मैं कसर नहीं छोड्डी।
एक नाभिकीय बम पै आवण आले खरच (चार करोड़ रुपइये) तै गाम के गरीबां खात्तर बत्तीस सौ घर बणाए जा सकैं सैं। एक सौ पचास गामां मैं पीवण के पाणी का संकट दूर कर्या जा सकै सै। एक सौ पचास बमों की लागत इतनी सै जितना सार्वजनिक स्वास्थ्य पै केन्द्र सरकार का 1998-1999 का बजट। एक नाभिकीय युग्म मारक शक्ति की लागत (करीब चार हजार करोड़ रुपइये) 1998-99 के केन्द्रीय बजट मैं प्राथमिक अर उच्च शिक्षा की खात्तर राखे पीस्यां तै फालतू बणै सै। एक नाभिकीय शक्ति संपन्न पनडुब्बी की लागत (चार हजार करोड़ रुपइये) एक हजार मेगावाट का एक बिजली संयंत्र लावण पै आवण आली लागत के बरोबर बैठै सै।
पूर्ण नाभिकीय शस्त्रीकरण कार्यक्रम पै चालीस हजार तै ले कै पचास हजार करोड़ ताहिं का खरच होवण का अन्दाजा सै। इतनी रकम तै गामां मैं आवास की सारी कमी दूर करी जा सकै सै अर कै स्कूल जावण आली उम्र के सारे बालकां की पढ़ाई का इन्तजाम करया जा सकै सै इतने रुपइयां तै।
तै भाई म्हारे खात्तर बढ़िया अस्पताल खोलण खात्तर अर बढ़िया पढ़ाई आले स्कूल खोलण खात्तर पीस्से का रोल्ला नहीं सै यो नीयत का रोल्ला सै। काले धन की बात काले बी करैं सैं अर धोले पीस्सां आले बी। पर जनता करै तो के करै काले अर धोले की पिछाण करणा ए बहोत मुश्किल काम होग्या? आज के बख्त मैं जिसके धोरै आच्छा पीस्सा सै ओ धोला पीस्सा क्यूकर हो सकै सै? ईब हम नाहे समझणा चाहवां किसे बात नै तो के करया जा सकै सै?

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