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धोखा हरित क्रांति का
हरित क्रांति का ढोल कई साल पीट लिया सरकार नै पर इसकी असलियत लोगां कै इब समझ मैं आवण लागी सै। हरित क्रांति के दौर मैं सिंचाई अर चोखे साधन आले इलाक्यां मैं चुनकै किसे भी कीमत पै पैदावार बढ़ाओ अर मुनाफा कमाओ का नारा दिया गया। खाद बीज बरगे पैदावार बढ़ाऊ अर ट्रेक्टर हार्वेस्टर बरगे मजदूर हटाऊ तरीके अपणाये गए। अर एक बै तो घघाट बांध दिया। इस ढाल की खेती करण का जुगाड़ किसान नै कुछ घर तै करया अर कुछ कर्ज लेकै करया। उत्पादकता बधगी, पैदावार भी बधगी। फेर सरकार नै दो चाल चाल कै कसूती डाण्डी मारी। एक तै उसनै खेती की उपज अर उसमैं भी नाज के भाव दाब कै राखे। इसका मतलब यो हुआ अक बढ़ी पैदावार का लाभ किसानां के हाथां मैं कोण्या जावण दिया। इसका नतीजा यो हुआ अक खेती किसान अर उसकी गेल्यां जुड़े मजदूर की मेहनत की हकदारी आम तौर पै दबी रही। फेर इसका सबतै तगड़ा झटका उड़ै लाग्या जड़ै किसान आसमान के भरोसे खेती करै सै। ओरां के मुकाबले मैं किसान की मेहनत की हकदारी और तल्ली मैं चाली गई।
दूजे कान्ही सरकार गांव और किसान के विकास की खात्तर जी ज्यान तै लागरी सै। इस आडम्बर अर छलावे नै बनाये राखण खातर उसनै कितै खाद पानी मैं दो पीस्यां की छूट दे दी तो कितै खेती की मशीनां की खात्तर रियायत दे दी। इन सारी बातां का असली लाभ तै शहर अर उड़े के उद्योग नै मिल्या। हां थोड़ा घणा फायदा बड्डे किसान नै भी हुया। पर किसान अर मजदूर कर्ज के बोझ तलै दबता चाल्या गया। जात का चश्मा पहर कै औ बड्डे किसानां की रहनुमाई मैं अपने भाग नै सराहता रहया अर सरकारां के गुणगान करता रहया। म्हारे गामां अर शहरां मैं परत दर परत गहराते संकट मैं हर परत आले नै अपणे तै नीचे की परतां के लोगां की हालत देखकै उनतै बेहतरी का गुमान बण्या रहया। गांव के किसान व शहर के अमीर की तकदीर वह अपनी तकदीर अलग मान कर चालता रहा।
फेर आई तै हरित क्रांति जिसनै आम किसान की गांठ बांधकै गेर दी। अमीर और अमीर होये अर इसकी कमाई पै पांच सितारा होटल संस्कृति पनपी। अर ईस लूट तै मालामाल हुये लोग काले धन के दम पै खेती की जमीन अर बाकी संसाधनां पै कब्जा जमावण के जुगाड़ मैं दिखाई देवैं सैं। अर इस काम में उननै विश्व बैंक जिसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थानां अर पूंजी का पूरा सहारा सै। दूसरे कई देसां मैं पहलम बी किसान के घटते लाभ अर बाहरी महंगी पूंजी के दो पाटां बिचालै किसान की खेती फंसाकै कति खतम कर दी। अर ओहे सांग भारत मैं भी रच दिया। केन्द्र मैं कमजोर सरकार अर राज्यां मैं मगरूर क्षत्रपों से नीति निवेश खात्तर सीधे समझौते हमनै उसे चीज कान्ही धकेल कै ले जावण लागरे सैं। पड़ौसी श्रीलंका मैं तै विश्व बैंक से इस बाबत सीधे निर्देश मिल रहे बताये। किसान नै खुद सोचना पड़ैगा अक इन शिकारियां तै अपणा पैंडा क्यूकर छुटवावै। इसी सरकार कूणसी हो सकै सै जो आम किसान अर मजदूर के हक दिवावण की खात्तर देस की नीतियां मैं अखाड़ बाढ़े तै बदलाव ल्या सकै। कवि ने कहा है किसान ताहिं -
सदी बीतली सोतेनै ना आई ईब तक जाग तनै,
ये खूनी कीड़े खाण लागरे चौगिरदें निर्भाग तनै।
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