ऊंट किस करवट बैठेगा
बिना बुलाये संसद के लैक्शन आगे। सारी जागां कूण किसकी गाड्डी मैं बैठ लिया अर कूण किस गाड्डी मां तै कूद लिया इसके चर्चे जोरों पै सैं। हरियाणा मैं चौटाला साहब भीत बिचालै अर लठ बिचालै आगे दीखैं सैं। किसान प्रधानमंत्री बणावण खातर उसनै भाजपा तै समर्थन उल्टा लिया था। जिब किसान प्रधानमंत्री ना बणता दीख्या तै किसान (बादल) के कहे तैं उल्टे जा चिपके बाजपेई जी कै। ईब के भाजपा नै किसान प्रधानमंत्री की घोषणा कर दी अक चौटाला साहब भाजपा का साथ देण नै उम्हाए हांडैं सैं। अर बात तै आड़े ताहिं आली अक चौटाला साहब न्यों कहन्ते बताए अक एक भाई स्टेट मैं खा कमा लेगा अर दूसरा भाई केन्द्र मैं खा कमा लेगा। दुनिया का नौमा अजूबा होग्या अक बंसी अर चौटाला एक स्टेज पै खड़े होकै (चाहे न्यारी न्यारी बी हों) भाजपा खातर वोट मांगैंगे। कदे किसे नै देबीलाल, बादल, बंसीलाल, चौटाला हर बरग्यां के बारे मैं एक बात कही थी अक रै ये तै वे तरपाल आले खड्डू नारूए सैं जिनपै न्यारे न्यारे ढाल की कौडडी अर् तिरपाल घाल कै पूंजीपति म्हारा बेकूफ बणावैं सैं। ये सारे खड्डू दिल्ली मैं जाकै उस पूंजीपति की धोक मारैं सैं। म्हारै पहलम जच्या नहीं करदी ईब साच माच जंचवादी बंशी अर चौटाला नै।
एकबै एक कुम्हार था उसके दो बेटी थी। एक ईसे घर मैं ब्याही गई जड़ै बरतन बना कै गुजारा करया करते अर दूजी ईसे घर मैं ब्याही गई जड़ै खेती करकै गुजारा था। (साजे बाधे की) साल पीछे कुम्हार उनकी राजी खुशी का बेरा लेण गया तै पहली बोली - जै म्हि बरसग्या तै सारे बास्सण बहै ज्यांगे। दूसरी कै गया तै वा बोली - जै म्हि नहीं बरस्या तै सारी खेती का नाश होज्यागा। उल्टा आया कुम्हार तै उसकी घरआली बोली - के हाल सै बेटियां का? तै कुम्हार बोल्या - एक मरण मैं सै।
अर लै भाई ये चौटाला साहब अर बंशीलाल जी अर अटल जी अर आडवाणी जी कितनी ए स्याणपत दिखा लियो। चौटाला अर बंशीलाल मैं तै एक तो मरण मैं सै ए। कूणसा? यो कैहणा ईबै मुश्किल सै। ईसा बी हो सकै सै अक जनता इन दोनूआं ए नै भारत दर्शन पै भेज दे अर और किसे पार्टी ने संसद मैं भेज दे। बाकी आज की राजनीति मैं कद कोण किसकी गैल्यां बैठ्या पावै कहणा बहोत मुश्किल सै। असूल की राजनीति, जनता के हक की राजनीति, अमन की राजनीति, आत्मनिर्भरता, गरीब के हक की राजनीति तै हरियाणा मैं घणे ए दिन होगे देखें। बेरा ना कद सी अक गरीबां के दिन बाहवडैंगे हरियाणा मैं। कहावत सै अक बीस साल मैं तो कुरड़ी के दिन भी बाहवड़जाया करैं। फेर जनता नै बी देखणा तो पड़ैगा अक जात पात का चश्मा तार कै, दारू सुल्फे का लोभ त्याग कै ईब कै सही पाल्टी अर सही माणसां ताहिं संसद मैं भेजणा चाहिये। कदे जनता ईब कै बी दही के भामै कपास खाज्या अर फेर कहवै अक ओहले के बेरा था न्यों बणज्यागी?
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