बुधवार, 7 दिसंबर 2016

नैतिकता की शिक्षा

नैतिकता की शिक्षा
जब भी नैतिकता की बात चालै तो मान लिया जा सै अक लोगां नै धर्म कर्म छोड़ दिया ज्यां तै चरित्र अर नैतिकता तले नै जाते जा रहे सैं। फेर असल मैं या बात ठीक इसकै उल्ट सै। इन धर्मां नै म्हारी सोच मैं अर म्हारी नैतिकता मैं जितना जहर घोल दिया उतना किसे चीज नै नहीं घोलया। जगन्नाथ के मन्दिर मैं सैंकड़ों मन दाल अर चावल हजारों पुजारियां की खातर रांधे जावैं सैं। इस मन्दिर के जय विजय दरवाजे पै पत्थर की ईसी मूर्तियां देखी जा सकैं सैं जिनमैं देवता जगन्नाथ विभिन्न ढाल के सम्भोग आसनां मैं विराजमान सैं। मन्दिर की बाहर की दीवारां पै औरत मर्द के पूरे कद काठी के अन्दाजे के हिसाब मैं 64 सम्भोग आसन खुदे औड़ सैं जिनका वर्णन सुण्या सै वात्सायन के कामसूत्र मैं लिख राख्या सै। न्यों बतावैं सैं अक रात के दस बजे मन्दिर के दरवाजे बन्द कर दिये जावैं सैं अर इसमैं नृत्य भजन हो सै। यो नाच गाना मन्दिर मैं सेवा करण आली 20 लड़कियां मां तै एक नै करना पड़ै सै। इस नाच गाने नै जगन्नाथ की निर्जीव मूर्ति अर संगीतकार ब्राह्मण पुजारी ए देखैं सैं। ज्यों-ज्यों नाच गाना शिखर पै पहोंचै सै नाचण आली छोरी अपणे लत्ते तार बगावै सै अर पूरी मगन हो कै नाच करै सै। आखिर मैं वा या कैहकै मूर्ति पै पड़जया सै - हे भगवान मैं थारी दुल्हन सूं, थाम मेरे तै प्यार करो। या जगन्नाथ की निर्जीव मूर्ति फेर उसतै प्यार करै सै अक ओ जिन्दा ब्राह्मण, इस बात का किसे नै नहीं बेरा। नाच्चण आली ये लड़कियां... जो कि... देवता जगन्नाथ की सेवा करती-करती सेवा मुक्त होज्यां सैं, पवित्र नगर जगन्नाथ पुरी की गलियां मैं वेश्यावृत्ति करकै अपना पेट पालैं सैं अर उनके ग्राहक ईसे भगत हों सैं जो हजारां की संख्या मैं आड़ै पूजा अर्चना करण की खातर आवैं सैं। न्योए साईं बाबा के एक अमरीकन चेले ‘‘टाल ब्रुक’’ नै अपनी किताब मैं लिख्या सै अक साईं बाबा नै मेरे तै अर फुटपाथ के दूसरे गोरी चमड़ी आले नौजवानां की गेल्यां समलिंगी बलात्कार करण की कोशिश करी थी। न्योंए बीटन जॉन लेनन के कहे मुताबक बीटल नै महर्षि महेश योगी का साथ ज्यां करकै छोड़ दिया था अक उसनै एक स्त्री श्रीमति मिया फैरो की गेल्यां बलात्कार करण की कुचेष्टा करी थी। गुरू महाराज जी का चित्र, गुप्त कैमरे द्वारा उस समय खींच लिया गया जिब ओ घर की नौकरानी नै आलिंगनबद्ध करकै चूम्मण लागरया था अर उसकी अमरीकन पत्नी उड़ैए किसे दूसरे कमरे मैं थी।
प्रथम शंकराचार्य - ‘‘आदिशंकर’’ जो खुद नै बड्डा ब्रह्मचारी अर त्रिलोकदर्शी बताया करता उसतै एक भगत नै ‘काम’ के बारे में सवाल कर दिया। उसनै अपणे भगत तै कहया बतावैं सै अक मैं ‘काम’ का जवाब इसका अनुभव प्राप्त करकै दयूंगा। न्यों कहवण मैं आवै सै अक शंकराचार्य एक ब्याहे औड़ माणस के शरीर मैं प्रवेश करग्या अर उसनै उस माणस की पत्नी गेल्यां सम्भोग करया।
जो माणस स्कूल कालजां मैं धार्मिक शिक्षा शुरू करण की वकालत करैं सैं उननै कदे न्यों सोची सै अक इन कल्पित देवतावां की काम वासना आली कथावां का बालकां के भोले-भाले दिलां पै के असर पड़ैगा? एक प्रसिद्ध वकील अर लेखक फ्रैंक स्वेन कारा नै न्यारे-न्यारे देशां मैं धर्म अर अपराध के बारे मैं खोज करी सैं। उसमैं तै एक देश सिंग सिंग मैं 100 सालां के भीतर जिन लोगां ताहिं कत्ल के जुल्म मैं फांसी दी गई उनमैं 65ः कट्टर रोमन, 21ः प्रोटैस्टैंट, 6ः हीब्रूज, 2ः मूर्ति पूजक अर एक प्रतिशत के तिहाई भाग तै भी कम धर्म नै नहीं मानणिया आले थे। इसतै एक बात तो साफ दीखै सै अक अनैतिकता की सीढ़ी पै चढ़कै नैतिकता का प्रचार करणिया माणस अर देश इतिहास मैं पिछड़ते रहे सैं। एक दौर मैं जो भारत सबतै आगै था ज्ञान के प्रचार-प्रसार मैं, जित नालन्दा अर तक्षशिला जिसे शिक्षा के केन्द्र थे जित दूसरे देशां के माणस शिक्षा ग्रहण करण आया करते ओ देश रसातल मैं क्यों चाल्या गया? इसपै कोए ठोस खोज हुई हो बेरा ना। मनै दीखै सै अक म्हारे समाज मैं धर्म की कट्टरता की अर अनैतिक काम करणियां की पकड़ नै म्हारी सोच के दरवाजे खुलणै कोण्या दिये जिस करकै नई खोज नई जरूरत के हिसाब तै भारत देश नहीं कर सक्या अर धर्म के कट्टरवाद नै इसकी सोच, इसकी समझ और भी भीड़ी कर दी। जिस करकै जो कुछ पहलम हमनै बणाया था ओ बी खत्म होन्ता चाल्या गया। अर आज बी सही बात नै तर्कशील विचार नै, जनता के हक की बातां नै हम आस्था के नाम पै, परम्परा के नाम पै, राष्ट्रभक्ति के नाम पै पाछे नै धिका द्यां सां। तालिबान आल्यां की ढालां फतवे जारी करण लाग लिये सां। इसतै देश तरक्की कोनी करै। एक बात और सै अक जो लोग मन्दिरां मैं नंगे नाच करवावण के हिम्माती सैं वेहे तालिबानी फतवे भी जारी करणिये सैं। आज सभ्य जमाने के आचरण अर नैतिकता के स्तर की तुलना मैं ये देवी देवतावां की घटिया किस्म की कथा म्हारे बालकां के मनां पै इसा ए असर गेरैंगी जिसे माइकल जैक्शन के डान्स अर कै सौन्दर्य प्रतियोगिता अर कै टी.वी. की बाजारू संस्कृति। हमनै बालकां ताहिं धर्म के नाम पै ईसी झूठी अर घटिया नैतिक शिक्षा देवण तै तो परहेज करना ए चाहिये।

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