ओहले भाई !
यो तै मानना ए पड़ैगा अक वजीरे आजम वाजपेयी किस्मत का सिकन्दर सै। एक बै उनकी पार्टी के बड्डे नेता नै उस ताहिं अपणी पार्टी का ‘मुख’ नहीं ‘मुखौटा’ घोषित कर दिया था पर बखत का फेर अर बाकी पार्टियां की अक्ल का इसा दिवाला लिकड़या अक सारे मुखां ताहिं हट परे नै कैहकै यो ‘मुखौटा’ ए फेर जा बैठया दिल्ली की गद्दी पै। ले ऊं तै तेरह म्हिने जिब ये सरकार चलावण लागरे थे तो एक बी दिन इसा कोण्या बीत्या जब उनकी सरकार की काबिलयत पै सवाल ना खड़े करे गये हों। और तै और उसके अपणे ‘परिवार’ आल्यां नै आज ताहिं के सबतै नकारा प्रधानमंत्री का औहदा इस ताहिं दे दिया था। फेर कारगिल मैं घुसपैठ का मामला के शुरू हुआ अक इसकी लॉटरी सी फेर खोलग्या। ओहे ‘नकारा’ प्रधानमंत्री अपणी पार्टी के भीतर अर बाहर एक इसा युद्ध नायक उभरया अक वाजपेयी नै 15 अगस्त नै राष्ट्र के नाम सन्देश मैं ‘स्वतन्त्रता संग्राम’ ताहिं नहीं बल्कि ‘कारगिल संग्राम’ ताहिं फूल चढ़ाये। या बात न्यारी थी अक कारगिल नै दिल्ली सरकार पै कई सवाल खड़े करे अर इसके बड़बोलापन कि पोल भी खोल कै धरदी अक हमनै एटम बम्ब बणा लिया ईब पाकिस्तान नै देखांगे। तेरा म्हिने के ‘फ्लाप शो’ का तमाशा खत्म होण आला था अक इतने मैं कारगिल आग्या। साची बात या सै अक कारगिल के मामले मैं बी बीजेपी की धौल साहमी आई पर जनता फेर बी इसकी गेल्यां रही। इसमैं कोए डूंघा मामला दीखैसै जो म्हारी समझ मैं नहीं आ लिया। अर ऊंबी सोचण अर समझण के काम तै हरियाणा आले अर पूरे उत्तर भारत के लोग बेरा ना बिदकें क्यों सैं? सोच कै राजी ए तो कोण्या।
कोए न्यों कैहन्ता पाज्यागा अक कारगिल के मुद्दे नै लेकै संघ अर उसके परिवार आले टी वी अर अखबारां मैं छागे अर तले ताहिं मार करगे। कई न्यों बी कैहन्ते पावैं सैं अक सेना के जवानां की लाशां पै सरकार नै अपनी राजनीति के टीक्कड़ सेके सैं। पर इन बातां तै इस सवाल का जवाब कोण्या मिलता अक ‘फ्लाप शो’ ‘कामयाब शो’ मैं क्यूकर बदलग्या? इस बात मैं कोए शक नहीं बचरया अक म्हारी जिन्दगी मैं सैन्यीकरण की भावना बढ़ी सै। अर दूसरी बात या लागै सै अक राष्ट्रवाद के लबादे मैं अल्प संख्यकां का विरोध म्हारे दिमागां मैं घर करग्या। म्हारी मानसिकता मैं इसा कीड़ा बाड़ दिया जो इनकै सूत आवै सै। पर आपां नै यो बेरा ए कोनी अक आपां आस्तीन के सांपां नै दूध प्यावण लागरे सां। इन सांपां नै म्हारी आच्छी आच्छी पढ़ाई की जागां मैं अर नई खोज करण आली संस्थावां मैं अपणे बिल बणा लिये, घणी कसूती बाम्बी बणा ली। म्हारे मध्यम वर्ग के दिमाग तै साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष की बची खुची याद खतम करकै उसमैं साम्राज्यवाद तै ‘प्यार’ के तौर तरीके बिठावण की पूरी ताकत लाण की तैयारी सैं। अर यो मध्यम वर्ग भी इसा अभाग हो लिया अक अपणी खातर सुविधा लेवण नै यो कुछ बी कर सकै सै - यू देश बेच सकै सै, यू बिल बेच सकै सै, यू सुविधा बेच सकै सै यू मानवता की भ्यां बुला सकै सै अर और बेरा ना के के कर सकै सै?
ऊं देखैं तो संघ परिवार जिंके पूर्वज हिटलर अर मुसोलिनी के प्रशंसक रहे सैं अर जिनका देश की आजादी की लड़ाई मैं भागीदारी का अपणा कोए बी इतिहास कोण्या फेर बी इनका राज मैं आवणा खतरे की घंटी सै। या घंटी बाजण लागरी सै अर आपां नाच्चण लागरे सां। किसा चाला हुया। ब्याह मैं नाचदे माणस देखे। बालक होण पै नाचैं अर और बी कई खुशी के मौके हों सैं जिन पै माणस नाच्या करैं। पर हम तै अपणी तबाही पै नाच्चण लागरे, अपणी बर्बादी की खुशी मणावण लागरे, अपणे देश अर अपणे प्रदेश के गुलाम अर कर्जदार होवण का जश्न मणावण लागरे सां आपां। आजै कोण्या बेरा लागै इन बातां का। पेड़ बोया जा सै, खाद पाणी दिया जाया करै, रूखाल करी जा फेर जा कै दो एक साल मैं फल थ्याया करै। अर जै बबूल बोद्यां तै काटे जरूर मिलैंगे तो थोड़ा सा और नाच ल्यो फेर कद आखरी धम्म होज्या बेरा नहीं सै। अमरीका परस्ती बढ़ण लागरी सै। म्हारी नई आर्थिक नीतियां म्हारे देश के विकास की कड़ तोड़ण लागरी सैं। अर आपां खुश सां अक अमरीका म्हारी कड़ थेपड़ण लागरया सै। होल्यां राज्जी कै दिन होवांगे? फेर न्यों कहे काम कोण्या चाले-ओहले भाई। मनै के बेरा था न्यों बण ज्यागी?
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