सोमवार, 5 दिसंबर 2016

फायर पै फायर

फायर पै फायर
टीवी मैं देख्या अक सिवसेना के चेले चपट्यां ने बम्बई के दो सिनेमा घरां मैं चलती फिल्म ‘फायर’ के विरोध मैं सिनेमा हाल तोड़ फोड़ दिये अर फायर के हवालै कर दिये। उनकी कार्यकर्ता न्यों बोली अक तोड़ फोड़ हमनै कोण्या करी, या तोड़ फोड़ तै फिल्म देखणियां नै फिल्म ना देखण देवण के बदले मैं करी सै। आगलै ए दिन दिल्ली मैं सांग रच दिया इनके चेले चेलियां नै अर टीवी पै दिखाया अक ये सारे के सारे सूड़यां मंडरे थे सीसे तोड़ण कै अर फिल्म देखणियां तै बाटै देखते रैहगे अक कद म्हारी बी बारी आवै अर हम सीसे तोड़ां। इस फिल्म के सही कै गल्त होण पै बहस हो सकै सै। हो सकै सै इसमैं चुने गए मसले के बारे मैं हम सहमत ना होवां। पर इसे नाज्जुक मुद्दे नै लेकै लोगों की भावनावां गेल्यां यो पाखण्ड आच्छी बात कोणया। जिब सिव सेना आल्यां नै अर उनके नेड़े धोरै आल्यां नै बम्बी मैं माइकल जैक्शन का प्रोग्राम करवाया जिब कित जारी थी या संस्कृति? जिब इनकी पुत्रवधु घटिया नाच गान्यां अर ऊघाड़ेपन आली फिल्म बणावै जिब इनकी या संस्कृति कित बूम्बले खावण चाली जाया करै? जिब रूप कंवर ताहिं जबरी चिता मैं बिठा दिया जा जिब या संस्कृति ‘सती’ की हिम्मत मैं दिल धौली काटकड़ तार कै धरदे तै सही माणस इस संस्कृति के बारे मैं के सोचैगा? दहेज नै अर दहेज हत्यावां नै ये ‘फायर’ पै फायर करणिया ठीक बतावै तो के समझया जा? ये दुनिया भर की मस्त राम की पौण्डी अर कोक शास्त्र सारे हिन्दुस्तान के बस अड्यां पै अटे पड़े रहवैं इसपै कद सी ध्यान ज्यागा?
दूसरी बात हिन्दू संस्कृति की सै तै या हिन्दुस्तान की इकलौती संस्कृति कोण्या। हिन्दुस्तान की संस्कृति तै 2500 हजार साल पुरानी संस्कृति सै। जिस संस्कृति का ये सिव सेना आले अर इनके भाई भतीज टोकरा ठायें हांडैं सैं उसका अर म्हारी प्राचीन संस्कृति का कोए ढब नहीं दिखता। म्हारी पुरानी देस की सांस्कृतिक विरासत मैं वेद बी सैं, उसतै पहलम की संस्कृति बी सै, इसमैं बुद्ध बी सै, इसमैं गुरू नानक बी सै, इसमैं कबीर सै, रैदास सै, रहमान सै, इसमैं जैनी बी सै, इसमैं नास्तिक बी सैं अर आस्तिक बी सैं। इस संस्कृति का इतिहास गवाह सै अक इसमैं जिसनै बी हिटलरी अन्दाज अपणाया उसनै मुंह की खाणी पड़ी।
ईब सवाल यो सै अक जै सिव सेना की भीड़ी समझदानी के नजरिये तै बी देखां अर सही नजरिये तै बी देखां तै बम्बी मैं बाकी जितनी फिल्म बणैं सै तै वे के सारी की सारी इस ‘सो काल्ड’ संस्कृति मैं फिट बैठें सैं? अर फायर फिल्म नै रोकण का यो दहसत भरया, गुण्डई अन्दाज तै हिन्दुस्तान मैं पंजाब के उग्रवादियां की कंपकंपी चढ़ावण आली याद ताजा करवादे सै। उननै भी इस संस्कृति की इसी तिसी करण मैं कसर नहीं घाली। एक कान्हीं तै पश्चिमी संस्कृति नै गाल दे कै फरमान जारी कर दिया अक कोए बी छोरी स्कूलां तैं पीली चुन्नी तै न्यारी कोए चुन्नी नहीं औढैगी। एक स्कूल की हैडमास्टरनी नै इसका विरोध करया तै उसकै गोली मारदी अर दूसरे कान्ही बेरा ना कितनी छोयिां की इज्जत खराब करी थी उसनै। ये ‘फायर’ पै फायर करणिया बी जिब ब्यूटी कम्पीटीसन करवावैं अर माइकल जैक्शन हर नै न्यौतैं तै दूसरी बोली बोलैं अर ईब दूसरी बोलैं सैं।
जनता ईब स्याणी होरी सै अर वा ईसी चालां नै खूब समझण लागली सै। इसे पाखण्ड बहोत देख लिये जनता नै। जनता का सवाल सै अब जिब बम्बी की आधी आबादी फुटपाथां मैं सोवै सै तै इस संस्कृति नै मासा भर भी सरम क्यों नहीं आन्ती? ये रोज धड़ाधड़ कत्ल होण लागरे बम्बी मैं तै या संस्कृति चुप क्यों रहवै सै? जिब बम्बी मैं मुसलमानां पै दंगई हमले करैं अर उननै मौत कै घाट तारदें तै या संस्कृति माणस मारण के फतवे क्यों देवै सै? हां अर इनके हितैसी जैन साहब बताये उननै एक चैनल चलाया था जिसपै घणी अस्लील फिल्म रात नै दिखाई जाया करती तै ये संस्कृति के ठेकेदार न्यों कहया करते अक वे ऊघाड़ी फिल्म तै जिब दिखाई जावैं सै जिब लोग बाग सोले सैं। बहोत हो लिया इस तरां का खिलवाड़ भारत की संस्कृति गेल्यां। म्हारा अपसंस्कृति तै क्यूकर छुटकारा हो? क्यूकर के चाल्या जा उस राह पै? ये लाम्बे मसले सैं। इनपै खूब बहस होनी चाहिये पर एक बात लाजमी सै अक जिब ताहिं देस में ‘ब्लैक मनी’ का बोल बोला सै जिब ताहिं ‘काली संस्कृति’ ‘अपसंस्कृति’ इसनै किमै कहल्यो या रहवैगी। धौली संस्कृति मतलब (‘व्हाइट मनी’) नै ‘काली संस्कृति’ का गुलाम बणकै उसका तलहड्डू बणकै रैहणा पड़ैगा। ‘ब्लैक मनी’ की भ्यां क्यूकर बोलै इसपै फेर कदे सही।

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