मेरा अदालत जाणा
मैं धौलपुर जिले के नकसोदा गाम का रहवण आला एक गरीब सूं। मेरा नाम रामेश्वर जाटव सै। मेरा गाम कई बरस पहलम छूट लिया। 1998 में साल की अप्रैल के म्हिने की बात सैं ये। मेरे 150 रुपये एक सवर्ण में आवैं थे। मनै हाथ जोड़ कै आग्रह करया अक मेरे 150 रुपइये उल्टे दे दिये जावैं। बस फेर के था। रामेश्वर नै तो धरती भीड़ी होगी। मनै अपणी खातर मौत न्यौत ली समझो। स्वर्णां नै समझ्या अक रामेश्वर जाटव हेकड़ी दिखाग्या। म्हारे पै पीस्से मांगण की हिम्मत क्यूकर होगी। कई स्वर्ण कट्ठे होकै आये अर मैं बांध-जूड़ कै मेरी नाक मैं छेद करकै जूट की एक मीटर लाम्बी अर दो मिलीमीटर चौड़ी दो रस्सियां का एक छल्ला मेरी नथनां मैं घाल दिया। उस बख्त की आज भी याद करकै मेरै कंपकंपी आ ज्या सै। दरद का चाला होरया था। इतनी मैं ए कोण्या साधी उन जालिमां नै। इस नकेल नै पकड़ कै मनै घसीटते औड़ लेगे अर पूरे गाम मैं मैं घुमाया। सारे गाम मैं किसे की हिम्मत नहीं होई जो उस बखत मेरी मदद पै आ जान्ता। कई दिन मैं जाकै इस जुल्म की दहशत तै बाहर आवण पाया। उस दिन बेरा लाग्या मनै उस कहावत का अक ‘‘जिस पैर ना पटी बिवाई वो क्या जाणै पीर पराई।’’
इस घटना की खबर अखबारां मैं सुर्खियां मैं आई। मनै कुछ होंसला होया। सारे देश मैं एक बै विरोध की लहर सी उठगी। दूसरे देशां के अखबारां मैं भी, टेलीविजन पै भी इस जुलम के बारे में एक बै तो उफान सा आया। बहोत खबर छापी। एकबै तो मनै लाग्या अक न्याय जरूर मिलैगा मनै। फेर शायद मेरी वा भूल थी। घणा कसूता झटका लाग्या मेरै। गाम के स्तर पै नौकरशाही नै एक आतंक का माहौल बना दिया अर भीतरै भीतर उनके दिल मैं मेरी बाबत घृणा थी उसके चालते यू सारा प्रचार बेअसर कर दिया भाइयां नै। दूजे कान्ही जब इस मामले मैं सनसनी अर न्यारा दीखण आली बात सांप्पड़ ली तो प्रैस अर टी.वी. की भी मेरे मैं दिलचस्पी खत्म होगी। जो मानवाधिकारां आले ग्रुप थे वे भी सहज-सहज पाछेनै हटते चाले गये। मैं फेर एकबै एकला रैहग्या। मेरे इस एकलेपन का एहसास म्हारे देश के कितने अक लोगां नै हुया होगा मनै कोए अन्दाजा नहीं। मेरे हिसाब तै वे मुट्ठी भर इन्सान रहे होंगे। मीडिया भी भूलग्या अर फेर जो मेरे पै बीती उसनै सुणनिया कोए-कोए था, घणखरे अपने-अपने कामां मैं लागगे। इसतै आगै जो कुछ हुया मनै अपने दम पै भुगतन की कोशिश करी, खुद झेल्या। जो कुछ मनै झेल्या सै वो सब हटकै मीडिया ताहिं बतावण की ताकत मेरे मैं नहीं रैहरी। इतने दबाव मेरे ऊपर आये। बन्दूक छाती कै लादी उन गुज्जरां नै। मारा-पिट्टी के मौके कितने थे मेरै याद बी कोण्या रहे।
आखिर मैं भाइयो मनै अदालत मैं लाइन बदलनी पड़ी। समझ सको सो उस बखत की बात जिब वे जालिम अदालत में मेरे साहमी खड़े थे अर वकील नै सवाल करया - इननै पिछाणै सै? मेरे जी मैं आया अक चिंग्घाड़ मारकै कहूं अक येहे थे वे जालिम। मैं बोल्या - वकील साहब मेरी गेल्यां अत्याचार तो कसूता हुया फेर इन छः माणसां मां तै तो मेरी समझ मैं कोए नहीं था। ये तो वे कोण्या जिननै जुल्म ढाया था। मेरा ए जी जानै सै मेरे भीतर के-के बात आवैं अर जावैं थी उस बखत। ‘सीनियर मैडीकल’ अफसर नै मेरै लागी औड़ चोटां का विस्तार तै ब्यौरा त्यार करया था फेर ईब वो भी न्यों बोल्या - रामेश्वर मेरै धोरै उन चोटां गेल्यां आया तो था फेर मेरै न्यों तो याद कोण्या अक उसकै ये चोट क्यूकर लागी थी। ख्याल सा कोण्या अक उसनै इस बात का किमै जिकर करया भी था अक नहीं। मेरे बाब्बू की गवाही कचहरी नै मानी कोण्या वो के कहया करैं ‘होस्टाइल’ करार दे दिया। उन जालिमां का कुछ नहीं बण्या वे न्योंए दन-दनाते हांडैं सैं। इलाके के सारे अधिकारी सारे म्हारै खिलाफ, पुलिस आले म्हारे खिलाफ, उन स्वर्णां के लठैत! माणस जीवै तै क्यूकर जीवै? मीडिया आले फेर कदे आये तै न्योंए लिखैंगे ना अक रामेश्वर जाटव डरग्या, रामेश्वर नै झूठ बोल्या, रामेश्वर हिम्मत हारग्या, रामेश्वर स्वर्णां धोरै पीस्से लेकै ब्यान बदलग्या। मेरे बाब्बू नै यू मुकद्दमा लड़ण खात्तर दो बीघे जमीन बेचनी पड़ी। आज हाल यू सै अक ये स्वर्ण मनै कदे बी खत्म कर सकैं सैं। मैं थारे धोरै बूझणा चाहूं सूं इसे हालात मैं थाम के करदे? जो मनै करया ओहे अक और किमै? और किमै करदे तो के करदे? मैं ईब के करूं? किसे धोरै कोए जवाब हो तै मेरा नाम पता इसमैं सै, मेरे धोरै एक पोस्टकार्ड तै गेरियो। मेरा अदालत जावण का मतलब समझ मैं आग्या होगा थारै?
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