सोमवार, 5 दिसंबर 2016

म्हारा बजट-2001

म्हारा बजट-2001
मानगे इस साल के बजट नै। चाले पाड़ दिये बतावैं सैं। चारों कूट रुक्का पड़रया सै ‘स्वप्न बजट’, ‘स्वप्न बजट’ का। अर भाई रोल्ला के झूठा सै? कार सस्ती होगी, ए.सी. सस्ते होगे अर इसे ढाल की बाकी चीजां भी सस्ती होगी। ईबै गर्मी नहीं सै फेर ठंडे की बोतल सस्ती होगी। कर्जे सस्ते होगे। बाहर तै पूंजी ल्यावणा सस्ता होग्या। भीतर का हो चाहे ना हो, बाहर तै समान मंगवाणा सस्ता होग्या। बड़ी कमाई बी सस्ती होगी अर सुण्या सै सरकार बी सस्ती होगी। अर जिब सरकार सस्ती होगी तै सरकारी कारखाने बी सस्ते तो होवणे ए थे। होगी होंगी किमै राशण-वाशण की कुछ चीजां महंगी। कुछ दवा-दारू, बिजली, आण-जाण का भाड़ा किमै महंगे जरूर होगे होंगे। फेर इन चीजां की महंगाई का रोणा कितने दिन ताहिं रोवन्ते रहवांगे आपां? बताओ ऊंबी राशण इंसान खात्तर सै अक इंसान राशण की खात्तर? बहोत दिन सस्ता नाज (राशण) खा लिया, सस्ती बिजली जला ली, सस्ती गाड्डी मैं घूम लिए, सस्ते मकान मैं रह लिए, सस्ती पढ़ाई पढ़ ली, सस्ते इलाज करा लिये। ईब पब्लिक भी तै अपणी कैड़ तै कुछ कौड़ी दो कौड़ी खरच करना सीखै। जनता की या मुफ्तखोरी के हमेशा चालती रहवैगी? भला ये बिचारे पीस्से आले भी कद ताहिं अपणा पेट काट-काट कै इस नाशुक्री जनता के ऐश-आराम का खर्चा भरते रहवैंगे? अर बिचारे राज करणिया दिल्ली आले कद ताहिं राशण-पानी तै लेकै अर दीयाबात्ती ताहिं के जनता ताहिं इन्तजाम करते रहवैंगे? जै ईसै मैं ये लाग्गे रहे तो देश नै इक्कीसवीं सदी मैं क्यूकर लेज्यांगे? बम-बाम्ब क्यूकर बणावैंगे? हम भी कुछ सां, यो दुनिया खात्तर क्यूकर दिखावांगे? यू राष्ट्र-गौरव का मामला सै अर राष्ट्र के गौरव खात्तर तो कोए भी कीमत कम सै। ईब राष्ट्र-गौरव भी जनता नै मुफत मैं चाहिये? इसकी कुछ तै कीमत देणी ए पड़ैगी ना?
एक बात सै म्हारा वित्त मन्त्री पूरा गुरू सै गुरू। इसनै मन मोहन सिंह अर चिदंबरम सब पाछै छोड़ दिये। गुरू के कटोरा दांव तै सारे विरोधी चित् पड़े सैं। गुरू नैं तो शब्दां के मतलबै बदल कै धर दिये। ईब विपक्ष आले करलें विरोध क्यांका करैंगे। वे कहवैंगे कुछ अर उसका मतलब कुछ लिकड़ैगा। सरकार ना तै राशण खरीदैगी अर ना राशण बेचैगी - इसनै ईब विकेन्द्रीकरण कहवैंगे। पब्लिक तै ईब हर चीज का ज्यादा दाम वसूल्या जावैगा - इसनै ईब सुधार कहवैंगे। नाज, दवा, बिजली, पाणी, रेल, सबतै सरकार हाथ खींच लेगी अर इसतै ईब गरीबी घटना कह्या जागा। नौकरी, मजदूरी सब मैं कमी होगी - इस ताहिं रोजगार की स्थिति मैं सुधार बताया जागा। बाल्को तै झांकी सै अर यू सारा पब्लिक सैक्टर बाकी सै। इस सारे नै बेच कै अर्थव्यवस्था मजबूत करी जागी। जिसनै टेलीविजन दिखावैगा वा पब्लिक मान जागी बाकी जनता जाओ भाड़ मैं।
चारों कान्हीं बजट की तारीफ होवण लागरी सैं। कोए टेलीविजन के इस चैनल पै फूल बरसावै सै तो कोए उसपै। कोए बजट की किसे बात पै लट्टू होरया सै तो कोए किसे पै। जड़ बात या सै अक बजट बहोतै घणा काम्मल सै। कितना काम्मल सै यो असली जनता धोरै कोए जान्ता ए कोण्या। रही-सही कसर सुलफे, स्मैक अर दारू नै पूरी करदी। सोने पै सुहागे का काम टी.वी. नै कर दिया। जनता भूखे पेट भी राम-राम पुकारै अर बजट बढ़िया-बजट बढ़िया न्यों पुकारै। देखियो सारा साल इस बजट तै क्यूकर पूरा होवैगा?

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