बुधवार, 7 दिसंबर 2016

अपणा मारै छांह म्हं गेरै

अपणा मारै छांह म्हं गेरै
मुंसी अर मौजी गढ़ी गाम मैं रह्या करदे। दोनूआं के घर धोरै-धोरै थे। दो-दो किल्ले धरती थी। गुजारा अच्छा था। दोनूं आपस मैं डंगवारा करकै काम चलारे थे। आज काल डंगवारे कोण्या रहे। एक बुलध मुंसी पै था अर एक मौजी पै था। हफ्ते मैं तीन दिन हल उसकै चालदा तै बाकी तीन दिन मौजी कै चालदा। बुलध-बुलध का डंगवारा था बाकी सब बात न्यारी-न्यारी थी। मुंसी कै चार बालक थे। मौजी कै एक फालतू था। पढ़ाई का ध्यान कोए से नै नहीं कर्या। कोए बालक चौथी मैं तै उठ लिया कोए पांचमी मां तै। हद या सै अक आठमी पास किसे तै नहीं होई। बड़े दुखी थे दोनूं। जमाना पढ़े-लिखे लोगां खात्तर बी आसान नहीं रह्या तो अणपढ़ां का कड़ै गुजारा? मुंसी का छोरा अठारा साल का होग्या। गात बी चौखा था अर कद बी लिकड़मा था। मुंसी अर मौजी नै सलाह करी अक रामे नै फौज मैं करवाद्यां। कुछ तो दाब कम होवैगी। दो-तीन बै खड्या कर्या पर नम्बर कोण्या आया। मौजी नै मुंसी को समझाया अक पचास साठ हजार माथे मैं मारद्यां सां किस्से कै। पर मुंसी का जी कोण्या मान्या। आखिरकार छह बर खड्या होणा पड़्या जिब जाकै उसका नम्बर आया।
दो-तीन बरस पाछै मौजी का छोरा गाभरू होग्या। सिविल मैं नौकरी थ्याई ना, मंत्रियां के बस्ते बी खूब ठाये। फेर फौज मैं जुगाड़ करणा चाहया पर उड़ै बी हालात बदलगे थे। छोरा दस बै खड्या हो लिया पर किस्से नै पाएं ना टिकण दिये। कदे छाती का माप कम, कदे वजन कम, कदे दौड़ मैं पाछै। जड़ छोरे धीरे के बी गोड्डे कति टूट लिये। उदास रैहण लागग्या, काम मैं जी लागणा बन्द होग्या। एकला पड्या रहवै कै सोएं जा। मौजी कै बी छोह आवण लागग्या। गैल्यां चिन्ता बी होगी अक के बणैगा छोरे का। एक दिन होक्के पै बैठे थे। बोल्या - किमै जुगाड़ भिड्या मौजी? न्यों बात कोण्या बणै। मौजी नै मुंसी की बात आच्छी कोण्या लागी।
खैर हार थक कै मुंसी अर मौजी बिचौलिया टोहवण चाल पड़े। एक जाटां का छोरा था आजाद, एक बाहमणां का था भगत अर एक सैणियां का था सूरत। तीनूआं धोरै गए अर रेट बूझे। सूरत के रेट घाट थे आजाद अर भगत तै। सूरत पचास हजार मैं कहै था, आजाद साठ मांगै था अर भगत सत्तर की मांग करै था। भगत सिंह मुन्शी नै कह्या बी अक अपणे माणसां की कुछ तो रियात होणी ए चाहिए अर ऊं बी हम बाहमण भाई ठहरे। भगत बोल्या - यो रेट तो थारै तांहि सै और किसे नै तो इतणे में मैं दरवाजे पै बी कोण्या खड्या होण द्यूं। आजाद अर सूरत भरोसे के माणस कोण। आपणी जबान पक्की होया करै।
दोनूं उल्टे चाल पड़े। अपणे-अपणे हिसाब तै सोचैं थे। मुन्शी का ख्याल था अक सूरत की मार्फत काम करवाया जा। मौजी न्यों सोचै था अक जै आजाद कै सूरत पीस्से मारगे तो के बणैगी? भगत फेर बी अपणा बाहमण भाई सै। कुछ तो लिहाज करै ए गा। फौजी नै मन बणा लिया अक भगत की मार्फत काम करवावैगा।
चालते-चालते मुंसी नै बूझ्या - फेर के मन बणाया मौजी? सोच-साच कै मौजी बोल्या: अरै मुन्शी वा पुराणी कहावत सै ना अक अपणा मारै त छांह मैं गेरै, सुणी होगी। मेरे तो जचैं सै अक भगत ठीक सै। मुन्शी चुप रह्या बोल्या कुछ नहीं, ना ना कहीं अर ना हां कही। फेर मन-मन मैं सोची - मरे पाछै छांह किसी अर घाम किसा?

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें