आडू.
नेता जिसकी पीठ पै एक बर हाथ फेर दे सै उस माणस का दिमाग काम करणा छोड़ज्या सै, उसकी तर्क शक्ति की ताकत सापड़ज्या सै, आच्छे-भूण्डे का फरक करण की ताकत मारी जा सै, हां मैं हां मिलावण की आदत पड़ ज्या सै, देखी आंख्यां माक्खी निगलण की खूब ‘प्रैक्टिस’ होज्या सै, झोटे की ढालां गस खाणा भी आज्या सै, अर नेता के सम्मोहन मैं फंसज्या सै। नेता की हर बात की चाद्दर के पल्ले कै गांठ मार ले सै। उसकी रीढ़ की हाड्डी कड़ थेपड़तें ए की साथ बेरा ना कित रफ्फू-चक्कर होज्या सै अक पिंघल ज्या सै। ज्यूकर सामण के आन्धे नै हरया ए हरया दिख्या करै न्योंए उस माणस नै बी ओए दीखै सै जो उसका नेता दिखाना चाहवै।
सत्ता पक्ष के लोग तो अपणे कार्यकर्त्ता नै समझावैंगे अक जो अपणी चालदी मैं नहीं चलावै ओ माणस बी किमै माणस हो सै? सदियां तै यो दस्तूर चालदा आया सै। जिस की चाली उसनै चलाई। महाराजा अशोक तै हिन्दुस्तान का अशोक सम्राट माण्या जा सै फेर गद्दी पै बैठण ताहिं तो उसनै बी अपणे तीन-चार भाइयां का कत्ल करवाया ए था। तो फेर आज के जमाने मैं राज डाट्टण की खात्तर बीस-तीस कत्ल कर दिये जां कै करवा दिये जां तो के हरजा सै? या तै म्हारी विरासत सै, म्हारा रिवाज सै यो, म्हारी पुरानी संस्कृति का सवाल सै। म्हारी आस्था नै ठेस पहोंच सकै सै जै हम बख्त-बख्त पै सौ-दो सौ चार सौ माणसां नै धर्म पै कै जात पै लड़वा कै मरवा नहीं द्यां। शाबाश रै म्हारे नेताओं! तम अशोक समा्रट की सही साच्ची शुद्ध सन्तान सो।
बिना मैरिट, नौकरी दिवावण का झांसा देकै राखणा, बिना मैरिट यूनिवर्सिटी मैं दाखला, बिना मैरिट मैडीकल मैं लैक्चर अर प्रोफैसर लवाणा, रातों-रात करोड़पति बणा देणा ये सारे गुण सैं आजकाल के नेतावां मैं। कायदे-कानूनां को ठोक्कर मारकै घटिया काम करणियां ताहिं बचाणा, ये सारी चीज़ ऊपर तै लेकै तले ताहिं घटण की जागां बधती जावैं सैं। ईसे नेता आण्डी कै फक्कड़ कहे जावैं सैं। अर हम भी पक्के आडू. सां जो इन की इतनी घटिया बातां नै आंख मूंद कै सहन करें जावां सां। म्हारे मां तै कई तो न्यों कहवैंगे अक जै माणस चालती मैं भी नहीं चलावैगा तो फेर नेता बणण की जरूतै के सै? ईब ईसे ढालां सोचणिया माणस आडू. तै न्यारा के हो सकै सै?
ये नेता दूसरी बात अपने चेले-चपट्यां नै या सिखाया करैं अक अपणा मारै छां मैं गेरै। अर हम बी न्यों कैहण लागज्यां सां अक बात तो सोला आने सही सै। अपणी समझदाणी पै जोर देकै सोचण की तो आपां नै बी सूं खा राखी सै। पहली बात तो या सै अक आपां अपणा किसनै समझां सां अर पराया किसनै समझां सां। ऊत, बलात्कारी, कात्ल, सुलफाबाज, काला धन कमावणिया तै हमनै प्यारा लागै सै इस करकै अक ओ म्हारी जात का सै, ओ म्हारा गोत्ती भाई सै, ओ रिस्तेदारी मैं पड़ै सै। ईमानदार, आम जनता का भला चाहवणिया, साच नै साच अर झूठ नै झूठ कहवणिया, अपणे असूलां पै चालणिया सरीफ माणस हो तै आपां उसनै सूंघते बी कोण्या। इस करकै अक ओ अपणी जात का कोण्या, ओ गोत्ती भाई कोण्या। कोए बूझै तो कैहद्यां सां अक ऊत सै तो के सै, सै तो अपणी जात का। जिस माणस की फितरत बलात्कारी की होगी ओ जात की छोरियां तै भी बदफेली करैगा अर दूसरी जात की छोरियां गेल्यां बी। औं नहीं बक्शै किसे जात नै। अर फेर बी हम उसनै अपणा मानां अर उस पै केस नहीं चालण देवां।
जिस माणस का काम सुलफा बेचण का सै तो ओ योहे काम तै म्हारे बालकां नै भी सिखावैगा। बताओ ईसे रिस्तेदार अर गोत्ती भाई नै के कोए चाटै? ये हे माणस सैं जो अपणे बचण की खातर यो मुहावरा इस्तेमाल करैं सैं अक अपणा मारै छां मैं गेरै। हम भी सैड दे सी कहवांगे अक बात सही, अपणा माणस फेर बी किमै तो ख्याल राखैगा ए। हम एक बात कति भूल ज्यावां सां अक मरे पाछै किसी छां अर किसा घाम? मरै पाछै निर्जीव शरीर का कोए किमै करो के फर्क पड़ै सै? कई माणस तो समझण लागगे अक जात पै बांट कै ये नेता म्हारा उल्लू बणावैं सैं। फेर कई झकोई इसे पावैंगे जो मान कै ए कोण्या दें। समझाल्यो क्यूकर समझाओगे ईसे आडूआं नै। आडू. कैहण का बुरा मानज्यां, अपणे आप सोचैं ना, दूसरे की समझाई औड़ समझैं ना। पढ़्या-लिख्या माणस घणा आडू पावै सै। अनपढ़ आडू. फेर बी समझाया जा सकै सै फेर पढ़े-लिखे आडू. नै समझा कूण दे, अंगद की ढालां पां गाड कै खड़या होज्या सै। सबनै दीखै सै अक ये बदेशी कम्पनी सब क्याहें पै छावण लागरी सैं फेर म्हारा नेता इनपै चुप सै तो आपां भी चुप खींचरे सां। न्यों चुप खींच कै कितने दिन काम चालैगा? इस बाजार व्यवस्था मैं सब किमै पीस्से के पाछै भाज लिया अर म्हारे नेता इसका गुणगान करण लागरे सैं, तो हम भी इसके कसीदे खींचण लागगे। अरै इन नेतावां तै कोए सवाल भी करैगा? कोए बूझैगा अक इस देश का, इस देश के लोगां का क्यों आडू. बना राख्या सै? किसे दिन म्हारे नेता जी बदेश मैं बैठे पावैंगे अर हम आडै़ एक-दूसरे की धोती की लांगड़ पकड़ कै खींचते रहवांगे। अर तुम हमनै के बेरा था न्यूं बणज्यागी?
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