बेढ़ब संस्कृति
‘‘दखे चालदी मैं बी जो ना चलावै उसनै माणस पागल की उपाधि दे दिया करैं’’ - चान्दो बोली। क्यों के बात होगी? के काम अटक ग्या? सूरते नै जवाब दिया। ईब तनै कौण समझावै अर क्यूकर समझावै। न्यों कह्या करैं सैं अक सोवन्ता औड़ माणस तो ठाया जा सकै सै पर दड़ मारे औड़ माणस नै क्यूकर ठावै? चान्दो नै नाराजगी तै कहया। उसनै फेर होंसला सा करकै कह्या अक तनै नहीं बेरा अपणे बेटे कर्मबीर नै मास्टरी की दरखास दी सै। सुण्या सै घणीए जागां लिकड़ री सैं। सूरता बोल्या अक भरया होगा फारम, दी होगी दरखास इसमैं मेरा के जोर चालै सै। किस्मत मैं होगी मास्टरी तो कौण हाथ अड़ा सकै सै। चान्दो न्यों के हार मानण की थी। वा बोली अक तकदीर वकदीर कुछ ना। भाज दौड़ करनी पड़ैगी। किसे मन्त्री तै सढ़ा लाणा पड़ैगा। कोए बिस्बास का बिचौलिया थापणा पड़ैगा। आजकाल बिचौलिए बी तो थोथे लिकड़यावैं सैं। जे बेटे की नौकरी लाग ज्यागी तो समझो मैं तो गंगा जी न्हाई जांगी। अपणे हल्के आला एम.एल.ए. बी सुण्या सै मन्त्री बणग्या। उसकी तो दांत काटी रोटी सै तेरी गेल्यां। बेढ़ब गेल्या तो तेरा पूरा ढब सै।
जिब ओ एम.एल.ए. नहीं बण्या था तो सुरते के घरां ए पड़या रहया करता। गाम मैं तो जी नहीं लागता अर शहर मैं उसके धोरै इनतै न्यारा ठिकाना नहीं था। ऊं मन का मौजी माणस सै, यारां का यार सै। खाओ अर खाण दयो यो उसका सिद्धांत कदे कदीमी का सै। जिब बढ़िया मूड मैं हो तो कहवैगा अक मारो खाओ पर हाथ ना आओ अर जै पकड़े जाओ तै अकड़ ना दिखाओ। बस जी हजूरी तै अर कै पीसे तै काम बनाओ। मन्त्री बणण नै बणग्या पर भाईके सिद्धान्त वेहे सैं। जिब ओ किमै बी ना था तो कई बै चान्दो ताहिं कह्या करता अक के करूं भाभी क्यूकर नौकरी ल्वाऊं, राजपाट तो मेरे हाथ मैं कोण्या। जै कदे दा लागग्या तो सबतै पहलम बेटे की नौकरी का जुगाड़ करूंगा। थारे स्यान के मेरे पै इस उमर मैं उतरैं सैं। ईब मन्त्री बणे पाछै तो म्हिने हो लिए भाई नै फुरसतै कोण्या लागली भाभी तै फेटण की। रोज बेढ़ब की बाट देखै सै भाभी। भाभी नूनामल नै बेढ़ब कहया करती।
सूरते के दिमाग मैं आई अक नूनामल ईब तो बिचास कै देखना ए चाहिये। सूरता पहोंचग्या चण्डीगढ़ एम.एल.ए. होस्टल मैं। उड़े तै घणी ए वार मैं बेरा चाल्या अक नूनामल की कोठी तो सात सैक्टर मैं सै। उड़ै आया। बाहर घणीए भीड़ लागरी थी, ओ बी जाकै बैठग्या उनमैं। एक पर्ची पै नाम लिख कै दे दिया। दो घण्टे होगे भीतरै ना बुलाया। सुरते कै बहोतै घणा छोह उठ्या पर के पार बसावै थी छोरा नौकरी जो ल्वाणा था। खैर बुला लिया भीतर। उठकै कौली भरकै फेट्या नूनामल। इतनी वार मैं तिवाड़ी जी आण बिराज्या। तिवाड़ी जी नै बताया अक छोरा एम.ए. करकै घरां बैठ्या सै। इबकै ये ठेके पै लैक्चरर लावण लागरे सैं। उसमैं उसका बी नम्बर आज्या तो कुछ तो साहरा लागैएगा। नूनामल नै तो सैड़दे सी उड़ती चिड़िया के पर गिण लिये अर न्यों बोल्या अक तिवाड़ी जी जै थारा काम नहीं होगा तो फेर किसका होगा। छोरे के नम्बर कितने ए अक सैं? सत्तर फीसदी नम्बर लेरया सै और के कहया करैं सैक्ट भी पास करराख्या सै। खेलां मैं बी घणा अगाड़ी था। नूनामल बोल्या अक तिवाड़ी जी समझो थारा काम होग्या। सीरनी बांटो जाकै। या तो अपनी संस्कृति की बात सै ना अक काम होए पाछै लोग सरीनी बाँटया करते तो अपनी संस्कृति तो आपां नै भूलनी नहीं चाहिये। आज मैं अर पहलम मैं बस फर्क इतना सा सै अक पहलम सीरनी काम होए पाछै बांटया करते आजकाल काम होए पहलम बांटैं सैं।
तिवाड़ी जी नै तो झट गोज मैं हाथ घालया अर एक मोटा सा लिफाफा काढ़या अर नूनामल ताहिं दिया अर बोल्या अक हमतो सीरनी पहलम बी अर पाछै बी बांट देंगे पर काम हो जाणा चाहिये। नूनामल नै लिफाफा गोज कै हवालै करया अर न्यों बोल्या अक फिकर मन्ना करो। जाकै ताण कै सो ज्याओ। तिवाड़ी चाल्या गया तो नूनामल नै कहया अक मैं कई दिन तै आण की सोचूं था पर फुरसतै कोण्या लागी। सूरता तो किसे और दुनिया मां तै उल्टा आया। नूनामल बोल्या - किमै काम सै तो तावला बता मनै तीन बजे मीटिंग मैं जाणा सै। रात नै डटिये घर बिध की बतलावांगे। सूरता बोल्या - काम के हो था, मैं तो बस फेट्टण आग्या था। नूनामल बोल्या - छोरे का काम हो ज्यागा तूं घबरावै मतना। सुरते कै थोड़ी शान्ति होई। फेर चालता-चालता नूनामल बोल्या - गाम मैं स्वागत पूरे ताम-झाम तै होणा चाहिये। इक्यावन हजार तै कम की माला के कोए मतलब नहीं। या सुआगत करण की रिवाज म्हारी पुरानी संस्कृति मैं सै। सुरता चाल पड़या उल्टा। बस मैं बैठ्या सुरता सोचै था - या नई संस्कृति बी मारैगी अर पुरानी संस्कृति ऊं बांसैगी। मरण सुरते का अर ठाठ नूनामल के, या कोणसी संस्कृति?
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