पर पहल कूण करै
म्हारे देस की गंगा जमुनी तहजीब की रक्षा का सवाल क्यूकर हल कर्या जा? न्यों तो सब किलकी मारैं सैं अक नास हो लिया। पर यू नास कूण करण लागर्या सै इसपै सारे न्यारी-न्यारी बात करैं सैं। पर एक सवाल यो बी सै अक म्हारे समाज मैं जो किमै थोड़ा घणा सही अर ठीक सा काम बच बी रहया सै जो आर्थिक नीति की नई झलां तै क्यूकर बच्या रैहग्या यो क्यूकर बचाया जा अर इस नई आर्थिक नीति की के काट टोही जा। दलितों, पिछड़ों अर नारी समुदाय मां तै उभर कै आई दावेदारी की भावना अर पिछड़े इलाक्यां के समूचित विकास बरगे नये अर पुराणे मुद्दयां पै जो हलचल होण लागरी सै इन ताहिं के दिशा दी जावै? म्हारे पर्यावरण का भट्ठा बठा कै गेर दिया, ईसी परियोजना शुरू करदी जो फायदे की जागां नुकसान फालतू करैंगी। बेरा ना किसे-किसे बम बणा लिये, ईब इनपै रोक कूण लावैगा? एक बम तो निर्जीव नै कुछ नहीं कहवै पर जीव नै मारैगा। भ्रष्टाचार नै सारे राज पाट की चूल हिला कै धरदी।
कोए मानो अर चाहे मत मानो अक म्हारे नागरिक जीवन के सैन्यीकरण तै लेकै अन्ध राष्ट्रवाद के लबादे मैं अल्प संख्यक विरोध, श्रद्धा पै आस्था इन बातां का असर म्हारे समाज मैं बधण लागर्या सै। देश की आजादी पाछै हमनै जो अपणे देश की तरक्की की राही टोही थी, उसके फल के रूप मैं सै यो सब कुछ। अमीरपरस्त मिलीजुली अर्थ व्यवस्था के तहत म्हारे खून पसीने की कमाई तै जो पब्लिक सैक्टर खड्या करया था उसतै आड़े कै टाटा बिरला हर खूब मोटे होन्ते चाले गए। अर इसे बीच मैं म्हारे बीच मां तै एक पैंट कोट आला बाबू जी अर उसतै ऊपर अफसर बी पैदा होग्या। इसनै मध्यम वर्ग कहवण लागगे। इस मध्यम वर्ग नै लन्दन आल्यां कै जुल्म कदे नहीं सहे, अमरीका की चालबाजी का कदे शिकार नहीं हुया। कइयां का तो आजादी की लड़ाई तै कोए लेना-देना नहीं था।
इस बात मैं भी कोए शक नहीं रहया अक दिल्ली तै जै किसे गाम के शहर के विकास खात्तर जै एक रुपया चालै सै तो उड़ै तो पन्दरा पीस्से ए पहोंचैं सैं बाकी के पिचासी तो बीचै मैं रैह लें सैं। यो रुपइये का रुपइया अपणी सही जागां पै क्यूकर पहोंचै? म्हारी शिक्षा, म्हारी सेहत, म्हारे मकानां के बारे में कूण सोचैगा? हमनै खुद सोचणा पड़ैगा।
सबतै पहली बात तो याहे सै अक हमनै लूटणिया के दा पेंच समझण की खात्तर अपणी सोच भी तेज करनी पड़ैगी अर अपना सूरड़ापन अर ऐहदीपन भी छोड़ना पड़ैगा। या पहली शर्त सै म्हारी बढ़िया जिन्दगी जीण की। म्हारी पैनी सोच बेरा पाड़ सकै सै अक मुनाफे की लूट पै टिक्या औड़ यू सामाजिक ताना बाना म्हारे काम का कोण्या। पिचासी पीस्से आले नै यो ताना बाना न्यूं का न्यूं राखण खात्तर म्हारा संविधान भी उसे की हिमात मैं जा खड्या हो सै अर या पुलिस अर फौज बी उसे की हिफाजत खात्तर म्हारे पै गोली तान कै खड़ी होज्या सै। इब चुनाव आवण लागरे सै हमनै म्हारे लीडरां धोरैं न्यों तो बूझणा ए चाहिये अक यू के सांग सै? चौवन हजार करोड़ रुपइये का बैंका का कर्जा कूण लेरे सैं? यू पीस्सा म्हारे खून पसीने की कमाई मैं तै टैक्सां की मार्फत कट्ठा करे औड़ पीस्से मैं तै इन कारखाने दारां नै उधार लिया था। ईब देवण तैं नाटैं सैं। क्यूं? इस पीस्से नै उल्टा लेण की हिम्मत कूण करैगा?
नहीं तो ईक्कीसवीं सदी मैं भी म्हारा न्योंए बैंड सा बाजैगा जिसा बीसवीं सदी मैं बाज्या सै। सवाल फेर योहे सै अक अच्छाई की जंग ठाडी हो, गरीब नै उसके हक मिलज्यां, जातपात अर धर्म के ऊपर लोग आपस मैं कट कै ना मरैं, मेहनत करण आले की समाज मैं कदर होज्या, इस जंग का नक्शा कूण त्यार करैगा? कूण इसमैं रंग भरैगा? इसमैं ईसे रंग भरणिया माणसां की खोज करनी पड़ैगी। अर ये माणस और किते आसमान मैं तै कोण्या टपकैं ये म्हारे में ए सैं, हमनै आंख खोल कै अपणे चारों कान्हीं देखण की जरूरत सै।
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