सोमवार, 5 दिसंबर 2016

गंठे की आत्मकथा

गंठे की आत्मकथा
मनै गंठा कैहदे कोए प्याज़ कैहदे अर कोए अनियन कैहदे। मनै लेकै पाछले एक साल तै सबके पासने पाटरे सैं अर भाजपा आल्यां के तो कैहने ए के सैं। इननै आठ म्हिने हो लिए राज करते। आठे म्हिने मैं सबकी म्यां बुलां दी इननै। जनता की चूल हिला कै धरदी। मनै सोच्ची अक सरकार ताहिं सबक तो सिखाणा ए चाहिए। मेरा सीधम सीध तो ब्यौंत नहीं था किमै करण का तो मनै बैरी का हथियार बैरी पै चला दिया। घोड़े के तनाल लागती देखकै मिंडक नै बी पां ठाया। मतलब मेरी गेल्यां आलू, टमाटर, धनिया अर मिर्च ये सारे के सारे स्पीड पकड़गे। बाजपेई जी नै अपणी सफाई देवण मैं कसर नहीं घाली अर मेरे दाम तले नै ल्यावण की खातर बहोतै ताने तुड़वाये फेर कोण्या बात बणी अर जनता नै मध्य प्रदेश, राजस्थान अर दिल्ली मैं भाजपा की सफाई करदी।
बात न्यों बणी अक पाछले दिसम्बर की मेरी जितनी फसल होनी चाहिये थी उतनी कोन्या हुई। जिब मार्च मैं मेरी दूसरी फसल आई तै वा भी उम्मीद तै कम थी। यो इसा मौका था जित भाजपा सरकार चूकगी अर मेरा एक्सपोर्ट बन्द कोनी कर्या। मेरी पैदावार 15 प्रतिशत कम थी पर फेर बी सरकार ने अपने मुंह लागते ब्यौपारियों का भोभा भरण की खातिर मेरा 250,000 टन का (फसल का 8 प्रतिशत) एक्सपोर्ट कर दिया। सारे देस मैं हा हा कार माचग्या। हाय गंठा! हाय गंठा! सोमपाल जी बोल्या अक गंठे के भा बधवा के किसानां नै फायदा होगा। दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री बोले अक म्हारे प्राचीन ग्रन्थां मैं लिख्या सै अक प्याज खाये तै गुर्दे की पत्थरी होज्या सै ज्या करकै जनता नै प्याज नहीं खाणा चाहिये।
जून के म्हिने मैं सरकार के एक विभाग ने मेरे एक्सपोर्ट पै बैन लावण की सिफारिस बी करदी थी। फेर बाजार मार्किट दुनिया की का अपणे चहेत्यां ताहिं मजा दिवाण खातर सरकार नै कोण्या गोली या बात। सोमपाल जी के ब्यान मैं भी थोथ पाई। किसान कै भा बधण का फायदा कोण्या हुआ पर ब्यौपारी काच्ची काटगे। अर मेरी कीमत पचास पै पहोंचगी। करोड़ां करोड़ के वारे न्यारे होगे। जनता की जीभ बाहर लिकड़याई।
जित मेरी आत्मकथा नै जनता के ढीड ल्यादी उड़ै जनता नै भाजपा कै कील ठोक दी। फेर जनता ताहिं इस गंठाराम की एक अपील और सै अक जनता की ठुकाई ईबै पूरी नहीं होली सै। सब्जी मंडी नै देख कै ईब नाज मंडी बी रंग बदलती आवै सै। एक बै मुनाफा जिसके मुंह लागज्यागा फेर उसनै चैन तै कोनी बैठण देवै। पंजाब मैं जीरी की फसल बी कम होई सै। अक्तूबर मैं कुल सरकारी खरीद का 30 प्रतिशत लिया जाया करै फेर ईबकै यो कोटा घणा कम सै। ब्यौपारियां नै अपणे गोदाम भर लिये जीरी गेल्यां। क्यों भर लिये? इननै बेरा ला लिया अक इन्डोनेशिया अर बंगला देश मैं जीरी की फसल बहोत खराब गई सै। फिलीपीन की चावल की मांग घणी सै। पहलम थाइलैंड इन देशां नै चावल भेज्या करता पर ईबकै उसकी फसल की हालत बी आच्छी नहीं बतान्ते।
म्हारले देस के ब्यौपारी नै म्हारी चिन्ता कोण्या उसनै अपणे मुनाफे की चिन्ता फालतू सै ज्यां करकै चावल खरीद के गोदाम भर लिये। चावल भाजपा सरकार की आवण आले दिनां मैं ‘अग्नि परीक्षा’ लेगा। चावलां के भा मेरे भा तै भी ऊंची छलांग मारैंगे। दखे मेरे खाये बिना तै लोगां की सधगी थी पर चावलां बिना तै लोग एक दूसरे नै बुड़कम बुड़क्यां खावण लागज्यांगे।
1960 के जमाने में महंगाई का कारण था अक सूखा पड़ग्या था। पर ईब की महंगाई सै म्हारे ब्यौपारियों के मुनाफे की भूख करकै अर सरकार की नीति करकै। बस मेरा तै इतना ए कैहणा सै अक मैं जनता का था, जनता का सूं, अर जनता का रहूंगा।

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