एक मरण मैं सै
या बात जग जाहिर होली अक विशाल देहात मैं किसान कसूती फफेड़ मैं आरे सैं। एक बी अखबार कोन्या, एक बी पत्रिका इसी कोन्या जिसमैं इस संकट का जिकर रोजाना इसके पन्यां पै ना आन्ता हो। देश के कोने कोने तै किसानां के संघर्षां की भी खबर छपैं सैं। संसद मैं भी किसानां के इस संकट पै बहोतै हंगामा हुया सै। राज्य सरकारें केन्द्र पै राहत की खातर दबाव गेरण लागरी सैं। फेर ज़मीनी तौर पै हालात मैं सुधार ही झलक कोण्या दीखती। पाछली बरियां धान के भा बधवाणा भूल कै किसान इस बात पै आ लिये थे अक किसे भी भा सरकार म्हारे धान खरीद ले। फेर खरीदणिया भी टोहे नहीं पाये। ईबकै बी 30 रुपइये गिहूआं के बधा के स्याण सा करया सै किसानां पै फेर जै कोए मण्डी मैं 610 के भा तै ठावणिया ए नहीं पावैगा तो इस टोफी का के बणैगा?
किसानां की इस बदहाली के कई पहलू सैं। जै फसल भरपूर होज्या तै उसका खरीददार नहीं मिलता। सरकारी एजैंसी कोए बाहणा बणा कै नाज खरीदण तै इन्कार कर दें सैं। किसान नै अपनी गुजर बसर करण की खातर जो सामान खरीदणा पड़ै उस खातर फालतू पीस्सा देणा पड़ै। ऊपर तैं खाद पै सब्सिडी घटा दी। अर डीजल की कीमत बधा दी। बिजली के रेट तै बढ़ा दिये फेर उसकी आपूर्ति तै नियमित कोण्या करी। सारे देश मैं मजबूरी मैं फसल घटे औड़ दामां पै बेचण की दर्दीली दास्तान सुनाई देण लागरी सैं। ईसा अजीबो गरीब वाक्या होवण लागरया सै जो आजाद भारत मैं ईब ताहिं अनजान था। आड़ै सस्ती कृषि जात चीजां के आयात की इजाजत दे दी गई सै जिस करकै कीमत गिरती जावण लागरी सैं। दूजे कान्हीं अपने देश मैं मौजूद नाज के भण्डारां नै कोए खरीदणिया कोण्या। कर्जदारी बढ़ती जावण लागरी सैं। बड़े पैमाने पै किसान अपनी जमीन तै हाथ धोवण लागरे सैं अर मजदूरां के गैहटे मैं शामिल होवण लागरे सैं। कई किसान तो आत्महत्या जिसा हताशा भरया कदम ठावण पै मजबूर हुए सैं। चारों कान्हीं तै हमला सै किसान पै अर इस संकट की जड़ सै यो भूमंडलीकरण। इस वैश्वीकरण की चाल के साहमी राज में बैठे लोगां नै तो कति गोड्डे टेक दिये लाग्गैं सैं।
पर इस संकट नै किसानां के संघर्ष मैं भी एक नई ज्यान घाली सै। उनके गुस्से का बहोतै जुझारू ढंग तै इजहार होवण लागरया सै। अफसरां, मंत्रियां अर आड़े ताहिं अक मुख्यमंत्रियां ताहिं भी नीं बख्स्या जान्ता। खबर सै अक राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कारवां पै पत्थर बरसाये अर छोह मैं आये किसानां नै एक जनसभा मां तै खदेड़ भी दिया था। चन्द्र बाबू नायडू नै कई जनसभावां मैं किसानां के प्रदर्शनां का सामना करना पड़या। पंजाब मैं भी किसानां ने मोरचा थाम्बया। हरियाणा मैं भी सुरसुराहट सै फेर जात ईबै पट्टी बांधरी सै। पहल्यां आले संगठन ठप्प से होगे अर गरीब अर मझोले किसानां के नये संगठन उभर कै आवण लागरे सैं। कवारी के असली हिम्माती मसले पै जुझारू संघर्ष जारी सै जिसमैं महिला भी शामिल सैं। पाले बन्दी होवण लागरी सै। किसानां के असली हिम्माती कूण सैं नकली हिम्माती कूण सैं ईबकै जरूरी बेरा लागज्यागा। घणे दिन काठ की हान्डी चढ़ी नहीं रैह सकदी।
एक बर एक कुम्हार कै दो छोरी थी। एक का ब्याह थोड़ी धरती आले कै कर दिया अर दूसरी का ब्याह बर्तन बणावण आलै कै कर दिया। साल पाछै कुम्हार की घरआली नै कहया अक बिमला अर कमला का बेरा तो लिया। कुम्हार चाल्या गया पहलम बिमला कै। हाल चाल बूझया। बिमला बोली - बाबू खेती सूकण लागरी सै, जै मींह बरस ज्यागा तो जी ज्यावैंगे। बाबू बोल्या - करैगा राम जी मेर सी। दूसरी छोरी कमला धोरै गया तो उसका हाल चाल बूझया। कमला बोली बर्तन बहोत थाप राखे सैं। जै मींह नहीं बरस्या तो जी ज्यांगे बाबू। बाबू बोल्या - राम जी मेर करैंगे। घरां आकै कुम्हार की घर आली नै बूझया अक के हाल सै छोरियां का। कुम्हार बोल्या - एक मरण मैं सै।
तो आई किमै समझ मैं अक नहीं? इन नकली नेतावां मैं तै अर किसानां मां तै एक मरण मैं सै। जै किसानां नै इन नकली नेतावां का असली रूप नहीं पिछाणा तो वे मरगे अर जै इन नकली नेतावां का असली चेहरा पिछणग्या तो ये नकली नेता मरगे। फेर यू पिछाण करण आल्या काम क्यूकर होवै अर कूण करैगा?
यू किसानां नै करना पड़ैगा। अर ज्यूकर जात का चश्मा तारकै ये जिब भैंस खरीदण जावैं सैं तो धार काढ़ कै देखैं सैं तो न्यों ए किसानी का चश्मा पहर कै इन नकली नेतावां की असली करतूत देखणी पड़ैगी। नहीं तै जात के चश्मे मैं इनका असली चेहरा साहमी कोनी आवै।
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