सोमवार, 5 दिसंबर 2016

जात लुगाई की

जात लुगाई की
दादा लख्मी चन्द बरगा सांगी कोए एकाधै और होतै हो। मीरा बाई का सांग, नौटंकी, पदमावत, हीरामल जमाल, राजा भोज, शरण दे, मेनका शकुन्तला, चन्द किरण, ज्यानी चोर, बीजा सौरठ, सुलतान निहालदे, गोपीचन्द, चीर पर्व, कीचक पर्व, अर और भी कई सांग लिखे अर गाये। उनकी गायकी, उनकी लय सुर की पकड़ बहुत ही मजबूत थी। मगर औरत का स्थान उनके सांगों में क्या था इसका अध्ययन के बेरा आज ताहिं नहीं हो लिया। मेरे बरगा अनाड़ी इस विषय गेल्यां छेड़छयाड़ करदा बी आच्छा कोण्या लागदा। फेर काची पाकी शुरूआत तै इतने जरूरी विषय पै होणी ए चाहिए। मनै बेरा सै दादा लख्मी के भगतां कै इसा विश्लेषण गलै कोण्या उतरै। म्हारा मतलब दादा लख्मी के हुनर की नामोशी करना कती नहीं सै फेर बी इसका विश्लेषण तै होणा ए चाहिए। पंडित जी का एक सांग सै ‘नौटंकी’। राजा गजेसिंह के दो छोरे थे भूपसिंह अर फूलसिंह। फूलसिंह छोटा है उसका ब्याह नहीं हो लिया। भूपसिंह का दोस्त सै कुन्दन सेठ। कुन्दन सेठ अर भूपसिंह की घरआली आपस में बतलाई। फूलसिंह के ब्याह की खातर भूपसिंह की पत्नी फूलसिंह नै उकसावै सै। उसकी बात सुणकै फूलसिंह नाराज होग्या सै। औ सारी बात भूपसिंह ताहिं बतावै सै। भूपसिंह फेर फूलसिंह ताहिं के कहवै सै भला -
तेरी भाभी लागै सै नेग में बहोड़िया भाई की। टेक
हम दो भाई मां जाए प्यारे, तेरे तैं के काम करे सैं न्यारे,
चाल घरां गुण अवगुण छाटैंगे, सांठा जिन्दगी का सांठैंगे
तूं घरा चाल नाड़ काटैंगे, वा पलरी ढाल जमाई की
जै कोए पहल्या अवसर चूक्या हो, बोल तेरी छाती मैं दुख्या हो,
जै ब्याह शादी का भूूखा हो, करूं तदबीर सगाई की।
लख्मीचन्द छन्द नै गाले, कुछ भाई की तरफ निंघाले
जै तूं भूखा हो तै खाले, या रोटी खांड मलाई की।
इस रागनी मैं भूपसिंह फूलसिंह ने समझावै सै अक तनै अपणी भाभी कै दो थप्पड़ क्यूं न जड़ दिये। लुगाई की भी किमै जात हो सै के। तूं घरा चाल उसकी नाड़ नै काटांगे वा तेरी भाभी जमाई की ढाल पलकै सांड होरी सै। अर जै तूं भूखा हो तै या रोटी खांड मलाई की खाले। या लाइन दो अर्थी भी हो सकै सै। इसका आड़ै यू मतलब बी लाया जा सकै सै अक तेरी भाभी गेल्यां जै तनै सैक्स की भूख सै तै वा भी पूरी करले। कई लोग तै आज भी इनै बिचारां के पक्के हिमाती पा ज्यांगे। फेर इसे आडू हरियाणा में घणे ए सैं ज्याए तै तो हरियाणा संस्कृति खाड़े में पाछै रैहग्या बताया। औरत के बारे में इतनी पिछड़ी सोच की एक कहावत और कही जा सै आज बी अक लुगाई कै तै गुद्दी पाछै मत हो सै, इसकै एक घर तै बाहर जान्ते धरद्यो अर एक घरां आन्ते की साथ धरद्यो या जिबै काबू मैं रह सकै सै। इसतै घटिया बात आज के बख्तां मैं और के हो सकै सै? औरत नै हम आज भी पां की जूती समझां। रै कदे जिब म्हारी समझदानी छोटी थी। जिब म्हारी समझ विकसित ना हो पाई थी। जिब इसी बात सोचणी तै समझ मैं आ सकै सै दादा लख्मी का। फेर आज के बख्तां मैं तो ये बात मानसिक बिमारी अर कै घटिया पिछड़ी संस्कृति के खाते मैं ए आ सकैं सैं। तै लख्मी दादा की बात उन दिनों के हिसाब तै औरत के बारे में थोड़ी घणी ठीक हो सकैं सैं फेर आज के बख्तां के फीत्यां के नापे मैं वे फिट कोण्या बैठती। या न्यारी बात सै अक घर बार के, रिश्ते नात्यां के, ऊंच-नीच के रीति रिवाजां के बोझ तलै औरत का कोए अपणा बतौर एक इन्सान बतौर एक नागरिक बी कोए वजूद हो सकै सै इसका कोए खाता ‘नौटंकी’ के सांग मैं दिखाई नहीं देन्ता। भूपसिंह की बहू (भाभी) का नजरिया भी सही-सही ऊभर के नहीं आवन्ता। वा तै खलनायिका ए दिखा राखी सै अर नौटंकी जो नायिका सै उसका भी एक भोग की ‘चीज तै न्यारा कोए वजूद दिखाई नहीं देन्ता।’
इन सारी बातां का यो मतलब कति नहीं सै अक कहानी का चुनाव माड़ा सै अक छन्दां मैं कितै कमजोरी सै। ये सारी बात बढ़िया सैं बस खटकण आली जो बात सै वा सै अक औरत के समाज मैं स्थान नै लेकै जो नजरिया इस नौटंकी के सांग म्हं दीखै सै ओ खास तरां तै आज के हिसाब तै पिछड़ा औड़ सै। इसपै और बिचार करण की जरूरत हो सकै सै। आपस में तलवार काढ़ कै लड़ण की जरूरत कति नहीं सै। एक विश्लेषणात्मक अर आलोचनात्मक नजरिये तै चीजां का आकलन करण की जरूरत सै। हो सकै सै बाजे भगत के नजरिये मैं भी औरत के समाज मैं स्थान नै ले के घणा फर्क ना हो। हो सकै सै इस बारे मैं मेहर सिंह बी उड़ै ए सी खडया पावै अर उनकी आज की पीढ़ी के पण्डित कृष्ण चन्द्र शर्मा भी कमोवेश उसै नजरिये की पतवार तै नैया खेवण लागरे हों। इस मायने में मनै लागै सै दादा लख्मी, बाजे भगत, मेहरसिंह घणे न्यारे-न्यारे नहीं थे। हां वे किन-किन बातां मैं न्यारे-न्यारे थे। यो भी एक शोध का काम हो सकै सै। फेर एक सवाल तो दिमाग म्हं आवै ए सै अक दादा लख्मी के ग्रन्थ छपगे, मेहर सिंह की रागनियां के संकलन छपगे पर बाजे भगत के बारे मैं ईब ताहिं कुछ भी नहीं छप लिया या दूभान्त क्यों? कौन आच्छा था कौन किसा था इसका फैंसला जनता करणा जाणै सै। जनता नै पहलम भी करा ए था अर जै सारी सबकी बात उसकै साहमी आज्या तै जनता आप हिसाब ला लेगी अक किसमै कितना दम था। फेर सच्चाई तै ईमानदारी तैं जिसका जितना काम था ओ छपाई मैं तो आवै एक बै।


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