बुधवार, 7 दिसंबर 2016

जात्यां की बेड़ी टूटैंगी

जात्यां की बेड़ी टूटैंगी
पाछले पांच छह साल तैं हरियाणा मैं जनता कै सांस चढ़रे सैं। कदे बाढ़ आज्या सै, कदे मलेरिया खाज्या सै, कदे पीलिया छाज्या सै तो कदे डैंगू भ्यां बुलाज्या सै। समाज सेवी संस्था बी ज्यूकर मींह पाछै गिजाई लिकड़याया करैं न्यों उभरयाई। जड़ बात या सै अक जितनी तेजी तै बख्त का पहिया घूमण लागरया सै इसका अन्दाजा तो माणसां नै कदे सुपणे मैं भी नहीं लाया होगा। जिस गाम मैं बी नजर मारकै देखो उस मैं पाछले दस साल मैं कुछ नई बात हुई लागैं सैं। टी वी  सैटां के एरियल सरड़क पै मोटर मैं बैठे बैठे बी तीस चालीस तो कम तै कम गिणे ए जा सकैं सैं, बैरियर बधगे, सिलाई की दुकान कई कई खुलगी, बिजली की दुकान, मैना कैसेट की दुकान, पिंचर लावण की दुकान, किरयाणे की हर गली मैं दुकान अर कई और इसे ढाल की चीज। दो चार ट्रक खड़े पाज्यांगे, एक दो टाटा सूमो खड़ी दीख ज्यांगी अर दस बीस ट्रैक्टर अर उनकी ट्राली। सलवार कमीज, पैंट पजामा घर घर मैं जा बैठे। एकाध घर पै डिस एंटिना बी लाग्या पाज्यागा। फेर गाल न्यों की न्यों सड़ियल, कुरड़ी न्यों की न्यों अर जोहड़ां मैं काई लाग्या औड़ सड़ता पाणी।
एक दूसरी जात्यां के बालक आपस मैं ब्याह करण लागगे। सारी जात्यां के बालक कट्ठे होकै अपणी पढ़ाई के बारे में सोचण लागगे। जातपात का भेद भूलकै अपणी बेरोजगारी पै मन्थन शुरू कर दिया। बेरोजगारां कै या बात समझ आण लागगी अक जात के घेरे तै जमात का घेरा घणा चौड़ा सै अर सही सै। बेरोजगारी का सामना सबनै कट्ठे होकर करना होगा अर इननै कट्ठे जलसे जलूस काढ़णे शुरू कर दिये। ये सारी बात देख कै जात के ठेकेदारां कै काला बाजारियां कै अर टाटा बिड़ला बरग्यां के कान खड़े होगे। जात पात पै बांटकै पचास साल खून चूस्या म्हारा सबका इननै। हरित क्रांति मैं कमायें हम अर घर भरे इनके अर हम न्यारे न्यारे पड़े खाट तोड़ें गए अर अपनी किस्मत नै कोसें गए। फेर म्हारे बात समझ मैं आगी हम कट्ठे होण लागे तो जात्यां के ठेकेदार रंग बदल कै, भाषा बदल कै, चाल बदल कै अर चेहरा बदल कै फेर आ डटे मैदान मैं। कितै कोए सभा अर कितै कोए सभा। खूब आडम्बर खड़े कर दिये। इनकी अपणी जात बी बदल कै मुनाफाखोरां की जमात होगी। रोहतक के चारों कान्हीं जितनी भी फैक्टरी सैं उनके मालिक सारे कट्ठे सैं अर कोए जात पै एसोसिएशन नहीं बणा रया सारे जमात पै बणारे सैं। ज्यूंकर लघु उद्योग संघ, भट्ठा मालिक संघ।
पर जिब कोए न्यारी जात की छोरी अर न्यारी जात का छोरा आपस मैं ब्याह करलें सैं तो इन ठेकेदारां के पाह्यां तले की धरती खिसक ज्या सै। अर ये फांसी का हुकम सुणा दे सैं दोनूआं ताहिं। छोरा छोरी अपणी मर्जी तै ब्याह करणा चाहवैं तो ये तीसरे तेली कोण? असल मैं सौ का जोड़ यो सै अक जै ये जात्यां के किले ढहगे तो मुनाफाखोरां की लूट कै झटका लागैगा। ज्यां करकै ये इन किल्यां पै टीप करण लागरे सैं पर जाणैं वै भी सैं अक इन किल्यां की नींव थोथी होली सै। या जातपात भी औच्छी जूती की ढालां होली इसने काढ़ कै ए पैंडा छूटैगा ना तै औच्छी जूती की ढालां पायां नै काट कै धर देगी। छूआछूत, जातपात मिटे बिना नया समाज क्यूकर बणाया जा सके सै? पर ये बेड़ी टूटैंगी जरूर अपणे आप नहीं म्हारे सबके मिलकै जोर लाए तैं।

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