मंगलवार, 18 जुलाई 2017

तावल़ा सो बावल़ा मेरे बीरा!

एक बर की बात सै अक एक महावत एक राजा कै एक हथणी पै नौकर था। फेर ओ सारी हाण हथणी की देखभाल मैं लाग्या रहन्ता अर हथनी नै इसे ढाल राखता जणों तै वा हथणी उसकी अपणी औलाद हो। कई लोग अर लुगाई उसका यू जनून देखकै उसनै जनूनी बी कहया करदे अर नफे, सत्ते अर फत्ते तो उसनै पागल बी कह दिया करदे।
एक दिन के हुया अक वा हथणी क्यूकरै खुलगी अर भाजदी गई अर बण मैं भीतर चाली गई। महावत नै तो तड़कैं ए उठकै देख्या तो हथणी कोण्या दीखी। न्यून देखी, भीतर देखी, बाहर देखी, बाग मैं देखी, जड़ कितै नहीं पाई। बहोत दुखी हुया महावत। गैल्यां उसनै चिंता होई कि मालिक खाल तारैगा वा न्यारी।
महावत नै डरते डरते से नै मालिक ताहिं बताया कि हथणी तो भाजगी बणां मैं। सुनते की साथ मालिक का पारा तो सातमें आसमान मैं गया। महावत नै भतेरे हाथ पां जोड़े कि इसमैं मेरा कोए दोष नहीं सै। फेर मालिक तो आखिर मालिक ठहरया। ओ उसकी बात क्यां नै सुणै था। उल्टा उसनै महावत पै इल्जाम ला दिया कि उसनै हथणी बेच खाई अर ईब बात बणावै सै। न्यों भाज कै आज ताहिं नहीं गई हथणी। महावत कै और भीतरले मैं जा कै लागी। मालिक फेर बोल्या - थारे बरगे गरीब गुरबा लोग अमीरां के न्योंए कान काट्या करैं। पर मैं अपणे कान कति नहीं कटवाऊं तेरे पै। मालिक नै आगा पाछा कुछ बी ना देख्या अर महावत तै बिचारा पढ़ण बिठा दिया। उस ताहिं घणा जबर दंड सुणा दिया।
इन बातां नै बारां साल बीतगे। एक दिन महावत नै किसे काम तै बण मैं जाणां पड़ग्या। उसकी गेल्या और बी कई लोग लुगाई थे। उड़े उननै हाथियां का झुण्ड देख्या। उन हाथियां मैं वा हथणी बी थी। महावत नै वा हथणी सैड़ दे सी पिछाण ली। उसनै उसकै धोरै जाणा चाहया पर उसके साथियां नै ओ रोकणा चाहया फेर महावत कड़ै सुणै था उनकी। सीधा हथणी के धोरै चाल्या गया। महावत नै हथणी का नाम ले कै जोर तै रुक्का मारया। सुणण की वार थी हथणी नै महावत की आवाज पिछाण ली। वो झट भाज कै उसके धोरै आगी अर आकै बैठगी। महावत बी सैड़ दे सी उसपै जा बैठया। हथणी महावत नै जंगल मैं लेगी। उसनै अपणे बालक बुला लिये। महावत उन सबनै ले कै मालिक धोरै घर नै आग्या। मालिक नै देख्या तो जणों उसपै कई घड़े पाणी पड़ग्या। उसनै अपणी गलती का अहसास होग्या। उसनै महावत धोरै माफी मांगी अर बोल्या तूं तो बेकसूर था। मालिक नै अपणे मन मैं सोच्या अक तावला सो बावला। उसनै कसम खाई कि आज पाछै कदे तावल नहीं करया करैगा।
फेर आजकाल तो आपां चट मंगनी अर पट ब्याह करण की सोचां सां। म्हारे देश म्हं आजकाल सब क्यांहे नै बड़ी रफ्तार पाकड़ राखी सै। सारी ऊंचनीच सोच कै काम करण की आदतै कोण्या रही माणस मैं। यो तुरत फुरत आला मामला म्हारे देश का कदे ना कदे एक्सीडैंट करवा कै मानैगा। सोच समझ कै, झाड़ पूंछ कै, देखभाल कै, वोट दियो। भैंस खरीदां जिब धार काढ़ कै देखां, बुलध खरीदां तो खूड काढ़ कै देखां, हल खरीदां तो चांड कै देखां फेर वोट गेरण के बख्त या परख करकै गुण दोष के आधार पै चीज लेवण की आदत म्हारी कड़ै चाली जा सै? हमनै जो खूब बरत कै देख लिये, कति माठे, खूड मैं बैसकण आले बुलध घरां बांध कै के करांगे। देखिये कदे तावल तावल मैं इसे लोगां नै वोट दे दयो जो हमनै तमनै सबकै बेच कै खाज्यां अर फेर हम न्यों कहवां कि ओहले भाई। हमनै के बेरा था अक न्यों बणज्यागी?
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