आज थोड़े से बी पीस्से आला अपणी पत्नी नै उत्पादन के औजार तै सिवा और कुछ बी नहीं मान कै चालदा। उस खातर तो वा इसी ए चीज सै ज्यूकर गुलाब जाम्मण कै संतरा। इस्तेमाल करण की चीज़ अपणी वासना मिटावण की चीज अर बालक पैदा करण की मशीन तै फालतू कुछ नहीं औरत उसकी नजरां मैं। उसतै थोड़े से फालतू पीस्से आले की मानसिकता और बी घटिया स्तर पै चाली जावै सै। अपणे खेत क्यार मैं अर घरां मैं अर कारखान्यां मैं अर कै भट्ठयां पै मजदूरी करणियां की बहूबेटियां का इस्तेमाल ओ अपणी मनमर्जी तै करना चाहवै सै। यू किसे चरित्र का माणस सै। असल मैं व्यक्तिगत संपत्ति की नींव पै टिके औड़ म्हारे समाज मैं लैंगिक अर वैवाहिक प्रश्न समाज की हरेक तबके की औरतां कै आगे बहोत घणी समस्याएं, उलझण अर परेशानी पैदा कर रे सैं। पुराने सामाजिक बंधन टूटण लागरे सैं। नये आदमी की साथ आदमी के नए आदर्शवादी संबंधां की मांग भी उभरती दीखै सै। असल मैं ये लैंगिक अर वैवाहिक समस्याएं पूरी सामाजिक समस्या के रूप मैं देखी जाणी चाहियें। यो औरत मरदां की नाबराबरी पै टिक्या समाज औरत नै उपभोग की वस्तु तै फालतू कुछ भी माणण नै तैयार कोण्या। असल मैं इस अन्यायकारी समाज की जागा न्यायकारी समाज, एक समतावादी समाज की खातर जो संघर्ष लड़या जागा वो संघर्ष ही वैवाहिक अर लैंगिक संबंधां के उद्धार की नींव सही सही ढंग की तैयार करैगा। इसकी खातर सार्वजनिक जीवन मैं औरतां की हरेक जागृति अर काम ताहिं खूबै होंसला हफजाई मिलणी चाहिये। सामाजिक जीवन के भांत-भांत के कामां मैं हिस्सेदारी करकै उनका घर के भीतर का कोल्हू के बुलध आला जीवन खत्म होवण की राही पड़ैगी।
आज कै दिन देखण मैं आवै सै कि दुनिया के सबतै फालतू अमीर देशां मैं चहुंमुखी संकट पैर पसारता जावण लागरया सै, पुराने ढंग की शासन प्रणालियां खतम होवण लागरी सैं अर पूरा का पूरा सामाजिक ढांचा खतम होवण लागरया हो तै लैंगिक अर विवाह के संबंधां मैं विकृति भी जरूर पैदा होवैंगी अर मौज मस्ती की इस ढाल की इच्छाएं अर प्रेरणाएं बड़ी आसानी तै निरंकुश हो सकैं सैं। तो सवाल यू सै कि इसकी काट के सै? या जो अपसंस्कृति पूरे समाज मैं घुण करण लागरी सै इसका के राह लिकड़ै? असल मैं एक चाल्ला और होवण लागरया सै। औरत नै उसको असली आजादी कोण्या मिली सै। यो पीस्से आला हिस्सा चाहवै सै कि औरत नै आजादी मिलै अक वा उसकी इच्छापूर्ति करण नै आजाद हो। मतलब उसका ‘चिज्जो’ के रूप मैं इस्तेमाल करण मैं जो अड़चन आवैं सैं उनतै आजादी मिलजै। एक औरत की एक इन्सान के रूप मैं आजादी की बात कोए नहीं करदा। असल के प्रेम मैं व्यापक लैंगिक प्रेरणा का वैयक्तिक प्रेम के रूप मैं विकसित अर परिष्कृत होणा बहुत जरूरी पक्ष सै। प्रेम मैं दो जीवां का अर नये पैदा होवण आले एक तीसरे जीव का भी रिश्ता सै। इसे करकै उसका एक सामाजिक महत्व बी सै अर उसमैं समाज के प्रति एक कर्त्तव्य बी सै। म्हारे हरियाणे के अर किसे बी जागां के नौजवानां नै अपनी जिंदगी मैं आनंद अर स्फूर्ति की जरूरत सै। यू आनंद अर स्फूर्ति उसनै टी.वी. के लटके झटके अर इंटरनैट की पोरनोग्राफी नहीं दे सकदी। इनकी जागां जरूरत सै स्वास्थ्यप्रद खेलकूद की, तैरण की, बहोत ढाल के शारीरिक अर बौद्धिक कामां मैं युवा लड़के लड़की जितनी घणी हिस्सेदारी करैंगे, साथ मिल जुलकै पढ़ैंगे लिखैंगे इसतै जितना कुछ इन युवावां नै मिलैगा उसका हजारवां हिस्सा भी उननै इन लैंगिक समस्यावां पै बात करकै कै पोरनोग्राफी देखकै कोण्या मिलै। म्हारे बड़े बुजुर्गों नै कोषण की जागां उनकी स्थगित ऊर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल करण मैं अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाणी चाहिए ना तो ईब्बी नाश होवण मैं तो कसर नहीं रैहरी बाकी आगै बी और नाशै होवैगा/
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