म्हारे देश की दुर्गति होण लागरी सै अर आपां हाथ पै हाथ धरे बैठे सां। म्हारे देश के आका देश की सार्वजनिक संपत्तियां नै पूरी तरां तै अन्धाधुन्ध तरीके तै लुटावण पै उतारू होरे सैं। बाल्को बेची, होटल सैरटन बेच्या अर तेल कंपनी बेचण की तैयारी करली पूरी।
या तो भला हो सुप्रीम कोर्ट का अक उसनै सरकारी तेल कंपनियां के बेचण पै रोक ला दी। पर म्हारे देश के आकावां कै या बात गलै नहीं उतरी। सरकार नै सुप्रीम कोर्ट तै फेर हटकै आग्रह करया सै कि इन भीमकाय तेल कंपनियां - बी पी सी एल. अर एच.पी.सी.एल. के विनिवेश (बेच्चण) के मामले पै दिये औड़ रोक के फैसले पै हटकै गंभीरता तै विचार करै। इसका मतलब यू बी लाया जा सकै सै कि ईब जो फैसला कोर्ट नै दिया सै ओ बिना सोचे समझे दे दिया। होणा तो याह चाहिए था कि इस मामले मैं सर्वोच्च न्यायालय का फैसला म्हारे देश के ठेकेदार सिर झुका कै स्वीकार करदे अर इन कंपनियां के विनिवेश का मामला संसद कै साहमी ल्याया जान्ता अर दूध का दूध अर पाणी का पाणी आपै हो जान्ता। फेर संसद मैं यू मामला कोण्या ल्याया गया। म्हारे देश की सरकार नै सुप्रीम कोर्ट तै हटकै अपील करी सै कि कोर्ट अपणे फैसले पै पुनर्विचार करै। नीयत साफ सै कि कोर्ट सरकार नै कंपनी बेच्चण की छूट दे दे।
म्हारी देश की देशभगत सरकार का यो कदम अपणे आप मैं बहुत किमै उजागर करण आला सै। पहली बात तो या सै कि सरकार आगले संसद के सत्र ताहिं बी इंतजार करण नै तैयार कोण्या अर सार्वजनिक क्षेत्र नै लूटण खातर बहोत जल्दी मैं दीखै सै। दूसरी बात या सै कि कोर्ट के आदेश के बावजूद इस मामले नै संसाद के साहमी ले कै जावण तै बचण की सरकार की कोशश तै योए मतलब लिकड़ै सै कि वा निजीकरण की प्रक्रिया ना तो जुम्मेवारी के तरीके तै चलाना चाहन्ती अर ना पारदर्शी तरीके तै चलाणा चाहन्ती। सुप्रीम कोर्ट की बैंच का सर्वसम्मति तै यू फैसला सै कि संसद के कानून के तहत गठित कंपनियां का संसद की इजाजत के बिना निजीकरण नहीं करया जा सकदा। इस तरियां सरकार इस फैसले का पालन करण नै मजबूर सै। फेर हद देखो म्हारी सरकार की कि इस स्पष्ट फैसले नै बी धत्ता बतावण की कोशिश करण लागरी सै। ईब जनता नै देखणा सै कि या इजाजत क्यूंकर दी जा सकै सै। कोर्ट नै बी देखणा सै कि सरकार उसनै ठेंगा ना दिखावै।
यो तै सरासर लूट अर धोखाधड़ी का मामला सै। म्हारै बी बेरा ना के लकवा सा माररया सै, हम बोल चुप्पाके सां। दो खूड खेत के कोए ले ले तो हम माणस मारण नै त्यार होज्यां। ये यूपी अर हरियाणा आले किसान रोज गोली चलावैं धरती पै फेर यू कई हजार करोड़ां का म्हारा माल बेच्या जावण लागरया इसपै म्हारै सांप सा सूंघ रहया सै। जै हमनै इस लूट का विरोध नहीं करया तो आवण आली पीढ़ी हमनै माफ नहीं करैगी। इसे प्रबंधकां के हाथां मैं तो इन संपत्तियां का प्रबंधन भी नहीं रहणा चाहिए। फेर जनता जनार्दन तो फिलहाल अन्धेरे मैं दीखै सै बेरा ना कद आंख खुलैगी जनता की।
ईब तो या बात जग जाहिर होली सै कि निजीकरण के नाम पै भारी भरकम अवैध कमाई अर भ्रष्टाचार तै भरे सौदे हुये सैं। असल मैं तो निजीकरण की ए ना तो कोए आर्थिक तुक बणती अर नाहें सामान्य ज्ञान के हिसाब तै निजीकरण फिट बैठता। ईब कूण समझावै म्हारे देश के ठेकेदारां नै? जनता नै इनका तो कोए पक्का इलाज टोहवणा पड़ैगा ना तो ये जनता की भ्यां बुलवा देंगे। पूरी दुनिया की जनता राह खोजण की तैयारी मैं सै। वे ईब समझण लाग लिए सारी बातां नै।
सुण्या सै 16 जनवरी तै ले कै 21 जनवरी ताहिं ये लोग मुंबई मैं कट्ठे होवैंगे। सौ तै फालतू देशां के लोग उड़ै आवैंगे अर विश्व सामाजिक मंच के झंडे तलै आपस मैं बैठ के बतलावैंगे। इस ढाल के मंचां तै नई उम्मीद बंधी सै कि इस खुली लूट का मुकाबला करण नै लोग खड़े जरूर होवैंगे।
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