आजकाल पूरी दुनिया आर्थिक मंदी के दौर म्हं सै। दो हजार म्हं विकास की वृद्धि की दर 4.2 फीसद थी। फेर अनुमान सै अक दो हजार एक म्हं या वृद्धि दर 2.4 रहवैगी। आर्थिक सहयोग तथा विकास संगठन (ओईसीडी) के 29 देशां म्हं या वृद्धि दर एक फीसद रैहन्ती बताई। गैल की गैल विश्व व्यापार की वृद्धि दर म्हं भारी गिरावट आई सै। सन् 2000 म्हं या दर 13.4 फीसदी थी फेर 2001 म्हं या सिर्फ 3.5 फीसदी रैहगी। ग्यारह सितंबर की घटनावां पाछै तो यो मंदी का दौर और भी गहरा होन्ता दीखै सै। अर ये अमीर देश गरीब देशां पै बोझ गेरण की पूरी तैयारी म्हं दीखै सै। इन गरीब देशां की जनता की फिरकी पहलम्हं बणरी सै फेर आण आले बख्तां म्हं तो और भी बुरा हाल हो ज्यागा। या बात इन गरीब देशां की गरीब जनता कै तो समझ मैं आगी फेर इन गरीब देशां की अमीर जमात कै या बात घाट जंचै सै अक उनके महलां पै भी ये अमीर देश बाज की ढालां झपटा जरूर मारैंगे। पूरी दुनिया म्हं जो लोग इन अमीर देशां के अमीर मालकां की पैंतरेबाजी नै समझगे वे इनकै खिलाफ लड़ण की त्यारी म्हं भी जुटरे सैं। टीना अर टीपा का जंग जारी सै। टीना का मतलब सै देयर इज नो आल्टरनेटिव मतलब कोए विकल्प नहीं सै अर टीपा का मतलब सै देयर इज पीपुल्स आल्टरनेटिव मतलब लोगां धोरै इस क्रूर दुनिया का विकल्प सै।
आज की दुनिया म्हं विकास का जो तरीका इस्तेमाल होरया सै उसतैं अमीर और अमीर होन्ता जावण लागरया सै अर गरीब और बी गरीब होवण लागरया सै अर कुछ निरभाग बीच म्हं ए हिचकौले खावण लागरे सैं। अमरीका के विकास के मॉडल की दो खास बात सैं। विकास की तासीर इसी सै अक इसतै बेरोजगारी बधै सै। जितणा विकास फालतू जितनी तरक्की फालतू उतनी बेरोजगारी फालतू। दूसरी खास बात इस मॉडल की या सै अक एक देश बेरोजगारी की दर 3.9 फीसदी थी फेर दिसंबर के आन्ते आन्ते या 5.8 फीसदी पै पहोंचगी। मानव विकास रिपोर्ट 2001 के हिसाब तै दुनिया की आबादी के दस फीसदी सबतै गरीब तबके की आमदनी सबतैं धनी दस फीसदी की आमदनी के सिर्फ 1.6 फीसद के हिस्से जितनी सै। अमरीका के दस फीसदी हिस्से लोगां की कुल आमदनी दुनिया की सबसे गरीब 43 फीसदी आबादी (करीब दो अरब लोग) की कुल आमदनी तै भी फालतू सै। दुनिया के बीस तै फालतू देशां का 1999 का मानव विकास सूचकांक, 1995 के सूचकांक तै भी तले चाल्या गया। इन मां तै दस देसां के मामले मैं तो यो सूचकांक 1985 के सूचकांक तै भी तलै चाल्या गया। इस करकै तीसरी दुनिया म्हं रहवण आली घणखरी जनता बढ़ती गरीबी अर बदहाली के बोझ तलै पिस्सण लागरी सै। विज्ञान अर प्रौद्योगिकी नै इतनी तरक्की करली अक पूरी दुनिया की घणखरी जनता की जीवन स्तर ऊपर ठाया जा सके सै फेर इस पूंजीवादी समाज व्यवस्था के उत्पादन के संबंध विज्ञान की इस सच्चाई के साहमी दीवार बणकै खड़े सैं। इतना ए नहीं ये समाज के संबंध मुनाफे की अपनी लुटेरी तलाश म्हं म्हारी इंसानियत नै हैवानियत म्हं बदलण लागरे सैं। म्हारे विकास की इस अमानवीय प्रकृति अर बाजार व्यवस्था करकै दुनिया पै संकट के बादल छावण लागरे सैं अर उनके दुख दरद बधण लागरे सैं अर लोग राधा स्वामी, चन्द्रा स्वामी, मुरारी बापू के चरणां म्हं अपणे दुख दरदां के खातमे की खातर लागरे सैं। फेर उन धोरै इस क्रूर समाज व्यवस्था का इलाज कोण्या। वे तो इसका जिकरा बी कोण्या करदे। इस विकास के ढांचे म्हं गड़बड़ के कारण विकसित अमीर देसां अर तीसरी दुनिया के विकासशील गरीब देसां के बीच का संकट दिन ब दिन गहरा होन्ता जावण लागरया सै। इन अमीर देसां का यो हमला म्हारी आजादी अर आत्मनिर्भरता पै कसूती चोट करण लागरया सै। विश्व पर्यावरण की ताहिं कसूते खतरे पैदा कर दिये इसनै। ये देश अपनी सेना के ताकत के दम पै अर अपनी तकनीक के दम पै तीसरी दुनिया के देसां का गल घोटण लागरे सैं अपणी अपनी ऐश की खात्तर। इन देसां के माल खजाने भरे जावें सैं अर गरीब देसां के खजाने खाली होन्ते जावैं सैं। देखियो के होगा?
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