महात्मा गांधी नै कहया था अक भारत गांमां मैं बसै सै। आज के भारत मैं जड़ै पीस्से आले कसूती ढाल जगमगावण लागरे सैं, उड़ै असली भारत, भारत के गामां की के हालत सै? बेरा सै के? आज कै दिन ताहिं 20,000 तै फालतू किसान आत्महत्या करण नै मजबूर हो लिए अर 20,000 तै फालतू गामां के लोग भूख तै मरण लागरे सैं। 50 लाख तै फालतू छोटे अर हाशिये के किसान अपनी खेती की जोतां नै खोकै बेरोजगारों की जमात मैं शामिल हो लिये सैं। सैंकड़ों किसानां नै अपणा कर्ज चुकावण की खातर अपणे गुर्दे बेचने पड़े सैं। इन गरीब किसानां अर खेतिहरां ताहिं क्रेडिट (उधार) की उपलब्धता के बिना क्रेडिट कार्ड की व्यवस्था पूरे जोर शोर तै जारी सै। न्योंए वितरण प्रणाली के बिना राशन कार्ड बांटे जावण लागरे सैं। ईब ताहिं जो चीज म्हारे किसान बहुतायत मैं उपजाया करते उन चीजां का भी हम आज आयात करण लागरे सां। म्हारे गोदामां मैं करोड़ा टन अनाज न्योंए सड़ण लागरया सै पर देश की भूख मिटावणियां भूख तै मरण लागरे सैं। सोने पै सुहागा यो सै अक हम फेर बी इस अनाज का बहोतै रियायती दरां पै निर्यात करण लागरे सां। गिहूं अर चावल के निर्यातकां ताहिं हाल मैं 800 करोड़ रुपइयां तै फालतू की सब्सिडी हमनै दी सै। दूजे कान्हीं आये दिन 5000 बालक कुपोषण तै मरण लागरे सैं। खास बात या सै अक दुनिया भर के भूखे लोगां का एक तिहाई हिस्सा लगभग 84 करोड़ लोग म्हारे प्यारे भारत मैं रहवैं सैं।
1998 तै ईब ताहिं डीजल की कीमत दोगणी बधगी, यूरिया की कीमत 3,680 करोड़ प्रति टन तै बध कै 4,830 करोड़ रुपइये प्रति टन होगी, डी.ए.पी. की कीमत 8,300 रुपइये प्रति टन तै बधकै 9350 रुपइये प्रति टन होगी, एन.पी.के. के दाम 7,500 रुपइये प्रति टन तै बढ़कै 8,060 रुपइये प्रतिटन होंगे। 2000-2001 मैं कृषि क्षेत्र मैं बिजली की खपत 1721.8 करोड़ किलो वाट थी अर इसपै 27,000 करोड़ रुपइयां की सब्सिडी दी गई थी। नये अधिनियम के कारण या सब्सिडी खत्म कर दी जागी। 1991-1992 मैं किसानां ताहिं बिजली 12 पीस्से प्रति कि.वाट घंटे की दर तै दी जावै थी जो 2000-2001 मैं बधाकै 28.5 पीस्से प्रति कि.वाट घंटे कर दी गई। सब्सिडी हटाये पाछै कृषि क्षेत्र मैं बिजली का किराया कई गुणा बधैगा। इसतै पाणी खींचण आले 125.1 लाख पम्प सैटां पै असर पड़ैगा। दूसरे कान्ही उपज की कम कीमत मिलै सै किसान नै। 2002-03 मैं गिहूं का समर्थन न्यूनतम मूल्य 620 रुपये प्रति क्विंटल घोषित करया जबकि उत्तर प्रदेश के किसानों नै मात्र 530 रुपइये प्रति क्विंटल के दाम मिले थे। इस तरियां फसलां के भावां के चक्कर मैं आये साल किसानां नै 1,16,000 करोड़ रुपइयां का घाटा होवण लागरया सै। स्रोत: रिसर्च फाउंडेशन फॉर टेकनोलॉजी एंड इकोलॉजी।
रही सही कसर विश्व व्यापार संगठन की दाब मैं पूरी होगी। दुग्ध क्षेत्र तै नियन्त्रण हटा लिया गया। यो 10 हजार लीटर तै फालतू प्रसंस्कृत अर रख रखाव करण आली डेरियां पै लाइसैंस की बाध्यता खत्म करण तै अर उननै मिल्क शेड क्षेत्र मुहैय्या करवावण तै शुरू हुया। दूध की सहकारी संस्थावां नै इस नीति के चालते गम्भीर संकट झेलना पड़रया सै। दूजे कान्ही बहुराष्ट्रीय निगमां की डेरियां नै भारत के बाजार मैं पैर पसारने शुरू कर दिये। कृषि क्षेत्र में 1996 मैं आवंटित निधि 8 प्रतिशत थी जो ईब घट कै 5.2 प्रतिशत रैहगी। हाल मैं कृषि अर ग्रामीण क्षेत्र के विकास खातर ‘लोकनायक जयप्रकाश नारायण फंड’ जारी किया गया फेर बजट मैं इस फंड की खातर एक बी पीस्सा नहीं दिया गया। लालची बहुराष्ट्रीय निगम म्हारे प्राकृतिक संसाधनां पै नजर गाडरे सैं। नीम, बासमती, हल्दी, भारतीय गिहूं की किस्म आदि तै बने उत्पादां पै, पेटन्ट की कोशिशें इसका जीता जागता उदाहरण सैं।
हरियाणा के गामां का नजारा बी कमोबेश इसा ए सा सै। देखियो आगै के बणैगी? आई किमै समझ मैं? गेर रै पत्ता गेर, हमनै के लेणा इन बातां तै।
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