रविवार, 16 जुलाई 2017

कढ़िया

कढ़िया
म्हारे हरियाणा मैं ऊं तो लोग घणे भोले भाले सैं फेर अपणे दिमाग तैं कम सोचैं सैं अर ज्याहें करकै उननै कोए हो भका ले सै। सविता, कविता, नफे, सत्ते अर ताई धापां आज कट्ठे हुए तो बात चाल पड़ी इन गावड़ियां पै। नफे बोल्या इ सून्नी गावड़ियां नै तो नाक मैं दम कर दिया। थोड़ी घणी मटर बाई थी, बालकां की पढ़ाई का खरचा निकल जान्दा फेर सारी मटर पढ़ण बिठादी। सत्ते बोल्या - गावड़ी गावड़ी कैहन्ते थामनै शरम नहीं आन्ती। गऊ माता तो कहो बिचारियां नै। सविता बोली - पहलम अपणी खुद की मां नै तो माता कैहलें, इन गावड़ियों की पाछै देखी जागी। सत्ते बोल्या - इन्नै खेत मैं तै ताहवां अर एकाध लठ मारद्यां तो ये बजरंग दल आले ना बस्सण देन्ते। कहवैंगे हाय म्हारी गऊ माता कै मारे। फेर जिब ये गऊ माता भूखी तिस्सई बणी मां जिब पखाणा अर पोलीथीन खान्ती हांडैं सैं तो बेरा ना इनके चाहवण आले कड़ै चाले जावैं सैं। हां तो नफे उड़ै ले चालांगे सिसाने आली गऊशाला मैं। नफे बोल्या - रै मैं खुद का भाड़ा लाकै अर पांच गावड़ियां नै ले के गया उड़ै फेर नाटगे इननै राखण नै। न्यों बोले अक आच्छी बिच्छी गऊंआं के लागदार कोण्या हम। हम तो बीमार, लंगड़ी लूली बेसहारा गऊआं नै लिया करां। उन खातर जागां कोण्या राखण नै। थारी इन रानी गऊआं नै हम नहीं राख सकदे। मनै बहोत बात करी फेर कोण्या बात बणी अर उल्टा आणा पड़या। कविता - सत्ते झूठ तो ना बोलै सै?
गऊशाला नै बदनाम मतना करै। वे गऊआं नै गौशाला मैं क्यूं ना लेंगे? सत्ते भरया बैठया था एकदम बोल्या - जै मैं झूठ बोलूं सूं तो मनैं फांसी तोड़ दियो अर जै मेरी बात ठीक पाई तो थाम सारे अर यूं सारा गाम अर गुहांड के करैगा? सारे चुप। कोए कुछ ना बोलै। सत्ते फेर बोल्या - मेरै दो किल्ले तो धरती। उसमैं बोई औड़ खेती नै ये गऊ माता चरज्यां अर कै उजाड़ करज्यां। गौशाला आले इननै राख कै राज्जी ना। इननै कोए किमै कैहदे तो इन तिलकधारियां कै मरोड़ होज्यां। इनकी मरे औड़ा की खाल तारकै गुजारा करणियां के जीनै रोज साका रहवै। कोए तो ये खाप की पंचात कै ये समाज सुधार आंदोलन आले किमै तौ ध्यान देवैं।
नफे बी सत्ते की मजबूरी समझ कै बोल्या - सत्ते यू एकला तेरा सवाल नहीं सै यू तो पूरे गुहांड का सवाल सै अर इसपै बातचीत तो होणीए चाहिए। अर एक बात और सै ताई। ताई धापां बोली - तूं भी कैहले ईब तो अपणी बात। नफे बोल्या - जिब ये बड्डी-बड्डी कंपनी ट्रैक्टर ल्याई खेती मैं तो ट्रेक्टर आन्ता गया अर बुलध खेती मैं तै खतम होन्ता गया। अर जिब बुलध खेती मैं नहीं रहया तो गऊमाता क्यूंकर बचै थी? कविता बोली - नफे सिंह जी बात किमै समझ मैं कोण्या आई। माड़ी खोल कै बताओ। नफे सिंह बोल्या - ये ट्रेक्टर बणावण आली कंपनियां के मालिक सैं म्हारे बुलधां के अर गऊआं के हत्यारे। ट्रेक्टर खेती मैं आया तो बुलध गया अर गऊआं की या हालत होगी। इन ट्रेक्टर बणावण आली कंपनियां नै बजरंग दल आले कदे किमै बी कोण्या कैहन्ते इन गावड़िया के बारे मैं। सविता बोली - मनै इसा लागै सै जणो इस गऊमाता की पूंछ तो इननै म्हारे ताहिं पकड़ा दी अर ये सारे इसके चमड़े नै बेच कै, इसकी हाड्डियां नै बेच कै अर इसकी चर्बी नै बेच कै काच्चे काटैं सैं। ताई धापां बोली - सविता तेरी बात गड़बड़ लागी थोड़ी सी और खोल कै बता। सविता बोली - हम तो न्यूं मानां सां अक अक ये इनकी चमड़ी तारण आले इन गऊआं का चमड़ा तारकै पेट भरैं। फेर मनै तो पढ़या सै कि कई हजार करोड़ का गऊआं का चमड़ा अर बाछड़े का चमड़ा अर इनतै बणे औड़ जूते अर दूसरी चीजां का ब्यौपार हो सै भारत मैं अर इसतै बाहर भी जावैं सैं। अर इस सारे ब्यौपार के बड्डे हिस्से के मालिक हिंदू सैं। इस गऊमाता की माला बी जपैं अर इसके चमड़े अर हाड्डियां का ब्यौपार भी करैं। किसे नै कोए जवाब नहीं आया फेर सत्ते बोल्या - इन बातां का सही-सही राह तो काढ़ना पड़ैगा ना तो दुलीना, अलेवा कांड होन्ते रहवैंगे अर गऊ के नाम पै माणस मरते रहवैंगे। सत्ते नै रात नै सपना आया अर देख्या अक पूरे हरियाणा की न्यारी न्यारी खापां की पंचायत सिसाना मैं होवण लागरी सैं। अर उसमैं सत्ते पै कसूर लाया जा सै गऊमाता के अपमान का अर ‘कढ़िया’ का दंड दिया जा सै। सत्ते की आंख खुलज्या सै तो ज्यान मैं ज्यान आवै सै।
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