सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

आरक्षण तै नफरत क्यों ?


उच्च शिक्षण संस्थानां मैं पिछड़यां की खातर केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री अर्जुन संह की आरक्षण की घोषणा नै देश भर मैं तूफान सा ल्या दिया। यो तूफान समझ मैं आवण आली बात तो सै फेर इसके करकै सामाजिक वैमनस्य अर विभेद की जो परतें खुली सैं उनतै भविष्य की एक डरावनी अर भयानक तसवीर तो साहमी दिखाई दी सै। सवर्णां की ये अभिव्यक्तियां भारत के समाज के संघटन के प्रति घणी चिंता पैदा करण आली सैं। मेरे हिसाब तैं ये आण आले दिनां मैं के होगा भारत मैं उसका ट्रेलर तो जरूर सैं। या भी बात साफ होगी अक एक विभेदपरक सामाजिक संरचना मैं वंचितों नै आगै ल्यावण की कोए भी कार्यवाही निरापद नहीं हो सकती। जिननै ईब ताहिं इस समाज पै अपणा कब्जा जमा कै राख्या सै उनके पेट मैं दरद तो जरूर होवैगा। वर्ण व्यवस्था पै जिस हिन्दू समाज की नींव हो तो म्हारे बरगे तथाकथित ऊंची जाति के लोग इस आरक्षण नै क्यूकर गले तै नीचै तार सकैं सैं? मेरे हिसाब तै हम इन्हीं दलितां की वंचितां की मेहनत की कीचड़ मैं उगे औड़ कमल सां। देश की आबादी की 18 प्रतिशत ऊंची जातियां का आज भी 85 प्रतिशत सरकारी सेवावां पै कब्जा सै अर वे देश की 90 प्रतिशत संपत्ति की स्वामी सैं।
शहीदे आजम भगत सिंह नै तो फांसी तै पहलम जेल की मेहतरानी के हाथ की रोटी खावण की इच्छा जाहिर करी थी। उसका कहना था अक मेरी मां नै तो बचपन मैं मेरी गंदगी साफ करी थी परंतु या तो मेरे बड़े होवण पै भी मेरी गंदगी साफ करती रही सै इस करकै इसका दरजा मेरी मां तै भी ऊंचा सै। काश! हम भगत सिंह तै कुछ सीख ले पान्ते। इसे करकै निश्चित रूप तै इस प्रक्रिया मैं सामाजिक अन्तः संघर्ष अर द्वंद्व तो उभरैंगे। फेर बौद्धिक अर आधुनिक कहे जावण आले सवर्ण तबके की तरफ तै जिसी प्रतिक्रियाएं आवण लागरी सैं उनतै इसा लागै सै अक यथास्थिति नै तोड़ण की माड़ी सी कोशिश भी बहोत घणी बिचलनकारी सै। इस प्रसंग नै वीपी सिंह द्वारा मंडल कमीशन नै लागू करण के दस साल पहलम के उस बख्त की बहस फेर ताजा कर दी। इसे करकै इसके विरोधी इसनै मंडल-दो का भी नाम देवैं सैं। कई नए सवाल बी खड़े करे सैं। इन बहसां मैं प्रतिभा, योग्यता अर स्तर नै लेकै उठे कुछ बेमानी सवाल सैं जिनके पाछै कोए वैज्ञानिक तर्क नहीं सै। खास बात या सै अक ये सवाल और घणे जोर शोर तै ठाये जावण लागरे सैं। कोए बूझै रामायण किसनै लिखी? महाभारत किसनै लिखी? कबीर कौण था, रैदास कौन था?
एक शिकायत या बी करी जा सै अक सरकार नै प्रारंभिक शिक्षा का स्तर क्यूं नहीं सुधार्या? कितना बढ़िया होन्ता जै या शिकायत पूरे दमखंम की साथ दस-बीस साल पहलम ठाई जान्ती। न्यौ बी कहवैंगे अक ईब छुआछूत कड़ै सै? तो पूनम अर उसका पति इन खाप पंचातियां तै क्यों ल्हुकते हांडैं सैं? दस एमबीबीएस करैं औड़ सवर्ण डाक्टरनी 10 दलित डाक्टरां तै ब्याह तो करकै दिखावैं जै छुआछूत खत्म होगी सै तो। फेर न्यों कहवैं सैं अक आरक्षण आले घटिया डाक्टर बणैंगे। कोए बूझणिया हो इम्तिहान तो सार्यां खातर एकसा हो सै। इम्तिहान के नंबरां मैं आरक्षण कोन्या। तो जै घटिया डाक्टर कोए बनै सै तो वो तै इम्तिहान लेवणियां का कसूर हुया। बाकी इसमैं कोए शक नहीं अक सामाजिक न्याय का मामला गंभीर सै। बाबू जगजीवन राम नै एक मूर्ति का उद्घाटन कर्या था तो बाद मैं वा गंगा जल तै धोकै पवित्र करी गई थी। क्रीमी लेयर की बी बात खूबै आई सै। दलित के आरक्षण तै जो दो च्यार परसैंट लोग आये सैं वे भी जाते रहवैंगे। पिछड़ा वर्ग मैं या क्रीमी लेयर की बात थोड़ी बहोत सोची जा सकै सै। सवर्णां मैं कमजोर तबक्यां खातर बी आरक्षण की बात सोची जानी चाहिए। प्राइवेट कालेजां मैं अर प्राइवेट सेक्टर मैं बी आरक्षण की बात सोचनी चाहिये। पब्लिक सेक्टर मैं नौकरी बचीए कोन्या। एक बै एक डाक्टर अर एक इंजीनियर एक बस मैं सफर कैरैं थे। एक सीट पै बैठे थे। डाक्टर बोल्या यू शीशा बंद करदे मेरै जुखाम होर्या सै। इंजीनियर बोल्या - मैं तो खुल्या राखूंगा। मनै गर्मी लागै सै। दोनूं झगड़ पड़े। कंडक्टर आया अर बूझ्या के बात क्यूं झगड़ो सो? डाक्टर बोल्या - शीशे पै रोल्ला सै। यू कहवै सै खुल्या राख मैं कहूं सूं बंद करदे। तो कंडक्टर बोल्या - पहलम न्यों तो देखल्यो शीशा सै बी अक नहीं। शीशा कोन्या इस खिड़की मैं। कड़ै सैं नौकरी?
सौ का जोड़ यो सै अक केरल नै विधानसभा मैं एक बिल पास कर्या सै इस आरक्षण नै ले कै उस पै गौर कर्या जाना चाहिए। बख्त की नजाकत समझणा बहोत जरूरी सै।

छोरी डाक्टर बणैगी ?


सते, फत्ते, नफे, कविता, सविता, सरिता शनिवार के दिन शाम छह बजे फेर कट्ठे होगे। नफे आज बहोत खुश था। उसकी छोरी नै पी.एम.टी. टेस्ट मैं हरियाणा मैं बाहरवां स्थान लिया था। नफे बोल्या - म्हारी मेहनत रंग ल्याई। सरिता नै बीच मैं टोक दिया - थारी मेहनत रंग ल्याई अक पीस्सा रंग ल्याया? नफे सिंह नै एक बै तो गुस्सा आया फेर माड़ा-सा सीला होकै बोल्या - सरिता तेरा के मतलब सै? पीस्से दे कै पी.एम.टी. पास कर्या सै के मेरी छोरी नै? अपनी मेहनत तै पी.एम.टी. पास कर्या सै मेरी बेटी नै। सरिता बोली - बाहरमी मैं पूरे साल फिजिक्स, कैमिस्ट्री, बॉयलॉजी की ट्यूशन नहीं राखी तनै उसकी? कितने रुपइये म्हिना दिया करदा? जिब तो आकै रोया करदा अक 1200 रुपइये म्हिने के तो ट्यूशन मैं खर्च होज्यां सैं छोरी के। होस्टल के खर्चे नै रोया करदा। फेर दिल्ली तीन म्हिने की ट्रेनिंग लेकै आई चालीस हजार मैं। क्यूं मैं झूठ कैहरी सूं के? नफे धीमा-सा बोल्या - ना ये बात तो सारी ठीक सैं सरिता। मनै तो छोरी की पढ़ाई खातर एक लाख रुपइया दो रुपये सैकड़े के ब्याज पै ठाणा पड्या न्यादर क्यां कै तै। सरिता बोली - यू टैस्ट रोहतक मेडिकल का टैस्ट कोन्या। कविता बोली - हरियाणे मैं एकै तो मेडिकल सै फेर यो कूणसा टैस्ट था। सते बोल्या - यू प्राइवेट मेडिकल कालेजां का अर प्राइवेट डैंटल कालेजां का टैस्ट था। नफे सिंह बोल्या - ना भाई मैं तो मेडिकल रोहतक आला टैस्ट समझर्या था। सविता बोली - रोहतक का टैस्ट तो कई दिन पहलम हो लिया। मेरे मामा की छोरी नै दाखला मिल्या सै उसमैं। वे तो बहोत राज्जी होरे थे अक चौखा इस सरकारी मैं नंबर पड़ग्या प्राइवेट मैं भेज्जणा का तो म्हारा ब्योंत नहीं था।
फते नै बूझ लिया - क्यों प्राइवेट मैं भेज्जण मैं के दिक्कत मानै था तेरा मामा। सरिता बोली - रोहतक के सरकारी मेडिकल मैं तो एक साल की 18 हजार फीस सै। फते - प्राइवेट मैं कितनी सै? सरिता बोली - सही-सही तो मनै बेरा ना फेर इसतै कई गुणा फालतू बतावै सैं। कविता बोली - बालकां कै तो चूड़ी-चढ़ा राखी मैडिकल मैं दाखिले की खातर अर आपां नै न्यूं बी बेरा कोन्या अक उड़ै फीस कितनी लागै सै। सारे एक-दूसरे के मुंह कान्हीं देखैं अक मौलाना मैडिकल कालेज मैं फीस कितनी सै? दो-दो की टोली बनाकै चाल पड़े गाम मैं बेरा पाड़ण। जित-जित पढ़े-लिखे माणस थे सबतै बूझ कै देख्या। हैरानी की बात थी अक पूरे गाम मैं एक माणस नै बी बेरा कोन्या अक मौलाना मेडिकल मैं एमबीबीएस के बालकां की एक साल की कितनी फीस ली जावै सै। उल्टे आगे। नफे सिंह कै पस्सीने आगे अक बेटी नै मौलाना मैडिकल मैं दाखिला तो मिलग्या फेर उड़े की फीस बी पाटैगी अक नहीं? सते बोल्या - मेरे याड़ी का छोरा पढ़ै सै उड़ै उसतै बूझ कै देख ल्यां सां। नफे बोल्या - क्यूकर बूझैगा। सते नै टेलीफोन टोह्या अर मिलाया। धापां ताई के फोन पर तैं। बेरा लाग्या अक पहलम तो साल की फीस थी एक लाख बीस हजार फेर ईबकै होगी एक साल की तीन लाख एक छात्र की। नफे की आंख्यां आगै अंधेरा-सा छाग्या अर बोल्या - इसका मतलब 25000 रुपइये म्हिना तो फीस के सैं। बाकी खरचे रहेंगे वे न्यारे। सरिता बोली - एक साल के तीन लाख दो रुपइये सैकड़ा पै और उधार ले लेगा फेर छोरी डाक्टर बणाणी ए चाहिए। ऊठ लिये सारें। नफे नै सारी रात नींद नहीं आई। छोरी नै दाखला मिलग्या फेर फीस कोनी भरी। उल्टे आगे अर छोरी नै रोहतक मेडिकल मैं दाखिले खातर आगले साल की तैयारी ईबै तै करण का मन बनाया।
---

असल बैरी - साम्राज्यवाद


जित म्हारे देश मैं कुछ अमीर लोग सैं अर वे आड़े के गरीब लोगां का शोषण करैं सैं इस तरियां एक गरीब देश के रूप मैं म्हारे राष्ट्र का शोषण भी कुछ अमीर देशां द्वारा अर उनके नियंत्रण मैं काम करण आली संस्थावां द्वारा कसूते ढाल कराया जावण लागरया सै। धर्राटा ठा राख्या सै। बहोत से कारणां तै म्हारा भारत देश इन अमीर देशां व इनकी कटपुतली संस्थावां के कर्जे के जाल में फंस लिया सै अर इसे करकै म्हारी बांह बी कसूती ढाल मरोड़ी जावै सै। ज्यूकर गाम मैं ब्याज पै पीस्से देवनिया बीस ढाल की बेगार करावै अर जित चाहवै उड़ै वोट गिरावै न्योएं ये कर्ज देवण आले म्हारी आर्थिक अर विकास की नीतियां पै भी तरहां तरहां के दबाव बनावैं सैं। म्हारे देश मैं राज करणियां फेर न्यों कहवैंगे अक बांह कोन्या मरोड़ राखी म्हारी, हम तो अपने स्वामी रामदेव जी आला प्राणायाम कररे सां। वैश्वीकरण, सुधारीकरण, उदारीकरण अर निजीकरण के शगूफे म्हारी कष्टां की रामबाण दवाई म्हारले शासक बी बतावैं सैं। इन सुधारां की कोल्हड़ी सिर्फ भारत भारत मैं कोन्या चाली या ज्यादातर गरीब देशां मैं म्हारे तै बी पहलम चला ली। उड़ै इसनै माणसां की जो गत बनाई सै उसका हम सबनै बेरा सै फेर हम फेर बी न्योएं कहवां सा अक याहे रामबाण दवाई सै गरीबी दूर करण की। इस वैश्वीकरण अर निजीकरण की थोथ म्हारे सबकै साहमी आली अर रही सही कसर और पांच सात साल मैं पूरी हो लेगी। सच्चाई अर कड़वी सच्चाई या सै अक गरीबी अर बेरोज़गारी दूर करण की खातर या बात लगाकर साफ होन्ती जावै सै अक साम्राज्यवादी शोषण का विरोध हो। इसमैं सबतै बड्डी दिक्कत या सै अक साम्राज्यवादी देशां के धोरै ए सबतै घातक हथियार अर फौज की ताकत भी सै। सीधी-सीधी टक्कर का मतलब साफ सै के बगैनी म्हारी गेल्यां। प्रतिरोध के म्हारे तरीके के हों? यक्ष प्रश्न सै यो।
पहलम तै भारत मैं एक ईस्ट इंडिया कंपनी आयी थी अर सहज सहज दिल्ली की गद्दी पै कब्जा कर लिया। ईब तो हजारां बदेशी कंपनी छागी भारत मैं। सीधे गामां ताहिं पहोंच बना ली। वैश्वीकरण अर निजीकरण की नीतियां का विरोध जीवन मरण का सवाल होग्या भारत के किसान की खातर अर कर्मचारी की खातर। एक ढाल का प्रतिरोध जो सोच्या जा सकै सै वो सै अक आपां लोगां के बीच मैं जमकै प्रचार करां अक वे बदेशी कंपनियां का सामान ना खरीदैं। दाल मशाले युवक युवती तैयार करैं अर स्वदेशी का साथ मैं प्रचार करैं। गीत गावैं नाटक दिखावैं, घर-घर अलख जगावैं। अमरीका की दादागिरी खोल कै दिखावैं। इस ढाल एक तीर तै कई निशाने पै आज्यांगे। म्हारे नौजवान अपनी सामाजिक सार्थक भूमिका निभाज्यांगे।
युवा लड़के लड़कियां नै दहेज का डटकै विरोध करना चाहिये। ब्याह पाछै दहेज करकै जै पत्नी पै कोए अत्याचार होवै सै तो उसका मजबूती से विरोध करना बहोत जरूरी है। परिवार मैं, आस पड़ौस मैं समाज मैं किते बी लिंग के आधार पै भेदभाव होवै सै तो इसनै रोकण का जतन जरूर करना चाहिये। खाप की स्वयंभू पंचायतां के दकियानूसी फैंसल्यां का विरोध करे बिना म्हारा गुजारा कोन्या। म्हारे संविधान नै ब्याह शादियां के जो कानून बनाये सैं उनके हिसाब तै ब्याह शादियां ताहिं सामाजिक मान्यता मिलनी चाहिये। स्वयंभू पंचायतां नै समानान्तर न्याय प्रणाली चलावण का कोए हक नहीं सै अर यू गैर कानूनी सै। हरियाणा मैं लोगां की पिछड़ी सोच का फायदा ये स्वयंभू पंचायत ठायें जावैं सैं। आपां मूकदर्शक बनकै इनकी गेल्यां शामिल होकै समाज मैं न्याय की साथ खड़े होवण की जागां अन्याय के साथ खड़े हो ज्यावां सां। म्हारी सेहत के बारे मैं जानकारी की कमी करकै अर कई डाक्टरां अर दवा कंपनियां की मिलीभगत के कारण म्हारी अज्ञानता का अनुचित फायदा ठाया जावै सै अर म्हारे दुख दरद बढ़ ज्यां सैं। इसकी बाबत जागरूकता अभियान अर जित संभव हो चिकित्सा उपलब्ध करवाना भी बहुत सार्थक सामाजिक काम सै। इसे तरियां अनपढ़ लोगां नै पढ़ावण का काम भी सार्थक काम सै अर इसकी गेल्यां जागरूकता का काम भी जुड़ ज्यावै तो सोने पै सुहागा। शिक्षा में नीतियां के स्तर पै मौजूद विसंगतियां का विरोध अर सुधार की खोज बहुत महत्वपूर्ण काम सै समाज सुधार का।
जड़ बात या सै अक समाज नै रसातल मैं जावण तै बचावन की खातर एक नये नव जागरण रूपी समाज सुधार आंदोलन की जरूरत सै जिसमैं महिलावां की, दलितां की अर नौजवान लड़के लड़कियां की बहोत महत्वपूर्ण भूमिका सै। हरियाणा मैं यू काम कितै कितै सै अर रफ्तार बड़ी धीमी सै। इसकी पहचान करना युवा वर्ग का पहला काम सै। सामाजिक क्षेत्र के सवालां पै साफ समझ बनाकै आगे बढ़ना पड़ैगा। खेती की दुनिया मैं आई खड़ौत अर कम पैदावार के कारण टोहवने पड़ैंगे। समझाना पड़ैगा किसानां ताहिं अक आत्महत्या नहीं, आत्म बचाव का आंदोलन खड्या करना पड़ैगा। साम्प्रदायिक ताकत म्हारी एकता नै तोड़न आवैंगी बार बार फेर उनतै खबरदार रहना बहोत जरूरी काम सै।
---

राम की जागां रामदेव!


सत्ते, फत्ते, कविता, सविता, कमला, भरपाई, नफे सिंह आज भरपाई की बैठक में शनिवार को इकट्ठे हो गये। सविता ने पूछा - सत्ते कई दिन से दिखाई नहीं दिये थे। कहीं गये थे क्या? कमला - हां, सत्ते रामदेव जी के यहां देहरादून एक हफ्ता लगाकर आये सैं। फत्ते - हां रामदेव जी का चारों कान्ही कसूता रूक्का पड़र्या सै। ईब तो जो लोग राम अर अयोध्या नै कान्धै धरकै हांड्या करते वे रामदेव जी नै कान्धै धरै हांडते दीखैं सैं। कमला - मनै पूरे गाम मैं नज़र मारकै देखी थी। गिनती के सात-आठ लोग-लुगाई योग करते पाये। सत्ते - म्हारे गाम की कुल आबादी कितनी सै? फत्ते - होगी साढ़े छह हजार तो। नफे सिंह - तीन हजार छह सौ वोट तो पाछली बरियां पड़ी थी गाम मैं। पाच हजार तो होगी आबादी जरूर। सबनै अपना-अपना अंदाजा बताया फेर सही-सही आंकड़ा किसै धोरै भी कोनी पाया। मान लिया कम तै कम आबादी पांच हजार बी सै तो सात-आठ लोगां ताहिं यो योग पहोंच्या सै। कमला - टीवी पै तो इसा लागै सै अक जणो सारा भारत देश रामदेव जी का भगत होर्या सै। म्हारे हरियाणा मैं सात हजार के लगभग गाम बताये। तो हरियाणा के गामां के 56000 लोग तो रामदेव जी का योग उपयोग मैं ल्यावणै लागरे सैं। सविता - गामां मैं कम असर सै ये तो शहरां आले घणे बावले हुये हाण्डैं सैं इसकै पीछे। ब्लॅड प्रेसर, शूगर, मानसिक तनाव, पेट फूलने की बीमारी ये सब शहर मैं रहने वालों को ज्यादा हावैं सैं। हां तो बात तो उड़ै तै चाली थी अक सत्ते रामदेव के गढ़ मैं रैहकै आया सै किमै विस्तार मैं बतावै म्हारे ताहिं। सत्ते बोल्या - मैं तो देख के हैरान रैहग्या बाबा जी अर उनका अरबां का दिव्य योग ट्रस्ट साम्राज्य।
कविता बोली - यू रामदेव तो म्हारले आचार्य बलदेव का चेला बताया। फेर मेरै कम जंचै सै या बात। सविता - क्यूं घाट क्यूं? कविता - और के आचार्य बलदेव तो योग कोनी सिखात्ता। हो सकै सै उसनै आत्ते ए ना हों योग करने तो फेर वो रामदेव का गुरु क्यूकर होग्या। फत्ते - या कविता एक और राग लेकै बैठगी। कई बर चेले गुरु के सिर पर कै हाथ फेरनियां होज्या सैं। हां भाई सत्ते। तूं किमै बतावै था। सत्ते बतावण लाग्या - उड़ै चर्चा थी अक साल भर पहलम आचार्य कर्मबीर ने 6 दिन ताहिं अन्न-जल त्याग दिया था। उसकी शिकायत थी अक रामदेव नै अपने भाई रामभरत ताहिं भैरों मंदिर कालोनी कनखल मैं 25 लाख रुपइये की जायदाद खरीद कै दी सै। इस ट्रस्ट के पीस्से का इस्तेमाल निजी काम की खातर कर्या गया। कविता बोली - या बी किमै बात सै। गैहटे का बुलध तो गैहटे मैं ए खावैगा। न्यों बताओ ओ बुलध कित जावैगा? ट्रस्ट रामदेव का, कमाई रामदेव की। ओ जिसनै चाहवै उसनै देवै। थारै क्यूं पेट मैं दरद होर्या सै।
सविता ने बीच में टोक दिया - ट्रस्ट के नाम पर पैसे इकट्ठे करके कोई अपने भाई को क्यूंकर दे सकै सै? सत्ते बोल्या - आचार्य कर्मबीर को मनै टोहण की कोशिश करी उड़ै अक उसे धोरै बूझल्यूं फेर वे उड़ै पाया ए कोनी। सविता बोली - सत्ते तूं न्यूं बता अक तूं रामदेव कान्हीं सै अक कर्मबीर कान्हीं? सत्ते बोल्या - दिल तो मेरा सै रामदेव कान्हीं फेर दिमाग कई बर कर्मबीर कान्हीं खड़या पावै सै। हां, एक बात का चरचा और था उड़ै। बाबा रामदेव का दूसरा सहयोगी सै ना ओ, के नाम सै उसका, हां ओ आचार्य बालकृष्ण पर नेपाल के विराट नगर मैं ढाई करोड़ की संपत्ति खरीदण अर अपने भाई ब्रह्मदत्त शास्त्री ताहिं मेरठ मैं लाखां रुपइये की संपत्ति खरीदवावन का आरोप सै। या बात न्यों कहवैं थे अक बालकृष्ण नै भी मानी सै अक नेपाल में उसका घर बन्या सै फेर ट्रस्ट के पीस्यां तै कोन्या बण्या। सविता बूझ बैठी - तो फेर या तो बात साफ होनी ए चाहिये अक वो किसके पीस्यां तै बण्या। फत्ते बोल्या - गोरखपुर मैं बाबा रामदेव का योग का 7 दिन का प्रोग्राम करवावनिया मेरा दोस्त सै। ओ बतावै अक 7 दिन का ठेका पच्चास लाख का था। एक करोड़ की टिकट बिकी थीं। दस लाख खरच होगे अर चालीस लाख का फायदा होग्या। सविता - सुण्या सै उस कैम्प मैं आम आदमी ताहिं जावण की इजाजत नहीं थी। ढाई सौ तै तले की टिकटै ना थी। फत्ते - हां सबतै फालतू टिकट उननै ढाई हजार की छपवाई थी। ढाई सौ आली तो 100-दो सो टिकट थी दिखावण ताहिं। सविता - या बात तो गल्त सै, स्वामी रामदेव नै योग बी बेचना शुरू कर दिया।
म्हारे पूर्वज नै के योग की खोज इस खातर करी थी अक इस योग का कोए ब्यौपार करै। फत्ते बोल्या - स्वामी रामदेव नै योग फेर उभार दिया या के थोड़ी बात सै। सविता बोली - या बात तो सही सै पर यू बेचणा बी तो शुरू कर दिया, या बात तो गलत सै। ये कैम्प तो ‘आशा बाबू’ हर की ढालां कमाई का धन्धा होगे। फत्ते बोल्या - टीवी पै लाखां लोगों नै मुफ्त मैं दिखावण लागर्या। सविता बोली - चैनल मुफ्त मैं देवैं सै के रामदेव की ताहिं इतना बख्त। आस्था चैनल की विज्ञापनां की कमाई का हिसाब बूझ कै देख्या सै के कदे। चैनल तो मालामाल होग्या रामदेव करकै। फत्ते फेर बोल्या - फेर इसमैं रामदेव के कर सकै सै। कमला ईब ताहिं चुपचाप बैठी थी, वा बोली - मनै एक बात और सुनी सै अक रामदेव बदेशी कंपनियां पै बहोत छोह मैं आवै सै।
सत्ते बोल्या - कसूता देशभगत सै इस मामले मैं रामदेव। पूरा देशी सै देशी। सविता बोली - देशी तो सै फेर मोडरन देशी सै। पहलम आले देसी पीर-पैगम्बर तो मरीज का इलाज मुफ्त मैं कर्या करदे। पीस्से कोन्या लिया करदे इलाज के। म्हारे वैद जी के बारे मैं मशहूर था अक पीस्से नहीं लेत्ता। कमला बोली - आज तो चाट का जमाना है। बिना चाट सान्नी मैं मिलाये तो भैंस बी दूध कोन्या देती, तो इसमैं रामदेव जी का के कसूर?
---

साम्प्रदायिकता - इसतै बचकै


म्हारे देश मैं न्यारे न्यारे धर्मां नै मान्नण आले लोग रहवैं सैं। म्हारी पुरानी सांझी विरासत बहोत मजबूत रही सै। फेर अंग्रेजां नै मजबूती तैं अपना राज चलावण की खातर म्हारी इस सांझी विरासत गेल्यां खूबै छेड़छाड़ करी अर हम भी साम्प्रदायिकता की आन्धी मैं बहते चले गये। आज फेर हटकै इन अलग-अलग धर्मां के लोगां के बीच की एकता नै तोड़ण के लगातार षड्यन्त्र रचे जावैं सैं। मंदिर-मस्जिद के झगड़यां मैं लोगां नै उलझावण के खेल खेल्ले जावैं सैं। इसे माहौल मैं सब धर्मां मैं एकता बनाए राखण का काम भी एक सार्थक सामाजिक काम सै। साम्प्रदायिक सद्भावना, सहनशीलता अर भाईचारे की भावना का प्रचार-प्रसार करना बहोत जरूरी होग्या। यकीनन इस सूची मैं घणे ए काम जोड़े जा सकैं सैं। आड़ै एक बात साफ करना और बी जरूरी सै अक जड़ै एक सार्थक काम नै निभावण आले लोग जै दूसरे उतने ए सार्थक कै उसतै भी सार्थक काम का विरोध करैं तो इसे लोगां तै दूर रहना बढ़िया सै। आज के दिन म्हारे समाज मैं कई इसे लोग पाज्यांगे जो अश्लीलता का विरोध करण का काम कै स्वास्थ्य के नियमां नै लोगां तक फैलावण का काम वे अपनी छवि बणावण खातर अर प्रसिद्धि लेवण खातर करैं सैं। फेर जिस काम नै वे बहोत जोर लाकै करैं सैं वो सै भारतीय सभ्यता अर संस्कृति के दो भाइयां मैं - हिन्दुआं अर मुसलमानां मैं अविश्वास अर अशान्ति फैलावण का घृणित काम। इसे संकीर्ण सोच आले लोग जो बाहरी तौर पै व्यायाम का काम, राहत का काम अर बदेशी कंपनियां के खिलाफ बोलण का काम करैं सैं उनमैं हमने घणी सार्थकता इस करकै नजर नहीं आती अक जो थोड़ा-बहोत दुःख-दरद वे इन कामां नै करकै दूर करैं सैं उसतै घणा फालतू दुःख-दर्द वे साम्प्रदायिक प्रचार द्वारा फैलावैं सैं। जै हम इसे लोगां की साथ रलकै काम करांगे तो हम समाज का दुख-दर्द दूर नहीं करांगे बल्कि इसनै और बढ़ा द्यांगे। इस करकै या तो गांठ बांध लेनी चाहिए अक इसे माणसां गेल्यां मिलकै सार्थक काम हम नहीं कर पावांगे, इनतै दूर रह कै ए हम किमै ढंग का सार्थक काम कर सकां सैं।
साम्प्रदायिकता फैलावण आले संगठन (ज्यूकर हिन्दु, मुस्लिम आदि विभिन्न धर्मों के साम्प्रदायक संगठन) अर संकीर्ण जातिवाद फैलावण आले संगठन (ज्यूकर जाट महासभा, ब्राह्मण महासभा, वैश्य सभा, यादव सभा, सैनी सभा) आदि इसी श्रेणी मैं आवैं सैं, इनते बचना चाहिए। फेर जो संगठन किसे जाति मैं सुधार ल्यावण खातर बनाए जावैं सै कै उस जाति के लोगां ने किसे ऊंचे सार्थक सामाजिक काम की खातर संगठित करैं सै ज्यूकर छुआछूत की समस्या हटावण की खातर कै कमजोर वर्ग के तबक्यां की समस्यावां पै ध्यान खींचण खातर उनमैं काम करते हुए हमनै कोए परहेज नहीं होना चाहिए। हमारे आदर्श का बेहतर निर्वाह किसा काम करे तै होगा इसतै बी महत्वपूर्ण सवाल सै अक कितने युवक-युवतियां सामाजिक बदलाव के काम की खातर आगै आवण नै तैयार सैं। नेपाल मैं टीवी पै देख्या होगा जवान लड़के लड़कियां बहोत घणे शामिल होरे थे। इस बात तै कति इन्कार नहीं करया जा सकदा अक म्हारे समाज पै अन्ध उपभोक्तावाद बुरी तरियां छारया सै। म्हारे जीवन स्तर नै लगातार फालतू तै फालतू खर्चीला बनाणे, ढाल ढाल की आधुनिक सुख-सुविधाएं जुटाने को ही जीवन का एकमात्र ध्येय मान्या जावै सै।
‘ऊपर की कमाई’ जरूरी होगी। ऊपर तै टेलीविजन अर दूसरे प्रसार माध्यमां अर विज्ञापनां के माध्यम तै इस उपभोक्तावाद का जाल बुन्या जावण लागरया सै। इसके साथ ही साथ सैक्स अर हिंसा के अधिक प्रदर्शन द्वारा भी युवा वर्ग का ध्यान आदर्शां की तरफ तै हटा कै विपरीत दिशा मैं लगाया जावै सै। जिस ढाल की टीवी पै फिल्मां की भरमार होरी हो सै, उत्तेजक संगीत की दे मार कर राखी सै, उसतै तो योहे लागै सै अक युवा वर्ग ताहिं इस अन्ध उपभोक्तावाद अर उत्तेजक घटिया मनोरंजन के संकीर्ण दायरे मैं जकड़न की साजिश करी जारी सै। या बात साफ तौर पै समझण की सै अक जो युवक-युवतियां सामाजिक बदलाव मैं सार्थक योगदान देना चाहवैं सैं, उनने इस अन्ध उपभोक्तावाद अर उत्तेजक घटिया मनोरंजन के दुष्चक्र तै बाहर आवणा पड़ैगा। सादगी का जीवन अपनाना पड़ैगा।
सादगी का मतलब नीरसता कति नहीं सै। सादे अर सस्ते कपड़े भी बहोत सुरूचिपूर्ण हो सकैं सैं। स्वास्थ्य के नियमों मैं ढला शरीर हो और इसमैं सत्कार्य करने की मुस्कान हो तै इसे चेहरे की खूबसूरती का मुकाबला फिल्मी सितारे कै तारिकायें बी कोन्या कर सकदे। सादगी का दूसरे अर्थां मैं मतलब अक हमनै अंध उपभोक्तावाद का रास्ता त्याग कै इसकी जागां पै कम तै कम उपभोग की चीजां तै काम चलावण की सोच की राही पाक्कड़ ली सै। कम खर्च मैं ए जिन्दगी मैं खूबसूरती पैदा करैं असली मजा तो इसे बात मैं सै। एक खास बात और सै अक जिब सादगी का जीवन अपनावां तो जित ताहिं हो सकै अपने परिवार नै भी इसमैं शामिल जरूर करां। माता-पिता की सेवा करना युवा वर्ग का फर्ज सै। फेर म्हारे आदर्शवादी युवक-युवतियां खातर यो जिबै तो संभव होवैगा जिब माता-पिता की सोच भी सादगी के जीवन के अनुरूप होवैगी। जै मां-बाप मैं अन्ध उपभोक्तावाद की सोच बनी रही अर वे अपने बेटा-बेटी तै इसकै अनुकूल अपेक्षा करते रहे तो मुश्किल हो ज्यागी। जिन्दगी मैं जरूरी बात पीस्सा कोन्या अर ये सुख-सुविधाएं कोन्या, म्हारे आपसी संबंध अर दुख-दरद बांटना ए जरूरी काम सै। इस बात की छाप युवक-युवतियां अपने परिवार मैं अपने आस-पड़ोस मैं अपने सेवा भाव तै छोड़ सकैं सैं।

अधिकार


महिलावां के अधिकारां की बात करां तो साफ-साफ बात साहमी आ जावै सै अक इनके समाज मैं दोयम दरजे के अधिकार सैं। जायदाद मैं अधिकार भी कहवण नै तो न्यों कहया जावै सै अक पीहर अर सासरे मैं दोनूं जगां सै। फेर पीहर मैं धरती छोरी भाइयां के नाम तरवा देवै सै। जो एकाध ना तरवावै तो उसनै मार दें सैं। उसकी गेल्यां समाज बहिष्कारी बरगा व्यवहार किया जावै सै। सासरे मैं जायदाद मैं अधिकार जिब सै जिब उसका पति मर ज्यावै। इसका मतलब वा पहलम तो या माला फेरै अक पति जी का स्वर्गवास तावला सा हो ताकि जायदाद मैं मेरा बी हिस्सा हो सकै। कौन महिला सै जो चाहवैगी अपने पति की मौत? अर एक खास बात और सै। कई बर उसके पीहर मैं हिस्से के खिलाफ म्हारे नेतावां नै अर इन खाप के चौधरियां नै कानून पास करवावण की बी कोशिश करली। यो सै म्हारा महिला सशक्तीकरण का असली चेहरा। ये सैं नंबर वन हरियाणा मैं नंबर वन महिला के अधिकार। फेर एक बात और आई मेरे दिमाग मैं अक जो पीहर मैं जायदाद का अधिकार नहीं रहया महिला का तो वा महिला कित जावैगी जो शादी नहीं करवाना चाहती।
एक होनहार छोरी सै। रिसर्च करना चाहवै सै। ब्याह शादी कोन्या करवाना चाहती तो उसका जायदाद मैं हक कड़ै बचैगा? आजकाल तो बिना ब्याह शादी के ‘लिव इन कप्पल’ बहोत बढ़ते जावण लागरे सैं तो उस छोरी का अधिकार कित मिलैगा - पीहर मैं अक उस तथाकथित सासरे मैं? इसतै एक बात साफ उभर कै आवै सै अक महिला का जायदाद मैं अधिकार इबै नंबर दो का सै। म्हारी परंपरावां की दुहाई दैकै आपां इसनै दोयम दर्जे का ए राखना चाहवैं सैं। एक बात याद आगी इसे बात पर। एक फकीर था गाम मैं। एक दिन फकीर को एक नई-नई आई बहू नै भिक्षा देवण तै इनकार कर दिया। फकीर बी पुराने फकीर कोन्या रैहरे। फकीर बिगड़ग्या। खूब लाल पीला होग्या। गाल मां कै बड़बड़ान्ता चाल पड़या। थोड़ी सी दूर गया था अक राह मैं फकीर नै उस बहू की सासू फेटगी। बस के था। भरया पड़या था फकीर। देखते की साथ बोल्या - तुम्हारी बहू की या मजाल अक वा फकीर नै भिक्षा देवण तै मना कर दे। के मेरे बरगा फकीर मुट्ठी भर आट्टे अर रोटी के एक टुकड़े तै भी गया गुजरा सै। सिर पै बिठा राखी सैं थामने ये बहू। के जमाना आग्या। घर-घर मैं बहुएं करता-धरता होगी। बड़े छोटे का कोए लिहाजै नहीं बच्या। फकीर की बात सुणकै सासू का पारा सातमे आसमान पर चढ़ग्या। सासू बोली - फकीर जी बहोत गल्त करया बहू नै। यो क्यूकर कर दिया? उसकी इतनी औकात कद तै होगी? थाम चालो मेरी साथ। फकीर कै माड़ी आस बंधी अक ले बणैगी किमै बात। सासू के सिर पै लकड़ियां का गट्ठर उसनै अपने सिर पै ले लिया। सास्सू नै रास्तेभर बहू को पानी पी-पीकर कोस्या। खूब गालियां दी। उसकी सात पुश्तों तक को नहीं छोड्या। घर पहौंचते की साथ वह उससे लकड़ियों का गट्ठर लेकै भीतर गई अर बहू ऊपर बरस पड़ी। उसकी बहोत लानत-मानत की। जी भरकै खरी खोटी सुनाई। बोली - तेरी या जुर्रत अक तूं घर आये संत नै भिक्षा देवण तै मना करदे। फकीर नै सोच्या - आज उसके पौ बारा होगे। कई दिनां तक भिक्षा नहीं मांगनी पड़ै। आखिर मैं सासू नै बहू तै फारिग होकै फकीर की सुध ली। बाहर आकै बोली - मेरे जीवन्ते जी मना करण आली वा कौण सै? मना करूंगी तो मैं मना करूंगी। जाओ दफा हो आड़े तै। कोई भिक्षा-दिक्षा नहीं है। बड़ी आयी मेरे रहते मना करने वाली। नवाबजादी कहीं की। फकीर चाल पड़या माड़ा सा मुंह लेकै। इस सारी बात मैं बात या सै अक बहू नै कोए अधिकार नहीं। भिक्षा देवण का भी अधिकार नहीं। म्हारी परंपरावां मैं सासू अर ननद को इस बात की खातिर तैयार करया जावै सै अक वे बहू नै ठोक पीट कै हिसाब सर राखैं। पितृ सत्तामक ढांचे मैं मुखिया द्वारा ये पावर डेलीगेट कर राखी सैं साहू अर नन्द ताहिं। आई किमैं समझ मैं अक ईब्बी न्यों कहवोगे अक औरत औरत की दुश्मन हो सै। या सही बात कोन्या। सोचो दिमाग पै जोर देकै।
---

खाप और महिला


पितृसत्ता महिला, पुरुष के जीवन पर गहरी छाप छोड़ती है और इन दोनों को तयशुदा भूमिका मैं फिट कर देती है। कसूती तरियां ढाल देती है महिलाओं को। एक व्यक्ति के रूप में महिला पुरुष अपने लिए कौनसा और कैसा जीवन चुनैं, किसे कामों को पसन्द करैं और आपस मैं किसा रिश्ता पसन्द करैं हरियाणा के समाज मैं इसकी कोए गुंजाइश नहीं है। पितृसत्ता के द्वारा रच्या गया सारा माहौल महिलावां पै ढाल-ढाल के रंग की हिंसा नै बढ़ावा देवै है। इस माहौल नै ठीक करना बहोत जरूरी है ना कि इसको और बिगाड़ दें हम। यो खराब माहौल क्यूकर ठीक कर्या जा सकै सै यो विचार करने का गम्भीर मामला है।
फेर एक बात सही सै अक अपनी मरजी तै ब्याह करने वालों की हत्या करने वालों को सम्मानित करना समस्या का समाधान तो किसी भी सभ्य समाज में नहीं बताया जा सकता। एक खास बात और सै अक इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था मैं सिर्फ महिला ही नहीं पुरुष बी पीड़ित हैं। इस करकै या माहौल ठीक करना, पितृसत्ता को चुनौती देना दोनूआं के हक मैं है। इस करकै पितृसत्ता को चुनौती देना, इसनै झकझोरना अर आखिर मैं इसको ढाह कर जनतांत्रिक प्रणाली कायम करना बहोत जरूरी है ताकि महिला पुरुष समानता आले समाज की स्थापना की तरफ कदम बढ़ाये जा सकैं, संघर्ष मिलजुल कै कर्या जा सकै। स्वभाविक है कि इन हालातां मैं महिलाएं अर पुरुष अपनी-अपनी धार्मिक परम्परावां मैं जात के रीति रिवाजां मैं अर कायदे कानूनां मैं घिरते जान लागरे सैं और हम सबकी एक इन्सान की छवि और घणी खराब होवण लागरी सै।
संविधान मैं दिये गये म्हारे ज्यादातर नागरिक अधिकार कागजी सैं। ये अधिकार हरियाणा के 80 प्रतिशत से भी फालतू परिवारां मैं परिवार की दहलीज लांघ कर अन्दर नहीं घुस पाये। इसका श्रेय म्हारे हरियाणा की खाप पंचायतों को और म्हारे दकियानूसी विचारों को जाता है। इस मामले मैं हरियाणा नम्बर वन सै। इंदौर की शाहबानों का केस, मुजफ्फरनगर की इमराना का केस, जौन्धी, आसन्डा, नयाबास, लिस्ट बहोत लाम्बी सै। कानून इनके हक मैं होते हुए इनको इनके हक नहीं मिले। संघर्ष करना पड़रया सै।
इन बातां नै महिलावां के साहमी एक बात तो साफ करदी अक उनके हक मिलना इन धर्मों, जात गोत अर खाप पंचायतां के रहमोकरम पर है नाकि म्हारे देश के कानून पर। शाहबानों अर सोनिया हर के केस तै महिलावां की अपने वजूद की लड़ाई की इच्छाशक्ति साहमी आई सै। एक बात और साफ होगी अक महिलावां पर और युवा लड़कियां पर होवण आली हिंसा अर महिलावां की घटती हुई संख्या को ठीक करना है तो महिला को संघर्ष करने का बीड़ा उठाना पड़ैगा।
जैविक लिंगभेद से सामाजिक लिंगभेद तक पहुंचने के इतिहास और सामाजिक सांस्कृतिक आधारां नै समझ कर ही हम इस मुद्दे पर कुछ ठोस काम सोच अर कर सकां सां। मानव विरोधी, महिला विरोधी, दलित विरोधी, युवा विरोधी, गरीब विरोधी इतिहास को बदलने अर उसकी जागां समता के मानवीय मूल्यों को हटकै स्थापित करने की बहोत जरूरत है। समाज मैं आये बिगाड़ को ठीक करने का हथियार खाप के ये फतवे नहीं हो सकदे। इसपै बैठ के विचार करना पड़ैगा। दिमाग पर जोर देकै विचार करने तै परहेज छोड़ना पड़ैगा। आई किमै समझ मैं! महिला और पुरुष दोनूआं की लामबन्दी जरूरी सै, इस समाज मैं आये बिगाड़ को ठीक करने की खातर। इसनै ठीक करने के बी कई नुस्खे लेकर घूमैं सैं म्हारे बरगे। मूलभूत समाज सुधार बिना काम कोन्या चालै। इसपै फेर कदे सही।

दो किल्ले आले मरगे


कमलू कै दो किल्ले धरती। वा भी चार जागां आधा-आधा किल्ला। पहलम तो खाद गेर कै बीज नये गेर कै अर कीटनाशक का इस्तेमाल करकै फसल ठीक ठ्याक हो ज्या थी। फेर जै लागत लाकै देखता तो उसनै लागता किमै घाटे मैं ऐ रह्या सै। बुलध बेचने पड़गे। ट्रैक्टर ल्यावण का ब्योंत नहीं। पाणी का चौआ घणी नीचै चल्या गया। ट्यूबवैल का खरचा ठावण का भी ब्योंत कोनी रह्या। थ्रैसर तै गिहूं काढण का जमाणा आग्या। थ्रैसर बी क्यूकर ल्यावै। इन तीनों चीजां नै किराये पै लेकै खेती करना आसान कोन्या रह्या। कमलू नै देख्या अक पाछले आठ-दस सालां मैं गामां तै गिद्ध खत्म होगे। क्यों खत्म होगे? किसे की कोए चिंता नहीं। कई बर मोर मरे पाये जावैं सैं। कोए चिंता नहीं। एक जोहड़ का पाणी तो कती काला होग्या। होग्या तो हो ज्याओ हमनै के पड़ी।
सहज-सहज देख्या कमलू नै अक धरती मैं फसल पैदा करण की ताकत कम होन्ती चली गई। खेती टोटे का सौदा होगी। एक किल्ला उसका थलियां कान्हीं पड़ै था। उड़े कै नैशनल हाईवे का लिंक रोड काढ़ दिया सरकार नै। कमलू का आधा किल्ला एक जागां अर आधा किल्ला दूसरी जागां एक्वायर होग्या। उसके बीस लाख रुपइये मिलगे। कमलू तो मींह बरगी बाट देखै था धरती बिकण की। इस बीस लाख का ईब के करै? सोच्ची कितै और जमीन लेल्यूं तो आसपास तो भाए ना बचरे। सिरसा मैं ली सै जमीन उनके पड़ौस के गाम आल्यां नै। उड़ै सूत थ्यागी उनकै। फेर कमलू कै तो एक छोरा दो छोरी सैं। छोरा सोफ्टवेयर इंजीनियर लाग्या सै छह म्हीने तै। छोरी ब्याह थ्याह दी। गाम छोड़ कै सिरसा जाणा पड़ै। कुछ नै कांशीपुर (नैनीताल) मैं ले ली धरती। उड़ै बी दो एक किल्ले मिलै थी इतने पीस्यां मैं। फेर सोची अक खरखौदे मैं कोए दुकान ले ले। तो दुकानां के भा बी पहोंच तै बाहर पाये। खरखौदे मैं प्लाट लेकै मकान बनाने की सोची तो उड़ै 500 गज का प्लाट पांच हजार रुपइये गज पाया।
हार कै कमलू नै तो गाम आले मकान का ऐ कायाकल्प कर दिया। अर एक ले आया कार। कमलू के ठाठ देख कै रमलू नै भी चिंता होई। उसका किल्ला ईब्बै बिकण मैं नहीं आ लिया। जड़ होड़ लागरी सै कमलू अर रमलू हरां मैं अक किसका किल्ला पहलम बिकै। तीस साल का 10,000 रुपइये का भी इंतजाम कर दिया। फेर कोए कमलू तो न्यों बूझै अक तीस पाछै के बनैगी बेरा सै? तो कमलू सैड़ देसी न्यों कैहदे सै अक इतनी आगे की नहीं सोच्या करदे। अर या सोच एकले कमलू की हो इसी बात नहीं सै। दो किल्ले आला हरेक किसान कमले बरगा होर्या सै। फेर अपनी मौत वो आप बुलावण लाग रया सै उसनै इस बात का बेरा कोन्या। उसके बालक के करैंगे इस बात नै कोन्या सोचणा चाहन्दा। कमलू के बालक को चलो किसे ढाल काम चला बी लेंगे। फेर बाकी कमलुआं के बालक? गामां की बहोत-सी महिला वेश्यावृत्ति के जाल में घलती जावण लागरी सैं। अर छोरे अपराध जगत में पहोंचण लागरे सैं। हरियाणे मैं एक तो अगवाड़ा सै अर एक पिछवाड़े का तलछट सै। अगवाड़ा तो जगमगावै सै फेर यो पिछवाड़ा जिसनै हम देखना पसंद नहीं करते, जिसके बारे मैं हम सुनना पसंद नहीं करते यो बहुत खतरनाक अर भयावह शक्ल अख्तियार करता जावण लाग र्या सै। इस 25 लाख के किल्ले तै इसका खास नाता सै यो हमनै समझना पड़ैगा। आई किमै समझ मैं?
---

आई टी आई का के रोल्ला सै ?


फत्ते बूझ बैठ्या - ये आई टी आई आले बालक रोज सड़कां पै बैठे रहवैं सै यू के रोल्ला सै? सत्ते ओला सोला लखाया। फत्ते बोल्या - किमै तो बता सत्ते। सत्ते बोल्या - अंघाई लागरी सै इन बालकां नै। पढ़णा चाहन्ते ना। फत्ते बोल्या - न्यों बता यू सारा किस्सा के सै? सरकार तो कहवै सै अक हाम इन आई टी आइयां मैं सुधार करना चाहवां सां। अर ये एस एफ आई आले कहवैं सै अक या सरकार इन आई टी आइयां का निजीकरण करण लागरी सै। इसपै किमै बेरा होतै बता। सत्ते बोल्या - इतना गहराई ताहिं तो मनै बेरा ना फेर इतना जरूर सै अक या सरकार जिस बी सुधार की बात करै सै उसमैं कुछ फांचर ठोक उल्टी बात जरूर ठोक देवै सै। फत्ते बोल्या - सत्ते मैं तो तनै बड़ा समझदार मानूं था फेर तूं तो कई कति पैदल पाया इस मामले मैं। किमै अखबार अखबूर ढंग तै पढ़ लिया कर। सत्ते बोल्या - यू पड़ौस मैं न्यादर क्याँ कै छोरा सै आई टी आई मैं उसनै बुला कै बूझ ले नै। फत्ते बोल्या - जा फेर ल्यां तो बुला कै। सत्ते चल्या गया उसनै बुलावण। ओ बी आग्या फेर बेरा उसनै बी इसा ए था। सविता बोली - फत्ते और क्याहें पै बात कर ल्यो आज। जरूरी सै इस आई टी आई मैं माथा मारना। कविता बोली - मनै थोड़ा घणा पढ़या सै इसके बारे मैं अर वा बाला नहीं सै ब्लाक प्रधान कांग्रेस की पाल्टी की वा बी न्यों ए कहवै थी अक आज की मांग के हिसाब तै सरकार सुधार करना चाहवै सै अक आई टी आई पास करनिया बालकां पै माड़ा मोटा रोज़गार मिलज्या। फत्ते बोल्या - फेर ये एस एफ आई आले के न्यों कहवैं सैं अक इननै रोज़गार नहीं मिलना चाहिए अर कै इन आई टी आइयां की जो दुर्गति होरी सै इसमैं सुधार नहीं होना चाहिए? सत्ते बोल्या - न्यों तो कोन्या कैहन्ते फेर निजीकरण का विरोध तो करैं सैं।
कविता बोली - इसके बारे मैं पढ्या था अक 2004-05 मैं म्हारे केन्द्रिय वित्त मंत्री नै अपने बजट भाषण मैं बताया था अक देश के 500 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थावां नै अपग्रेड करैंगे। इसकी खातर वाणिज्यिक संगठनां नै अर कारखाने दारां नै शामिल करकै आगै बात बढ़ाई जावैगी अर इस डंगवारे ताहिं उसनै पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के नुस्खे की घोषणा करी थी। कमला बोली - फेर के दिक्कत सै इसमैं। डंगवारा तो म्हारी पुरानी परम्परा सै। कमजोर किसान डंगवारा करया करते अर अपना गुजारा कर लिया करते। फत्ते बोल्या - वो डगवारा तो बराबरी के आधार पै हुआ करता। एक बुलध मेरा अर एक बुलध तेरा। एक दिन हल मैं चलाऊं अर एक दिन हल तूं चलावै। कमला बोली - तो यू और ढाल का डंगवारा सै के? कविता बोली - इस पार्टनरशिप के तहत पहली खेप मैं 100 आई टी आई छांट कै सरकार की योजना थी अक इननै तक्षिला अर नालंदा बरगे केंद्र सेंटर ऑफ एक्सीलैंस के रूप मैं म्हारे देश के आर्थिक संसाधनां के दम पै बणावैगी। अर दूसरी खेप मैं 400 आई टी आई विश्व बैंक धोरै कर्जा ले कै अपग्रेड करैगी।
कविता फेर बोली - सुणै बीगां अक अपणी ए हांकैगा? या दस माणसां की कमेटी बणैगी। इस कमेटी का प्रधान मतलब चेयरमैन इंडस्ट्रीज का प्रतिनिधि होगा अर कुल पांच मैम्बर कारखाने दारां के होंगे। बाकी पांच मैं राज्य तकनीकी शिक्षा निदेशालय का एक प्रतिनिधि, एक जिला रोजगार अधिकारी, एक संस्थान का प्रिंसीपल, एक वरिष्ठ शिक्षक अर एक छात्र प्रतिनिधि हुआ करैंगे। सविता नै बूझ लिया - इस कमेटी नै अधिकार बी होवैगा कोए सै अक इन म्हारी पंचायतां की ढालां सरकार के हुंकारे भरण आली कमेटी होवैगी? कविता नै बताया - इस कमेटी नै वे सारे अधिकार होवैंगे जो ईब ताहि सरकार धोरै सैं। सत्ते बोल्या - या तो बहौते काम्मल बात होगी। कविता बोली - इतना ए नहीं कारखानेदारां की मांग के हिसाब तै नए ट्रेड शुरू करण के अर पुराने ट्रेड बंद करण की ताकत बी दे दी। बालकां के दाखल्यां के फीसां के संस्थान खातर चंदा कट्ठा करण के अध्यापकां की भर्ती अर तबादले के सारे अधिकार इस कमेटी धौरे रहवैंगे। सरकार की इसमें कोए दखलंदाजी नहीं होवैगी। ईब ताहिं की जमीन, इमारत, मशीन, भवन आदि जो इन संस्थावां धोरै सैं इननै ट्रांसफर करण का, बेचण का अर इंडस्टरी की सुविधा के हिसाब दूसरी जागां आई टी आई खोलण का अधिकार भी कमेटी नै होगा। इस खातर एक स्टीयरिंग कमेटी बणाण का भी प्रस्ताव सै फेर आखिर मैं मंत्रालय नै साफ-साफ कैह दिया अक मैनेजमेंट कमेटी ताहिं पूरी आजादी तै काम करण दिया जावै। सत्ते आपै ए बोल पड़या - फेर तो बेच खावैंगे आई टी आईयां की इतनी महंगी धरती नै।
इन सरपंचां धोरै जै या पावर आल्या तो ये सारे गाम नै बेच दें अम्बानी कै। फत्ते बोल्या - ये जो बात कविता नै बताई इनतै कुछ सवाल खड़े होगे। आखिर इस डंगवारे का फायदा किसनै होवैगा? इसनै निजीकरण कहवां अक नहीं कहवां? के इसका और कोए राह नहीं था इस डंगवारे तै न्यारा? यू सारा मामला छात्रां की नजर तै भी देख्या जाणा चाहिए अक नहीं? इसपै ताश खेलते खेलते बी बहस हो सकै सै। और जानकारी कट्ठी करी जा सकै से। एम एल ए हलके का आवै तो बूझया जा सकै सै। कुछ तो करया ए जाना चाहिए ना तो ये बालक रुलज्यांगे आई टी आई आले।

म्हारी प्राचीन संस्कृति-आखिर खतरा किंघान तै ?


कर्मबीर अर चांदकौर मैं बड़ी लड़की की शादी की चर्चा होवण लागज्या सै। लड़का आस्ट्रेलिया मैं कम्प्यूटर की कम्पनी मैं काम करै सै। लड़की एमएससी कर चुकी सै। कन्यादान पै बात चाल पड़ै सै। कर्मबीर की राय सै अक कन्यादान करना सही बात सै अर हमनै जै समाज मैं रहना सै तो लोगां का दिया औड़ कन्यादान लेना बी पड़ैगा हम मनाहीं कोन्या कर सकदे। पर चांदकौर का कहना सै अक जिब लड़का अर लड़की बराबर माने जांसैं तो लड़की का दान ही क्यों करया जावै? यो कन्यादान का रिवाज तो नाबराबरी का प्रतीक सै। जिब तक कन्यादान का रिवाज समाज मैं रहैगा उस बख्त तक महिला का दोयम दर्जा तो रहवै ए रहवै। कर्मबीर चांदकौर को कहता है कि तेरे ऊपर पश्चिमी संस्कृति का भूत चढ़ग्या दीखे सै। हरियाणा के गाम इसे तावले अमरीका कोन्या बणण देवां हम। दोनूआं मैं बातचीत अर बहस होवै सै। या बातचीत सवाल जवाब का रूप अख्तियार करले सै। क्या कहते हैं भला।
कर्मबीर: कन्यादान धर्म माणस का बिना रिवाजां ना जिया जा। 
चांदकौर: लड़का लड़की बराबर सैं तो छोरा ना दान मैं दिया जा।
कर्मबीर: कन्यादान की रस्म सदा घर म्हारे मैं मनती आई या
छोरी कुहांवै सै धन पराया मुनियां नै बात बताई या
चाहूं रिवाज निभाई या कन्यादान सारी जागां दिया जा।
चांदकौर कर्मबीर की बात सुनकर हंस पड़ै सै अर वा कहवै सै अक सही बात नै भी पश्चिमी संस्कृति का मुखौटा पहरा के खारिज करण का बड़ा आसान तरीका काढ़ लिया सै हमनै। कै फेर पिछड़ी रुग्न मानसिकता नै ए हम अपनी संस्कृति मान कै महिला की साथ अन्याय करते रहवां सां। आज जो बाजारवादी अपसंस्कृति अश्लीलता परोसण लागरी सै टीवी पै उसके विरोध मैं आपां इस पिछड़ी रुग्न मानसिकता के हिम्माती होकै महिला की गेल्यां और घणा अन्याय करां सां। महिला जिब बालक नै जनम देसै तो उसके शरीर में कुछ परिवर्तन होवैं सैं अर उसनै आच्छे पौष्टिक आहार की जरूरत होवै सै। म्हारे आड़ै पुराना रिवाज सै अक लड़का पैदा होगा तो जच्चा नै दस किलो घी मिलैगा अर लड़की पैदा होवैगी तो उसनै पांच किलो घी मिलैगा। के यो रिवाज सही सै? के यो महिला के साथ दुर्भात करण आला रिवाज नहीं सै? इसनै परम्परा के नाम पै ढोना कितना सही सै? इसे तरियां बालक के जनम पै घुट्टी प्यावण का रिवाज सै फेर बालकां के डाक्टर डा. खोसला बरगे बतावैं सैं अक इस घुट्टी का कोए फायदा कोनी उल्टा नुकसान हो सकै सै। तो के हमनै इस रिवाज के चिपके रहना चाहिए। जिब बालक पैदा होसै तो इसकी औरनाल हम जंग लागे दरांत तैं काट्या करते अर कई बालक इस करकै टैटनस की बीमारी का शिकार होकै मर जाया करदे। जिबतै हमनै इस बात का बेरा लाग्या सै हमनै यू रिवाज छोड़ दिया। क्यूं यातै म्हारी परम्परा थी ना? कर्मबीर हमनै देखना पड़ैगा अक म्हारी प्राचीन संस्कृति मैं कौन सी बातें आज म्हारी खातर सही सैं अर कौनसी हमनै नुकसान पहुंचावैं सैं। कई बर जनता नै बी गुमराह करकै उसके नुकसान की बातां नै बी कई लोग जनता के हक की बतावैं सैं तो के करया जावै? ज्यूकर सती प्रथा नै आज बी कुछ लोग ठीक बतावैं सैं अर इसे ढाल सहशिक्षा का भी विरोध करैं सैं। ये सारी बात हमनै विवेक तैं अर वैज्ञानिक नजरिये तैं परखनी पड़ैगी।
चांदकौर: एक तरफ कहैं दोनूं बराबर छोरा अर ये छोरी।
कदम कदम पै दुभांत क्यूं रिवाज कै भीतर होरी।
उनपै बूझां बने हांडैं जो थोरी खून म्हारा क्यों पिया जा।
चांदकौर कहती है कि जो हमारी संस्कृति के ठेकेदार हैं वही दारू के भी ठेकेदार हैं। जो लड़कियां के जीन पहरण के विरोध का ठेका लेरे सैं वेहे जीन के बड़े-बड़े शोरूमां के मालिक सैं। जो गऊ हत्या के विरोध का ठेका ठाये हांडैं सैं उनके चमड़े के जूत्यां के बड़े-बड़े शोरूम सैं। जो महिला नै घर मैं बोच के राखना चाहवैं सैं वेहे इसके शरीर नै टीवी पै बनियान अर जांघिये के विज्ञापन की साथ बेचैं सैं। या दोहरी नैतिकता सै म्हारे ठेकेदारां की, इसका तोड़ खुलासा तो करना ए पड़ैगा। फेर कर्मबीर ठहरया पक्का पुरातनपंथी ओ के कहवै सै भला?
कर्मबीर: छोरा ब्याह कै ल्यावै छोरी नै या रिवाज चाली आवै देख! म्हारी परम्परा पै आंगली जिद्दां मैं तूं मतना ठावै देख।
उल्टे बांस बरेली ले ज्यावै मुंह अपना नहीं सिया जा।
चांदकौर कहती है कि थारे बरगे दकियानूसी नाश करण लागरे सैं हरियाणे का। समझ जाओ ईब बख्त सै ना पाछै पिछताओगे।
चांदकौर: जो हुये पुराने और बने बेड़ी सोचो उनके बारे मैं।
बीर गई सै सदा सताई ई बी देना चाहो आरे मैं।
आगै आई जग सारे मैं रणबीर लिख्या ना उल्टा लिया जा।
कर्मबीर चांदकौर की बहस सुनकर पड़ौस का रघबीर बी आ जावै सैं अर बात बातां मैं चांदकौर की तरफदारी करण लागज्या सै। कर्मबीर नै या बात आच्छी कोन्या लागती अर ओ जोर-जोर के बोलै सै अक तम ज्ञान-विज्ञान समिति आले इन औरतां नै सिर पै बिठाकै क्यूं म्हारे घरां का नाश करवाओ सो। फेर ये बात हम इस गाम मैं कोन्या पुग्गण देवैं चाहे तम कितना ए जोर ला लियो। रघबीर कर्मबीर ने समझावै सै अक चांदकौर की बात कौन-सी गलत सै?
---

लत्तयां मैं आग


सत्ते, फते, नफे, सविता, सरिता, कविता अर ताई भरपाई फेर कट्ठे होगे शनिच्चर नै। फते बोल्या - सत्ते कित जारया था, कई दिन मैं दिख्या? सत्ते बोल्या - मेरे मामा का छोरा सै ना ओ जय प्रकाश, उसकी गेल्यां गया था। एक गाम के एक घर मैं कई म्हिने तै लत्तयां मैं आग लागै थी। उननै सारे सकपके करकै देख लिए थे फेर किसे बी स्याणे कै बात काबू कोन्या आई। कविता बोली - तो जयप्रकाश नै भेद पाड़ दिया के आग लागण का? सत्ते बोल्या - ओ तो बड़ी-बड़ी बातां का भेद पाड़ दे सै। सविता बोली - तो के साच्चे ए उसनै बेरा ला लिया अक लत्यां मैं आग क्यूकर लागै सै? सत्ते बोल्या - थारै यकीन नहीं आता तो सारा किस्सा सुणल्यो। एक अफसर धोरै जयप्रकाश का आणा-जाणा था कई बै वे इस ढाल के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्यां पै एकाध घंटा बातचीत कर लिया करदे। अंध-विश्वासी थे, फेर जयप्रकाश जिब इसे केसां के बारे मैं बात करदा तो सोच-विचार करण नै मजबूर बी हो जाया करदे। उनकी पत्नी टीचर सै। कई बार वा बी बैठ कै बात सुणन लाग जाया करदी। उसकी बदली होगी। एक दिन उसे अधिकारी का फोन आया अर बोल्या - आड़ै एक घर मैं आग लागै सै। पेटी मैं धरे ओड़ लत्ते अर खूंटी पै टंगे औड़ लत्यां मैं आग लागज्या सै। मैंने खुद भी जांच-पड़ताल करकै देख ली, फेर बात कोन्या काबू आई। थाम अपनी पूरी टीम लेकै आज्याओ। भाड़ा हम दे देंगे। जय प्रकाश हर तीसरे दिन उड़ै गये तो मैं भी उनकी गेल्यां ए था। उड़ै वो अधिकारी भी था अर दो-तीन पुलिस आले बी मौजूद थे। जयप्रकाश नै उसतै उस केस पै लाम्बी बातचीत करी। उस पाछै पूरे घर का जायजा लिया। कई जले औड़ कपड़े बी देखे। कोए कपड़ा आधा जलरया था तो कोए पूरा का पूरा। जयप्रकाश नै पूरा परिवार इकट्ठा बिठा लिया। उस घर मैं मां-बाप, उनके तीन लड़के, तीन बहू अर पोते-पोतियां थीं। एक छोरा फौज मैं नौकरी पै था अर दो छोरे खेती का काम करैं थे। काम ठीक-ठ्याक था। 10 एकड़ जमीन थी। ट्रेक्टर बी था। 14-15 भैंस थी। दो भैंस दूध दे रही थी। उनके हिसाब तै घर मैं किसे चीज की कोए कमी नहीं थी। पड़ौसियों के घर मैं कोए खास आणा-जाणा नहीं था। एक अलग तै बैठक थी, उड़ै अकसर दोचार माणस बैठे रहया करदे। जयप्रकाश बोल्या - घर के एक-एक सदस्य तै अलग-अलग बात करना चाहूं सूं अकेले मैं। सारे बोले - ठीक सै। जयप्रकाश नै बारी-बारी तै एक-एक की गेल्यां बात करनी शुरू करी। जब ओ एक बहू तै बात करण लागरया था भीतर तो खूंटी पै टंगी हुई एक सलवार मैं आग लाग गी। उसनै बाहर आकै देख्या। उस कपड़े तै आवण आली गंध की जांच करी अर उसकै कुछ समझ मै बी आई बात। जिब फौजी की पत्नी का नंबर आया तो उसनै भीतर जावण तै मना कर दिया। पूरे परिवार नै उस ताहिं समझाया अक भीतर जावण मैं हर्ज कैसे? वा बोली - मैं नहीं जाऊं चाहे कुछ भी होज्या। फेर पूरे परिवार नै दबाव बनाया तो वा गई भीतर। भीतर जातै उसनै जयप्रकाश पै गुस्सा होकै कहया - कहो क्या कहना है। जयप्रकाश नै कहया - बैठ जाओ और आराम से बात करो। आप तो मुझे ऐसे धमका रही हैं जैसे मैंने ही आपका कुछ बिगाड़या हो। जो आप चाहती हैं उसमैं बाधा तो आपका परिवार डाल रहा है। आप अपना ही नुकसान कर रही हो। आपने अभी जो सूट जलाया है, 200-400 रुपये का नुकसान किया है। वह एकदम बोली - इसका मतलब आग मैं लगाती हूं। मैं अपना नुकसान क्यों करूंगी? उसने कहा - यह तो मैं जानता हूं कि आग आप लगाती हैं और क्यों लगाती हैं। फेर मैं तेरे मुंह तै सुनना चाहूं सूं। तेरी पूरी मदद करूंगा अर किसे नै बताऊं बी कोन्या। फेर बता तो सही वा बोली - मेरी मदद करनी सै तो मनै करवाद्यो न्यारी। उसने कहा - तुम न्यारी होना चाहती हो? वा बोली - हां। मैं बीए तक पढ़ी हूं और कोई नहीं इतना पढ़ा-लिखा। मेरी दोनों जेठानी अनपढ़, जेठ आठ पास अर पति 10 पास। सबमै छोटी होवण करके घरका सारा काम मनै करना पड़ै सै। मेरे बाबू ने कहया भी था अक मेरी छोरी नै पढ़ाई का काम करया सै, और नहीं। जिब तो फौजी के घरके न्यों बोले अक या तो फौजी की गेल्यां ए रहवैगी। फेर एक दिन बी उसकी गेल्यां कोन्या भेज्या। सारी तनखा फौजी अपनी मां नै दे दे सै। मेरे ताहिं एक बी पीस्सा कोन्या दिया। मैं पीहर चली गई और कहा कि जब तक न्यारी नहीं करोगे मैं नहीं आऊं। ये बोले - मेरी बाहण की शादी हो लेण दे फेर न्यारे हो ज्यांगे। 8 म्हिने हो लिए शादी नै।
इब आप ही बताओ मैं ज्यादा पढ़ी लिखी, इन दोनों से सुंदर भी मैं, इन दोनों से ज्यादा दहेज ल्याई, मेरा पति बी नौकरी करै और काम करूं मैं? इनका नौकरानी की ढालां ज्यूकर ये मेरे ऊपर अफसर लागरे हों। जयप्रकाश नै तसल्ली दी अक न्यारी करवाद्यांगे। उसनै दोस्त अधिकारी तै बात करी। उस बहू के सुसरे को अंदर बुलाया अर सारी बात बताई। सुसरे नै कहया - सारा काम या बहू ए करै सै के? उसको कहा - फेर बहू को कुछ नहीं कहना सै। जै कुछ कहया तै वा कुछ बी सोच सकै सै। न्यारी करण मैं नुकसान कैसे? ससुर बोला - मनै बता देती मैं कर देता, इतना पवाड़ा करण की के जरूरत थी। जयप्रकाश बोल्या - म्हारे समाज मैं बहुआं नै सुसरे गेल्यां बात करण की इजाजत कड़ै सै? ससुर बोल्या - आज ही न्यारी कर द्यूं सूं। उसनै कहया - म्हिने-बीस दिन पाछै कर दिये। बहू नै मैं समझा द्यूंगा। किसे नै बेरा बी नहीं लागैगा। ससुरा मान गया। जयप्रकाश नै बहू को अकेला बुलाया और कहा - सब ठीक हो जायेगा। अब कुछ ना करना। बहू नै जयप्रकाश का धन्यवाद करया अर हंसण लागगी। फते बोल्या - वा आग क्यूकर लाया करदी? सत्ते बोल्या - सारी बात आजै बूझैगा या फेर कदे सही।

म्हारी स्वयंभू पंचायत

म्हारी स्वयंभू पंचायत
जागां-जागां बिना चुन कै आई पंचायतां की पूरे हरियाणा मैं लहर-सी आरी सै। जिब मुद्दा महिला विरोधी हो, दलित विरोधी हो, अंतर्जातीय हो अर कै सवर्ण जात की ज्यादती के खिलाफ करी कारवाई का हो तो इन पंचायतां की घणी कसूती बांह फड़कैं सैं अर म्हारे नेता बी चुप, म्हारी होनहार ब्यूरोक्रेसी भी कांपै अर म्हारी न्यायपालिका के बी क्या कहने। इसे ढाल का किस्सा एक झज्जर के गाम मैं हुया। गाम की दो जात्यां के युवक अर युवती नै ब्याह रचा लिया अर वे गाम तै भाजगे इन पंचातियां तैं डरते आज ताहिं नहीं बेरा वे कित सैं। पर उन दोनूआं के घरक्यां गेल्यां इन पंचातियां नै जो करी उसपै आज चर्चा कोन्या। हां उस गाम के लोगों नै उस पंचायत के पंचातियां का जो नक्शा खींच्या वो साझा करण नै जी करै सै। पंचायत का अध्यक्ष था मीना सिंह जिसकी उम्र 80 साल की होगी। चौदवीं शताब्दी के विचारां का धनी। अपने चाचा की जमीन उसनै 20 साल ताहिं दाब कै राखी। चाचा का छोरा एक था कर्मबीर। उसने ब्याह हुयां पाछै अपनी घरआली तै मिलकै वा जमीन हांगा लाकै छडवाई। मीना सिंह का सगा भाई था। धरती के लालच मैं वो साझै राख्या। उसकी पत्नी नै पीहर मैं जीवन बिताया। मीना सिंह की पत्नी बहोत दुःखी थी। उसकै बेल मारकै राख्या करते। ईब तै वा मर ली। भाई की पत्नी अपनी बेटियां की ससुराल मैं रहवै सै। मीना सिंह के कहे मैं उसके भाई का छोरा ना अपनी मां नै ना ल्यान्ता अर ना बाहनां नै घर मैं बड़ण देन्ता। इस पंचायत के प्रधान कै खिलाफ सै किसे का पंचायत करण का ब्यौंत? एक दूसरा मैम्बर सै पुराना सरपंच - अनूप। बिघन की जड़ योहे सै। सारी उल्टी-सीधी स्कीम गुप्त ढंग तै योहे बनावै सै। इस ब्याह आले मामले मैं उसका पूरा हाथ बताया। 10 साल ताहिं सरपंच रह्या। खूब पीस्सा खाया। उसतै बाद जो बी सरपंच बन्या उसने उसकी छत्रछाया मै काम करना पड़या। खुद कदे साहमी नहीं आवै। अनूप सरपंच गाम का शकुनि मान्या जावै सै। सबनै ठेंगे पै राखे सै। करल्यो कोए के करैगा उसका?
तीसरा सदस्य सै श्याम चंद्र। पुराने सरपंच नरेंद्र का छोटा भाई। इसका एक भतीजा ट्रक ड्राइवर यूपी मैं डाका मार्या करदा। उड़ै ए उसका मर्डर होग्या। दूसरा भतीजा बी पुलिस नै एक डाके मैं पकड़या था। श्यामू के एक भाई नै कई साल अपनी पत्नी छोडें राखी। इसकी बुआ धान्धलान मैं ब्याही थी। उड़ै उसकी कोन्या बनी तो गाम के एक पुजारी की गेल्यां बिना तलाक लिए रहवण लागगी। अपने भाई भतीज्यां नै मंदिर का खूब पीस्सा दिया करदी। मंदिर की 35 एकड़ ज़मीन की सारी आमदनी ढो गिरी उननै। चौथा पंचाती सै राजकुमार। यू नम्बरदार का बेटा सै। उम्र 37 साल सै। अनपढ़ सै फेर बी तेज बहोत सै। इसका बाबू कमलू नम्बरदार बी इस केस मैं शामिल था। गाम मैं पूरी चर्चा चाली बताई अक नम्बरदार नै अपनी सागी बाहण गेल्यां बलात्कार कर्या था। ईब नम्बरदार की उम्र 80-82 बरस की सै; पहली पत्नी तै एक बेटी होई। फिर इस पहली पत्नी के जीवन्ते जी पुत्र की खातर दोबारा ब्याह रचाया। दूसरी पत्नी के घर आल्या नै 10 एकड़ ज़मीन अपनी बाहण के नाम करवा ली थी। फेर उस धरती की आमदनी नम्बरदार धोरै ए रह्या करदी। उस धोरै 35 एकड़ जमीन सै फेर बी उसकी पहली पत्नी सारी उम्र अपने पीहर मैं पड़ी रही।
एक बार भकाभकु कै ल्याये थे उसनै नम्बरदार हर। एक लड़का गोद दिवा दिया अर सारी धरती उसकै नाम करवा दी। फेर उस छोरे नै वा कदे नहीं सम्भाली। बुढ़ापे मैं वा अपनी बेटी गेल्यां रही अर उड़ैए डीघल मैं उसनै आखरी सांस ली। नम्बरदार नै सारी ज़मीन तीनों बेट्यां के नाम करवा दी अर पहली पत्नी की बेटी नै कदे बी नहीं बुलान्ता। राजकुमार नै इसे गम मैं एक बनिया की छोरी गेल्यां बलात्कार कर्या बताया। उसका बड्डा भाई श्रीभगवान भी छोरियां के मामले मैं खूब बदनाम सै। राजकुमार उस छोरी के बारे मैं बोल्या - ईब तो वाह म्हारे गाम की छोरी तो रही नहीं जै कितै पाज्यागी तो चार-पांच दिन बरत कै देवांगे पुलिस मैं उसनै। ये तो एक पंचायत के कुछ लोगां की हिस्ट्री सीट सै। इसमैं जो कुछ साच्ची बात थी उनके बारे मैं वेहे बताई गई सैं बस नामां मैं थोड़ा अदल-बदल जरूर करी सै। ईब जनता नै हिसाब ला लेना चाहिये अक ये किसे पंचाती सैं अर गाम की ईज्जत की इसे लोगां नै असल मैं कितनी परवाह सै। कोए फांचर ठोक, कोए लिकड़ा तोड़, कोए कढ़ी बिगाड़, कोए माणस मार, कोए चोर अर जार, कोए दारू बाज, कोए धोखेबाज अर सट्टेबाज, ईब कितनी अक योग्यता बताई जावैं इन पंचातियां की। कई बर तो इसा लागै सै अक या जनता बी कतिए डूब ली जो इसे पंचातियां के फतवे सिर झुका के कबूल करले सै। इन पंचायतां की संविधान के हिसाब तै के हैसियत सै? संविधान बड्डा अक ये स्वयंभू पंचायत बड्डी? सैड देसी कहवांगे हमनै संविधान तै के लेना? म्हारी खातर तो ये पंचायत फालतू। बस आड़ैए तो रोल सै समझण मैं। संविधान तै ऊपर क्यूकर हो सकैं सैं ये पंचायत। कानून नै अपने हाथ मैं क्यूकर ले सकैं सैं?
---

म्हारा बढ़ता व्यापार - भूख का चढ़ता बुखार

म्हारा बढ़ता व्यापार - भूख का चढ़ता बुखार
सारी दुनिया के लेवल की अर म्हारी लोकल आर्थिक स्तर पै कति माणस नै भींच्चण आली परिस्थितियां मैं तो बढ़ता ब्यौपार अर ऊंची छलांग मारता आर्थिक विकास बढ़ती भुखमरी की कान्ही धकेल कै ले ज्यावण लागरया सै। नहीं? मेरी बात झूठी सै? बे सिर पैर की सै? चलो हो सकै सै थारली बात ठीक हो फेर म्हारा इतहास तो हमनै याहे बात बतावै अर समझावै सै अक इस मुक्त व्यापार व्यवस्था के तहत म्हारे बरगे गर्म देशां तै करया औड़ कृषि निर्यात अर इसकी बढ़त हमेशा म्हारे जिसे देशां मैं खाद्यान्न उत्पादन मैं अर उसकी म्हारे देश के नागरिकां ताहिं उपलब्धता मैं गिरावट का ए कारण बनी अर म्हारे तीसरी दुनिया के देशा के जनगण-ताहिं कुपोषण के मुंह मैं धका दिया। कई जागां तो जनता अकाल के मुंह मैं भी झोंक दी इसनै। के कह्या - इन बातां मैं दम कोन्या। माड़ी सी आंख खोल कै अपणे चारों कान्हीं देखण का कष्ट तो करले मेरे बीरा। कई कृषि के क्षेत्र के माहिर लोगां नै इस बात का अंदाजा 1990 के दशक के शुरू में म्हारे साहमी प्रस्तुत कर दिया था अक इस आर्थिक संकुचन कारी माहौल के चालते भारत मैं व्यापार उदारीकरण के साथ म्हारी खाद्य सुरक्षा कमजोर पड़ैगी। आज के दिन या बात सही साबित हुई सै।
आंध्र प्रदेश का उदाहरण म्हारै साहमी सै। किसे नै कहया सै ना अक हाथ कंगन नै आरसी के अर पढ़े लिखे नै फारसी के। 1998 के बाद उड़ै पांच हजार तै बी फालतू ऋण (कर्ज) के मारे औड़ किसान अर खासकर कपास की खेती करणिया किसान आत्महत्या करने पै मजबूर हुए सैं। यो हाल तो जिब था जिब चंद्रा बाबू नायडू पूरे हिंदुस्तान का सबतै काम्मल हाईटैक मुख्यमंत्री था। उड़े की सरकार ने विश्व बैंक की गेल्या राज्य स्तर का ढांचागत कार्यक्रम लागू करण का समझौता कर राख्या था जिसके तहत उसनै बिजली के रेटां मैं पांच बर बढ़ोतरी करी थी जबकि इसे बख्त के बीच कपास की कीमत नीचे नै आई अर आधी रैहगी। पंजाब मैं भी खासतौर पै कपास उत्पादक पट्टी मैं, किसानां की आत्महत्यावां की एक हजार तै फालतू केस हुए थे। इसे तरियां केरल के वायनाड मैं 2001-2005 के बीच आत्महत्या की 1250 तै फालतू वारदात हुई थीं। उड़ै कहवा चाय तथा काली मिर्च उत्पादक किसान, विश्व की मंडी मैं इन उत्पादां की कीमतां मैं भारी गिरावट तै तबाह हो करकै हताशा मैं आत्महत्या का सहारा लेवण पै मजबूर हुए थे। म्हारे देश मैं इन दूसरे देशां मैं जान आली फसलां की खपत नाम लेवा थी। खास बात या भी थी अक म्हारे देश के इन किसानां नै फालतू मार झेलनी पड़ी थी क्योंकि 2003 के आन्ते आन्ते फसलां की खरीद बेच के धंधे मैं बहुराष्ट्रीय कंपनी पां जमावण के हालात मैं थी अर कहवा उत्पादक के हाथ अपनी पैदावार की खातर 1999 के मुकाबले मैं चौथाई हिस्सा दाम आवै अर चाय और काली मिर्च की खेती करणियां कै एक तिहाई दाम हाथ आवैं थे।
पाछले छह सालां मैं भारत ने गेहूं अर चावल का रिकार्ड निर्यात कराया सै अर इन दोनूं बुनियादी नाजां का विश्व निर्यात मैं भारत का हिस्सा काफी बढ़या सै। खास बात गौर करण की सै अक एक कान्ही तो इस दौर मैं भारत मैं कृषि उत्पादन की वृद्धि मैं कसूती गिरावट आवण लागरी थी दूजे कान्हीं 2002 अर 2003 के दो सालां मैं भारत ने 2 लाख टन नाज का निर्यात करया। उसके कुल निर्यात मैं नाज का हिस्सा पांचवें हिस्से तै बधकै चौथे पै पहोंचग्या। यू क्यूकर हो पाया? पैदावार कम अर निर्यात फालतू। म्हारे देशवासियां नै भूखे राख कै ए यो संभव हो सकै था। किसान अर मजदूरां की आय मैं भारी गिरावट आई। भारत मैं नाज की प्रति व्यक्ति खपत बहोत नीचै चली गई। बड़े पैमाने पै निर्यात हुया, गोदामां मैं नाज पड़या सिड़ै, लाखां टन अनाज नै मुस्से खागे फेर गरीब किसान मजदूर भूख तै मरदा रहया। काम के बदले नाज बरगी बढ़िया स्कीमां का भी बैंड बजा दिया।
चारों कान्हीं संकट बध्या। हाईटैक मुख्यमंत्री तै जी भरग्या जनता का अर पाछले चुनाव मैं जनता नै केंद्र की सत्ता मैं बदलाव ल्याकै इस बात की अपेक्षा करी थी अक वर्तमान सरकार किसानां की आत्महत्यावां का कोए पुख्ता इलाज टोहवैगी। जनता का जनादेश अर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार। दो साल हो लिए लोग मुंह बायें बाट देखैं सैं। हरियाणा मैं किसानां की इस संकट करकै आत्महत्यावां की पिछाण करण की क्षमता कोन्या। ना तो ये जितने युवा लोग-लुगाई सल्फास की गोली खा-खा कै मरण लागरे सैं, इन मां तै दो तिहाई किसानां के बेटा-बेटी सैं। आई किमै समझ मैं? गेर रै गेर पता गेर अर बाज्जी पूरी कर। इसकी तो आदत सै इसा लिखण की। देखियो मेरे बीरा ताश की बाज्जी नहीं ज्यान की बाज्जी का सवाल सै।

बाजे भगत कड़ै गया ?

बाजे भगत कड़ै गया ?
सत्ते फत्ते नफे कविता सरिता अर ताई भरपाई फेर कट्ठे होगे शनिच्चर नै। सत्ते बोल्या - आज तो रात नै नांगलोई मैं रागनी कम्पीटीशन देख कै आया। फेर वे पहलम आले कम्पीटीशन कोन्या रहे। ईब तै लटके झटके, दो अर्थां आली बात, भद्दे अश्लील चुटकले अर भूंडी रागनी छागी इन कम्पीटीशनां पै। दूसरी बात या भी अक ईब पहलम आले गायक बी कोन्या रहे। फत्ते बोल्या - हां भाई राजकिशन गुमान - पुरिया का के मुकाबला था। कविता बोली - इन रागनियां मैं अर चुटकल्यां मैं महिला भी बहोत अपमानित करी जीवैं सैं। पूर्णमल के किस्से मैं एक 16 साल की लड़की का ब्याह 60 साल के बुढ़े तै करवा कै लेखक चाहवै सै अक वा पतिव्रता का फर्ज निभावै। पूर्णमल की वा लड़की रिश्ते मैं मौसी लागै सै। उस लड़की का झुकाव पूर्णमल की तरफ हो जाता है। इस सारे किस्से मैं पुरुषवादी पितृ सत्तात्मक परिवार के ढांचे की नज़र काम करै सै। उस लड़की की तरफ खड़या होके पूरा किस्सा देखण की जहमत कोन्या ठाई लेखक नै। दूसरे हिसाब तै न्यौं बी कह्या जा सकै सै अक लेखक का इस नज़र तै किस्सा बणावण का ब्योंतै कोन्या था। सविता बोली - कविता नै सही बात कही सै। सत्ते बोल्या - सुणण मैं आवै सै अक एक बै नांगलोई मैं बाजे भगत अर लखमी दादा मैं खींचगी। एक अंग्रेज इस प्रोग्राम का मुख्य अतिथि था। बाजे भगत छाग्या उड़ै। जिब ईनाम पहला बाजे ताहिं मिल्या तो बोल्या - ये सम्मान तो दादा लखमी नै ऐ फाब्बै सै। न्यौं कैहकै साफा अर डोगा दादा लखमी के पाहयां मैं धर दिया था। कविता बोली - एकाध बात तो बाजे भगत की सुणाद्यो कोएसा। सरिता बोली - शकुंतला दुष्यंत का किस्सा भी तो बाजे भगत नै रच्या था? ताई भरपाई बोली - सही बात सै उसनै ए लिख्या था। मेरी सास गाया करती एक गीत उस किस्से का। कविता बोली - ताई सुणा दे तेरे याद होगा।
ताई भरपाई सुणाती है - वह बताती है कि राजा दुष्यंत से शकंुतला कहती है कि महाराज बगैर माता-पिता की आज्ञा के मैं आपसे शादी कर रही हूं। आप मुझे धोखा तो नहीं दोगे? धोखा मत करना। उस मौके पर शकुंतला क्या जवाब देती है भला - पिया कर कै ब्याह की रीत, भूल मत जाइये हो। कदे तूं चूकै ना पढ़ गुणकै, मैं भी पछताऊं सिर धुन कै, कितै सुण कै बेरीत के गीत टूहल मत जाइये हो। अपने ब्याहे वर कै, नारी रह सहारे नर कै, पिया जी करकै अपनी जीत हूल मत जाइये हो। चम्पा चमेली चंदन के पोरे, हुस्न गुलशन यौवन मैं होरे, तूं भौंरे सुगंध के मीत, छोड़ फूल मत जाइये हो। बाजे भगत वाणी की, प्यास प्रेम रूप पाणी की, मेरै लाकै राणी की फीत, मिला धूल मत जाइये हो। सुणकै सारे टूहलगे। फत्ते बोल्या - लखमी की सुणल्यां, मांगे राम की सुणल्यां, मेहर सिंह की सुणल्यां फेर बाजे की बात तो ये आज पहली बार सुणीं सैं। बाजे तो घणा बढ़िया सांगी था। फेर बेरा ना लोगां नै क्यूं भुला दिया? ताई भरपाई बोली - म्हारे गाम का हरिजनां आला कुआं बी बाजे भगत नै सांग करकै पीस्से कट्ठे करकै बनवाया था। कविता बोली - सुणा है बाजे भगत की आवाज, लय, सुर, रचना, विषयवस्तु सब बहुत बढ़िया थे तो फेर आज वो गुमनाम क्यों होग्या? के कला के पारखी खतम होगे हरियाणा मां तै? भला हो रामफल चहल का उसनै हिम्मत करकै बाजे भगत की बात छापी तो सही।
सरिता बोली - फेर उसकी बातां नै ये मैना कैसेट आले भरदे तो कोन्या। देखी सै बाज़ार मैं बाजे भगत की कोए कैसेट? सारे बोले - ना देखी तो कोन्या। कविता बोली - तो फेर हरियाणा आले इतने अहसान फरामोश क्यूंकर होगे अक बाजे भगत सिंह जिसे ऊंचे कलाकार नै भूलगे? नफे सिंह बोल्या - हरियाणा आल्यां की ना बूझै। इनकी याददाश्त बहोतै कमज़ोर सै। ये अपने मां-बाप नै भुलदे वार कोन्या लावैं। बाजे भगत तो किस खेत की मूली सै। कविता बोली - नफे तनै तो इसीए बात भाया करैं। सारे माणस हरियाणा के इसे थोड़े ए सैं। रामफल चहल भी तो सै जिसनै बाजे भगत पै पूरी किताब छाप दी। उसतै पहलम एक डाक्टर सै मेडिकल मैं उसने भी बाजे पै कुछ छाप्या बताया। बाकी इन पाले, रणबीर अर बाली बरग्यां के कान खींचने चाहिएं जनता नै अक ये बाजे भगत की बात क्यूं ना सुणाते। सत्ते - ये कैहदे सैं अक हम के करां, या जनता ए कोन्या सुणकै राज्जी। कविता बोली - जनता तै हम हाथ जोड़ कै प्रार्थना करलें सैं अक वे बाजे नै न्यों ना मारैं। मांग करैं अक गायक उसकी बात बी सुणावैं। ताई भरपाई बोली - सांगी तो हरदेवा, धनपत अर चंद्र बादी बी हुए सैं अपने बख्तां के। मेरे तो मन मैं इसी बात आवै सै अक दो दो सांग इन सारे सांगियां के कोए एक किताब मैं छाप दे तो दो काम हो ज्यांगे। पहला तो या अक सारे सांगियां की बात एक जागां कट्ठी होज्यांगी। दूसरी बात या सै अक जनता बी सारे सांगियां के बारे मैं जानकारी हासिल कर लेगी। नफे बोल्या - इसा दाणी कौन सै जो इसी किताब छापैगा? सविता बोली - हरियाणा साहित्य एकैडमी कै हरियाणवी साहित्य एकैडमी नै करना चाहिए यू काम तो। कविता बोली - बड़ी सही बात कही सविता नै। नफे फेर बोल्या - कूण-कूण सुणै सै? कविता बोली - 50 पीस्से का एक पोस्टकार्ड आपां नै हरियाणा साहित्य एकैडमी, चंडीगढ़ के नाम पै गेरना चाहिए। जिब ये एमएलए दौरे पै आवैं तो लोगों नै उन ताहिं बी तो कहनी चाहिए ये बात। सारे उठ लिए अर बोले - बाजे भगत तो पाले धोरै ज़रूर गुवाणा सै।
---

लय सुर मैं बतलाये

लय सुर मैं बतलाये
सत्ते, फते, नफे, मुरारी लाल, अली बक्स, सविता, कविता, सरिता अर धापां ताई सब शनिवार की बैठक मैं आये। कविता अपनी बात कहना शुरू करती है - बिना लड़ाई सुणले ताई, पार म्हारी जाणी ना। सरिता उसके सुर में सुर मिलाकर एकदम कहती है - हमनै ताई मारै महंगाई, काट्या मांगै पाणी ना। मुसद्दी लाल कहता है कि मेरे दिल की बात कैह दिती। पहले दे मुकाबले हुण गुजारा बहोत मुश्किल है। सविता कौनसा पीछे रहने वाली थी, उसने बात कुछ इस तरह फरमाई-या महंगाई बेकारी तो, घणी कसूती मार करै। लुटेरे की जात मुनाफा, जात भूल कै वार करै। राम नाम की माला देकै, बेड़ा अपना पार करै। राजनीति से हमको लूटै, दूर रहो प्रचार करै। नफे सिंह से कहां चुप रहा जा सकता था। बहुत बेचैन हो रहा था, वह बोला - टाटा की जाई या महंगाई, हमनै नब्ज पिछाणी ना। अली बक्स कह उठा बहुत खूब। क्या छन्द में छन्द मिलाया है। इस महंगाई ने तो किबला हद कर दी।
सरिता ने कहा - ये कीमतें तो इस राज में भी बढ़ती ही जा रही हैं। गैस सिलेंडर की कीमत 290 से ऊपर चली गई है। अलीबक्स और सरिता की बात सुनकर सत्ते भी जोश खा गया और सुनाने लगा - आज म्हारी थारी तनखा, दो-तीन गुणी घटज्या सै। दबकै बाहणा कोन्या खाणा, कीमत दूनी घटज्या सै। क्यों म्हारे जिस्यां की जिन्दगी, अलूणी कटज्या सै। नये लुटेरे पैदा होगे पुराने राजा राणी ना। वाह भाई सत्ते चाला पाड़ दिया। सही बात सै खेती मैं जो चाहिये उसकी कीमत बधती जावै, म्हारी फसल की कीमत घटती आवै, किसान मंडी मैं खड़या लखावै। कविता नै बी छोंक ला दिया। अलीबक्स ने गला साफ किया और पूरे सुर में गाने लगा - जाट बाह्मण का झटका, हम सुणते गलियारे मैं। हिन्दू-मुस्लिम का फटका, मिलै हरियाणा सारे मैं। यो प्रोमोशन का लटका, कहै ना रलता थारे मैं। इसी गुट बंदी होसै गन्दी, रोकै कुन्बा घाणी ना।
अपना गाना गाने के बाद अलीबक्स ने फरमाया - एक बार एक गरीब औरत की बेटी सरोज रोने लगी। वह भूखी थी। घर में खाने को कुछ था नहीं। उसकी मां ने उसे बहलाने-फुसलाने की बहुत कोशिश की मगर वह लड़की सरोज रोती रही। मां ने उसको दो-चार थप्पड़ बी लगाये पर रोना बंद नहीं किया। इतनी देर में पड़ोसन आ गई और पूछा कि लड़की क्यों रुआ रखी है? सरोज की मां बोली - रोटी मांगै सै। पड़ोसन ने कहा - फेर दे दे नै रोटी। मां बोली अक रोटी कित सै? पड़ोसन ने दो मिनट सोचा और बोली - आच्छा तो सरोज को वहां ऊपर टांड पर बिठा दे। सरोज की मां बोली - वहां क्या रोटी धरी सै? पड़ोसन बोली - एक बार बिठा तो सही। मां ने सरोज को टांड पर बैठा दिया। सरोज रोती तो रही पर उसका रोने का सबब बदल गया। जल्दी ही सरोज ने कहा - मां मुझे टांड से नीचे उतार दे रोटी चाहे मत दिये। सरोज की मां ने सरोज को नीचे उतार दिया। सरोज ने रोना बंद कर दिया। यह टोटका सुनकर अलीबक्स ने कहा - जब हम रोटी और रोजगार मांगते हैं तो हमें म्हारे नेता हमनै जात-पात-धर्म आदि की बात करकै टांड पर बिठा देते हैं और हम लड़ते रहते हैं वहां और फिर मांग करते हैं टांड से नीचे उतारे जाने की। हमें उतार दिया जाता है टांड से और तब तक हम अपनी रोटी, अपने रोजगार की बात भूल चुके होते हैं। रोना बंद कर देते हैं।
नफे सिंह बोल्या - बिल्कुल ठीक बात कही सै। अलीबक्स नै अक पहलम तो आपां नै इस जात-पात के टांड पर से उतरना चाहिये पर उस लड़की सरोज की तरह रोना बंद नहीं करना चाहिये। अपनी असली तकलीफां पै कट्ठे हो जाना चाहिये। और ईब मेरी बी सुणल्यो - हिरण की डार भली हो, रल मिल कै चालै भाई। माणस जूनी ले कै भी क्यों एकला हालै भाई। बैरी एक तोड़ण नै, टांड बीच मैं डालै भाई। चौधर कितै माल बिकाऊ, घर कसूते घालै भाई। ये कमजोरी हमनै खोरी, या समझण मैं हाणी ना। ताई धापां इन सबकी बात चुपचाप सुणण लागरी थी। बहोत मजा आया उसनै इतनी काम्मल-काम्मल बात सुणकै। फेर रह्या उसतै बी कोन्या गया अर वा बोली - मतभेद भूलकै हमनै, एक मंच पर आणा हो। किसानमजदूर सब भाई, मिलकै साथ निभाणा हो। हरियाणा आगै बढ़ैगा ले एकता का बाणा हो। हक लेन की म्हारी लड़ाई, ना पाछै कदम हटाणा हो। कहै धापां ताई फेर बचैगी महंगाई माणस खाणी ना।
सबने बहोत जोर-जोर से तालियां बजाई। मुसद्दी लाल बोला ताई तो छिपी रुस्तम निकली। हमें क्या पता था ताई भी इतनी लय और सुर में बातें कर लेती है। धापां ताई ने कहा - बख्त की बात हो सै। लय सुर मैं बात करने का गुण तै हरेक मैं हो सै। फेर मौका ए कित मिलै सै इस ढाल की बात करने का। लगे रहवां सां काम मैं ‘कोल्हू के बैल की तरियां’। ना दिन का बेरा ना रात का बेरा। कहया करैं ना अक दबी मूस्सी कान कटावै ओ हाल सै म्हारा तै। लाचारी मैं बेरा ना के के नुकसान ठाणा पड़ै सै। इस सारे मामले मैं किसा लय अर सुरताल बणैगा। इसपै इतना एक कह्या जा सकै सै अक इसी धुन लिकड़ैगी जो आज ताहिं ना ते लख्मी दादा तै लिकड़ी अर ना बाजे भगत तै।
सरिता बोली - माणस करोड़पति तै रातों रात कै एक दो साल मैं ए काला धन कमाकै क्यूकर अरबा पति होज्यां सै इसका तो जिकरा ए कोन्या रहया कितै। फेर जै कोए धौली कमाई करकै अपना हक मांगै तो लाठीचार्ज। वो सुर बी न्यारा ए हो सै। जड़ लोगां नै एक लय अर सुरताल मैं बतलाना पड़ैगा जिबै यो बहरा राजपाट कुछ सुणैगा।

खून की बी जात हो सै के

खून की बी जात हो सै के
म्हारे हरियाणा मैं जात के ठेकेदार बहोत पैदा होगे ज्यूकर साम्मण के म्हिने मैं गिज्जाई पैदा हो जाया करैं। इन जात के ठेकेदारां की गलेट लागैं सैं। अर भला ये के कहवैंगे अक अपणा मारै छां मैं गेरै। इनतै कोए बूझणिया हो मरे पाछै किसी छां अर किसा घाम? पर हम बिना सोचैं समझें इनकी हां मैं हां मिलाद्यां सां। ये ठेकेदार अपणी अपणी जात्यां नै सिस्से के बढ़िया फ्रेम मैं लवा कै कौम की सेवा करण की सूं खान्ते हांडै सैं। कई बै तो इसा सा लाग्गण लागज्या सै अक जणों तै पूरा ए हरियाणा जात्यां मैं बंट कै खड़या होग्या अर जो माणस जातपात मैं यकीन नहीं करता उसनै हरियाणा मैं रैहण का कोए हक नहीं बचरया। गामां मैं भी माणस जात पै, गोत पै, ठोले पै, पान्ने पै कसूती ढाल तनकै खड़े होज्यां सै माड़ी सी बात पै। जागां-जागां हरिजणा के बान्ध-बान्ध दिये जावैं सैं, बस्ती की बस्ती जला दी जावैं सैं। जात के नाम पै बलात्कारी बचाए जाण लागरे सैं। निकम्मे, चोर, ठग जात का साहरा ले कै चौधरी माणस बणे हांडैं सैं। ब्लैक करकै चौखा काला धन कमा लिया। भला हो बंशीलाल जी का जो दारू बन्दी करदी। ब्लैक की दारू नै बहोतै जन्यां के काच्चे कटवा दिये थे। एक खास बात और सै इन ठेकेदारां की अक दो चार पहलवान बी जरूर पावैंगे इनकी गेल्यां। आजकाल के सामाजिक सांस्कृतिक माहौल पै बी इनका कब्जा सै। आज की राजनीति मैं बी इनकी पूरी दखलन्दाजी बताई।
म्हारे गाम मैं बी ईसा ए जात का एक ठेकेदार था चौधरी रामपत। उसकी फुकांड़ मैं घास जल्या करदी। मजाल सै जै कोए हरिजन उसकी बैठक मैं खाट पै बी बैठज्या। म्हारे गाम की दलित सरपंच बी उसके साहमी धरती पै बैठी हमनै देखी थी कई बर। उसके खेतां मैं कोए पां टेक कै तो दिखाद्यो। बेरा ना किसे हरिजन के बालक नै उसकै बालकपन मैं किसी चोंहटकी सी भर राखी थी अक हरिजन का नाम आया नहीं अर वो फड़क्या नहीं। कुछ दिन पाछै भाई कै भैंसां की डेरी खोल्लण का सौक चढग्या। एक झीमरां का बालक सान्नी सप्पानी अर धार काढ़ण ताहिं राख लिया। कुछ दिन पाछै झीमर का बालक बीमार होग्या तो धार कूण काढ़ै? पड़ौस मैं हरिजनां का छोरा अत्तर था पूरा जवान गाभरू। पांच-सात दिन धार उसनै काढ़ी। एक दिन उसकी मां रामपत ठेकेदार कै घरां किमै चीज मांगण चाली गई, उस बख्त रामपत की बहू किढ़ावणी मां तै दूध काढण लागरी थी बालकां की खातिर। अत्तर की मां बी ऊंकै धोरै जा खड़ी हुई तै उसका पल्ला किढ़ावणी कै जा लाग्या। बस फेर के था रामपत की बहू नै तो जमीन आसमान एक कर दिया। वा बोली - म्हारी किढ़ावणी बेहू करदी अर और बेरा ना केके सुनाई उसनै। अत्तर की मां बिचारी कुछ नहीं बोली पर मनै मन न्यों सोच्चण लाग्गी अक जिब मेरा छोरा धार काढ़ै तो बाल्टी बी बेहू ना होन्ती अर ना दूध बेहू होन्ता अर मेरे पल्ले तै किढ़ावणी बेहू होज्या सै। रामपत की बहू नै जणो तै अत्तर के मां के दिल की बात सुणली। वा हटकै फेर बोली - काच्ची चीज बेहू कोन्या हुया करदी पाक्की औड़ चीज बेहू होज्यां सैं। अत्तर की मां फेर बी बोल चुप्पाकी रही।
थोड़े से दिन पाछै रामपत चौधरी करड़ा बीमार होग्या। बवासीर की तकलीफ थी खून घणाए पड़ग्या दो-तीन दिन मैं। लाल मुंह था ओ जमा पीला पड़ग्या। ना चाल्लण की आसंग रही। घर के उसनै मैडीकल मैं लेगे। भर्ती होग्या। खून टैस्ट हुया। ढाई ग्राम खून का नम्बर (हिमोग्लोबिन) पाया चौधरी साहब का। डयूटी आला डाक्टर बोल्या दो शीशी खून की चाहियें तुरत। चौधरी साहब नै डाक्टर तै बूझया - डाक्टर साहब। यू खून मोल नहीं मिलज्या। डाक्टर बोल्या - माणस का माणस के खून चढ़ै सै हाथी का खून थोड़ा चढ़ाणा सै। ब्लॅड की खातर उसके दोनूं छोरे बी कन्नी काटगे। उसनै सी एम की कोठी तै बी फोन करवाया। ब्लॅड बैंक मैं उसके ग्रुप का खून नहीं था। डाक्टर नै बेटे समझाए अक जिब थाम अपणे बाप खातर खून दे कै राज्जी कोन्या तो और कोए कौण देवैगा? फेर छोरे तो जमा नहीं मान्ने। रामपत की छोरी नांगलोई ब्याह राखी थी वा हाल चाल बूझण आई थी तो एक बोतल तो उसनै दिया। डाक्टर बोले दो बोतल और चाहिये।
दोनूं बेट्यां नै सलाह करी अक कुछ जुगाड़ करया जा। घूम फिरकै वे दो रिक्से आल्यां नै पाकड़ ल्याये चार सौ-चार सौ रूपइयां मैं। उननै न्यूं बी बेरा था अक ये दोनूं कई बै खून दे कै जा लिये ब्लॅड बैंक मैं। खून दे दिया उननै तो रिकार्ड मैं नाम लिखावण लाग्गे तो एक नै लिखाया रामचन्द्र सन आफ धर्म सिंह वाल्मिकी अर दूसरे नै लिखवाया रूप चन्द्र वल्द कन्हैया हरिजन। दोनूं बेटे एक बर तो हिचके पर फेर सैड़ दे सी दोनों बोतल ले कै वार्ड मैं पहोंचगे। डाक्टर नै वे दोनूं बोतल चढ़ा दी रामपत कै। उसके दोनूं बेट्यां कै जाड्डा चढ़रया था अक जै बाबू नै बूझ लिया अक यू किसका खून सै तो के जवाब देवांगे। फेर रामपत तो न्यों ए बड़बड़ान्दा रहया - तावले से चढ़वा द्यो खून। मनै बचाल्यो -।
आगले दिन रूप चन्द अपणे बकाया पीस्से लेवण ताहिं आया तो रामपत नै बूझ लिया अक क्यांके पीस्से? रूपचन्द ने सारी बात बतादी रामपत ताहिं। रामपत नै बूझया - तेरी जातके सै भाई तो रूपचन्द नै अपनी बी बतादी अर राम चन्द्र की बी बतादी। रामपत तो चुप खींचग्या। भींत बोलै तो रामपत बोलै। पीस्से दिवा के रूप चन्द सैड़ दे सी फारिंग करवा दिया अर अपना मन समझाया - खून मैं जातपात किसी? खून तो सबका ए एक सा हो सै। सवाल यूहे सै अक फेर यू जात्यां पै खामैखा का रोल्ला क्यूं? असली बात याहे सै अक हम बंटे रहवां जात्यां मैं अर लड़दे रहवां आपस मैं अर ऐश करनिया इनके नाम पै काच्चे काटें जावैं। फेर हमनै कड़ै फुरसत सै ये सारी बात सोच्चण की। ताश खेल्लण तै फुरसत मिलै तो किमैं सोचां। सोच कै देख लियो आच्छी ढालां-या जात ढेरयां आला कुड़ता सै इतनै इसनै तार कै नहीं फैंकांगे डेरयां तै पैंडा कोन्या छूटै। बख्त बदलगे। हम कद बदलांगे?

किसपै यकीन करां

किसपै यकीन करां
धर्मबीर अखबार पढ़ण लागरया  था। बेचैन था। पहले पेज पै तीन खबर पढ़ी उसनै। पहली खबर थी अक फलाणे गाम मैं फलाणे के घरां फलाणे नै फलाणे की छोरी गेल्यां जोर-जबरदस्ती करण की कोशिश करी। दूसरी खबर थी अक फलाणे गाम मैं फलाणे माणस नै फलाणे की बहू गेल्यां फलाणें के खेतां मैं काला मुंह कर्या। तीसरी खबर थी अक फलाणे शहर मैं फलाणे मोहल्ले की 10 साल की बच्ची गेल्यां बलात्कार हुया। फेर दो खबर थी अक फलाणे गाम मैं 14 लड़की तै असम तै बिहार तै, मध्यप्रदेश तै खरीद कै ल्या लिये अर पंद्रहमी काल ल्याये सैं खरीद कै। कहवण नै कहवैं सैं अक ब्याह कै ल्याये सां। इतणी वार मैं कर्मबीर आग्या अर औ राम राम करकै धर्मबीर तै बोल्या - सुणा के खबर सैं धर्मबीर। धर्मबीर नै कर्मबीर ताहिं अखबार का पहलड़ा पेज पकड़ा दिया। वे सारी खबर कर्मबीर पढ़-पढ़ा कै बोल्या - भाई कोए चाहे बुरा मानो चाहे भला मानो फेर बलात्कार घणे होवण के दो कारण सैं। धर्मबीर का ध्यान उस कान्ही गया। कर्मबीर बोल्या - एक तो ये लुगाई नौकरी करण के चक्करां मैं जिब तै बाहर जावण लाग्गी सैं जिब तैं बलात्कार फालतू होगे। दूसरा इस फैशन नै म्हारे देश का टिब्बा कर दिया। जिब तै ये छोरी अर बहू फैशन करकै बाहर लिकड़ण लाग्गी सैं, ये जीन पहर कै सड़कां पै घुम्मण लाग्गी सैं जिबै तै ये बलात्कार फालतू होगे। ओर बी दो-तीन लड़धू बैठे थे वे भी छुटदे की साथ बोले - कर्मबीर कति सोला आने सही बात कैहरया सै। आज काल की छोरी काबू ए मैं कोन्या रही। इनका घणा पां लिकड़ग्या, ज्याहें तैं ये इस ढाल की घटना फालतू होवण लाग्गी। एक जन्या बोल्या - तो के इलाज हो इसका। कर्मबीर बोल्या - इलाज तो जिबै होवै जिब ये बहू अर छोरी घर तै बाहर पां नहीं धरैं। इतनी बार मैं ज्ञान-विज्ञान आला राजेश बी आग्या अर ओ बी उनकी बात सुणण लागग्या। धर्मबीर धौरे रह्या कोन्या गया अर बोल्या - रै कर्मबीर भाई तेरी बात किमैं जंची कोन्या। कर्मबीर खावण सी नै आया - क्यूं सोचण मैं के दिक्कत सै तेरै। या सारी दुनियां तो न्योंए रुक्के मारै सै अब इन बीर-बानियां का घर तै बाहर पां लिकड़ग्या ज्यां तै बलात्कार बधगे। धर्मबीर बोल्या - कर्मबीर भाई घणा ठाड्डू मत ना बोलै। तनै अपनी बात पूरी कैह ली अर हमनै शांति तै तेरी बात सुनी। ईब तूं औरां की बात बी आराम तै सुण।
राजेश बोल्या - बात सही सै भाई। हां धर्मबीर बता तूं अपणी बात बता। धर्मबीर बोल्या - आज के अखबार मैं पांच बलात्कारां की कै छेड़खानी की खबर छपी सैं। इनमैं तै दो तै दो गामां मैं घरां धिंगताणै बड़कै करी औड़ घटना सैं, दो खेतां मैं हुई औड़ घटना सैं अर एक दस साल की बच्ची गेल्यां हुई औड़ घटना सै। फेर इस अखबार मैं छपी ये पांच खबर तो इसकी बातां की ताईद कोन्या करती। इन पांचों बलात्कारां का ना तो फैशन गेल्यां कोए संबंध अर ना बाहर जा कै नौकरी करण तै कोए मतलब। अर ये जितने रलधू आड़ै बैठे सैं ये भी कर्मबीर की हां मैं हां मिलावण लागरे सैं। एक जन्या बोल्या - हमनै के बेरा म्हारे सोनीपत के कालेज का म्हारा टीचर सै ओ कहै था हाथ कंगन नै आरसी के अर पढ़े-लिखे नै फारसी के। उसकी छोड़ सुण एक दिन की पांच खबरां मैं तो ये बात गलत पाई गई सैं फेर आपां एक हफ्ते की अखबारां की रिपोर्ट कट्ठी करकै देखल्यां, उनमैं भी, मेरे आली बात सही पावैगी अक बलात्कारां का जीन के फैशन तै अर लुगाई के नौकरी पै जावण तै ताल्लुक नहीं सै। कर्मबीर फेर गुस्से से मैं आकै बोल्या - मैं तो फेर बी कहूं सूं अक जै लुगाई घर तै बाहर नौकरी खात्तर नहीं जात्ती तो उसपै बलात्कार नहीं होत्ते। अर इस फैशन नै बी जलती मैं घी का काम करया सै। धर्मबीर बोल्या - कर्मबीर भाई तूं ठाड्डा सै, तेरा रुतबा सै, तूं पीस्से आला सै ज्यां तै ये रलधू तो बात तो तेरी ए मानैंगे फेर इसका मतलब यो कति नहीं सै अक तेरी ए बात साच्ची सै। साच्ची बात तो सै मेरी फेर तूं मान चाहे मत मान।
एक दिन मनै अखबार मैं या बी पढी थी अक लड़कियां अर बच्चियां गेल्यां बलात्कार उनके पड़ौसी, कै जानकार, कै रिश्तेदार करणिया फालतू सैं। अर उस अखबार मैं न्यों बी लिख राखी थी अक घर की चारदीवारी भीतर भी महिलावां पै खूबै अत्याचार होवैं सैं। अर ये बलात्कार की घटना बी घर-परिवारां मैं घाट ना होत्ती। कर्मबीर जो बात कहवै सै ना अक बीरबानी नै तो घर मैं ए रैहणा चाहिए बाहर नौकरी पै नहीं जाणा चाहिए तो महिला अपने घर-परिवार मैं भी सुरक्षित कोन्या। खबरां के हिसाब तै दो महिलावां गेल्यां तो उनके घर मैं ए बलात्कार हुए। इस सारे मामले की जड़ घणी डूंघी सै। यू पुरुषवादी समाज मैं औरतां नै भोग की चीज समझण का मामला सै। औरत नै घर की चारदीवारी मैं बंद करकै बात बणैगी इसा मनै तो दीखदा कोन्या। इस तरियां ड्रेस कोड लाये का बी कोए फर्क पड़ेगा मनै तो कोन्या लागता। बाकी कर्मबीर जै औरतां नै फेर बी घर मैं कैद करकै राखणा चाहवै सै तो इसकी मर्जी। बलात्कार का ताल्लुक बाहर अर भीतर तै नहीं सै कई और बातां तै सै। औरत सुरक्षित तो कितै बी कोन्या। क्यूं? इसका जवाब चाहिए। कर्मबीर बोल्या - इसका जवाब कूण दैवैगा? राजेश बोल्या - कूण के देवैगा। के रामजी आवैगा जवाब देवण। उसनै प्रसाद चखण तै कड़े फुरसत सै इसी बातां पै विचार करण ताहिं। हमनै खुद बैठकै इन सब बातां पै विचार करना पड़ैगा। अब आखिर हम करण के लागो सां? छोरी का पेट मैं कत्ल करते हम कति नहीं हिचकदे। हम हत्यारे सां या बात मानण नै तैयार कोन्या। इसे ढाल हम औरत नै बराबर का इनसान मानण नै तैयार कोन्या। उसनै उसके नाम तै पुकारण नै तैयार कोन्या। कर्मबीर बोल्या - बात नै पलटै मत ना। राजेश बोल्या - यू एकला बलात्कार का मामला कोन्या, यू औरत का समाज में के स्थान सै इस गेल्यां बी जुड्या मामला है। कर्मबीर उठता-उठता बोल्या - कितनी ए बात करल्यो फेर बात सही वाहे सै जो मनै कही थी। इतनी कैहकै कर्मबीर चाल पड्या। राजेश अर धर्मबीर उसनै जात्ते नै देखते रहे।
राजेश बोल्या - धर्मबीर घबरावै ना। म्हारी बात सही सै। कर्मबीर बरगे फांचर ठोक नहीं मानते तो कोए बात ना बाकी बहोत सैं जो ईब इन बातां नै समझण लागे सैं।
---

किसानी का संकट

किसानी का संकट
फर्रुखाबाद, कानपुर देहात, कन्नौज, इटावा, अर उन्नाव जिल्यां के किसान उत्तरप्रदेश में पैदा होवण आले आलू का 60 प्रतिशत पैदा करैं सैं। पहलम मैं वे कृषि के वैज्ञानिकां धोरै अपनी फसल बधावण के टोटके बूझया करदे, ईब कैन्यों बूझैं सैं अक आलू की पैदावार कम क्यूकर करां। उल्टे बांस बरेली नै। ये सन 2002 की बात सैं। शीत घरां मैं 69 लाख टन आलू भरया पड़या था अर 25 लाख टन खेतां मैं पड़या सड़ण लागरया था। इसे ढाल एक बात और जिब चौ. चरण सिंह प्रधानमंत्री थे, जिब लोगां ने ईख-खेत मैं फूंक्या था। ईख के दाम पिटगे थे। झोटा बुग्गी का भाड़ा बी पूरा कोन्या होवै था। न्योंए गिहुआं के भा पिटे। एक बै चावल पिटया अर सिरसम की तो बूझो ऐ मतना। किसान ज्यूकर म्हारे देश का रिवाज सै, वो अपना सिर पाकड़ कै अपनी किस्मत नै रोवण लागज्या सै कै सल्फास की गोली खा कै ऊपर बख्त तै पहोंच जावै सै। किसान की फूटी किस्मत का मामला यू सै ए कोन्या। फसल आच्छी फेर बी टोटा। असल मैं केंद्र सरकार की बुद्धि भ्रष्ट होंती जावण लागरी सै। विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष अर डब्ल्यूटीओ की शर्त मानण के नाम पै उसनै अपने किसान अनाथ बनावण का ठेका ठा लिया।
सब्सिडी खत्म करण के नाम पै उसनै खाद के कारखाने बंद करवा दिये खाद पै सब्सिडी खत्म करकै। किसानां ने म्हंगे दर पै खाद मिल्या, खपत फालतू चाहिए, बिजली अर पानी की दर बधा दी। फेर बिजली पानी बख्त पै मिलज्या किसानां नै इसकी कोए जिम्मेदारी नहीं सै सरकारां की। बधे औड़ बिलां नै उसूलना उसका काम सै अर जै सहकारी बैंकां की किस्त जमा नहीं करवाई हो तो 21 दिन ताहिं जेल मैं बंद करण का काम सैड़ फैड़ तैड़ देसी करदें सैं। फेर एक खास बात या सै अक इन शर्तां नै लादण आला देश अमरीका कुछ औरे करण लागरया सै। अमरीका की सरकार नै सरकार द्वारा दी जावण आली किसानां की सब्सिडी मैं बढ़ोतरी कर दी। 2002 मैं अमरीका नै अपने ‘फार्मर्स विधेयक’ के माध्यम तै अपने किसानां ताहिं 300 बिलियन डालर की दी जावण आली 58 फीसदी तै बधा कै उसमैं 173.5 बिलियन डालर का इजाफा कर दिया। इसतै न्यारा दूसरे देशां की मंडी पै कब्जा जमावण की खातर अमरीका न्यारी-न्यारी फसलां नै भी सब्सिडी देवै सै। मिसाल के तौर पै एक टन सोयाबीन के पाछै 193 डालर की सब्सिडी देवै सै अर सोयाबीन नै 155 डालर प्रति टन के हिसाब तै बदेशां मैं बेचै सै। इसका नतीजा साफ सै अक दूसरे देशां का जिसमैं भारत बी सै, सोयाबीन धरया का धरया रैहज्या सै। सोने पै सुहागा यो सै अक म्हारे देश के महान अर्थशास्त्री न्यौं कहवैं सैं अक जै म्हारे देश का किसान इतना आलसी अर बेकूफ सै अक ओ अमरीका के किसानां तै महंगा सोयाबीन तैयार करै सै तो उसका खामियाजा ग्राहक क्यों भरै? जै अमरीका का किसान भारत के मध्यम वर्ग मैं सस्ता सोयाबीन उपलब्ध करवा सकै सै तो इसका लाभ उसनै जरूर ठावना चाहिए। उसनै भारत के ‘आलसी’ किसान तै के लेना देना? फेर या सच्चाई साहमी कोन्या आन्दी अक म्हारे भारत देश का किसान नकारा कोन्या, म्हारे देश की सरकार नकारी सै जो अपने किसानां नै दी जावण आली तमाम सुविधा भूमंडलीकरण की नीतियां के दबाव मैं समाप्त करण लागरी सै अर अमरीका जो सारे कायदे कानूनां नै अर समझौत्यां नै धत्ता बता के अपने किसानां की सब्सिडी बधावण लागरया उसके खिलाफ मुंह बी कोन्या खोलती। नतीजा किसानां द्वारा रोज आत्महत्या सल्फास की गोली खा कै।
म्हारी सरकार ने सब्सिडियां पै ए कुल्हाड़ी कोन्या चलाई, इसके साथ-साथ किसानां की फसल की खरीद बी करीब-करीब बंद करकै छोटे अर मध्यम किसान बाज़ार के हवालै कर दिये। मंडी नै खुली लूट की छूट मिलगी। मंडी के आढ़तियां के शोषण तै किसान आच्छी ढालां वाकिफ सैं। चिट बी मेरी पिट बी मेरी। हरेक ढालां किसान की मर सै। किसे नै कहया सै ना अक चाहे खरबूजे पै चाकू पड़ै अर चाहे चाकू पै खरबूजा पड़ै कटना तो खरबूजे नै ऐ हो सै। तो किसान की मंडी मैं लूट बी इसे ढालां की सै। देन्ती हाणा बी उसकी लूट अर लेन्ती हाणा बी उसकी लूट। हरित क्रांति के दुष्परिणाम ईब साहमी आवण लाग लिये। लागत बधती गई अर भा बढ़े कोन्या। दूसरा कीटनाशक दवाइयां के, कैमीकल खाद के अंधाधुंध इस्तेमाल नै धरती की उपजाऊ ताकत कम कर दी। पानी का स्तर घणी डूंघै चल्या गया। पैदावार मैं खड़ौत आगी। जड़ खेती तै किसान की जो पहलम गुजर-बसर हो जाया करती उसपै सवालिया निशान लाग लिया। फसल चक्र बदलन की वकालत अर ओरगेनिक फार्मिंग का शगूफा छोड़ दिया गया बिना सोचे-समझे। असल मैं दूसरे देशा की जरूरत तय करण लागरी सै अक म्हारे किसान नै खेत मैं के बोवणा चाहिए। एक और बात होगी अक इन सारी बातां के चालदे जो भी किसान अपनी फसल नै जल्दी-जल्दी मंडी मैं लेजा कै बेच्चण नै मजबूर सै उसनै तो घाटे का सौदा करना ए पड़ै सै। आढ़ती की मनमानी का शिकार होना पड़ै सै।
भारत के अलग-अलग प्रदेशां मैं किसानां की आत्महत्यावां कै पाछै उनका निकम्मापन, उनका अैहदी पना नहीं सै। उसकी इस करकै फसल आच्छी नहीं हुई यू कारण कोन्या। असल मैं कारण तो यू सै अक फसल घणी बढ़िया होगी फेर मंडी मैं उसके दाम इतने गिरगे अक उसकी लागत बी कोन्या मिलती। इसमैं किस्मत का रोला नहीं सै यू नीतियां का रोला सै। लाखां परिवारां पै तलवार लटकै सै अर इनकी साथ खेत मजदूरां की जिंदगी बद तै बदतर होत्ती आवै सै। राशन की व्यवस्था ऊं चौपट करदी सरकार नै। समस्या और भी गंभीर होगी। यूपीए सरकार क्यूकर सामना करैगी यू जनता आण आले बख्तां मैं देखैगी। देख भी ली। बदल ल्यादी। बदल नै और भी तेजी ल्यादी। थोड़ी लिखी नै ज्यादा समझियो।

चाल तरक्की की

चाल तरक्की की
गाम मैं सते, फते, सविता, सरिता, कविता अर धापां ताई, शनिचर नै सब बैठक मैं आये अर आराम तै बैठ कै दुःख-सुख की बतलाये अक न्यारे ढाल के आंकड़े कठ्ठे करकै ल्यावण की जिम्मेदारी किस किसनै नहीं निभाई। ताई धापां या बात देखकै बड़ी दुःखी होई अक सब कठ्ठे करकै ल्यारे थे। जो आंकड़े कठ्ठे करके नहीं ल्यावैगा ओ एक किलो बरफी खवावैगा या शर्त थी। ताई बोली तो सते बतावैगा अपनी बात। सते बोल्या - सारी दुनिया के स्तर पै प्रति व्यक्ति सालाना कितनी आमदन सै बेरा सै? सारे गुटर-गुटर देखैं इसकी कान्हीं। बोल्या - बस! तो ले हम बतावैं सैं - 5120 डालर सै। भारत मैं प्रति व्यक्ति आय कितनी सै? इबकै तो कविता बतावैगी। कविता बोली - पक्का तो बेरा ना फेर या 500 डालर के करीब होनी चाहिए। सते नै बतया - हां 560 डालर सै। दुनिया मैं भारत का स्थान 162वां सै बस 29 देश भारत तै तलै बताये। सूरता बी आग्या था वो बोल्या - तूं ये आंकड़े कड़े तै ल्याया भाई? ये तो कोरी बकवास सै। ‘साइनिंग इंडिया’ इतना नीचै क्यूकर हो सकै सै? सते बदेशी कम्पनियां धोरै पीस्से लेरया सै ज्यां करकै भारत के बारे मैं इतनी घटिया अर झूठी बात करै सै। सते बोल्या - ये आंकड़े वर्ल्ड डेवलपमैंट इंडीकेटर-2003 तै ल्याया सूं। सूरता बोल्या - यो इंडीकेटर तै अंग्रेज छापते होंगे ना? म्हारी आस्था सै अक म्हारा देश तै कसूती ढालां दुनिया मैं ‘शाइन’ करण लागरया सै। सते ये झूठे आंकड़े नहीं चालैंगे भाई। सते बोल्या - कहवै तो रिपोर्ट ल्याकै दिखाद्यूं। सूरता बोल्या - के फरक पड़ै सै। जिब म्हारी आस्था सै अक तक्षिला अर नालंदा की म्हारी इतनी बढ़िया परम्परा का कोए मुकाबला नहीं दुनिया मैं तो ईब इस रिपोर्ट पै क्यूंकर यकीन कर ल्यूं? या हमनै बदनाम करण की साजिस सै। ताई बोली किसे रफड़े मैं फंसगे। आस्था का अर विज्ञान का जिब बी कोए टकराव हुया तो कुरबानी तो विज्ञान नै फालतू दी फेर जीत बी विज्ञान कीए होई। जिब ब्रूनो नै दुनिया कै साहमी या बात कही अक धरती के चौगिरदें सूरज नहीं घूमता उल्टा धरती सूरज के चारों कान्हीं घूमै सै तो उस बख्त के कट्टरपंथियां नै ब्रूनो जिन्दा जला दिया था। इसे तरियां गैलिलियो ताहीं भी फांसी की सजा सुना दी थी। इबै इन आंक्ड़यां पै आंगली कोए नहीं ठावैगा।
सरिता नै अपनी बात शिक्षा पै कही - भारत मैं दुनिया की आबादी का 16 8 फीसद रहवै सै फेर दुनिया के वयस्क निरक्षरां मैं तैं 34 फीसदी भारत मैं सैं तो भारत महान कड़े तै होग्या? 94 विकासशील देशां के शिक्षा सूचकांक मैं भारत का स्थान 76वां सै। तृतीय ‘टरसरी’ स्तर की शिक्षा मैं प्रवेश का अनुपात दुनिया का 23 फीसदी सै अर भारत मैं यो 10.5 फीसदी सै। क्या कहने भारत के! सूरते पै फेर कोनी टिक्या गया अर बोल्या - तूं किततै ल्याई सै ये आंकड़े? सरिता बोली - यूनेस्को की रिपोर्ट, एजुकेशन फॉर आल-2003-2004 मैं तै ल्याई सूं मेहनत करकै नै। अर सुनल्यो भ्रष्टाचार सूचकांक के हिसाब से दुनिया के 102 देशां मातै भारत 71वें स्थान पै सै। सिर्फ 31 देश सैं जो भ्रष्टाचार मैं भारत तै आगै सैं। यू आंकड़ा ट्रांसपेरैंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट 2003 तै लिया गया सै। ईबी कुछ कहना सै सूरत सिंह जी नै इन आंकड़या के बारे मैं? कोरी आस्था के दम पै कदे बी दुनिया कोनी चाली। सूरत सिंह कुछ कहना चाहवै था तो ताई बोली - एकबै सारे बोल लेवैं फेर दूसरा गेड़ा आवैगा।
कविता की बारी आई अर वा बोली - विदेशी ऋण का बोझ भारत पै 1998-1999 मैं 9823 करोड़ डालर था, जो 2003 जून ताहीं बधकै 10960 करोड़ डालर पै पहोंचग्या। 1998 मैं मार्च ताहीं देश के धनवानां पै बकाया कर 47444 करोड़ रुपइये था जो 2002 के 21 मार्च ताहीं बधकै 86342 करोड़ रुपइये होग्या। ये सारे आंकड़े मनै आर्थिक सर्वे 2002-2003 तैं कठ्ठे करे सैं। दूजे कान्हीं किसानां की 4500 हजार करोड़ के लगभग की सबसिडी पै जूत बजा राख्या सै। कम तै कम जिब म्हारे नेता गाम मैं आवैं तो इन बातां पै इनका के कहना सै हमनै बूझना तो चाहिए।
फते कई वार का मसकोड़े से मारै था, उसका नम्बर आया तो उसनै बताना शुरू करया - म्हारे बरगे 62 देशां के सूचकांक के आधार पै वैश्वीकरण की कटारी चाले पाछे के विकास का किस्सा घणा दर्दनाक सै। इन देशां मैं दुनिया की 80 फीसदी आबादी रहवै सै। 2001 में भारत का स्थान 49वां था फेर भला हो एनडीए की सरकार का अक 2002 मैं यो 57वां होग्या अर 2003 मैं यो 61वां होग्या। सुरते कै आज बेरा ना के होरया था बोल्या - सारी काट करोगे अक किमै आच्छी बात बी बताओगे? ईब आच्छी कड़े तैं घड़ां सुरते की खातर?

खाट का आंदोलन

खाट का आंदोलन
खाट ग्रामीण आंचल मैं सबतै आरामदेह उपकरण सै, जिसका इस्तेमाल थक हारकै आये किसान अर कामगार के विश्राम करण की खातर अर सोवण की खातर करया जा सै। गाम की चौपाड़ मैं कै बैठकां मैं लोग खाटां पै बैठकै ए गपशप करया करैं अर होक्के की घूंट मारें जाया करैं। जिन बख्तां मैं सोफा अर बैड नहीं आये थे उन बख्तां तै खाट का रिवाज चाल्या आवै सै। इसकी कीमत बी घणी ना सै अर गाम का कोए बी माणस इसनै खुद बी बना सकै सै।
सितंबर की पन्दरा तारीख धोरै सी चित्तौड़गढ़ के अचलपुरा गाम मैं दलितां नै एक खास ढंग तै अपना प्रतिरोध दर्ज करवाया। नेड़े धोरे के गामां के लोग जो दलित समुदाय के थे अपनी साथ खाट ले कै आये। ये खाट धोरै-धोरै बिछाकै इनपै बैठे अर गाम गुहांड मैं सामन्ती उत्पीड़न के खिलाफ क्यूकर आवाज़ ठाई जावै इसपै चर्चा करी। खास बात या रही अक इस बैठक मैं स्टेज का काम भी खाट तैए लिया गया। न्यूं देखां तो आड़ै ‘खाट’ प्रतिरोध के एक प्रतीक के रूप मैं उभर कै आई। इस प्रतीक की ताकत नै समझण की खातर हमनै उत्तरी भारत के यथार्थ तै रूबरू होना पड़ैगा। पूरे उत्तरी भारत मैं दलित समुदाय राजनीतिक ए नहीं, आर्थिक अर सामाजिक वंचना के भी शिकार रहे सैं अर आज बी सैं - दुलीना, हरसौला, गोहाना इसकी जीती जागती तसबीर सैं। मुख्य रूप तै सत्ता प्रतिष्ठानां के दायरे तै बाहर रहवण आला यू वर्ग आर्थिक तौर पै संसाधन विहीन रहया सै। कृषि प्रधान आर्थिक व्यवस्था मैं धरती गुजर बसर की सुरक्षा अर खुशहाली का ए स्रोत नहीं होत्ती बल्कि समाज मैं माणस की हैसियत का भी प्रतीक होया करै।
आज़ादी के बाद भी उत्तर भारत मैं भूमि सुधार की दिशा मैं कोए ठोस कदम कोन्या ठाये गये जिस करकै दलितां की स्थिति मैं कोए विशेष बदलाव कोन्या आया। फेर आरक्षण के चलत्ते दलितां मैं जो राजनीतिक नेतृत्व उभर कै आया, प्रशासनिक तन्त्र मैं उनकी जो थोड़ी हिस्सेदारी बधी, उस करकै इनमैं अस्मिता बोध विकसित होना लाजमी बात थी। दलित समुदाय नै एक दौर सै जिब खुद की पहल करकै नये ढाल के काम-धंधे अपनाये अर अपने खून पसीने तै आर्थिक बेहतरी के जतन करे। इस बदलाव नै म्हारी पुरानी सामाजिक व्यवस्था अर मान मूल्यां ताहीं गंभीर चुनौती दी सै। इसकी सबतै फालतू बेचैनी सामंती शक्तियां मैं देखी जा सै। एक सवाल तै उठै ए सै दिमाग मैं अक इसा सर्वसुलभ उपकरण सै खाट फेर इसपै बैठण ना देवण की मनाही का असल मैं के मतलब सै? जै इसकी गहराई तै पड़ताल करां तै बेरा लागैगा अक छुआछूत कहवण की खातर खत्म हुई सै। हरियाणा के किसे गाम का लेखक नै बेरा कोनी जित छत्तीस जात के लोग एक कुएं तै पानी भरकै ल्यांदै होवैं। हो सकै सै एकाध गाम हो इसा। जै कोए इसा गाम हो तै एक पोस्ट कार्ड लिखकै जरूर गेरियो। मन्दिरां मैं दलितां के जावण पै रास्सा छिड़ज्या। असल मैं म्हारे सामाजिक ढांचे मैं दलितां की उपेक्षा अर वर्जना मौजूद सै जिस करकै दलित अमानवीय अर त्रासद जीवन जीवण नै मजबूर सैं। इसमैं असल मैं सवर्ण लोगां का भी अमानवीकरण निहित सै। या जात ढेरयां आला कुड़ता सै जितनै पहरे रहवैगा समाज उतनै खाजले कुत्ते की ढालां दुखी रहवैगा।
खाट पै बैठण की लड़ाई असली मैं एक दलित की वैयक्तिक गरिमा की लड़ाई सै। उसके आत्म सम्मान का मसला सै। या बात आज समाज नै समझनी बहोत जरूरी सै। दलित नै हाशिये पै गेर कै समाज का विकास अधखबड़ा अर बेसुरा रहवैगा, इस बात मैं शक की कति गुंजाइश नहीं सै पर फेर बी म्हारे या बात जचती कोन्या। इसे करकै हरियाणा मैं इननै दाबकै राखण के करतब म्हां बीच कै सामन्ती तबके दिखात्ते रहवैं सैं। समाज करवट लेवण लागरया सै। दलित, महिला, युवा आज के दौर मैं बाजारीकरण के सबतै फालतू शिकार हो रे सैं। दूजे कान्ही ये वंचित तबके अंगड़ाई बी लेवण लागरे सैं। अपने आत्म सम्मान अपनी मानवता अपनी इंसानियत बचा कै राखनी सै तो खाट आंदोलन बरगे आंदोलनां मैं तहेदिल तै शामिल होना पड़ैगा आज, आज नहीं तो काल, काल नहीं तो परसों। किसे नै कहया सै अक जब सन् की रस्सी न्यारी-न्यारी पड़ी हो सै तो कुछ नहीं कर सकदी फेर इसनै कट्ठा करकै जब एक रस्सा बना दिया जावै सै तो यो बड़े-बड़े हवाईजहाजां नै खींच ले ज्यावै सैं। सामाजिक असमानता सामाजिक असुरक्षा की जननी सै। जै समाज मैं सुरक्षा लयानी सै तो सामाजिक असमानतावां कै खिलाफ आवाज़ ठावणी बहोत जरूरी सै, फेर ठावै कौण? या तो सब चाहवैं सैं अक समाज मैं भगत सिंह हटकै पैदा होज्या पर, पड़ौसियां के म्हारै नहीं। म्हारे बालकां नै कैरियर बणावण तै कड़ै फुरसत सै।
---

बदलता हरियाणा

बदलता हरियाणा
म्हारे बड्डे-बडेरे बतागे अक बाजे भगत तै सांग करया करता गामां मैं अर साथ मैं भगत फूल सिंह गुरुकुल खानपुर खातर चन्दा मांग्या करता, जिब जाकै यू गुरुकुल परवान चढ्या था। बाकी के स्कूल बी लोगां के चन्दे तै बनाए गए बताए। बाजे भगत नै हरिजनां की कई चौपाड़ सांग करकै पीस्सा कट्ठा करकै बनवाई बताई। जड़ या बात सै अक हारी-बीमारी मैं, ब्याह-शादी मैं लोग एक-दूसरे की मदद पै आ जाया करदे। माणस नै माणस की लिहाज-शरम हुया करती। बुलध के पां मैं फाली लाग जात्ती तो हाली नै इसा महसूस हुया करदा जणों तै उसके अपने खुद के पां कै लागगी फाली। कोए उल्टी-सीधी बात करदा तो च्यार माणस उसनै टोकणिया पा जाया करदे।
हरियाणा मैं कुछ साल पहलम ताहिं खेतां के डोल्यां पै शीशम खड़ी पा ज्याया करती। इनकी छां बी बढ़िया अर खेती मैं बी नुकसान ना। हलाई काढ़ कै हाली शीशम की छां मैं बैठ के जोटा लाया करता। इसकी लाकड़ी बी काम्मल बताई। शीशम के इतने फायदे अर फेर बी शीशम खत्म होत्ती जावण लागरी? हरियाणा विज्ञान मंच हर साल बाल विज्ञान कांग्रेस करदा बताया। कैथल के बाल वैज्ञानिकां नै एक सर्वे करया था कुछ साल पहलम जिसमै उननै इन शीशमां के खतम होवण के कारणां की तह मैं जावण की कोशिश करी थी। इसे ढाल बालकां नै एक सर्वे मैं देख्या अक गिद्धां की संख्या तेजी से घटदी जावण लागरी सै। इसके कारण बी टोहे। मरे औड़ गिद्ध कोन्या पाये उननै। अन्दाजा यू लाया अक खेती मैं जो कीटनाशक इस्तेमाल करे जावैं सैं वे पशुआं की मांसपेशियां मैं (पुठ्यां) मैं जमा होत्ते रहवैं सैं। पशु नै तो जो नुकसान हौवे सो होवै। इनका मांस जिब गिद्ध खावैं तो उनकै भी प्रजनन शक्ति पै उल्टा असर पड़ै सै अर इस कारण गिद्ध नपुंसक होगे अर उनकी संख्या घटगी। पाछै सी खबर थी अक कई जगां पै मोर मरे पाये गये। इसका कारण भी कीटनाशक दवाइयों के नेड़े-धोरै बताया वैज्ञानिकां नै।
भैंसा कै टीका लाकै दूध काढणा आम बात होगी। फेर इस टीके मैं जो दवाई सै ऑक्सीटोसिन उसके दुष्प्रभावां तै बेखबर सैं हरियाणा के लोग। सुण्या सै पेट की खराबी अर जवान गाभरूआं मैं नपुंसकता इन्हें कारणां तै बढ़त पै सै। पाणी मैं भी रमगे ये कीटनाशक, धरती मैं रमगे अर रमगे माणसां मैं भी। हरित क्रान्ति आई गेल्यां बीमारी नै बी ल्याई, पाणी धरती-माणस की इनै रेल बनाई। एक खास बात और सै ऊं तो कहवै अक म्हारे बेदां मैं महिला ताहिं ‘देवी’ का स्थान दिया गया सै। फेर इस ‘देवी’ नै एक कान्ही तो पेट मैं ए निबटा देवैं सैं अर दूजे कान्हीं पांच-पांच हजार मैं खरीद कै ल्यावैं सै कदे आसाम तैं, कदे बिहार तैं, कदे बंगाल तै। ज्यूंकर बाकी कामां की खातिर ‘बिचौलिये’ सैं म्हारे गामां मैं न्योंए इस काम की खातिर बी बिचौलिये पैदा होगे। अस्पतालां मैं कै तो दवाई नहीं अर दवाई सै तो डाक्टर नहीं, डाक्टर बी सै तो कम्पाउण्डर नहीं। स्कूलां का हालै मतना बूझो। जो स्कूल चन्दे गेल्यां बनाये थे वे ढहो चाहे रहो किसे नै कोए चिन्ता कोन्या। अैहदी पणे की हद होगी। नहरी पाणी गांम की खेती खातर ‘लाइफ लाईन’ बताया। रजबाहे तै जो नाला इन खेतां मैं पाणी ल्यावै सै उसकी खुदाई बी तीन-तीन च्यार-च्यार साल कोन्या करदे हाम।
ये सारी बात गहराई तै सोच्यण की सैं। बेरा ना गामां म्हं इन बातां कान्ही ध्यान गया सै कि नहीं गया सै। जिन गामां का मनै बेरा सै उड़ै तो इन बातां की कोए चर्चा नहीं। फेर इसी बातां कान्हीं उनका ध्यान क्यूंकर जावै? गाम आल्यां नै ताश खेलण तै फुरसतै कोन्या। कोए कट्ठे करण ताहिं बुलावै बी तो न्यों कहवैंगे - गेर रै गेर पत्ता गेर। आवां थोड़ी सी वार मैं। थाम शुरू करल्यो। फेर मजाल सै जै ताशां नै छोड कै दो बात किसे की सुणलें।
गाम म्हं छोरियां गेल्यां छेड़खानी की वारदात बधण लागरी सैं इनका किसे कै कोए खाता नहीं। जड़ बात या सै अक गाम काल उजड़ता आज उजड़ जाओ फेर किसे नै चिन्ता नहीं दीखती। सांझ नै दो घूंट लाकै इसनै गाल दे उसनै गाल दे। घरआली कै ऊपर छोह तार लें अर फेर बिना खायें पड़कै सोज्यां। दारू की मार तै कोए घर तो बच नहीं रहया माणस बेशक बचरया हो। पहलम तो आदमी ए हुक्का पीया करदे ईब तो कुछ औरत बी हुक्टी पीवण लागगी कै बीड़ी फूंकती पा ज्यांगी। कुछ गामां की तो रिपोर्ट या बी बताई अक दो-दो च्यार-च्यार औरत बी दारू का सेवन करण लाग्गी सैं। खांसी के शिकार लोग-लुगाई अस्पतालां मैं लुटते हांडै सैं। टीबी अर दमे की बीमारी बधती जावैं सैं ऊपर तै एडज और आण मरी। चमड़ी की खारिश रात नै सोवण नहीं देत्ती। चिन्ता करकै ब्लॅड प्रैशर बधगे, दिल का धड़का बधग्या। नशाखोरी के साथ-साथ सैक्स के अंगां की बीमारी बधती आवैं सैं। दूध ढोल म्हं घलग्या। पहलम कहया करदे - दूध बेच दिया इसा पूत बेच दिया। ईब सारे इस दूध रूपी पूत नै बेचण लागरे सैं। रोजगार खत्म होगे। प्राईवेट पाणी के नलके आगे। पीस्से आल्यां नै सुख होग्या, बिना पीस्से आल्यां की मर आगी। बुलध किते-कितै टोहे पावैं सैं। गाल भीड़ी होत्ती होत्ती इतनी भीड़ी होगी अक मोटा सा माणस तो लिकड़ै कोनी सकै। पाणी घर-घर मैं नलक्यां तै लियाये फेर इसकी निकासी का कोए इन्तजाम नहीं। कुछ घरां मैं तो भैंस बी नलके के पाणी तै नुहाई जावैं सैं।
परिवार नाम की कोए चीज नहीं बचरी। मकानां मैं रहवैं सैं लोग फेर वे घर नहीं सैं। बूढ़े बालकां नै देख कै राज्जी ना अर बालक बुढयां के मरण की बाट देखे जावैं सैं। सास बहू की कटती करती पावैं सैं, बहू सास नै बुरी बतावैं सैं। करियाणे की दुकान एक गाल मैं दो-दो तीन-तीन खुलगी। इन दुकानां मैं दारू के पाउच आगे। टीवी पै नशा, हिंसा, सैक्स का नंगा नाच क्यों होवै सै इसपै कोए सवाल ना। खेती की तबाही के के कारण सैं इसपै चरचा ना। ये ब्यूटी कम्पीटीशन कस्बयां ताहिं पहोंचगे इसपै चुप्पी क्यों सैं? इसमैं किसकी साजिश सै? कई बात लिखण की ना होत्ती। थोड़ी लिखी नै ज्यादा समझियो अर बिचार करियो। बिचार करांगे तो राह भी पावैगा। विचार तै परहेज करना छोड़ना पड़ैगा।
---