शनिवार, 3 जनवरी 2026

टोटके




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टांड़ पै बिठा दे
एक बै एक छोरी भूखी रोवै थी। घर मैं रोटी थी कोण्या। उसकी माँ नै बहोत समझाई । पर बातां तैं के भूख भाजै थी। रोवणा कोण्या बन्द करया । वा और ठाड्डू रोवण लाग्गी। उसकी माँ नै दो धौल बी धर दिए फेर बी चुप कोण्या हुई छोरी। इतने मैं पड़ौसन आगी अर बोली," नफे की बहू !या छोरी क्यूँ रूआ राखी सै?"
वा बोली," रोटी मांगै सै।"
पड़ौसन बोली," देंती क्यों नहीं ?"
माँ बोली, " रोटी तै कोण्या ना ।"
पड़ौसन सोच साच कै बोली," इसनै टांड पै बिठा दे । "
माँ बोली," टांड पै के रोटी धरी सैं?"
पड़ौसन बोली," बिठा तो सई।" 
माँ नै छोरी टांड पै बिठा दी।
छोरी टांड पै भी रोन्ती रही फेर उसनै रोटी मांगनी बन्द करदी अर बोली," माँ मनै बस इस टांड पर तैं तार दे। 
भूलगी रोटी नै ।
सोचियो!!!!!!!!
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पानीपत की चौथी लड़ाई 
सारे मिलकर करैं पढ़ाई
शायद मतलौडा ब्लॉक की वर्कशॉप थी टीचर्स और अक्षर सैनिकों की कि primar निरक्षरों की  क्लास में कैसे पढ़ना पढ़ाना है । एक पाठ बरसात कैसे होती है इस पर था । कैसे सूर्य की गर्मी और पानी के वाष्पीकरण से बादल बनते हैं और बरसात होती है। एक अध्यापक महोदय ने कहा यह गलत है, बरसात तो हवन करने से होती है ।
हमारे साथी ने उसे और ज्यादा सहजता के साथ समझाया कि बरसात के पीछे क्या क्या वैज्ञानिक मसले हैं । मास्टरजी तो अड़े रहे। फिर हमारे साथी ने पूछा-मास्टरजी आपका बच्चा कौनसी क्लास में पढता है?
जवाब था-- आठवीं में।
साथी-- यदि उसके एग्जाम में यह सवाल आ जाय कि बरसात कैसे होती है तो आप उसे क्या सलाह देंगे
मास्टरजी-- उसे तो मैं यही कहूंगा कि बरसात बादलों से होती है यही लिख कर आना।
साथी से रहा नहीं गया और कहा- फूफा फेर आध घण्टे तैं   म्हारा सिर क्यूँ खान लागरया सै। 
यूं ही याद आयी पानीपत की चौथी लड़ाई जो 1990 में शुरू की और अब तक जारी है ।
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 . एक किसान एक एकड़ में कितना गन्ना पैदा करता है ?
2  एक क्विन्टल गन्ने में कितनी चिन्नी बनती है ?
3 . कितना शीरा बनता है ? 
4 . कितनी खोही बनती है ? 
5 . इनसे आगे एक किलो शीरा से एक दारू की बोतल बनती है । 
6 . इसी प्रकार खोही से कापी पेन्सिल और बिजली बनती है । 
क्या कोई किताब है ऐसी जिसमें इसका पूरा हिसाब किया गया हो ? 
1990-92 में पानीपत की चौथी लड़ाई नाम से साक्षरता अभियान में ये सवाल लोगों ने उठाये थे । मैंने दो साल वहां काम किया था \
तब से उस किताब को ढूंढ रहा हूँ ? आपके पास हो तो एक कापी मुझे भी भेजना जी । ----



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  जिस मन लागै बेरा उसनै पाटै 

मेडिकल के ऑपरेशन थिएटर के बाहर दो अनजान रमलू अर कमलू आपस मैं मिले, मूलाकात हुई।  दोनूं एक-दूसरे नै कोन्या  जानैं थे। दोनों की घर आलियां का ऑपरेशन होवण लागरया था । बख्त गुजारण  की खातर आपस मैं हाल चाल बुझया अर घर बिध की बतलावण लागे ।

इतनी वार मैं एक नर्स नै आकै खबर दी अक रमलू की घर आली इब इस दुनिया मैं कोन्या रही। बड़े जोर का रोना-पीटना माचग्या । रमलू छाती पीट पीट कै  रो लाग्या । रमलू नै अपना सिर दीवार पै मारणा जारी राख्या। कमलू नै बड़े प्यार तैं रमलू के कांधे पै हाथ धर कै कह्या , "जिंदगी मैं आच्छे  भूंडे  दिन तो आते 
रहवैं सैं । इसमैं रोना-धोना ठीक कोन्या । थाम हिम्मत तैं इस दुख नै  औट। "

रमलू नै रोना घाट कर दिया । वाहे नर्स फेर आई अर मुरझा सी कै  बोली, "मैं माफी मांगूं सूं अक रमलू जी ताहिं उनकी पत्नी की मौत की खबर सुनाई। वे बिलकुल ठीक हैं। असल मैं कमलू जी की पत्नी इब इस दुनिया मैं नहीं सैं।"

किसा बख्त नाटक के पात्र बदलगे । इब रमलू दिलासा देवैं थे अर कमलू जी अपनी घर आली नै  याद कर कै जोर-जोर तैं रोवैं थे।



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मेरा घर आला राम जी मेरा तनै के?
रमलू के घर के बराबर आले घर मैं कोए दिन जाता होगा जिब शाका ना माचदा हो।
 नफे चौधरी अपनी घर आली धमलो  की  तड़कै कै सांझ कै धुनाई ना करता हो। रमलू बहोत दुखी हौंदा पर के पार 
बसावै थी?
नफे चौधरी नै  क्यूकर टोकै रमलू ? कई कहते दूसरे के मामलयाँ मैं टांग नहीं फंसाया करदे । फेर रमलू तै रमलू ठहरया। कोन्या डटया गया।

   सीधा जा कै नफे के घर की  बैल बजादी। दरवाजा खुलण मैं थोड़ी सी वार हुई । रमलू बेचैन बहोत हुया । फेर इतनी वार मैं तो नफे चौधरी नै अपना नेग जोग निभा लिया था। धमलो नै भी आंसू पूंछ पांछ लिये थे। झूठ मूठ का हँसण   का दिखावा करण लागी धमलो । रमलू नै थोड़ा छोह से मैं आ कै कह्या, " रोज-रोज का नफे यो के तमाशा सै ? बेरा सै ना, यो शरीफ जनता का  मोहल्ला सै।"

नफे तो चुप रह्या, पर धमलो नै सहज सी रमलू तैं कहया , "साहब नै कुछ  नहीं करया वो तै मैं पड़गी थी, चोट आगी, इस कर कै  आंसू भी आगे ।"

रमलू बोल बाला रैहग्या अर बाहर जावण लाग्या । धमलो दरवाजे तांहीं छोड़ण आई अर  फुसफुसाई , "कॉलेज के दिन भूलज्या, उन बख़्ताँ की बात और थी। जब तै थाम हिम्मत कर नहीं पाये। ईब  तो मेरा घरआला ए मेरा सब कुछ सै। वो मनै मारै कै  लाड करै थारा इसतैं कोई मतलब नहीं।"
रमलू नै जानूं सांप सूंघग्या ...



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काले बाल

बाल काफी बढ़ गये थे। सोचा कि सेंट्रल पर जाकर कटिंग करा आऊं। सो, पहुंच गया। काफी भीड़ थी। घंटे में नंबर आ ही गया। कुर्सी पर बैठते ही सामने आइने पर नजर पड़ी। पीछे वाले सज्जन अपने सफेद बालों को काले करवा रहे थे।

बाल कट जाने के बाद जब फिर आइने पर नजर पड़ी,

तो मालूम पड़ा कि वे सज्जन और कोई नहीं बल्कि आफिस के मेरे सहयोगी सीताराम हैं।

मुझे देखकर सीताराम तनिक झेंप गये। झेंप मिटाते हुए उन्होंने पूछा, "कहो क्या हाल हैं?"

नकल की दुनिया पर एक मामूली-सी बहस चल पड़ी। सफेद बाल काले करवाने के औचित्य पर चर्चा चल पड़ी। आखिर में सीताराम बोले, "भाई, शादी करने जा रहा हूं। बाल तो काले दिखने चाहिए। होने वाली श्रीमती जी के बाल बहुत सुंदर हैं।"

सीताराम की शादी धूमधाम से हुई। कोई दस दिन बाद हनीमून कर वे आफिस पहुंचे। बड़े दुखी दीख रहे थे। मुझे कोने में ले जाकर बोले, "तुम ठीक कहते थे। नकल की दुनिया है। मेरे तो सिर्फ बाल ही सफेद हैं। श्रीमती जी के सुंदर रेशम जैसे बाल तो विग का एक हिस्सा निकले। असली तो नाममात्र को भी नहीं हैं।"


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1
सास बहू का मंदिर जाना

एक नई नवेली दुल्हन जब ससुराल मैं आई तो उसकी सास बोली- बींदणी कल माता के मन्दिर मैं चालना सै। बहू नै बुझया- सासु माँ एक तो माँ जिसनै मेरे तैं जन्म दिया अर एक आप सो और कोन सी माँ सै? सास बड़ी खुश हुई अक मेरी बहू तो बहुत सीधी सै। सास नै कहया- बेटा पास के मन्दिर मैं दुर्गा माता सै काल सारी औरतें जावैंगी हम भी चालांगे। सुबह होने पै दोनों एक साथ मन्दिर जावैं सैं । आगै सास पाछै बहु।  ज्योँहें  मन्दिर आया तो बहु नै मन्दिर पै लागे एक चित्र नै देखकै कहया - माँ जी देखो तो गाय का बाछड़ा दूध चूंघण रहया सै, मैं बाल्टी लयाऊँ  सूं, धार काढ़ागे । सास नै अपने सिर पै हाथ मारया अक बहु तै पागल सै अर बोली - बेटा या फोटो  पात्थर की सै इसे करकै या दूध नही दे सकदी। चाल मन्दिर मैं। ज्योंहे  भीतर बड़ी  तै एक शेर की मूर्ति दिखाई दी । फेर बहू नै कहया - माँ आगै मत जाओ तो शेर  खाज्यागा ! सास नै चिंता हुई अक मेरे बेटे का तै सिर ए फूट लिया और बोली - बेटा पात्थर का शेर क्यूकर खालेगा? चाल भीतर  चाल मन्दिर मैं। सास  फेर बोली- बेटा या माता सै , इसतैं मांग ले जो मांगना सै। बहू नै कहया - माँ या तै पात्थर की सै या के दे सकै सै ? जब पात्थर की गाय दूध नही दे सकदी, पात्थर का बाछड़ा दूध पी नही सकदा ,पात्थर का शेर खा नही सकदा तो या पत्थर की मूर्ति के दे स कै सै? जै दे सको सो तो थाम मनै आशीर्वाद दे दयो सदा सुहागन रहने का।  इब सास की आँख खुली अक या बहू  तो पढ़ी लिखी सै
  के थाम भी पढ़े लिखे सो?

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2
एक बै एक महानुभाव अपनी घोड़ी पै किसे दूर शहर मैं जावण की तैयारी कर कै घोड़ी पै चढ़ कै चाल पड़े। गर्मियां के दिन थे। चलते चलते दोफारा होग्या। घोड़ी तिसाई होगी। महानुभाव नै देख्या  अक एक खेत मैं रैहट चला रहया था एक किसान । वो घोड़ी नै रैहट पै लेग्या अर घोड़ी के पानी पीवन ताही लगाम ढीली कर दी । घोड़ी पानी पीवण लागी तो रैहट मैं तैं किट की जोर की आवाज आयी। घोड़ी बिदक कै पाच्छे नै होगी। सवार नै फेर लगाम ढीली कर कै इशारा करया पानी पीवन ताहिं , घोड़ी नै मुंह तले नै करया तो फेर किट की आवाज होगी। घोड़ी फेर बिदक गी । तीन चार बार न्याें ए हुया तो सवार किसान तैं बोल्या भाई या किट किट बंद करदे घोड़ी बिदकै सै।
किसान बोल्या - पीगी तो किट किट मैं ए पीगी ना तो पाणी कित सै!
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3
फाइनेन्सियल मैनेजमेन्ट

रमलू भिखारी नै 100 का नोट मिलग्या

वो फाइव स्टार होटेल में गया और भरपेट खाना खाया

1500 रुपये का बिल आया, उसनै मैंनेजर तैं कहया – पैसे तो कोण्या मेरे पै!

मैनेजर ने पुलिस के हवाले कर दिया

रमलू नै पुलिस ताहिं 100 का नोट दिया, और छूटग्या

इसनै कहवैं सैं–

फाइनेन्सियल मैनेजमेन्ट विदाउट एमबीए इन इंडिया

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4
रमलू और धमलो में झगड़ा चल रहा था

रमलू – तेरे तैं ब्याह करने तैं आच्छा तो मैं बिन ब्याहा रह जान्ता..

धमलो – मनै भी अपनी माँ

की बात मान ली होती तो आच्छा होता

रमलू – के कहया करती तेरी माँ? 

धमलो – कहया करती
मत कर इस छोरे गेल्याँ ब्याह 

रमलू – हे भगवान् मैं आज ताहिं उस भली औरत नै भुणडी समझता रहया जो मनै बचाना चाहवै थी।

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5
टीचर - बच्चों, वादा करो कि कभी शराब-सिगरेट नहीं पिओगे।

रमलू -कमलू और कई बच्चे- नहीं पीएंगे।

टीचर - कभी लड़कियों का पीछा नहीं करोगे

रमलू -कमलू और कई बच्चे- - नहीं करेंगे।

टीचर - लड़कियों से दोस्ती नहीं करोगे

रमलू -कमलू और कई बच्चे- - नहीं करेंगे।

टीचर - वतन के लिए जान दे दोगे
रमलू -कमलू और कई बच्चे - दे देंगे सर, ऐसी जिंदगी का और करेंगे भी क्या...!!!
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6
साधु:: बच्चा तुझे स्वर्ग मिलेगा । लाओ कुछ दक्षिणा दे जाओ।
रमलू:: ठीक सै दक्षिणा मैं थारे ताहिं मनै दिल्ली दे दी। 
आज तैं दिल्ली थारी होली।
साधु:: दिल्ली क्या तुम्हारी है ? जो मुझे दे रहे हो??
रमलू:: तो यो स्वर्ग के थारे बाबू नै खरीद राख्या सै , जो थाम उड़े के प्लाट ऑड़े बाँटन लागरे सो???



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7
गणेश कै हाथी का सर किसनै लाया?
हरियाणा के आर्यसमाजी भजनी नरसिंह जी हुए । एक बार एक सभा मैं गणेश का जिक्र हुया तो एक टोटका सुनाया उणनै :-
एक बार रोहतक के टेशन पर एक टी टी ला दिया। मकान मिलग्या । भैँस बांधली । मौज होरी थी। एक दिन टिकट काटते काटते नै देख्या अक भैंस तो ट्रैक मैं खड़ी सै। दिल्ली कान्ही की गाड्डी आवन लागरी थी। उसनै भाजकै जाकै भैंस कै धक्का मारकै ट्रैक तैं बाहर करण की सोची। भाजकै गया अर धक्का मारया ।भारया थी । उल्टा वो खुद ट्रैक मैं घलग्या। ट्रेन आई अर दोनुआ नै बीच तैं काटगी।धोरे कै एक बड्डा पहोंचे औड़ बाबाजी जा था। उसनै सारा नजारा देख्या अर सैड़ दे सी तावल करकै भैंस का पाछा अर टी टी का आगा जोड़ दिया। मौज होगी टी टी की। दिन मैं टिकट काटै टेशन पै और तड़कै साँझ नै 10 किलो दूध काढ़ कै पीवै। 
लोग बाग़ कहन्ते -- दादा या बात तो होण की कोण्या।
नरसिंह भजनी कहते- फेर गणेश कै हाथी का मुँह क्यूकर लॉग  सकै सै?
रणबीर

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8
एक बर एक ताई एकली ए फिलम देखन चाली गई शीला टॉकीज पै।
टिकट ली अर जा बैठी आगै सी
फिलम देख कै जब वापस आई तो एक छोरे ने बुझ लिया -
री ताई पिक्चर देख आई के..?
थोड़ी सी रुक सी कै ताई बोली - रे छोरे के बताऊँ तन्ने....
छोरा बोल्ला- के बात होगी ताई...?
बता मैं के मदद कर सकूं सूं?

ताई बोल्ली- बात के होणी थी....
जद मै फिलम देखण लागी तो फिल्म मैं मेरे जेठ जीसा एक मरद था...

छोरा- फेर के होया तो....?

ताई:- फेर के होणा था, सारी फिलम मैं मैं घूंघट काढ़ कै बैठी री.....

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9
टांड़ पै बिठा दे
एक बै एक छोरी भूखी रोवै थी। घर मैं रोटी थी कोण्या। उसकी माँ नै बहोत समझाई । पर बातां तैं के भूख भाजै थी। रोवणा कोण्या बन्द करया । वा और ठाड्डू रोवण लाग्गी। उसकी माँ नै दो धौल बी धर दिए फेर बी चुप कोण्या हुई छोरी। इतने मैं पड़ौसन आगी अर बोली," नफे की बहू !या छोरी क्यूँ रूआ राखी सै?"
वा बोली," रोटी मांगै सै।"
पड़ौसन बोली," देंती क्यों नहीं ?"
माँ बोली, " रोटी तै कोण्या ना ।"
पड़ौसन सोच साच कै बोली," इसनै टांड पै बिठा दे । "
माँ बोली," टांड पै के रोटी धरी सैं?"
पड़ौसन बोली," बिठा तो सई।" 
माँ नै छोरी टांड पै बिठा दी।
छोरी टांड पै भी रोन्ती रही फेर उसनै रोटी मांगनी बन्द करदी अर बोली," माँ मनै बस इस टांड पर तैं तार दे। 
भूलगी रोटी नै ।
सोचियो!!!!!!!!

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10
फत्ते चूर्ण की गोलियाँ बेच्या करता। उसनै सोच्या, पीसा कामवन की खातर   धंधा बदलना चाहिए। वो उत्तर प्रदेश के एक कस्बे मैं गया। लांबे बाल अर दाढ़ी बढ़ा ली अर भगवा चोला अर माला धारण कर ली। फेर वेहे चूर्ण की गोली लड़का होवण के नाम पै देनी शुरू कर दी। दस मैं तैं औसतन चार-पाँच को लड़का होवै ए  सै । तो वे बीरबाणी इस बाबाजी का प्रचार करण लागगी। फेर के था, बाबाजी की दूकान चाल पड़ी। इसे किस्यां तैं हमनै सीख लेवण की ज़रूरत सै। इन बाबाओं नै कल्याणकारी ना समझां, इनके पाखंड नै समझां अर दूसरयां तैं भी इनकी पोल पट्टी खोलाँ। इसे मैं म्हारे समाज अर देश की भलाई सै।

आओ, यो छोरे - छोरी  के साच का भी बेरा पाड़ ल्याँ। विज्ञान कहवै सै अक  लड़का या लड़की होगी- इसके मामले मैं  बीरबानी की कोये भूमिका कोन्या। पुरुष धोरै  एक्स और वाई-दोनों ढाल के गुणसूत्र कुदरत नै दिये सैं, जबकि बीरबानी धोरै  बस एक्स गुणसूल होवैं सैं। जै एक्स तैं एक्स का संयोग होज्या तो मतलब साफ सै छोरी अर एक्स तैं पुरुष के वाई का संयोग होज्या तो होगा छोरा। संसर्ग के बाद गुण-सूत्रों के तेईसवें जोड़े का मिलन ही लड़की या लड़के का होना तय करै सै।  तो पुरुष और योग-दोनों पै निर्भर करै सै  अक  छोरा होगा अक छोरी होगी ? म्हारे समाज, विशेष रूप तैं उत्तर भारत मैं, बीरबानी कै  जै छोरी पैदा होज्या तै वा नफरत की नजर तैं देखी जावै सै , जबकि छोरा  होण पे उसका बाप मूंछों को ताव देवण लागज्या सै। यह अनपढ़ता और पिछड़े समाज की निशानी है। दिमाग में भरी अंधविश्वासों की गंदगी सिर्फ तर्कपूर्ण सोच और विवेक से ही निकल सकती है 

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11
थलियां गई थी
एक गांव मैं एक वासी रमलू अपनी ऊंटनी नै थलियों पै चरावण लेग्या। उड़े घास घूस चरया। फेर एक खेत मैं कचरी खूब लागरी थी। ऊंटनी नै रज कै खाई। खाते खाते एक गडूंबा भी खा लिया । ओ गले मैं फंसग्या । गामोली रमलू सैड़ दे सी ऊंटनी नै गाम मैं ल्याया अर वैद जी बुलाए। देखी वैद जी नै। बोल्या.. थलियां गई थी? कचरी खाई थी? रमलू बोल्या हां वैद जी। 
वैद बोल्या..एक दूसेरी और एक पसेरी ल्याओ । आगी।
ऊंटनी जय कर कै बिठाई फेर लिटा दी। पसेरी उसकी नाड़ तलै धरदी अर दूसेरी जोर तैं उसकी नाड़ की सोजिश पै मारी। ऊंटनी का मोटी कचरी (गडूम्बा)  था वो फुटग्या आर ऊंटनी ठीक होगी।
        कुछ दिन पाछै एक बुढ़िया कै नाड़ पै कैंसर की गांठ ऊभरगी । खावण मैं दिक्कत होगी । तो उसका घर आला रमलू वैद जी धौरै गया।  वैद जी तै लोगां नै रिश्तेदारी मैं गए बताए। उड़े कई लोग बैठे थे। एक नै बुझया.. के बात होगी?
रमलू: घराली कै नाड़ मैं गांठ सी दिखै सै अर रोटी निगलण  मैं दिक्कत होरी सै।
कमलू बोल्या.. ईसा ईसा तो इलाज मैं भी कर दिया करूं वो ऊंटनी के इलाज आले दिन था उड़े। 
बुला ली धमलो ताई । 
वो बोल्या..थलियां गई थी?
 रमलू बोल्या..ना। 
कमलू.. कैह दे - हां ,सोण हो सै।
रमलू..हां गई थी।
कमलू.. कचरी खाई थी ?
रमलू.. गई ए कोन्या तो कचरी कित तैं खावै थी।
कमलू..कैह दे.. हां, सोण हो सै।
रमलू..हां खाई थी।
कमलू..तै लिया पसेरी अर  दुसेरी।
लिटा कै बुढ़िया कमलू  पसेरी नाड़ तलै धर कै बोल्या..कचरी खाई थी?.. 
दुसेरी जोर तैं मारी नाड़ पै। 
धमलो ताई का तो होग्या इलाज।
गई ऊपर....
इसे वैदों तैं बच कै.....





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12
चश्मा

माता जी शायद उम्र के साथ सठिया गईं थीं। एक दिन बोलीं, "देवेंद्र, तुम सबकी शक्लें ही समझ में नहीं आतीं। मेरी एक इच्छा तो पूरी कर दे। मेरा चश्मा बनवा दे।"

पर दत्त साहब को फुरसत न मिली, न मिलने वाली थी। बेचारे क्या करते। जेब इजाजत ही नहीं देती थी। एक दिन उम्र ने खेल दिखाया। माता जी चल बसीं।

आज देवेंद्र दत्त अखबार पढ़ रहे हैं। उनकी पत्नी बाजार से लौटी हैं। खूब सारा सामान खरीद कर लाईं हैं। बड़े अच्छे मूड में हैं। आते ही बोलीं, "आज यह नया धूप का चश्मा खरीद कर लाई हूं। जरा निगाह उठाकर तो देखो, तुम्हारी चार बच्चों की मां चश्मे में कैसी जंच रही है।"

धूप के इस चश्मे की कीमत में बूढ़ी मां के पांच निगाह के चश्मे आ सकते थे।


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13
टोटका
हुक्का
धमलो नै पूरा जोर ला कै देख लिया , फेर रमलू अपने पतिदेव, के विचारों नै को बदल कोन्या पाई। रमलू हुक्के  का कसूता पियक्कड़ सै। एक दिन धमलो नै रमलू  तैं एक सवाल पूछया, "थारी निगाह मैं हुक्का पीना एक  भुनडी लत सै  अक  नहीं?"

रमलू गरम होग्या। पर सैड़ दे जी नरम भी होग्या। थोड़ी सी देर छात कान्हीं लखाणता रहया । फेर हुक्का गुड़गुड़ाया अर  धूम्में की हवा छोड़ते होये किसे ज्ञानी की ढालाँ बोल्या, "हुक्का पीना एक शान सै मेरी खातर। फेर आच्छे या नुकसान दायक  पै बहस का के फायदा?"

धमलो नै  एक बै फेर हटकै पुनः शांतमुद्रा मैं एक सवाल कर  दिया , "यो मेरे सवाल का जवाब कोन्या चौधरी । थाम तो या बताओ अक थाम अपने बेटे नै हुक्का पीवन  की सलाह देवोग़े अक नहीं?"

रमलू चौधरी एक बै फेर गरम होग्या। इब कै  वो नरम नहीं पड़या । रमलू मुंह चढ़ा सी कै  बोल्या, "मैं कदे किसे नै  सलाह नहीं द्यूंगा अक हुक्का पिया करो। फेर या भी तोड़ की बात सै  अक हुक्का पीना मैं  कदे  छोडूंगा भी नहीं।"

धमलो कुछ ना बोलीं। वा सहज सहज हुक्के कै  धोरै गयी। चिलम भर कै ल्याई अर हुक्का पकड़ कै  बोली आ दोनों बैठ कै  पीवाँग़े । रमलू बोल्या या अच्छी बात कोन्या। 
धमलो तो फेर ?
उस दिन पाछै रमलू नै हुक्के कै हाथ नहीं लाया।


********
14
जब भी ओले पड़या करते तै 
दादी ताई भाज कै  नै बगड़ मैं तवा उल्टा धर दिया करती ।

देखण मैं आवै  सै अक कोए कोए यो टोटका आज भी अपनावैं सैं,
इस उम्मीद मैं अक ओले पड़ने बंद हो ज्यांगे ।

असल मैं या बेबसी थी किसान की प्रकृति के साहमी क्योंकि जै ओले पड़ेंगे तो खेती नै नुकसान पहुंचावैंगे अर  हो सकै सै फेर यो तवा चढ़ेगा भी अक नहीं।

इस कर कै इसनै उल्टा करकै डाल दिया जावै था ।
एक आध बर संयोग तैं ओले रुक भी जावैं थे,
तो फेर  यो  टोटके के रूप मैं बरत्या जावण लाग्या।


***
15
भैंस अक घर आली ?

आज रमलू  घणा फिक्र मैं सै।  उसकी घर आली धमलो के पेट मैं दर्द सै । ऊं तो यो दर्द दो तीन सालाँ तैं कई बार हो लिया 
पर आज यो जोर का होग्या , हटण  का नाम ए  कोन्या लेरया ।

रमलू नै  सोच लिया अक वो आज तै धमलो नै शहर ले जाकै किसे बड़े डॉक्टर नै दिखावैगा। वो उस नै शहर ले चल्या ।

शहर मैं एक डॉक्टर का बड़ा नाम था। रमलू नै उसे धोरै ले ज्याण का फैसला कर लिया। बस अड्डे पर तैं उतर डॉक्टर साहब के घर पहुंच पहुंचग्या रमलू धमलो 
गेल्यां।
जब नंबर आया, तो डॉक्टर साहब नै बड़ी आच्छी ढालां धमलो देखी अर कुछ जाचें और भी बता दीं।

इब तै रमलू  कुछ परेशान सा  होग्या । वो तो उसे दिन गांव पहुंचना चाहवै था, उसनै डॉक्टर तैं बुझया , "क्यों डॉक्टर साहब, बगैर जांच काम नहीं हो सकता के? मैं तो आजै गांव पहुंचना चाहूं सूं।"
डॉक्टर साहब नै जांच का महत्व समझाया। फिर पूछा, "तुमको इतनी जल्दी क्यों है? कौन तुम्हें नौकरी पर पहुंचना है?"

रमलू घबराया सा बोल्या , "नौकरी तैं भी बड्डी चिंता सै डॉक्टर साहब। मेरे घर मैं  भैंस ब्या री सै। वहां मेरा रहना जरूरी सै।"

डॉक्टर साहब मुस्कुरा कर बोले, "तुम्हारी भैंस ज्यादा जरूरी है या घरवाली?"

रमलू नै गंभीर स्वर मैं सवाल भरया जवाब दिया, "फिलहाल तो भैंस ज्यादा जरूरी सै। या मरगी तो दूसरी आ ज्यागी अर दहेज भी लयावैगी, पर जै भैंस मरगी, तै दूसरी खरीदण के पीसे के आप देवोगे?"
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