सोमवार, 17 जुलाई 2017

सच, दिमाग के मामले म्हं आपां कति पैदल सां

सच, दिमाग के मामले म्हं आपां कति पैदल सां
     28 जून नै पहले विश्व युद्ध के पाछै बरसेलिस शांति संधि 1919 मैं हुई थी। इसै दिन सन् 1954 मैं नेहरू अर चाऊ एन लाई नै मिलकै ‘पंचशील’ सिद्धान्त की घोषणा करी थी। इसी दिन पीसी महलेनोविस मशहूर स्टेटिसियन का 1972 मैं देहांत होग्या था। 29 जून नै लार्ड क्लाइव मुर्शिदाबाद मैं बड़या था अर मीर जाफर ताहिं बंगाल का नवाब बनाया था साथ मैं बिहार अर आसाम बी थे। या सन् 1757 की बात सै। आसुतोष मुखोपाध्याय का जनम 1864 मैं 29 जून के दिन हुआ था। श्री चैतन्य देव का देहान्त 1553 मैं 29 जून कै दिन हुया था। 30 जून 1997 मैं हांगकांग नै अपना उपनिवेशी जुआं फैंक कै दोबारा चीन मैं शामिल होग्या। सन्थाल विद्रोह सिधो कनाहो की रहनुमाई मैं 1854 मैं 30 जून नै शुरू हुआ। दादा भाई नारौजी का देहांत 1917 मैं इसे दिन हुया था। एक जुलाई 1997 मैं पूर्व प्रधानमंत्री आई. के. गुजराल नै कलकत्ता मैं ‘साइंस सिटी’ का मुहूर्त करया था। इस दिन 1862 मैं कलकत्ता हाईकोर्ट का उद्घाटन हुया था। डा. बीसी राय का जनम एक जुलाई 1882 नै हुया अर उसका देहांत एक जुलाई 1962 नै हुया।
     एक जुलाई नै इम्पीरियल बैंक का राष्ट्रीयकरण हुया था अर इसका नाम स्टेट बैंक आफ इंडिया धरया गया था। यू कूणसे सन् मैं हुया था यू थामनै बेरा हो तै लिख कै भेजियो हरिभूमि आल्यां पै। एक जुलाई 1879 नै भारत मैं पोस्ट कार्ड शुरू करया गया था। किसनै शुरू करया था? 2 जुलाई 1757 मैं मुहम्मद बेग नै सिराजुद्दौला मौत के घाट तारया था। 2 जुलाई 1972 मैं भारत अर पाकिस्तान नै शिमला मैं एक संधि पै साइन करे थे। ये साइन करणियां कूण-कूण थे बेरा सै के? ना बेरा सै तो थोड़ा सा बेरा पाड़ण की कोशिश करियो। तीन जुलाई 1921 नै रिवोल्यूशनरी ट्रेड यूनियनां की अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस शुरू हुई थी। चार जुलाई 1998 नै यू.एस.ए. का बनाया औड़ ‘पाथ फाइन्डर’ जिसमैं एक रोबोट बी था, मंगल ग्रह पै उतरया था। चार जुलाई 1776 नै अमरीका आजाद घोषित हुया था। चार जुलाई 1902 नै स्वामी विवेकानंद का देहान्त होग्या था। वे पैदा कद हुये थे बेरा सै के? चार जुलाई 1940 नै दादी कोमारय्या जो तेलंगाना संघर्ष की पहली शहीद थी, नै शहादत दी थी। मैडम क्यूरी का चार जुलाई 1934 मैं देहान्त होग्या था।
     मैडम क्यूरी कौन थी? बेरा सै के? नहीं बेरा। तो थोड़ा घणा किताबां नै टटोलण की आदत थाम बी गेरल्यो माड़ी सी। पांच जुलाई 1997 नै जनता दल मां तै लालू राष्ट्रीय जनता दल बणया था। पांच जुलाई 1947 नै ब्रिटिश पार्लियामैंट मैं भारत की आजादी का बिल पेश करया गया था। आर.जी. कर मैडीकल कालेज भारत का पहला प्राइवेट मैडीकल कालेज था यू पांच जुलाई 1916 तै कलकत्ता मैं शुरू हुया था। भारत का पहला सरकारी मैडीकल कालेज कद शुरु हुया इसका बेरा सै के? नहीं तो कोशिश करां किते तै बेरा पाड़ण की।
     कइयां नै तो ये बात पढ़ते-पढ़ते नींद आगी होगी। कइयां नै बीच मैं पढ़णा छोड़ दिया होगा। कइयां नै तो बस ऊपरली दो लाइन पढ़ी होंगी। कइयां नै कहया होगा खूंटा ठोक धोरै माल साप्पड़ लिया जो ईसी ईसी बात लिखण लाग लिया। फेर एक बात साफ सै अक हमनै अपणे इतिहास की अर अपने नजदीकी भूतकाल की जानकारी बहोत कम सै। न्यूं कहया जा सकै सै अक आपां कति पैदल सां इस मामले मैं। तो इस तै कुछ लोगां मैं जानकारी चाली जा अर कुछां मैं जिज्ञासा पैदा होज्या किमै और बात जाणण की, तो योहे मकसद सै इस म्हारे भूतकाल पै इस ढाल की बात लिखण का। फेर मनै बेरा सै थामणै ताश खेलण तै कड़ै फुरसत सै इसे कामां की खातर। हरेक गाम मैं हर दस घरां पाछै ए बैठक मैं ताश बाजदे पावैंगे। बेरा नां यू अैहदीपणा कित लेज्यागा हरियाणा के गामां नै। हाथ तै काम करण की आदतै कोण्या रही अर दिमाग तै काम लेण की आदत पहलमै नहीं थी। ये दो-दो गुण क्यूंकर निभैंगे समझ मैं नहीं आन्ती। देखियो, जिनकै काला धन सै उनका काम तो चाल ज्यागा पर म्हारा काम कोण्या चालै। हाथ अर दिमाग दोनूं काम मैं ल्याणे पड़ैंगे।





ये सैं म्हारी पंचायतां


म्हारे देश की पंचायतें विकास का महत्वपूर्ण ढांचा होने के चलते सामाजिक-सांस्कृतिक, आर्थिक राजनीतिक तौर पर समस्या ग्रस्त हैं। गामां मैं सामाजिक, सांस्कृतिक अवरोधां की जकड़न इतनी कसूती सै कि पंचायतें आर्थिक विकास की जरूरत तै एक हद ताहिं पूरी करैं सैं फेर सामाजिक सांस्कृतिक विकास तै कति कोरी सैं, इसतै कति कटरी सैं।
म्हारे आड़ै संवैधानिक पंचायतां की साथ-साथ जात गोत आधारित सर्वखाप पंचायतें भी अस्तित्व मैं सैं। चुनी औड़ पंचायतां की कोए वैधता कायम नहीं हो सकी सै जबकि खाप पंचायतां ताहिं बहोत बड़ी सामाजिक मान्यता मिलरी सैं। ये परंपरागत पंचायत कै खापां की पंचायत नागरिक अधिकारों, महिलाओं अर दलितों के खिलाफ गैर कानूनी तरीके तै फैंसले करैं सैं। खाप पंचायत औरतां नै बदला लेवण का जरिया बी बणावैं सैं। जात-गोत के नाम पै कई अपराधिक कृत्यों को ढक दिया जावै सै अर बलात्कारी तक बचा लिये जावैं सैं। जोर जबरदस्ती अर ताकत के दम पै करे औड़ अपराधां ताहिं निभावण ताहिं आगै आवैं सैं तो पिछड़े रूढ़िवादी सामाजिक मूल्यों की वाहक ये पंचायतें अपणे तौर पै संबंध विच्छेद के अर कई बार तो हत्या ताहिं के फतवे जारी कर देवैं सैं।
पिछले दिनों इन्हीं पंचायतों ने कई ऐसे फैसले सुनाए हैं जिनमैं पति पत्नी ताहिं संबंध विच्छेद खातर विवश करया गया। अर भाई-बाहण बणण ताहिं कहया गया। ये पंचायतें सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अन्याय के खिलाफ कुछ नहीं बोलती उल्टा बाल विवाह, दहेज, घूंघट और जाति प्रथा जिसी पिछड़ी सोच की व्यवस्था ताहिं प्राश्रय देवैं सैं। म्हारे समाज मैं इसी पिछड़ी औड़ ताकत मौजूद सैं जो समाज मैं अपणा गलबा कायम करण की खातर इन पंचायतां का इस्तेमाल करैं सैं।
गामां मैं इसा ए माहौल राजनीति मैं भी मौजूद सै जड़ै कोए रचनात्मक काम नहीं हो सकदा। म्हारे गाम समस्या ग्रस्त गाम सैं जड़ै मुद्यां की राजनीति का तोड़ा सै पाने-ठोले की राजनीति सै। नशाखोरी, छेड़छाड़, लड़कियों की भ्रूण हत्या, मारपीट, पर्दा, दहेज, यौन उत्पीड़न जिसी कई सामाजिक समस्यां सैं जिनपै चुनी औड़ पंचायतां नै पहल कदमी करकै अगवाही करण की जरूरत सै। हमनै इस परिवेश मैं गाम नै समझण की जरूरत सै। हरियाणा आर्थिक रूप तै तो विकसित प्रदेश होग्या फेर आड़े के सामाजिक सूचकांक पिछड़े क्यों रहगे? सोच्चण की बात तो सै। 2001 की जनगणना के हिसाब तै स्त्री पुरुष अनुपात घटकै 861 पै आ लिया। महिलावां की खातर सामाजिक आचार-व्यवहार के नाम पर घूंघट जिसे बंधन सैं।
लड़कियां पै अत्याचार बढ़ते जावैं सैं। शादी के बाद महिलावां नै बड़े पैमाने पै मारपीट, दहेज की मांग, अर लड़का पैदा करण का दबाव झेलना पड़ै सै। पुत्र इच्छा के चलते भ्रूण हत्या का चलन आम होग्या। पंचायतां नै इसे सभ्य नागरिक समाज की स्थापना जिसमैं सबकी खातर समानता हो, सबनै अपनी बात कहवण का मौका मिले, सामाजिक कामां मैं सबकी भागीदारी हो अर सब सम्मान की जिंदगी बसर कर सकैं। ग्रामीण विकास नै एजेंडे पै ल्यावण खातर सबतै जरूरी काम सै चुनी औड़ पंचायतां की वैद्यता कायम करी जावै। परंपरागत पंचायतां कै खिलाफ माहौल तैयार करया जावै। महिलावां अर दलितां की हिस्सेदारी चुनी पंचायतां मैं बढ़ाई जावै। ग्रामसभा की मीटिंग ईमानदारी तै सारा गाम कट्ठा करकै करी जावै। अर उड़ै गाम के विकास के मुद्यां पै चरचा करकै गाम के विकास की योजना बनाई जावै। पंचायत के काम करण के तौर तरीक्यां मैं सुधार ल्याये बिना गामां का विकास करना आसान कोण्या। फेर पंचायतां नै सुधारण का काम कूण करैगा? सरकार करैगी? बीडीओ कै डीसी करैगा? यो तो जनता जनार्दन नै करणा पड़ैगा, जितना तावली जनता या बात समझ ले उतना ए आच्छा सै।





रविवार, 16 जुलाई 2017

निजीकरण के नाम पै या खुली छूट


म्हारे देश की दुर्गति होण लागरी सै अर आपां हाथ पै हाथ धरे बैठे सां। म्हारे देश के आका देश की सार्वजनिक संपत्तियां नै पूरी तरां तै अन्धाधुन्ध तरीके तै लुटावण पै उतारू होरे सैं। बाल्को बेची, होटल सैरटन बेच्या अर तेल कंपनी बेचण की तैयारी करली पूरी।
या तो भला हो सुप्रीम कोर्ट का अक उसनै सरकारी तेल कंपनियां के बेचण पै रोक ला दी। पर म्हारे देश के आकावां कै या बात गलै नहीं उतरी। सरकार नै सुप्रीम कोर्ट तै फेर हटकै आग्रह करया सै कि इन भीमकाय तेल कंपनियां - बी पी सी एल. अर एच.पी.सी.एल. के विनिवेश (बेच्चण) के मामले पै दिये औड़ रोक के फैसले पै हटकै गंभीरता तै विचार करै। इसका मतलब यू बी लाया जा सकै सै कि ईब जो फैसला कोर्ट नै दिया सै ओ बिना सोचे समझे दे दिया। होणा तो याह चाहिए था कि इस मामले मैं सर्वोच्च न्यायालय का फैसला म्हारे देश के ठेकेदार सिर झुका कै स्वीकार करदे अर इन कंपनियां के विनिवेश का मामला संसद कै साहमी ल्याया जान्ता अर दूध का दूध अर पाणी का पाणी आपै हो जान्ता। फेर संसद मैं यू मामला कोण्या ल्याया गया। म्हारे देश की सरकार नै सुप्रीम कोर्ट तै हटकै अपील करी सै कि कोर्ट अपणे फैसले पै पुनर्विचार करै। नीयत साफ सै कि कोर्ट सरकार नै कंपनी बेच्चण की छूट दे दे।
म्हारी देश की देशभगत सरकार का यो कदम अपणे आप मैं बहुत किमै उजागर करण आला सै। पहली बात तो या सै कि सरकार आगले संसद के सत्र ताहिं बी इंतजार करण नै तैयार कोण्या अर सार्वजनिक क्षेत्र नै लूटण खातर बहोत जल्दी मैं दीखै सै। दूसरी बात या सै कि कोर्ट के आदेश के बावजूद इस मामले नै संसाद के साहमी ले कै जावण तै बचण की सरकार की कोशश तै योए मतलब लिकड़ै सै कि वा निजीकरण की प्रक्रिया ना तो जुम्मेवारी के तरीके तै चलाना चाहन्ती अर ना पारदर्शी तरीके तै चलाणा चाहन्ती। सुप्रीम कोर्ट की बैंच का सर्वसम्मति तै यू फैसला सै कि संसद के कानून के तहत गठित कंपनियां का संसद की इजाजत के बिना निजीकरण नहीं करया जा सकदा। इस तरियां सरकार इस फैसले का पालन करण नै मजबूर सै। फेर हद देखो म्हारी सरकार की कि इस स्पष्ट फैसले नै बी धत्ता बतावण की कोशिश करण लागरी सै। ईब जनता नै देखणा सै कि या इजाजत क्यूंकर दी जा सकै सै। कोर्ट नै बी देखणा सै कि सरकार उसनै ठेंगा ना दिखावै।
यो तै सरासर लूट अर धोखाधड़ी का मामला सै। म्हारै बी बेरा ना के लकवा सा माररया सै, हम बोल चुप्पाके सां। दो खूड खेत के कोए ले ले तो हम माणस मारण नै त्यार होज्यां। ये यूपी अर हरियाणा आले किसान रोज गोली चलावैं धरती पै फेर यू कई हजार करोड़ां का म्हारा माल बेच्या जावण लागरया इसपै म्हारै सांप सा सूंघ रहया सै। जै हमनै इस लूट का विरोध नहीं करया तो आवण आली पीढ़ी हमनै माफ नहीं करैगी। इसे प्रबंधकां के हाथां मैं तो इन संपत्तियां का प्रबंधन भी नहीं रहणा चाहिए। फेर जनता जनार्दन तो फिलहाल अन्धेरे मैं दीखै सै बेरा ना कद आंख खुलैगी जनता की।
ईब तो या बात जग जाहिर होली सै कि निजीकरण के नाम पै भारी भरकम अवैध कमाई अर भ्रष्टाचार तै भरे सौदे हुये सैं। असल मैं तो निजीकरण की ए ना तो कोए आर्थिक तुक बणती अर नाहें सामान्य ज्ञान के हिसाब तै निजीकरण फिट बैठता। ईब कूण समझावै म्हारे देश के ठेकेदारां नै? जनता नै इनका तो कोए पक्का इलाज टोहवणा पड़ैगा ना तो ये जनता की भ्यां बुलवा देंगे। पूरी दुनिया की जनता राह खोजण की तैयारी मैं सै। वे ईब समझण लाग लिए सारी बातां नै।
सुण्या सै 16 जनवरी तै ले कै 21 जनवरी ताहिं ये लोग मुंबई मैं कट्ठे होवैंगे। सौ तै फालतू देशां के लोग उड़ै आवैंगे अर विश्व सामाजिक मंच के झंडे तलै आपस मैं बैठ के बतलावैंगे। इस ढाल के मंचां तै नई उम्मीद बंधी सै कि इस खुली लूट का मुकाबला करण नै लोग खड़े जरूर होवैंगे।
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घटना जिसनै अम्बेडकर भी हिला दिया

घटना जिसनै अम्बेडकर भी हिला दिया
घटना सन् 1935 की सै। इस घटना नै अम्बेडकर बरगे पहोंच्या औड़ बुद्धिजीवी भी हिला कै धर दिया था। उस बख्त बम्बई सरकार नै एक आदेश जारी करया था कि सार्वजनिक स्कूलां मैं अछूतां के बालकां ताहिं दाखिला दिया जावै। इस आदेश के तहत बम्बई प्रेसीडैंसी के अहमदाबाद जनपद के धोल्का तालुका मैं कबील नाम के गाम मैं 8 अगस्त 1935 नै उस गाम के अछूत अपणे च्यार बालकां नै स्कूल मैं दाखिला करवावण ले कै गए। उननै देखण की खातर सवर्ण हिंदू स्कूल के चारों कान्हीं जमा होगे। जिब दाखिला हो लिया तो आगले कुछ दिनां मैं हिंदुआं नै अपणे बालक स्कूल तै ठा लिये।
अर उसके कुछ दिन पाछै एक बाहमण नै गाम के एक अछूत पै हमला बोल दिया। इस हमले कै खिलाफ 12 अगस्त नै गाम के अछूत मजिस्ट्रेट की कचहरी मैं शिकायत करण की खातर धोल्का पहोंचे। हिंदुआं नै न्यों देख कै अक अछूता के बालिग लोग गाम मैं कोण्या, लाट्ठी, भाले अर तलवारां गेल्यां अछूतां के घरां पै हमला बोल दिया। उननै महिलावां, बूढ़याँ अर बालकां कै चोट मारी अर वे अधमरे कर दिये। धोल्का गये होए अछूत भी उसे रात नै गाम मैं उलटे आवण आले थे। हिंदू उननै मारण की खातर राह मैं घात लगा कै बैठगे।
एक बुढ़िया नै इस बात का बेरा लागग्या। उसनै उन धोरै खबर भिजवा दी ज्यां करकै वे उस रात ने कोनी आए अर एक और हादसा टलग्या। हमलावर हिंदू सारी रात उनकी बाट देखते रहे अर आगले दिन तड़कै हे वापस घर नै आए। भयभीत अछूत गांव छोड़ कै अहमदाबाद चाले गए अर उड़ै जाकै गांधी जी की संस्था ‘हरिजन सेवक संघ’ के मंत्री ताहिं सारी बात खोल कै बताई। फेर इस संस्था के मंत्री नै कोए मदद नहीं करी।
न्यून गाम मैं हिंदुआं नै अछूतां का सामाजिक बहिष्कार कर दिया। उन ताहिं मजदूरी देणा बंद कर दिया। खावण पीवण की चीज बेचण ताहिं इन्कार कर दिया। जड़ असली बात या सै कि उनका घर तै बाहर लिकड़ना मुश्किल कर दिया। और तो और उनके कुंए मैं माट्टी का तेल गेर दिया। आखिर मैं 17 अक्तूबर नै अछूतां नै मजिस्ट्रेट की अदालत मैं फौजदारी का मुकद्दमा दर्ज करवाया। डा. अम्बेडकर नै लिख्या बताया कि इस मामले मैं सबतै अजीब पक्ष तो महात्मा गांधी अर उनके सहयोगी वल्लभ भाई पटेल का रहया जिननै अछूतां ताहिं याहे सलाह दी कि वे गाम छोड़ दें। दलित इस मामले मैं बहोत असहाय महसूस करैं थे।
जै आज भी देखैं तो कई जगहां मैं हालात उड़ैए सी खड़े दीखैं सैं। चाहे दुलीना कांड हो, चाहे हरसौला का मामला हो अर चाहे पहरावर के सरपंच का मामला हो। दलित उत्पीड़न की मार कसूती पड़री सै।
कबीर गाम की उस घटना नै सन 1935 मैं बाबा अम्बेडकर का दिल भीतर ताहिं हिला कै धर दिया था। अम्बेडकर जी नै मेवला मैं इस ढाल के उत्पीड़न करण आले हिंदू धर्म मैं ना रहवण की घोषणा करी बताई। उनकी इस घोषणा तै या बात साफ होज्या सै कि दलितां पर उत्पीड़न उन बख्तां मैं कितना था। आम्बेडकर जिसे बुद्धिजीवियां नै भी इसी घोषणा करणी पड़ी।
इसी घटना आज पूरे हिंदुस्तान मैं अर खास कर उत्तरी भारत मैं बहोत घणी होवण लागगी। बहुजन समाज नै बी अंगड़ाई ली सै अर इस उत्पीड़न का प्रतिरोध भी दिखाई देवण लाग्या सै या अच्छी बात सै। फेर एक बात और समझण की सै कि यू एकला दलित भाइयां के उत्पीड़न का मसला नहीं सै। यू पूरे समाज का मसला सै। यू मानवता का मसला सै अर यू नागरिक समाज के विकास का मसला सै। इस मसले तै रूबरू होवण आली बात सै। आज नहीं तो काल पूरे समाज नै सोचना पड़ैगा कि इतने साल की आजादी पाछै बी दलित उत्पीड़न क्यूं बढ़ता जावण लागरया सै अर इसका के इलाज सै?
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म्हारा हरियाणा


     हरियाणा म्हं कुछ साल पहलम ताहिं खेतां के डोल्यां पै शीशम खड़ी पा ज्याया करती। इनकी छां भी बढ़िया अर खेती म्हं भी नुकसान ना। हलाई काढ़ कै हाली शीशम की छां म्हं बैठ कै जोटा लाया करता। इसकी लाकड़ी भी काम्मल बताई। शीशम के इतने फायदे अर फेर बी शीशम खत्म होन्ती जावण लागरी? या बात सो सोचण की सै। बेरा ना गामां म्हं इस बात कान्हीं ध्यान गया सै कि नहीं गया सै। उनका ध्यान क्यूकर जावै इसी बातां कान्हीं? गाम आल्यां नै तै ताश खेलण तै फुरसतै कोण्या। कै एक दूसरे की टांग खींचे जावैंगे। ज्यूकर पहलम बैठ कै दुख-सुख की अर ऊंच-नीच की बतला लिया करते वा बात तै ईब रही कोण्या। कौणसी बात गाम के हक म्हं सै अर कुणसी खिलाफ सै इसपै कदे कदाऊ जिकरा हो जान्ता हो तै बेरा कोण्या। गाम के स्कूल म्हं के होरया सै इननै कोए वास्ता नहीं, गाम के अस्पताल म्हं इलाज का के हाल सै इनकी चिंता ना, गाम म्हं पाणी की डिग्गी की सफाई हुई सै कि नहीं इननै कोए लेना देना नहीं। गाम म्हं छोरियां गेल्यां छेड़खानी की वारदात बधण लागरी सैं इनपै इसका कोए खाता नहीं। जड़ बात या सै कि गाम काल उजड़ता आज उजड़ जाओ फेर किसे नै चिंता नहीं दीखती। सांझ नै दो घूंट लाकै इसनै गाल दे उसने गाल दे, घरआली कै ऊपर छोह तार लें, अर फेर खायें बिना पड़कै सो जाणा। दारू की मार तै कोए घर तो बच नहीं रहया माणस बेशक बचरया हो। पहलम हुक्का आदमी ए पीया करते, ईब घणखरी लुगाई भी हुक्टी पीवण लागगी कै बीड़ी फूंकती पा ज्यांगी। कई गामां म्हं तो थोड़ी घणी बीरबानी बी दारू का सेवन करण लागली सैं। खांसी के शिकार लोग लुगाई अस्पतालां म्हं लुटते हांडैं सैं। दमे की बीमारी बधती जा सै। चमड़ी की खारिश रात नै सोवण नहीं देन्ती। चिंता करकै ब्लड प्रेसर बधगे। दिल का धड़का बधग्या। नशाखोरी की साथ-साथ सेक्स अंगां की बीमारी बधती जावैं सैं। जवानां म्हं नुपशंकता बढ़ती जा सै। दूध ढोल म्हं घलग्या। रोजगार खत्म होगे। छोरियां नै पेट म्हं खत्म करण लाग लिये। बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश की लुगाइयां नै पांच-पांच, सात-सात हजार म्हं खरीद कै ल्यावण के मामले बधगे। पहलम तै गाम म्हं एक दलाल हुया करता सरकारी महकम्यां का फेर ईब तै हरेक महकमे का एक एक दलाल होग्या। किसे का राज आल्यो इन दलालां की पांचों आंगली घी म्हं रैहणी ए रैहणी। प्राइवेट पाणी के नलके आगे। पीस्से आल्यां नै सुख होग्या बिना पीस्से आल्यां की मर आग्यी। बुलध टोहें पावैं सैं। गाल भीड़ी होन्ती होन्ती इतनी भीड़ी होगी कि मोटा-सा माणस तो लिकड़े कोनी सकै। पाणी घर-घर म्हं नलक्यां म्हं लियाए फेर इसकी निकासी का कोई इंतजाम नहीं कई घरां म्हं तो भैंस भी नलके के पाणी तै नुहाई जावैं सैं।
     नहर के पाणी के धान्ने अटे पड़े सैं। कई कई साल होगे धाने खरीदें। नहर का पानी किमै तो आवैए कम अर जो आवै भी वो धान्ना अट्या पड़्या, वो खेत म्हं क्यूकर पहोंचै। धान्ना खोदण कूण जावै? बिना बात की बात पै रोज राड़ करैं असली बातां का जिकरा ना, परिवार नाम की चीज नहीं बचरी। बूढ़े बालकां नै देख कै राजी ना अर बालक बुढ़या के मरण की बाट देखैं सैं। सास बहू की कटती करती पावै तै बहू सास नै बुरी बतावै। करियाणे की दुकान एक गाल म्हं दो-दो तीन-तीन खुलगी। इन दुकानां म्हं दारू के पाउच आगे। लोगां का राजनीति पर तै विश्वास उठ लिया फेर माला फेर बी इक्कीश इक्कीश हजार की घालैंगे नेतावां कै। नया पेटेंट के सै इसका किसे नै बेरा पावै कोण्या। यो डब्ल्यू टी ओ के बला सै इसपै होक्के पै कदे चर्चा ना।
     टी.वी. पै नशा हिंसा सैक्स का नंगा नाच क्यों होवै इसपै कोए सवाल ना। खेती की तबाही के कारण सैं इसपै जिकरा ना। ये ब्यूटी कम्पीटीशन एकदम क्यों छागे सारे भारत म्हं? इस म्हं किसकी साजिश सै? कई बात लिखण की ना होती। थोड़ी लिखी नै ज्यादा समझियो अर बिचार करियो। बिचार करांगे तो राह भी पावैगा। बिचार तै परहेज करना छोड़णा पड़ैगा।



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ठाडा मारै रोवण दे ना

ठाडा  मारै रोवण दे ना
उन्नीस सौ तेईस म्हं मुंबई की विधान परिषद नै यो प्रस्ताव पास करया था अक अछूत वर्गों नै सारी सार्वजनिक सुविधावां ज्यूकर तालाब, कुआं, धर्मशाला आदि बरतन की छूट दी जा सै। इसका मतलब इसतै पहलम उड़ै या छूट नहीं थी। सरकार ने हुकम जारी कर दिया। यो सरकारी हुकम महाड़ नगरपालिका धोरै पहोंच्या। उसनै भी प्रस्ताव पास कर दिया 5 जनवरी 1924 नै। फेर हिंदुआं नै इसका पालन कोण्या करया। कोण्या माण्या यो कानून। पाड़ कै रद्दी की टोकरी म्हं फैंक दिया। इसके तीन बरस पाछै महाड़ म्हं कोलाबा जनपद के अछूतां का सम्मेलन 1927 म्हं 18 मार्च तै 20 मार्च ताहिं हुया। इस सम्मेलन में डॉ. अम्बेडकर भी शामिल थे। 20 मार्च नै पच्चीस सौ अछूतां नै कट्ठे होकै जोहड़ का पाणी पीया। शहर के हिन्दु लखान्ते रैहगे। फेर उन हिन्दुआं पै पागलपन सवार होग्या अर उननै अछूतां पै कसूते जुल्म ढाये। अछूतां का कसूर योहै था अक उननै जोहड़ का पाणी भ्रष्ट कर दिया था। बात आड़ै ए कोण्या थमी। हिन्दुआं नै ओ जोहड़ निजी संपत्ति बताकै 14 दिसम्बर 1927 नै पास करया था। इसके छह दिन पाछै महाड़ म्हं अछूतां नै फेर सम्मेलन करया अर इस म्हं दो जरूरी प्रस्ताव पास करे। एक म्हं मनुस्मृति के जलावण की घोषणा करी अर दूसरे म्हं हिंदू के अधिकारां की घोषणा पै बात करी। 20 दिसम्बर 1927 नै उस सम्मेलन म्हं मनुस्मृति जलाई गई। डॉ. अम्बेडकर नै इस घटना की तुलना फ्रांस की क्रांति गेल्यां करी थी। 2 मार्च 1930 नै काला राम मंदिर म्हं जावण खात्तर पांच हजार अछूतां नै कूच कर दिया था। उड़ै हिंदुआं अर अछूतां के बीच म्हं खुल्या संघर्ष हुया अर डॉ. अम्बेडकर के सिर म्हं चोट आई अर और बी सैकड़यां लोग जखमी हुए।
एक और घटना याद आगी। बात 1935 की सै। मुंबई सरकार नै आदेश जारी करया था अक सार्वजनिक स्कूलां म्हं अछूतां के बालकां ताहिं दाखला दिया जावै। बम्बई के अहमदाबाद जनपद के धोल्का तालुका म्हं कबीर नाम के गाम म्हं आठ अगस्त 1935 नै गाम के अछूत अपने 4 बालकां नै स्कूल म्हं दाखिल करवाण ताहिं लेगे। इननै देखण खात्तर सवर्ण हिंदू स्कूल के चारों कान्हीं कट्ठे होगे थे। दाखिला होग्या तो आगले दिन कुछ हिंदुओं नै अपणे बालक स्कूल म्हं कोण्या खंदाये। इसके कुछ दिन पाछै एक बाहमण नै गाम के एक अछूत पै हमला बोल दिया। 12 अगस्त नै लोग मजिस्ट्रेट की कचहरी म्हं अछूत केस दर्ज करावण पहोंचे तो हिंदुआं नै लाठी, भाले अर तलवारां गेल्यां अछूतां के घरां हमला बोल दिया। महिलावां, बूढ़यां अर बालकां की पीट-पीट के ज्यानै काढ़ण नै होगे। रात नै धोल्का आले अछूतां नै उल्टा आणा था तो हिंदुआं नै उनपै भी घात ला लिया। औ तै शुक्र था अक गाम के एक बुढ़िया नै बेरा दे दिया अर अछूत रात नै कोण्या आये ना तो उनकी भी दुर्गति करी जावै हे। अछूत गाम छोड़ कै अहमदाबाद गांधी जी की संस्था हरिजन सेवक संघ म्हं गये अर उसके मंत्री ताहिं सारी बात बताई फेर उस मंत्री नै कुछ नहीं करया। गाम म्हं हिंदुआं नै अछूतां का सामाजिक बहिष्कार कर दिया। मजदूरी देनी बंद कर दी, खावण पीवण की चीज बेचण तै इन्कार कर दिया। अछूतां का घर तै पां काढ़णा मुश्किल कर दिया। उनके कुएं म्हं माटी का तेल गेर दिया गया। 17 अक्तूबर नै मजिस्ट्रेट कै मुकदमा करया। गांधी नै अर बल्लभ भाई पटेल नै अछूतां ताहिं सलाह दी अक वे गाम छोड़ दें। अम्बेडकर कै घणा धक्का लाग्या उनकी बात सुणकै अर उसै दिन उननै सोच लिया अक हिंदू धर्म म्हं नहीं रैहणा अर 1935 म्हं मेवला म्हं हिंदू धर्म म्हं ना रहवण की घोषणा कर दी थी। आज भी देखां तो हालत घणे से नहीं बदले सैं। हरियाणा के घणखरे गामां म्हं भी दलितां का अर सवर्णां का सांझे का कुआं नहीं पावैगा। दलितां के अर सवर्णां के होक्के न्यारे पावैंगे। जड़ बात उड़ै ए सी खड़ी सै। कितनी माड़ी बात सै। कदे हमनै बैठके सोच्या बी सै?
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पीसा बड़ा या भगवान बड़ा ?

पीसा बड़ा  या भगवान बड़ा ?
डाक्टर सैनी आज मजबूरी मैं खरखोदे शहर मैं रोंग साइड जावण लागरया था। यातायात पुलिस के माणस नै डाक्टर साहब पाकड़ लिये। बोल्या - रोंग साइड क्यों ? थाम तो पढ़े-लिखे लोग सो। डाक्टर सैनी नै अपणे बारे बताया। पुलिसिया नै सैलूट ठोक्या अर बोल्या - डॉक्टर तो भगवान का दूसरा रूप हो सै। आप गलत काम क्यूंकर कर सको सो। जल्दी जाओ साहब। डाक्टर सैनी नै खिसिया-सी कै उसका धन्यवाद करया। पुलिसिया सहज सी बोल्या - मेरे छोरे का इलाज आपकी देख-रेख मैं सै जनाब। थोड़ा-सा ख्याल राखियो।
डाक्टर बोल्या - जरूर-जरूर। नाम क्या है? पुलिसिया बोल्या सतबीर। आठ दस दिन पाछै फेर ओहे चेटक होग्या। डाक्टर सैनी फेर रोंग साइड जावण लागरे थे। यातायात पुलिस आले नै (कुदरतन ओहे पुलिसिया था) फेर टोक दिया। फेर ईबकै उसनै छोड्या नहीं। डाक्टर सैनी का चालान काट दिया। डाक्टर सैनी हैरान-सा उसके मुंह कान्हीं लखावै। ओ पुलिसिया बोल्या - उस दिन की बात न्यारी थी। मेरा लड़का थारी देख रेख मैं था आज की बात न्यारी सै। मेरा लड़का ईब दूसरे डाक्टर की देख रेख मैं सै। मैं ईब थारी सेवा किस बात खातर करूं?
फत्ते बोल्या - एक बात मनै सुणादी ईब एक बात सरिता नै सुणाणी चाहिए। सरिता सुणावण लागी - आजकाल एक जबरदस्त तकिया कलाम सै कि ‘बस पांच मिनट।’ कोए भी बात हो, कोए भी बख्त हो, यो मुहावरा आम सुणण मैं मिलज्या सै कि बस पांच मिनट रूको फेर फुरसत ए फुरसत सै। डाक्टर सैनी की बी याहे आदत थी। सारी हाण मरीजां तै घिरया रहण करकै वे हरेक माणस ताहिं न्योंए कैह दिया करते - ‘बस पांच मिनट रूको फेर आपका नंबर सै।’ एक दिन की बात सै कि डाक्टर साहब के केबिन मैं एक बूढ़े व्यक्ति नै झांक कै देख्या अर भीतर आग्या। ओ बहोत घबरारया था। आवन्ते की साथ बोल्या - थामनै लेवण आया सूं डाक्टर साहब। मेरी बिटिया सख्त बीमार सै। थाम तो भगवान सो। चाल कै बचाल्यो उसने। डाक्टर सैनी ने आदतन कैह दिया - बस, थारी गेल्यां पांच मिनट मैं चालांगे।
बीस मिनट पाछै बूढ़ा बाबा फेर बोल्या हाथ जोड़ कै - डाक्टर साहब वार होवण लागरी सै। डाक्टर सैनी फेर बोले - बस पांच मिनट मैं चालां सां। 25 मिनट पाछै जिब डाक्टर सैनी नै कहया - हां तो बाबा चालो चालां बेटी नै देखण। तो बूढ़ा बाबा कातर नजरां तै देखता हुआ फफक पड़या अर बोल्या - ईब जावण का के फायदा डाक्टर साहब! पड़ौसी इबै-इब खबर दे कै गया सै कि पांच मिनट पहलम बिटिया का स्वर्गवास हो लिया।
फेर कविता का नंबर आया तो उसनै एक बात बताई। एक बै एक बुढ़िया भिखारिन थी। भीख मांग कै उसनै पांच सात रुपइये कट्ठे कर लिए अर वा एक फलां की दुकान पै जाकै भीख मांगण लागगी - तेरा भगवान भला करैगा। बुढ़िया दो दिन तै भूखी सै। दुकानदार नै उस कान्हीं कोए ध्यान नहीं दिया। एक गावड़ी आगी। उसनै फलां कै मुंह मारणा चाहया तो दुकानदार नै एक लाठी जड़ दी उसकै। अर ग्राहकां नै चीज बेचण लागग्या। बुढ़िया नै आगै सी हो कै फेर कहया उसतै - भगवान भली करैंगे। दो फली ही दे दे। बुढ़िया दुआएं देगी। दुकानदार ने इस डर से कि कहीं ग्राहक बिदक ना जावैं एक बुस्या सा केला उस बुढ़िया के हाथ पै धर दिया। बोल्या - चाल ईब आगै चाल। बुढ़िया नै अपणे कमंडल मां तै एक रुपइये का सिक्का काढया अर बोली - ले एक केला दे दे। दुकानदार नै तो सैड़ दे सी एक बढ़िया लाम्बा, मोटा-सा केला बुढ़िया के हाथ मैं पकड़ा दिया। उसनै ऊपर नै ठाकै आसमान कान्हीं करकै बुढ़िया बोली - तेरे नाम पै तो यू केला अर एक रुपइये का यू केला। ईब तूं ही बता तनै बड्डा मानूं अक पीस्से नै बड्डा मानूं? तो आई किमै समझ मैं अक नहीं? क्यूंकर पीस्सा खून के रिश्ते भी बदल दे सै। एक हद तै ज्यादा पीस्से का लालच माणस की इन्सानियत बी खो दे सै।


फील गुड! माई डियर कंट्रीमैन!

फील गुड! माई डियर कंट्रीमैन!
मेरे देश के वासियों फील गुड। क्यूं? क्यूंकि तीन प्रदेशां मैं चुनाव जीते पाछै भाजपा गुड फील कर री सै इस खातर हम सब बी फील गुड करां। इसे फील गुड के माहौल मैं भाजपा चुनाव जीतण का सपना देखै सै। म्हारा थारा सबका इसे करकै गुड फील करना बहोत जरूरी सै। देखो म्हारा शेयर बाजार नई बुलंदियां नै छूवण लागरया सै, फील गुड! तब तक जब तक कि कोए हर्षद मेहता, कोए केतन पारेख थारे म्हारे निवेश नै लेकै उडारी ना भरज्या, तब तक फील गुड! एक नया घोटाला रंधण लागरया सै, फील गुड!
देखो बिदेशी मुद्रा भंडार एक अरब डालर नै पार करग्या, फील गुड! सेठों की तिजोरियां मैं बहोत पीस्सा सै, फेर म्हारे किसे काम का नहीं। इसे ढाल यू सरकार की तिजोरी की बिदेशी मुद्रा सै, बेरा ना म्हारे थारे के काम आवैगी भी अक नहीं फेर बी, फील गुड! तेलगी नै साठ हजार करोड़ का घोटाला कर दिया, फील गुड! बादल साहब नै हजारां एकड़ जमीन बणा ली, फील गुड! उनकी कोट्ठी मैं नब्बै ऐसी लागरे सैं, फील गुड! रंजीत डॉन नै पेपर लीक करकै सौ करोड़ बणा लिये, फील गुड! जूदेव नै मूछां पै ताव दे कै नौ लाख भीतर कर लिए अर पीस्से ताहिं खुदा का दर्जा दे दिया, फील गुड! रक्शा सौद्यां मैं दलाली का पर्दाफाश करण आल्यां का तहलका ठिकाणै ला दिया, फील गुड! सरकारी नौकरियां के थोक विक्रेता रवि सिद्धू नै जमानत मिलगी, फील गुड! असमी अर बिहारी, कितै बिहारी अर मराठी रेलवे की नौकरियां खातर लठमलठा होरैं सैं, फील गुड!
मेरे देश के जवानों अर किसानों, फील गुड! जै तमनै आत्महत्या करनी पड़री सै तो भी, फील गुड! गुड फील करते होंए आत्महत्या करण का न्यारा ए मजा सै, बेरा सै ना? खाद पै सब्सिडी खत्म होगी, फील गुड! थारे ताहिं डीजल म्हंगा कर दिया, फील गुड! नकली बीज अर नकली दवाइयां के अंबार ला दिये, फील गुड! इनके कारण फसल बर्बाद होगी, फील गुड! गिहूं अर धान नहीं बिकता, फील गुड! मंडी मैं आढ़ती थामनै दुत्कारै सैं, फील गुड! बिजली खूब म्हंगी होगी अर कदे कदे आवे सैं, फील गुड! चुनाव सिर पै आ लिए, फील गुड! किसान चैनल शुरु होवण लागरया सै, फील गुड! म्हारे वित्तमंत्री थारी खातर रेवड़ी ले कै आये सैं, फील गुड!
म्हारे देश के प्यारे आदिवासियों थाम क्यूं पाछै रहो सो। किमै तै, फील गुड! थाम भूख तै मरण लागरे सो कोए बात ना, फील गुड! थारी किस्मत बहोत आच्छी सै कि थाम अनाज के भरे औड़ भंडारयां नै देखते औड़ भूख तै मरण लागरे सो, फील गुड! पेडयां की छाल अर पत्ते खावन्ते खावन्ते, फील गुड! आम की गुठलियां नै उबाल कै खाते हुए, फील गुड! वनवासी कल्याण संघ थामनै कट्ठे करण ताहिं जोर लारया सै, फील गुड! ज्यूकर छत्तीसगढ़ मैं आदिवासियां मैं गऊ बांटी जावण लागरी सैं, थारे ताहिं भी एक-एक गावड़ी देवण का वायदा करया जा सकै सै, फील गुड! गौ सेवा करो अर फील गुड! मेरे देश के नौजवानों, छात्रों, युवकों अर युवतियों, फील गुड! म्हारे प्यारे प्रधानमंत्री पाछले पांच साल मैं एक करोड़ लोगां नै रोजगार देवण का वायदा नहीं निभा पाये। बेरोजगारी का मार सहकै बी, फील गुड! शिक्षा महंगी, फीसें बढ़गी, कर्जल्यों अर शिक्षा पाओ, फील गुड!
हड़ताल का अधिकार खोस लिया, फील गुड! डाउन साइजिंग अर छंटनी होवण लागरी, फील गुड! सारा देश बेच खाया, फील गुड! जो बचरया सै उसनै बेचण की तैयारी सै, फील गुड! भ्रष्टाचार की सारी सीमा लांघ दी, फील गुड! गुजरात के दंग्यां मैं हजारों अल्पसंख्यक मारे गए, फील गुड! ईब - फील गुड! फेर च्यार साल ताहिं फील बैड अर फेर पांचमें साल ग्रेट फील करण का एकबै मौका और दिया जागा। शाबाश मेरे देशवासियों! फील गुड!

कढ़िया

कढ़िया
म्हारे हरियाणा मैं ऊं तो लोग घणे भोले भाले सैं फेर अपणे दिमाग तैं कम सोचैं सैं अर ज्याहें करकै उननै कोए हो भका ले सै। सविता, कविता, नफे, सत्ते अर ताई धापां आज कट्ठे हुए तो बात चाल पड़ी इन गावड़ियां पै। नफे बोल्या इ सून्नी गावड़ियां नै तो नाक मैं दम कर दिया। थोड़ी घणी मटर बाई थी, बालकां की पढ़ाई का खरचा निकल जान्दा फेर सारी मटर पढ़ण बिठादी। सत्ते बोल्या - गावड़ी गावड़ी कैहन्ते थामनै शरम नहीं आन्ती। गऊ माता तो कहो बिचारियां नै। सविता बोली - पहलम अपणी खुद की मां नै तो माता कैहलें, इन गावड़ियों की पाछै देखी जागी। सत्ते बोल्या - इन्नै खेत मैं तै ताहवां अर एकाध लठ मारद्यां तो ये बजरंग दल आले ना बस्सण देन्ते। कहवैंगे हाय म्हारी गऊ माता कै मारे। फेर जिब ये गऊ माता भूखी तिस्सई बणी मां जिब पखाणा अर पोलीथीन खान्ती हांडैं सैं तो बेरा ना इनके चाहवण आले कड़ै चाले जावैं सैं। हां तो नफे उड़ै ले चालांगे सिसाने आली गऊशाला मैं। नफे बोल्या - रै मैं खुद का भाड़ा लाकै अर पांच गावड़ियां नै ले के गया उड़ै फेर नाटगे इननै राखण नै। न्यों बोले अक आच्छी बिच्छी गऊंआं के लागदार कोण्या हम। हम तो बीमार, लंगड़ी लूली बेसहारा गऊआं नै लिया करां। उन खातर जागां कोण्या राखण नै। थारी इन रानी गऊआं नै हम नहीं राख सकदे। मनै बहोत बात करी फेर कोण्या बात बणी अर उल्टा आणा पड़या। कविता - सत्ते झूठ तो ना बोलै सै?
गऊशाला नै बदनाम मतना करै। वे गऊआं नै गौशाला मैं क्यूं ना लेंगे? सत्ते भरया बैठया था एकदम बोल्या - जै मैं झूठ बोलूं सूं तो मनैं फांसी तोड़ दियो अर जै मेरी बात ठीक पाई तो थाम सारे अर यूं सारा गाम अर गुहांड के करैगा? सारे चुप। कोए कुछ ना बोलै। सत्ते फेर बोल्या - मेरै दो किल्ले तो धरती। उसमैं बोई औड़ खेती नै ये गऊ माता चरज्यां अर कै उजाड़ करज्यां। गौशाला आले इननै राख कै राज्जी ना। इननै कोए किमै कैहदे तो इन तिलकधारियां कै मरोड़ होज्यां। इनकी मरे औड़ा की खाल तारकै गुजारा करणियां के जीनै रोज साका रहवै। कोए तो ये खाप की पंचात कै ये समाज सुधार आंदोलन आले किमै तौ ध्यान देवैं।
नफे बी सत्ते की मजबूरी समझ कै बोल्या - सत्ते यू एकला तेरा सवाल नहीं सै यू तो पूरे गुहांड का सवाल सै अर इसपै बातचीत तो होणीए चाहिए। अर एक बात और सै ताई। ताई धापां बोली - तूं भी कैहले ईब तो अपणी बात। नफे बोल्या - जिब ये बड्डी-बड्डी कंपनी ट्रैक्टर ल्याई खेती मैं तो ट्रेक्टर आन्ता गया अर बुलध खेती मैं तै खतम होन्ता गया। अर जिब बुलध खेती मैं नहीं रहया तो गऊमाता क्यूंकर बचै थी? कविता बोली - नफे सिंह जी बात किमै समझ मैं कोण्या आई। माड़ी खोल कै बताओ। नफे सिंह बोल्या - ये ट्रेक्टर बणावण आली कंपनियां के मालिक सैं म्हारे बुलधां के अर गऊआं के हत्यारे। ट्रेक्टर खेती मैं आया तो बुलध गया अर गऊआं की या हालत होगी। इन ट्रेक्टर बणावण आली कंपनियां नै बजरंग दल आले कदे किमै बी कोण्या कैहन्ते इन गावड़िया के बारे मैं। सविता बोली - मनै इसा लागै सै जणो इस गऊमाता की पूंछ तो इननै म्हारे ताहिं पकड़ा दी अर ये सारे इसके चमड़े नै बेच कै, इसकी हाड्डियां नै बेच कै अर इसकी चर्बी नै बेच कै काच्चे काटैं सैं। ताई धापां बोली - सविता तेरी बात गड़बड़ लागी थोड़ी सी और खोल कै बता। सविता बोली - हम तो न्यूं मानां सां अक अक ये इनकी चमड़ी तारण आले इन गऊआं का चमड़ा तारकै पेट भरैं। फेर मनै तो पढ़या सै कि कई हजार करोड़ का गऊआं का चमड़ा अर बाछड़े का चमड़ा अर इनतै बणे औड़ जूते अर दूसरी चीजां का ब्यौपार हो सै भारत मैं अर इसतै बाहर भी जावैं सैं। अर इस सारे ब्यौपार के बड्डे हिस्से के मालिक हिंदू सैं। इस गऊमाता की माला बी जपैं अर इसके चमड़े अर हाड्डियां का ब्यौपार भी करैं। किसे नै कोए जवाब नहीं आया फेर सत्ते बोल्या - इन बातां का सही-सही राह तो काढ़ना पड़ैगा ना तो दुलीना, अलेवा कांड होन्ते रहवैंगे अर गऊ के नाम पै माणस मरते रहवैंगे। सत्ते नै रात नै सपना आया अर देख्या अक पूरे हरियाणा की न्यारी न्यारी खापां की पंचायत सिसाना मैं होवण लागरी सैं। अर उसमैं सत्ते पै कसूर लाया जा सै गऊमाता के अपमान का अर ‘कढ़िया’ का दंड दिया जा सै। सत्ते की आंख खुलज्या सै तो ज्यान मैं ज्यान आवै सै।
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शनिवार, 15 जुलाई 2017

अंतरजातीय ब्याह पै ईनाम

अंतरजातीय ब्याह पै ईनाम

सरकार नै न्यारी-न्यारी जातियां के बीच ब्याह नै बढ़ावा देवण की खातर एक योजना चालू करी सै। इसका नाम सै अंतरजातीय विवाह पुरस्कार योजना। सवाल यू सै कि सरकार नै इसी योजना बणावण की ज़रूरत क्यों पड़ी? ब्याह तो असल मैं निजी मसला सै इसमैं सरकार की दखलन्दाजी का के काम?
बात या सै अक म्हारे देश मैं जात-पात की जड़ इतनी गहरी सै बस बूझो मतना। अर इस करकै म्हारे निजी सम्बंधां पै भी बुरा असर पड़ै सै। जड़ै जात के आधार पै किसे आदमी की सामाजिक हैसियत आंकी जान्ती हो उड़ै इन्सान की इन्सानियत कै तो झटका लागणा लाजमी सा सै। एक इन्सान की के जात सै। याहे ना अक ओ किस परिवार मैं पैदा हुया सै? फेर इस बात पर इन्सान का तो बस कोण्या चालता। ओ किस जात के परिवार मैं पैदा हुया, या ना तो बड़प्पन की बात होणी चाहिए अर ना या छोटेपन की बात होणी चाहिए। के कोए इस करकै छोटा कै बड्डा होज्या सै अक ओ किस खास परिवार मैं पैदा हुया सै। सोचण की बात या सै कि माणस की कीमत उसका मोल असल मैं किन बातां तै तय हो सै? कै होणा चाहिये।
सांच बात तो या सै अक किसे बी इन्सान का समाज मैं कद उसके कर्म, उसके व्यवहार, समाज की खातर उसनै के करया सै, ओ कितना भला सै, कितना मेहनती सै अर कितना ईमानदार सै, इन चीजां तै तय होणा चाहिए। कुदरत नै भी कुल मिलाकै सारे इन्सान एक जिसे बणाए सैं। इस तरियां जै ब्याह की बात करैं तो यो दो इन्सानां के बीच का आपसी बंधन सै अर यू बंधन उनकी आपसी समझ अर प्यार पै होणा चाहिए। इसके बीच मैं ऊंच नीच अर जाति की रूकावटां का ल्याणा इन्सानां का अपमान करणा सै, इन्सानियत का अपमान सै। इसे ब्याह शादियां ताहिं समाज मैं बढ़ावा मिलणा चाहिए। जो लड़का या लड़की इसे ब्याह करैं सैं उन ताहिं समाज मैं इज्जत जरूर मिलनी चाहिए। एक इज्जत की जिंदगी जीणा सारे इन्सानां का हक सै चाहे वे किसे भी जात मैं पैदा होरे सैं। दूसरी जाति की लड़की कै लड़के तै ब्याह करण पै म्हारी सरकार नै इनाम देवण की योजना बणा राखी सै। इस योजना का नाम सै अर्न्तजातीय विवाह पुरस्कार। यो इनाम 25 हजार रुपइये का नकद इनाम सै। जै ऊँची जाति का लड़का कै लड़की अनुसूचित जाति के लड़के कै लड़की तै कानूनी रूप तै ब्याह करैं सैं तो इसे ब्याह ताहिं बढ़ावा देवण की खातर सरकार ईनाम देवै सै। नीची जातियां भी जो एक दूसरे की साथ छुआछूत करैं सैं उनके बीच मैं बीजै ब्याह हो सै तो उन ताहिं बी इनाम दिया जावै सै। हिमाचल प्रदेस में ब्याह खातर अर्जी देणी हो सै। इस खातर अर्जी देवण आले नै अपणे विवाह का पंचायत सैक्टरी, कै सब रजिस्ट्रार के दफ्तर मैं ब्याह का पंजीकरण करवाणा ही सै।
इसकी और जानकारी किसे वकील तै बी ली जा सकै सै। सविता फत्ते नै बोली हरियाणा मैं नहीं सै के इसा कानून। फत्ते बोल्या हरियाणा मैं तो पंचायतां का तथाकथित कानून चालै सै जिसमैं अंतरजातीय ब्याह करण आले युवक युवती ताहिं फांसी के फंदे का ईनाम दिया जावै सै। सविता बोली ईबकै जै म्हारे गाम गुहांड मैं कोए इसा अंतरजातीय ब्याह करैगा तो हमनै उसकी मदद करनी चाहिए। सत्ते बोल्या ये बात तो ठीक सै फेर ये खापां आली पंचायत तो हमनै बी जात बाहर कर देंगी। जै ये म्हारे बरगे दो च्यारां नै बी फांसी का हुकम सुणा दे सैं कै मरवा दें सैं जिब्बै बात बणैगी। फेर हमनै ईब सिर पै कफन बांध लिया सै, हम पाछै कोण्या हटां।

जिसकी लाठी उसकी भैंस

जिसकी लाठी उसकी भैंस
जिब तै या सृष्टि रची गई अर माणस नै इस धरती पै पां धरया उसे बख्त तै दुनिया की राजनीति का विधान था अक ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’। फेर सहज-सहज समाज मैं विकास हुया अर लोगां धोरै पीस्सा कट्ठा होवण लागग्या। चीजां के आदान-प्रदान की जगां जिब पीस्से (पूंजी) नै ले ली तो पूंजी किसकै धोरै कितनी से योहे योग्यता का पैमाना शुरू होग्या। या पूंजी सहज-सहज उन लोगां के हाथां मैं कट्ठी होन्ती गई जो औरां की मेहनत का शोषण करकै, औरां नै धोखा दे कै यू पीस्सा कमावण लागे। इसके साथ-साथ एक बात और होन्ती गई अक जिस धोरै पीस्से की ताकत फालतू होगी उसे का राजनीति पै भी कब्जा होन्ता चाल्या गया। राजनीति की चाबी भी पीस्से आले माणसां की गोज में चाली गई। इन पीस्से आल्यां मैं भौतिक संसाधनां नै अपने कब्जे मैं राखण की ताकत बी आगी अर ये पहलवानी ताकत की खरीद भी जितनी चाहवैं उतनी कर सकैं थे। जड़ सौ की बात या सै अक इन सारी बातां का नतीजा यू हुया अक इस पूंजी के राज मैं माणस के मुकाबले मैं माणस के हाथां तैं बणाई औड़ इस पूंजी की ताकत बढ़ती ए चाली गई।
इस पूंजी के राज मैं माणस की कीमत घटगी अर पूंजी की कीमत बढ़गी। अर नतीजे के तौर पै माणसां की रोटी, लते अर मकान की बुनियादी जरूरत भी पूरी नहीं करी जा सकी। पूंजी के राज मैं धनी वर्ग एकला माणस के मूल्यां मैं गिरावट कोण्या ल्यावन्ता, बल्कि मानवाधिकारां की कोताही भी बरते सै। पूंजी के राज के इस चरित्र नै इस दुनिया मैं एक नये राज के विचार को जनम दिया। कार्ल मार्क्स नै मानव-इतिहास का वैज्ञानिक सिद्धान्त बनाया। एक इसे राज का सपना लिया जिसमैं माणस की समता अर गरिमा की पक्की गारंटी करी जा सकै। पूंजी के राज के मुकाबले जनता का राज हो, पूंजी के राज मैं जड़ै भौतिक संसाधनां, परिसंपत्तियां अर धन का इस्तेमाल मुट्ठी भर धनी लोगां की खातर हो सै, वो ना रहै। कई रमलू बरगे न्यों कैहदें सैं अक ये के होवण की बात सैं। फेर इस बात मैं शक नहीं अक जड़ै बी जनता का राज असल मैं आया उड़ै उसकी भोजन, लत्ते, कपड़े, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, वृद्धावस्था संरक्षण आदि जरूरत का पूरा करण का काम खूब हुया। जनता के इस राज मैं इन पूंजी के राज आल्यां नै प्रपंच रचकै अर जनता की कमजोरियां का फायदा ठाकै, जनता का राज चलावण आल्यां मैं भ्रम पैदा करकै, उन देशां मां तै जनता का राज खत्म करकै फेर हटकै पूंजी का राज चला दिया। पूंजी के राज आल्यां नै ठाड्डा प्रचार करया अक पूंजी के राज तै न्यारा जनता की मुक्ति का और कोए भी राह कोण्या। कई देशां के जनता के राज, साम, दाम, दंड, भेद के गुर अपणां कै पूंजी आल्यां नै ढाह दिये।
आज पूरी दुनिया मैं पूंजी के राज आल्यां की बहोतै ठाड्डी यूनियन सै। जिसका प्रधान अमरीका सै अर ये ‘जी-सेवन’ के देश पूरी दुनिया के गरीब देशां पै भी अपणे बरगे अपणे तै माड़े पूंजी आल्यां के मांह कै पूरी दुनिया मैं पूंजी के राज का घघाटा ठारे सैं। विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष अर विश्व व्यापार संगठन की त्रिमूर्ति इनका सबतै कारगर हथियार सै। इस त्रिमूर्ति का काम यो सै अक पूंजी का राज पूरी दुनिया मैं छाज्या अर जड़ै कड़ै भी जनता का राज थोड़ा-घणा बचरया सै अर कै हटकै बणण की आस सै उड़ै यू जनता का रोज मूंधा मार दिया जावै। बाणगी खातर अमरीका को बहुराष्ट्रीय कंपनी सै माइक्रोसौफट अर उसका मालिक सै विलियम गेट्स अर उसकै धोरै सै 90 बिलियन अमरीकी डालर मतलब 387000 करोड़ रपिये की कीमत की धरोहर। आज पूरी दुनिया मैं 457 अरबपति सैं जिनके हाथ मैं धरती के लगभग आधे देशां के सकल घरेलू उत्पाद के बराबर की धन दौलत सै। दुनिया के सबतै अमीर 225 लोगां धोरै लगभग एक ट्रिलियन अमरीकी डालर (42,00,000 करोड़ रपिये) की संपत्ति सै जो दुनिया के 250 करोड़ गरीब लोगां की आय के बराबर सै। भारत मैं टाटा धोरै 37510 करोड़ रपिये बिड़ला के धोरै 19345 करोड़ रपियां की परिसंपत्तियां सैं। अर अडानी अम्बानी जी के तो कहणे ए के सैं।


युवाओं, दलितों और महिलाओं से उम्मीदें

युवाओं, दलितों और महिलाओं से उम्मीदें
गांव की इज्जत के नाम पर होने वाली जघन्य हत्याओं की हरियाणा में बढ़ोत्तरी हो रही है। समुदाय, जाति या परिवार की इज्जत बचाने के नाम पर महिलाओं को पीट-पीट कर मार डाला जाता है। उनकी हत्या कर दी जाती है या उनके साथ बलात्कार किया जाता है। एक तरफ तो महिला के साथ वैसे तो इस तरह का व्यवहार किया जाता है जैसे उसकी अपनी कोई इज्जत ही न हो, वहीं उसे समुदाय की इज्जत मान लिया जाता है और जब समुदाय बेइज्जत होता है तो हमले का सबसे पहला निशाना वह महिला और उसकी इज्जत ही बनती है। अपनी पसंद से शादी करने वाले युवा लड़के लड़कियों को इस इज्जत के नाम पर सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटका दिया जाता है। यहाँ के प्रसिद्ध सांगियों व लोक कवियों हरदेवा, लख्मीचंद बाजे, भगत, मेहर सिंह, मांगेराम, चंद्रवादी, धनपत, खेमचंद व दयाचंद की रचनाओं का आलोचनात्मक गुणगान तो बहुत किया गया या हुआ है मगर उनकी आलोचनात्मक समीक्षा की जानी अभी बाकी है। रागनी कंपीटीशनों का दौर एक तरह से काफी कम हुआ है। आडियो कैसटों की जगह, सीडी लेती जा रही है जिनकी सार वस्तु में पुनरुत्थानवादी व उपभोक्तावादी मूल्यों का तालमेल साफ नजर आता है। हरियाणा के लोकगीतों पर भी समीक्षात्मक काम कम हुआ है।
गहरे संकट के दौर में हमारी धार्मिक आस्थाओं को सांप्रदायिकता के उन्माद में बदलकर हमें जात, गोत्र व धर्म के ऊपर लड़वा कर हमारी इन्सानियत के जज्बे को, हमारे मानवीय मूल्यों को विकृत किया जा रहा है। गऊ हत्या या गौरक्षा के नाम पर हमारी भावनाओं से खिलवाड़ किया जाता है। दुलीना हत्याकाण्ड और अलेवा काण्ड गऊ के नाम पर फैलाए जा रहे जहर का ही परिणाम हैं। इसी धार्मिक उन्माद और आर्थिक संकट के चलते हर तीसरे मील पर मंदिर दिखाई देने लगे हैं।
सांस्कृतिक स्तर पर हरियाणा के चार पांच क्षेत्र हैं और इनकी अपनी विशिष्टताएं हैं। हर गाँव में भी अलग-अलग वर्गों व जातियों के लोग रहते हैं। जातीय भेदभाव गहरी जड़ें जमाए है। आर्थिक असमानताएं बढ़ रही हैं। सभी सामाजिक व नैतिक बन्धन तनावग्रस्त होकर टूटने के कगार पर हैं। बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ी है। मजदूरी के मौके भी कम से कमस्तर होते जा रहे हैं। मजदूरों का जातीय उत्पीड़न भी बढ़ा है। दलितों पर अन्याय बढ़ा है। कुएँ अभी भी अलग-अलग हैं। परिवार के पितृसत्तात्मक ढांचे में परतन्त्रता बहुत तीखी हो रही है। पारिवारिक रिश्ते नाते ढहते जा रहे हैं। जनतान्त्रिक परिवार बन नहीं पा रहे। इस सबके चलते महिलाओं और बच्चों पर काम का बोझ बढ़ता जा रहा है। मजदूर वर्ग सबसे ज्यादा आर्थिक संकट में है। खेत मजदूरों, भट्ठा मजदूरों, दिहाड़ी मजदूरों व माइग्रेटेड मजदूरों का जीवन-संकट गहराया है। लोगों का गाँव से शहर को पलायन बढ़ा है। कृषि में मशीनीकरण बढ़ा है। तकनीकवाद का जनविरोधी स्वरूप ज्यादा उभर कर आया है। जमीन की ढाई एकड़ जोत पर 80 प्रतिशत के लगभग किसान पहुँच गया है। ट्रैक्टर ने बैल की खेती को पूरी तरह बेदखल कर दिया है। बैल गया तो गाय की महत्ता भी गिर गई। थ्रेशर और हारवेस्टर कम्बाइन ने मजदूरी के संकट को बढ़ाया है। श्यामलात जमीन खत्म हो गई है। कब्जे पर ले ली गई या बाँट ली गई है। अन्न की फसलों पर संकट है। पानी की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है। नए बीज, नए उपकरण, रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाओं के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की दखलन्दाजी और मनमानी लूट ने इस सीमांत किसान के संकट को बहुत बढ़ा दिया है। किसान वर्ग के इस हिस्से में उदासीनता गहरे पैठ गई है और एक निष्क्रिय परजीवी जीवन ताश खेल कर बिताने की प्रवृत्ति बढ़ी है। हाथ से काम करके खाने की प्रवृत्ति का पतन हुआ है। साथ ही साथ दारू व सुलफे का चलन भी बढ़ा है और स्मैक जैसे नशीले पदार्थ की खपत बढ़ी है। सच में कहें तो युवा को नशे के माध्यम से दिशाभ्रमित करने का जाल बिछाया जा रहा है। मगर बड़े हिस्से में एक बेचैनी भी बखूबी देखी जा सकती है। मल्टीनेशनल मालामाल हो रहे हैं, भारतीय कारीगर भुखमरी की ओर जा रहा है। आसामी सिल्क, बालूचेरी की कारीगरी, कटकी, पोचमपाल्ली या बोकई के कारीगरों को मल्टीनेशनल की होड़ में खड़ा कर दिया गया है। अब इस गैरबराबरी की होड़ में भारतीय कारीगर चाहे वह किसी भी क्षेत्र का हो, कैसे टिक पायेगा? दुनिया का 1/8 भाग भूखा है। अब मैकडोनाल्ड को ही लिया जाए यह महानगरों तक कहाँ सीमित है? अब तो शहर शहर, गली-गली में मैकडोनाल्ड, हमारे बच्चों को बर्गर, पिज्जा-बर्गर के उपहार देकर खाने की आदत डालेगा, रिझायेगा, फंसाएगा ताकि कल को वह पूरी, पराठा, इडली-डोसे भूल जाएं और ‘‘बर्गर-पिजा’’ के बगैर रह ही न पाए। बच्चे ही देश का भविष्य हैं जिसने उनको जीता उसी की तूती बोलेगी कल पूरे देश में। आज भारत में युवा की संख्या सबसे ज्यादा है। पहले जैसे साम्राज्य स्थापित करने के लिए देश विशेष की संस्कृति कारीगरी, हुनर, व्यवसाय एवं शिक्षा को नष्ट किया जाता था ताकि साम्राज्य की पकड़ देश विशेष पर और मजबूत हो। इसी प्रकार व्यवसाय, शिक्षा एवं संस्कृति पर ही हमला बोला जा रहा है और हमारे मीडिया इस हमले में मल्टीनेशनल की भरपूर सहायता कर रहे हैं।
हरियाणा में अब गुंथा हुआ आटा, अंकुरित मूंग, चना, बाजरा, मक्की इत्यादि भी विदेशी कम्पनियाँ लाया करेंगे। कुकीज, चाकलेट व केक हमारे घर की शोभा होंगे, जलेबी और रसगुल्ले अतीत की यादगार होंगे। भारतीय कुटीर उद्योग के साथ-साथ अन्य कम्पनियां भी मल्टीनेशनल के पेट में चली जाएंगी। सवाल यही है कि क्या बिना किसी विचार के इतना अन्याय से भरा असमानताओं पर टिका समाज टिका रह सकता है? यदि नहीं तो इसके ठीक उलट विचार भी अवश्य है जो एक समता पर टिके न्यायपूर्ण समाज की परिकल्पना रखता है। उस विचार से नजदीक का संबंध बनाकर ही इस बेहतर समाज के निर्माण में हम अपना योगदान दे सकते हैं। इसके बनाने के सब साधन सी दुनिया में मौजूद हैं। जरूरत है उस नजर को विकसित करने की। आज मानवता के वजूद को खतरा है। यह एक देश का सवाल नहीं है। पूरी दुनिया का सवाल है। जिस रास्ते पर दुनिया अब जा रही है इस रास्ते पर मानवता का विनाश निश्चित है। नव दुनिया यह सब समझ रही है। हरियाणावासी भी समझ रहे हैं। मानवता अपनी गर्दन इस वैश्वीकरण की कुल्हाड़ी के नीचे नहीं रखेगी। मानवता का जिन्दा रहने का जज्बा और मनुष्य के विचार की शक्ति ऐसा होना असम्भव कर देगी। हरियाणा में नव जागरण ने अपने पाँव रखे हैं। युवा लड़के-लड़कियां, दलित और महिलाएं इसके अगवा दस्ते हैं और समाज सुधार का काम अपनी दिशा अवश्य पकड़ेगा। मानवता को नष्ट नहीं होने दिया जाएगा।



आर्थिक अगड़े, सामाजिक पिछड़े

आर्थिक अगड़े, सामाजिक पिछड़े
हरियाणा के समर्थन और सुरक्षा के माहौल में यहां के किसान, मजदूर - महिला और पुरुष ने अपने खून पसीने की कमाई से नई तकनीकों, नए उपकरणों, नए खाद बीजों व पानी का भरपूर इस्तेमाल करके खेती की पैदावार को एक हद तक बढ़ाया, जिसके चलते हरियाणा के एक तबके में संपन्नता आई, मगर हरियाणवी समाज का बड़ा हिस्सा इसके वांछित फल नहीं प्राप्त कर सका। यह एक सच्चाई है कि हरियाणा के आर्थिक विकास के मुकाबले में सामाजिक विकास बहुत पिछड़ रहा है। ऐसा क्यों हुआ? यह एक गंभीर सवाल है। हरियाणा के सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र पर शुरू से ही इन्हीं संपन्न तबकों का गलबा रहा है।
देश के विभाजन के वक्त जो तबके हरियाणा में आकर बसे उन्होंने हरियाणा की दरिद्र संस्कृति को कैसे प्रभावित किया इस पर भी गंभीरता से सोचा जाना शायद बाकी है। क्या हरियाणा की संस्कृति महज रोहतक, जींद व सोनीपत जिलों की संस्कृति है? क्या हरियाणवी डायलेक्ट एक भाषा का रूप ले सकता है? इस पर समीक्षात्मक रुख अपनाकर इसे विश्लेषित करने की आवश्यकता है। क्या पिछले दस पन्द्रह सालों में और ज्यादा चिंताजनक पहलू हरियाणा के सामाजिक-सांस्कृतिक माहौल में शामिल नहीं हुए हैं। व्यक्तिगत स्तर पर महिलाओं और पुरुषों ने बहुत सी सफलताएं हासिल की हैं।
समाज के तौर पर 1857 की आजादी की पहली जंग में सभी वर्गों, सभी मजहबों व सभी जातियों के महिला पुरुषों का सराहनीय योगदान रहा है जिसका असली इतिहास भी कम लोगों तक पहुंच सका है। हमारे हरियाणा के गांवों में पहले भी और कमोबेश आज भी गाँव की संस्कृति, गांव की परम्परा, गांव की इज्जत, गांव की शान के नाम पर बहुत छल-प्रपंच रचे गये हैं और वंचितों, दलितों व महिलाओं के साथ न्याय की बजाए बहुत ही अन्यायपूर्ण व्यवहार किए जाते रहे हैं। उदाहरण के लिए हरियाणा के गांवों में एक पुराना तथाकथित भाईचारे व सामूहिकता का हिमायती रिवाज रहा है कि जब भी तालाब की खुदाई का काम होता है तो पूरा गांव मिलकर इसको करता है। रिवाज यह रहा है कि गांव की हर देहल से एक आदमी तालाब की खुदाई के लिए जाएगा। पहले हरियाणा के गांव की जीविका पशुओं पर आधारित रही है। गांव के कुछ घरों के पास 100 से अधिक पशु होते थे। इन पशुओं का जीवन गांव के तालाब के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा होता था। गांव की बड़ी आबादी के पास न जमीन होती थी न पशु होते थे।
अब ऐसे हालात में एक देहल पर तो सौ से ज्यादा पशु हैं वह भी एक आदमी खुदाई के लिए भेजता था और बिना जमीन व पशु वाला भी अपनी देहल से एक आदमी भेजता था। यह तो महज एक उदाहरण है परम्परा में गुंथे अन्याय को न्याय के रूप में पेश करने का। महिलाओं के प्रति असमानता व अन्याय पर आधारित हमारे रिवाज, हमारे गीत, चुटकले व हमारी परम्पराएं आज भी मौजूद हैं। इनमें मौजूद दुखांत को देख पाने की दृष्टि अभी विकसित होनी बाकी है। लड़का पैदा होने पर लड्डू बाँटना, मगर लड़की पैदा होने पर मातम मनाना, लड़की होने पर जच्चे की छठ मनाना, लड़के का नामकरण करना, श्मशान घाट में औरत के जाने की मनाही, घूँघट करना, यहाँ तक कि गाँव की चौपाल से घूँघट करना आदि बहुत से रिवाज हैं जो असमानता को बढ़ावा देते हैं।
बाजार के कुप्रभावों के चलते महिला पुरुष अनुपात चिंताजनक स्तर तक चला गया है, मगर पढ़े-लिखे हरियाणवी इनका निर्वाह करके बहुत फख्र महसूस करते हैं। यह केवल महिलाओं की संख्या कम होने का मामला नहीं है बल्कि सभ्य समाज में इंसानी मूल्यों की गिरावट और पाशविकता को दर्शाता है। हरियाणा में पिछले कुछ सालों से यौन अपराध, दूसरे राज्यों से महिलाओं को खरीदकर लाना और यौन शोषण तथा बाल विवाह आदि का चलन बढ़ा है। सती, बाल विवाह, अनमेल विवाह के विरोध में यहाँ बड़ा सार्थक आंदोलन नहीं चला। स्त्री शिक्षा पर बल रहा मगर कोएजूकेशन का विरोध किया गया, स्त्रियों की सीमित सामाजिक भूमिका की भी हरियाणा में अनदेखी की गई। उसको अपने पीहर की संपत्ति में से कुछ नहीं दिया जा रहा। जबकि इसमें उसका कानूनी हक है। चुन्नी उढ़ा कर शादी करके ले जाने की बात चली है और दलाली, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी से पैसा कमाने की बढ़ती प्रवृत्ति चारों तरफ देखी जा सकती है। यहां समाज के बड़े हिस्से में अंधविश्वास, भाग्यवाद, छुआछूत, पुनर्जन्मवाद, मूर्तिपूजा, परलोकवाद, पारिवारिक दुश्मनियां, झूठी आनबान के मसले, असमानता, पलायनवाद, जिसकी लाठी उसकी भैंस, मूंछों के खामखा के सवाल, परिवारवाद, परजीविता, तदर्थता आदि सामंती विचारों का गहरा प्रभाव नजर आता है। ये प्रभाव अनपढ़ ही नहीं पढ़े लिखे लोगों में भी कम नहीं हैं। हरियाणा के मध्यमवर्ग का विकास एक अधखबड़े मनुष्य के रूप में हुआ।
पंचायतें महिला विरोधी व दलित विरोधी फैसले करती रहती हैं और इन्हें नागरिक को मानने पर मजबूर करती हैं। राजनीति व प्रशासन मूक दर्शक बने रहते हैं। यह अधखबड़ा, मध्यमवर्ग भी कमोवेश इन पंचायतों के सामने घुटने टिका देता है। हरियाणा में सर्वखाप पंचायतों के सामने घुटने टिका देता है। हरियाणा में सर्वखाप पंचायतों द्वारा जाति, गोत, संस्कृति, मर्यादा आदि के नाम पर महिलाओं के नागरिक अधिकारों के हनन में बहुत तेजी आई है और अपना सामाजिक वर्चस्व बरकरार रखने के लिए जहाँ एक ओर से जातिवादी पंचायतें घूंघट, मार पिटाई, शराब, नशा, लिंग पार्थक्य, जाति के आधार पर अपराधियों को संरक्षण देना आदि सबसे पिछड़े विचारों को प्रोत्साहित करती हैं, वहीं दूसरी ओर लड़कियों की सामाजिक पहलकदमी और रचनात्मक अभिव्यक्ति को रोकने के लिए तरह-तरह के फतवे जारी करती हैं। जौंधी व नयाबास की घटनाएं तथा इनमें इन पंचायतों द्वारा किए गए फैसले जीते जागते उदाहरण हैं। युवा लड़कियां केवल बाहर ही नहीं बल्कि परिवार में भी अपने लोगों द्वारा यौन हिंसा और दहेज हत्या की शिकार हो रही हैं।

मरया औड़ काटड़ा़ और हाम

मरया औड़  काटड़ा़ और हाम
हरियाणा के पूर्वजां नै एक परम्परा बणाई। किसनै बणाई अर कद बणाई इस बात का किसे किताब मैं जिकरा कोण्या पान्ता। जै किसै नै बेरा हो अक कूणसी इतिहास की किताब मैं लिख राख्या सै तो हमनै भी बतावण का कष्ट करैं। वा परंपरा सै अक जिब भैंस का काटड़ा मर ज्या तो भैंस दूध देवण मैं आन्ना-कान्या करया करै। अर भैंस की दो खड़ की आन्ना कान्नी भी भैंस के मालिक नै बहोत महंगी पड़ज्या सै। इस बात नै जो भैंस पाल कै दूध बेच कै गुजारा करैं सैं उननै इस बात का खूबै ए बेरा सै। लोगां नै एक नयाब तरीका टोह लिया भैंस पुसावण का। अक मरे औड़ काटड़े के सिर-मुंह अर धड़ मैं भूस्सा भरवा ल्यो अर जिब धार काढ़णी हो तो भैंस कै साहमी उसनै धर्य द्यो। भैंस उसनै चाट लेगी अर दूध देगी। खूंटा ठोक नै भी दो च्यार जागां यो सांग देख्या अर जाणना चाह्या अक इसका नाम के सै? जित बी कोए फेट ज्या खूंटा ठोक उसै तै इसका नाम बूझण लागज्या। सारे न्यों कहवैं अक सै तो सई इसका किमै नाम पर के सै न्यों बेरा ना। कई हरियाणवी संस्कृति की जो कोली भरें हांडे सैं उनपै भी बूझ्या फेर वे भी सिर सा खुजा कै रैहगे। ल्यो थोड़ी-सी वार थाम बी सोच कै देख ल्यो। इतनै एक बात याद आगी अक एक बटेऊ की सुसराड़ मैं कम बण्या करदी। उसका रंग भी घणा काला था कति जैट ब्लैक। ईब कै ओ अपणी सुसराड़ गया तो उसकी सासू बहोत मीठा बोली। सांझ कै हल्वा बणाया अर खुद सासू नै थाली परोसी।
साहमी बैठकै बोली अक बेटा जितने दिन जी करै दस दिन, पन्द्रह दिन म्हिना आड़ै डट। तेरी खूब खातिर दारी करांगे। बटेऊ कै बात समझ नहीं आई अक इतनी सेवा क्यों होरी सै? सारी रात सोचदा रह्या। तड़कै ए गरम गरम परोंठे आगे। सासू राजी खुसी की बूझण लाग्यी। फेर बोली अक जितने दिन जी करै उतने दिन डटिए। बटूऊ बोल्या बिना काम न्यों खाट तोड़दा माणस आच्छा कोण्या लागदा। जै डाट्टण चाहो सो तो किमै काम बताओ। सासू बोली अक काम अर बटेऊ धोरै? बटेऊ बोल्या फेर बी माता जी किमै तो काम हो। सासू बोली अक म्हारी भैंस का काटड़ा मर र्या सै। जिब धार तड़कै सांझ काढूं तो उसके साहमी खड़या हो जाया कर। तो बात या सै अक म्हारे नेता बी अपणे मरे औड़ नेतावां की खोड़ मैं भूस्सा भरवा कै जनता नै लैक्सनां कै टाइम पुसावण नै इसका खूबै इस्तेमाल करैं सैं। तो आई याद अक भूस्स भरे औड़ काटड़ का नाम के सै? नहीं बेरा ना। एक बै फेर सोच कै देखल्यो। थोड़ा-सा दिमाग पै बोझ गेरणा सीखणा चाहिए।
जो भी आकै हमनै भकाज्या सै हम उसकी हां मैं हां करकै नाड़ हिला द्यां सां। अर फेर कहवां सां अक ओहले भाई। हमनै के बेरा था अक न्यों बणज्यागी? अर फेर ताश खेलण लाग ज्यांगे। अर कै दारू की बोतल धर कै बैठ ज्यांगे।
मजाल सै जै इस भूस्स भरे औड़, मरे औड़ काटड़ का नाम एक पोस्टकार्ड पै लिख कै अर हरिभूमि के दफतर मैं भेजद्यां। हो सकै ज्यूकर बासमती चावल का बदेसी कंपनियां नै पेटैंट करवा लिया न्योंए इसके नाम का भी वे बोतडू. के नाम तै पेटैंट करवा लें अर आपां फेर कहवां अक ओहले भाई। के बेरा था न्यों बणज्यागी? या तो बणी बैठी सै। एक बर इसका नाम अखबार मैं आज्यागा तो फेर बदेशी कंपनियां नै आसान नहीं रहवै इसका पेटैंट करवाणा। आया समझ मैं नाम अक ईब्बी नहीं आया सै? के बाट देखो सो अक खूंटा ठोक बता देगा। ना कति नहीं बतावै अर जै बताणा भी चाहवै तो किततै बतावैगा। खुदै बेरा कोण्या। फेर एक बात पक्की सै अक आपां सारे रलकै सोचांगे तो इसका नाम जरूर टोहल्यांगे। आपा मारे पार पड़ैगी। बिराणै भरोसै बैठकै कै राम के भरोसे बैठकै काम कोण्या चालै।



बुश दादा सुणिए

बुश दादा सुणिए
बुश दादा म्हारे कान्ही की राम राम तनै। मनै बहोत बिचार करया अक लिखूं अक ना लिखूं? फेर दिल कोन्या मान्या। दिल नै गवाही दी अक खुल्ली चिट्ठी ना तै गोपनीय चिट्ठी लिख दी जा फेर लिखना जरूर चाहिए। मेरी थारे तै हाथ जोड़ कै बिनती सै अक और किसे नै या चिट्ठी मतना दिखाइयो। पाछली बरियां कश्मीर विधान सभा पै बार-बार हमले (आतंकी) हुए तो हमनै थारे ताहिं जो खत लिख्या था उसनै लेकै म्हारे विपक्ष नै म्हारी खाट खड़ी करण मैं कसर कोन्या छोड्डी। कै तो इस विपक्ष नै थारे जाथर का कोनी बेरा अर कै ये म्हरी थारे कान्ही की जो श्रद्धा भक्ति सै उसनै देख कै ये जलैं सैं। जलें जांगे। इनका काम तो बस जलना ए सै। फेर दादा तों यकीन राख इनके जलण तै म्हारी भक्ति मैं कसर नहीं आवैगी, ले मनैं राम की सूं। फेर एक बात सै ज्यूकर राम जी अपने भक्तां का ख्याल राखैं सैं न्यांेए तमनै म्हारा भी ख्याल राखणा चाहिये। इसा लागै सै जणों पाछले कुछ दिनां तै थाम म्हारे तै नाराज सो। उल्टा बख्त तै हमनै थारी बहोतै घणी जरूरत सै। माड़े बख्त सैं म्हारे, हम देखैं सैं साहरे थारे। दादा तमनैं बेरा सै अक इस बख्त राहु अर केतु सारे म्हारी कुण्डली मैं कट्ठे होरे सैं। घणे कष्ट मैं सां हम। थामनै बेरा सै अक मंदिर आले उत्तर प्रदेश मैं अर साथ की साथ पंजाब मैं लैक्शन आगे। पंजाब की तो देखी जागी उड़ै तो घणे तै घणा योहे होवैगा अक कांग्रेस हटकै आज्यागी अर उसकी आपां नै घणी चिंता कोन्या। फेर उत्तर प्रदेश मैं तो म्हारै पसीने आरे सैं। दादा तमनै तो बेरा ए होगा अक म्हारे इन विपक्षी दुष्टां नै गलजोट कर लिया अर लोक मोर्चा बणा लिया। इतनै मैं एक कोन्या बात थमती दिखाई देन्ती। पिछले पांच साल मैं जो म्हारे याड़ी थे वे भी म्हारे चहोंटकी भरण लागरे सैं। हमनै तीन-तीन मुख्यमंत्री बदल कै देख लिये फेर ये विपक्षी पां नहीं टिकण देन्ते। अर याड़े की जनता भी नहीं सुधरी। हमनै इस जनता  खात्तर कै नहीं कर्या पर या या जनता हमनै झूठा कहवै सै। जनता कहवै सै अक राम के नाम पै हमनै जनता बेवकूफ बणादी अर कानून व्यवस्था टाण्ड पै धरदी। यो लैक्शन जीतना मुश्किल लागै सै। जनता नै ईब के कैहकै भकावां? पहलमैं हजारां वादे कर लिये थे पूरा कोए कर नहीं पाए। मुश्किल तै संसद पै आतंकवादियां के हमले नै राह काढ्या था। हमनै लोकसभा मैं आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया। हमनै अपणे दम पै आतंक का खात्मा करण की घोषणा कर दी। यो तै पाछै बेरा लाग्या अक गल्ती होगी। हमनै दादा थारे साहरै इसतै निपटण की घोषणा करनी चाहिए थी। इस गल्ती की सजा थामने म्हारे ताहिं संयम बरतन की बात कैहकै दे दी। हम सोचां थे हमला करकै उत्तर प्रदेश का लैक्शन आगे नै सरका ल्यांगे। फेर थारी या सजा घणी महंगी पड़दी दीखै सै दादा।
हमनै दादा थारा हरेक हुकम माण्या सै। थामनै काठमांडू मैं परवेज मुशर्रफ तै हाथ मिलावण का इशारा करया, हमनै मिला लिया। थामनै कह्या अक पोटो जारी करद्यो, हमनै कर दिया। थामनै हुकम दिया अक अपणी सरकारी पूंजी सेठां ताहिं बेच द्यो, हमनै बेच दी अर बेचण लागरे सां। थामनै कह्या छंटनी करो, हमनै हजारां लोग नौकरी पर तै ताह दिये। थामनै कह्या किसानां की सब्सिडी खत्म करद्यो, हमनै करदी। फेर दादा ईब एक बात तो म्हारी बी सुणले अक हमनै यो संयम तोड़ण की इजाजत दे दे। असल मैं हम म्हारी सीमा पै अपणी सेना खड़ी करगे, ईब उल्टी के कैहकै बुलावां? घणे नहीं तो थोड़े से तोप के गोले फोड़ण की, टैंकां नै हरकत मैं आवण की अर हजार पांच सौ जवान तै कम तै कम शहीद करावण की इजाजत दे दे। बस इसमैं ए म्हारा बी अर थारा बी बेड़ा पार होज्यागा। थारी कंपनियां नै नये ताबूत बनावण का आडर मिल ज्यागा अर कंडम हुआ औड़ गोला बारूद जो थारै धोरै सै उसने हम खरीद ल्यांगे। दादा एक बै इजाजत दे दे। म्हारे चेले चांटे युद्धोन्माद का जनून जनता के सिर पै चढ़ावण लागरे सैं। थारे हुक्म की देर सै। युद्ध के कारण जनता बाकी सब किमै भूल ज्यागी। यू.पी. अर पंजाब का लैक्शन बी।
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बुश का नया सिद्धांत

बुश का नया सिद्धांत
बुश नै साफ अर छाती काढ़ कै या बात बताई सै अक आवण आले दिनां म्हं अमरीका दुनिया म्हं के के गुल खिलावैगा। उसकी रणनीति के होगी। अमरीका पूरी दुनिया पै अपणा झण्डा अर डण्डा घुमाना चाहवै सै।
सारी दुनिया पै कब्जा करणा चाहवै सै। एक दस्तावेज त्यार करया गया सै जिसका नाम सै ‘द नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रेटजी ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स’। इसका मतलब सै अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति। यो दस्तावेज तेंतीस पेज का बताया।
अमरीकी संसद के साहमी यो दस्तावेज पेश करया सै। इस बुश-सिद्धांत की खास-खास बात के सैं? बेरा सै के? ना कोण्या बेरा लागता। तो लागदार इन बातां का बेरा तो लाणा पड़ैगा। इस म्हं दो नयी बात कही गई सैं। पहली बात तो अमरीका नै या कही सै अक जनसंहार के हथियार विकसित करण आले शत्रु देशां कै आतंकवादी ग्रुपां कै खिलाफ अमरीका पहलमै कार्यवाही कर देगा। दूसरी बात कही सै अक अमरीका इस बात की इजाजत नहीं देगा अब उसकी सैन्य सर्वोच्चता ताहिं उस ढाल की चुनौती कदे बी दी जावै जिस ढाल की शीत युद्ध के बख्तां म्हं दी गई थी।
पहली बात का मतलब यो बी सै अक अमरीका आतंकवाद के खतरे का नाम ले कै किसे बी दुनिया की संस्था तै बिना बुझे उस देश पै एकला एक हमला ठोक दे। दूसरे देशां नै देखणा पड़ैगा अक वे उन आतंकवादी देशां की मदद ना करैं।
इसका मतलब साफ सै अक अमरीका दुनिया का सबतै बड्डा ‘दादा’ पाक लिया। उसके हुक्म ना माणण आले देशां की खबर वो कदे बी अर क्यूकरै बी ले सकै सै। इसे अधिकार के हिसाब तै ओ हाल म्हं इराक नै सबक सिखावण की बात करण लागरया सै। कमाल की बात तो या सै अक दुनिया म्हं सबतै पहलम भारत नै अमरीका को इस बात का समर्थन कर दिया।
अमरीका दुनिया का सबतै बड्डा दादा से अर रहवैगा या बात मान ली। मतलब साफ सै अक बुश की दादागिरी आगै हमनै गोड्डे टेक दिये। बहाणा यू बणाया अक यू नया दस्तावेज भी पुराने दस्तावेजां जिसा सै इस म्हं नया कुछ बी कोण्या।
दूसरी बात जो बुश नै कही उसका मतलब ये सै अक अमरीका इस बात नै कति बर्दाश्त नहीं करैगा अक उसके प्रभुत्व के दायरे तै बाहर का कोए बी देश सैन्य शक्ति खड़ी करै जो अमरीका के मुकाबले की हो। ये चुनौती देवण आले देश चाहे चीन जिसे उभरते देश हों अर चाहे इराक बरगी क्षेत्रीय ताकत हों। इस तरां की इनकी हरकत बैरी की हरकत मानी जागी अर अमरीका इसे देशां कै खिलाफ किते ताहिं बी जा सकै सै। अमरीका की हां म्हं हां जितनी वार उतनी वार ठीक। अर हां म्हं हां नहीं तो फेर हमलों की खात्तर त्यार रहो।
अमरीका के हितां की अनदेखी कोए देश नहीं करैगा अर जै कोए इसा करैगा तो इसका खामियाजा भरैगा। 112 अरब बैरल के तेल भंडार की साथ ईब इराक अमरीका के निशाने पै सै। क्यूं? क्यूं के अमरीका का कहया कोण्या माणण नै त्यार।
पश्चिम एशिया एशिया म्हं इराक बरगा देश ताकतवर होज्या यू अमरीका नहीं पचा सकदा। देखिये बुश यो तेरा नया सिद्धांत कदे सारी दुनिया नै ले कै डूब ज्या अर फेर तो भी हरियाणे आल्यां की तरियां कहवै ओहले! मनै के बेरा था न्यों बणज्यागी।
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आओ आपणे मांह बी झांक कै देखलें

आओ आपणे मांह बी झांक कै देखलें
     म्हारा गाम, म्हारा भाईचारा, म्हारी इज्जत, म्हारे बालक, म्हारा गुहांड, म्हारे बेटा-बेटी, म्हारी बहु, म्हारे बाहण अर भाई। इन रिश्तयां का खोखलापन कति सबकै साहमी आ लिया। पर चाला तो योह सै अक हाम फेर बी इन रिश्तयां की कोली भरे बैठे सां। फेर गाम की इज्जत के बारे मैं म्हारी समझ के सै, इसतैं भी कई बात जुड़ै सैं। गाम की इज्जत के मायने के सैं, इस पर चर्चा अर बहस की जरूरत सै। आज गामां का के हाल हो लिया, इसपै चर्चा करण की जरूरत सै।
     इतना बुरा हाल क्यों हो लिया इस पर भी बहस चलावणी चाहिए। म्हारे मन तो साफ सैं फेर क्यों इतनी गंदगी फैलगी? म्हारी नजर मैं तो कोए खोट नहीं फेर बलात्कार करण आले लोगां की हिम्मायत मैं एसपी अर डीसी कै ट्रॉली भर भर कै कूण ले ज्यावैं सैं? दारू पीवणीयां, पीस्से खावणिया, लड़की गेल्यां छेड़खानी करणियां नै सरपंच कूण बणावै सै? गाम मैं सुलफा, दारू अर स्मैक कूण बिकवावै सै? गाम मैं वेश्यावृत्ति कूण फैलावै सै? गाम की छोरियां अर बहुआं की गेल्यां भद्दे मजाक कर टोंट कौण कसै सै? बाहण की गेल्यां चाचा कै मामा कै पड़ोस का छोरा अवैध संबंध क्यूं बणावै सै? बहू की गेल्यां सुसरा क्यों गिरकावै सै? एकली देख कै बहू की इज्जत पै हाथ क्यों उठावै सै?
     खेत-क्यार मैं कमजोर तबक्यां की औरतां गेल्या जोर-जबरदस्ती कौण करता पावै सै? नामर्दी नौजवानां मैं क्यों बढ़ती जावै सै? बाहण-भाई के रिश्ते बच कड़ै रहैं सैं? आज ताहिं किसे ऊंची जाति के खाते-पीते परिवार ताहिं फांसी का फतवा म्हारी पंचायतां नै उसके छोरे ताहिं क्यंू नहीं सुनाया? बिगाड़ करण मैं सबतै आगै सै यू छोरा। सबनै बेरा। फेर तलै ए तलै सब किमै चालै सै। ऊपर दिखाई नहीं देवणा चाहिए। जै इतनी ए चिंता सै इन पंचायतां नै गाम की इज्जत की तो इनपै क्यूं ना फांसी का हुकम? इतनी खामी आगी गामां मैं उन पर तो कदे पंचायत नहीं अर जो बालक नौजवान अपनी मर्जी तै ब्याह करकै घर बसाना चाहवैं सैं वे समाज मैं बिगाड़ करते दीखैं सैं इन असली गाम बिगाडुआं नै। एक हरिजन का छोरा अर किसी बड़ी जात की छोरी उसै गाम की आपस मैं ब्याह करलें सैं तो उन ताहिं मौत का फतवा दे दिया जावै सै। जहर दे कै मार दिये जावैं सैं। छोरी नै मामा कै खन्दा देंगे अर दस पन्दरा दिन पाछै कै म्हिने पाछै बेरा आवैगा गाम मैं, अक बिमला के पेट मैं चाणचक दर्द हुया अर वा मरगी। सारा गाम जाणै सै अक वा मारी गई सै? उसके मारण आल्यां नै उस ताहिं मारण का हक किसनै दिया? अन्तरजातीय ब्याह करया, दोनूं 18 साल तै फालतू उमर के तो गाम तीसरा तेली कूण? कानून कहवै सै अक 18 साल तै ऊपर के दो व्यस्क आपस मैं ब्याह कर सकैं सैं तो फेर ये पंचायत क्यूं रोज मौत के फतवे देवण लागरी सैं इन नौजवानां नै? म्हारा कानून, म्हारे अफसर, म्हारी पुलिस अर म्हारे नेता क्यूं इन फांसी का हुकम सुणावण आले सफेद पोश बदमाशां का विरोध नहीं करते? क्यूं इन पर कानूनी शिकंजा नहीं कस्या जान्ता? आपस मैं ब्याह करणा जुल्म कड़ै सै? जै जुल्म नहीं तो फेर ये ब्याह करणिये रोज क्यूं फांसी तोड़े जावण लागरे सैं? क्यूं हम चुप्पी साधरे सां? हमनै के हक सै किसे की ज्याण लेवण का? बहोत हो लिया। ईब तो इस बर्बरता का खात्मा होणा ए चाहिए। किसे नै किसे नै तो आगै इन नौजवानां की हिम्मायत मैं आणा पड़ैगा। खूंटा ठोक तो लिया आ बाकी थारा थामनै बेरा होगा।

गो-मांस भक्षण का निराधार प्रलाप


दैनिक हरिभूमि दिनांक 26 अक्तूबर के संपादकीय पृष्ठ पर किन्हीं खूंटा ठोक ने ‘गऊ बचाओ माणस मारो’ शीर्षक से जो लेख लिखा है वह घोर आपत्तिजनक और सर्वथा मिथ्या है। उनके अनुसार ‘‘एक सवाल तो साफ सै अक गाय म्हारी माता कदे कदीमी जमाने तै नहीं सै। गाय का मांस भी म्हारे पूर्वज खूब खाया करते। म्हारे पूर्व आर्य थे या हम मानां सां। म्हारे ग्रंथां म्हं गऊ मारके उसका भोज करण का जिकरा एक जागां नहीं कई जागां म्हं कर राख्या सै। मनुस्मृति अध्याय-तीन श्लोक 271 म्हं लिख राख्या सै अक गाय, बर्धी का मांस अर दूध अर दूध तै बणी चीजां तै पितरां का तर्पण करण तैं बारह साल तांहि तृप्त रहवैं सैं।’’ देखिये मनुस्मृति अध्याय-3 श्लोक 271 इस प्रकार है -
संवत्सरं तु गव्येन पयसा पायसेन च।
वार्ध्रीणसस्य मांसेन तृप्तिर्द्वादशवार्षिकी।
यहां पर बिल्कुल स्पष्ट लिखा है - ‘गव्येन पयसा पायसेन च’ गाय के दूध से और दूध से बनी पायस (खीर) से एक वर्ष तक तृप्ति होती है। गाय के मांस का यहां कोई ‘जिकरा’ नहीं है। वार्ध्रीणस के मांस से बारह वर्ष की तृप्ति लिखी है। मनुस्मृति की टीका में कुल्लूकभट्ट ने ‘वार्ध्रीणस’ शब्द का अर्थ लिखा है - ऐसा सफेद बूढ़ा बकरा जिसकी अनेक संतान हो चुकी हों, जो क्षीणशक्ति हो और पानी पीते समय जिसके लंबे दोनों कान और जीभ जल का स्पर्श करते हों।
ध्यान रहे, इस अध्याय के 122 से 284 संख्या तक के श्लोकों में मृतक श्राद्ध का वर्णन होने से ये श्लोक प्रक्षिप्त हैं। मनु ने जीवित पितरों के श्राद्ध का विधान किया है (3.80-82) मृतक-श्राद्ध मनु की मान्यता के विरुद्ध है। दूसरा मिथ्याकथन - ‘‘वशिष्ठ स्मृति के चौथे अध्याय म्हं लिख राख्या बताया अक पूजा के खात्तर तगड़ा बुलध अर बकरा पकाणा चाहिए।’’
इस भाषा से प्रतीत होता है कि लेखक ने वशिष्ट स्मृति देखी ही नहीं। वशिष्ठ स्मृति के चौथे अध्याय में 131 श्लोक हैं, जिनमें गृहस्थ धर्म के अंतर्गत विवाह, गर्भाधान और सीमन्तोन्नयन संस्कारों का वर्णन है। मैंने पूरे अध्याय का पाठ किया, किसी भी श्लोक में तगड़े बैल, बकरा पकाने की चर्चा नहीं है। तीसरा प्रसंग - ‘‘बृहदारण्यकोपनिषद् 6.4.18 म्हं लिख्या सै अक गुणीपुत्र की प्राप्ति के खात्तर गाय अर सांड का मांस खाणा चाहिए।... पत्नी की गेल्यां मिलकै सांड अर बुलध का मांस घी भात की साथ खाणा चाहिए।’’ बृहदारण्यकोपनिषद् शतपथब्राह्मण का अंतिम भाग है। उद्धृत अंश गर्भाधान प्रकरण का है। इसमें गृहस्थ दंपत्ति इच्छानुसार श्रेष्ठ पुत्र और पुत्री की प्राप्ति के लिए अपना भोजन किस प्रकार करें, उसका विधान 14 से 18 तक की पांच कण्डिकाओं में किया गया है। माषौदन-उड़द और चावल के स्थान पर प्रेस अथवा लेखक के प्रमादवश ‘मांसौदन’ पाठ हो गया है। कुछ भी हो यह पाठ इस प्रकरण के सर्वथा विपरीत है। क्योंकि 14वीं से 18वीं कण्डिका तक क्षीरौदन, दध्योदन, उदौदन, तिलौदन के पश्चात ‘माषौदन’ ही प्रासंगिक है ‘मांसौदन’ नहीं। इसमें तिल के बाद माष का उल्लेख है। इसी क्रम में यहां पर दूध, दही, जल और तिल के बाद माष का ही पाठ होना चाहिए, मांस शब्द एकदम अप्रासंगिक है। इसी प्रकार उक्षा और ऋषभ शब्द को केवल बैल अथवा सांड अर्थ में रूढ़ मानना भी अज्ञानता ही मानी जाएगी। शास्त्रों में उक्षा का अर्थ समुद्र और सूर्य भी है। इसी प्रकार ऋषभ का अर्थ ऋषि, उत्कृष्ट गुणकर्मस्वभाववाला राजा, बलवान, विज्ञानवान (परमयोगी) भी होता है। इसके अलावा, महाभारत शांतिपर्व अ.337 श्लोक 4-5 में स्पष्ट लिखा है-
बीजैर्यज्ञेषु यष्टव्यमिति वै वैदिकी श्रुतिः। अज-संज्ञानि बीजानि च्छागं नो हन्तुमर्हथ। ऋषियों ने कहा - हे देवताओं! यज्ञों में बीजों द्वारा यजन करना चाहिए, ऐसी वैदिक श्रुति है। बीजों का ही नाम ‘अज’ है अतः बकरे का वध करना उचित नहीं।
यहां यौगिक अर्थ में बीजों को अज कहा गया है। इसी प्रकार ईश्वर का नाम भी इसलिए ‘अज’ है। ‘अजो न क्षां दाधार पृथ्वीं’ (ऋृ 1.67.3) (ऋृ 7.35.13) इत्यादि ऋचाओं में ‘अ’ का अर्थ अजन्मा परमात्मा है। यदि अज का लौकिक रूढ़ अर्थ लिया जायेगा तो बकरा पृथिवी आदि लोकों को धारण कैसे कर सकता है? इसी प्रकार ‘उक्षा’ शब्द को देखकर किसी ने बैल का ग्रहण किया होगा, क्योंकि उक्षा बैल का भी नाम है। परन्तु इतने बड़े भूगोल के धारण करने का सामर्थ्य बैल में कहां से आवेगा? इसलिए ‘उक्षा’ वर्षा द्वारा भूगोल के सेचन करने से ‘सूर्य’ का नाम है। (सत्यार्थप्रकाश, समु. 8)। महाभारत (अनुशासन पर्व अ. 145) में मांस-भक्षण और हिंसा का निषेध कई श्लोकों में देखा जा सकता है जैसे - जो मनुष्य अपने स्वाद के लिए प्राणियों की हिंसा करता है वह व्याघ्र, गृध्र, शृगाल और राक्षसों के तुल्य है। ‘गाय हमारी माता कदे कदीमी जमाने तै नहीं सै।’ यह कथन भी लेखक की अल्पज्ञता को ही दर्शाता है। अंत में संपादकमंडल से मेरा यही नम्र निवेदन है कि मिथ्या और विवादास्पद जनविरोधी लेख को प्रकाशित न करें। लेखक को भी बिना प्रमाण के मिथ्या प्रलाप नहीं करना चाहिए।






जै याही रही चाल, देखियो के होगा

जै याही रही चाल, देखियो के होगा
म्हारे चमचमाते इंडिया मैं इस छलांग मारते माहौल मैं जै 1998 से चालते आवण आले ‘सुराज’ के बख्तां मैं जै कुछ लोग चांद पै नहीं भी पहुंचे तो भी काच्चे काटण लागरे सैं इस बात मैं झूठ कड़ै सै? एक बात तै हो सकै सै या बात म्हारे हरियाणा आले भोले भाले भाई-बाहणां कै के बेरा समझ मैं आज्या। म्हारे देश मैं जितने भी नैगम कर, तट कर आयकर अर केंद्रीय उत्पाद शुल्क भरण आले जितणे भी लोग लुगाई सैं, उनपै कर की मद मैं बकाया 31 मार्च 1998 मैं 47,888 करोड़ रुपइये था। कितना था? सैंतालीस हजार आठ सौ अठासी करोड़। यू पीस्सा 31 मार्च सन् 2002 मैं कितना होग्या बेरा सै? कोण्या बेरा? हां क्यूंकर बेरा लागै, रोटी रोजी तै फुरसत कोण्या अर कै ताश खेलण तै फुरसत कोण्या। जड़ बात या सै कि हमनै इस बात का बेरा लावण की ना तो इच्छा अर ना म्हारे धोरै बख्त इसे काम खातर। ठीक सै ना? तो ले हम बतादें इसका हिसाब। यू पीस्सा मार्च 2002 मैं 86,342 करोड़ था। देख्या च्यार साल मैं दुगणा होग्या। एक अंदाजा यू भी सै कि ईब तो यू पीस्सा 1000 अरब की रेखा पार करग्या दीखै सै। फेर कई न्यों कैहदें सैं जिब करग्या होगा इसका म्हारी सेहत पै के असर सै? इसपै भी बात हो ज्यागी फेर या बात मान तो ल्यो कि 1000 अरब म्हारे सरकार के खजाने मैं आणा चाहिए था ओ कोण्या आया।
एक सोने पै सुहागे आली बात और सै कि म्हारे देश के बड्डे बड्डे कारखानेदार बैंकां का पीस्सा डकारें बैठे सैं। बेरा सै कितना पीस्सा सै यो? ईब न्यून न्यून मतना देखै अर बता कै सोच कितना पीस्सा डकार राख्या सै इननै। के सोच्या? सौ करोड़? एक हजार करोड़? पचार हजार करोड़? इसतै फालतू तो के डकारग्या होगा न्यों मतना सोचो। पूरा एक लाख करोड़ रुपइया डकारे बैठे सैं अर ईबै तो आए साल डकाराणै लागरे सैं। फेर इसतै फालतू लूट क्यूंकर मचाई जा सकै सै? सबतै बड्डा चाला यू सै अक फेर बी गुडफील, साइनिंग इंडिया अर और बेरा ना क्यां क्यां के बाहणै म्हारे सरकारी खजाने के 500 करोड़ रपिए बहाए जावण लागरे थे। इब यू सारा पीस्सा जिन लोगां की गोज मैं गया उन ताहिं तो इंडिया कसूता चमकण लागरया सै। फेर इसमैं उस इंडियावासी का जिकरा कोण्या जो अपणा घर मिट्टी के तेल तै चलावैं सैं अर न्यूं भी नहीं बताया जान्ता कि 1998 मैं एक लीटर माट्टी के तेल का भा दो रपइये ठावन पीस्से था अर यू चमक कै जनवरी 2004 मैं दस रुपइये होग्या।
न्यूएं डीजल का भा बध गया, पैट्रोल का भा, गैस सिलेंडर एक सौ पैंतीस रुपइये ठानवैं पीस्से का था ओ दो सौ इक्तालिस रुपइये साठ पीस्से का होग्या। देख्या कैरोसीन, डीजल, पैट्रोल, अर रसोई गैस क्यूंकर चमकण लागरे सैं। के कहया नहीं चमकते? जाओ चश्मे चढ़वा कै आओ अर देखो पूरा इंडिया क्यूंकर जगमगावण लागरया सै। अर जै साइनिंग इंडिया आल्यां ताहिं जनता नै एक मौका और दे दिया तो देखियो किसा चमका देंगे पूरे इंडिया नै। पूरी दुनिया मैं इंडिया-इंडिया हो ज्यागा। यूरिया जो 98 मैं 3680 रुपइये था ओ 4830 रुपइये टन होग्या। अर लैक्सनां पाछै यूरिया की कीमत 8000 रुपइये टन हो गयी। बिजली की यूनिट की कीमत बधग्यी अर भारत का कमेरा दारू पी कै टन हो ज्यागा। दारू पीये पाछै तो इंडिया और भी चमकता दीखैगा। देखियो घणा मतना चमका दियो इंडिया नै।

म्हारा पाला कुणसा ?

म्हारा पाला कुणसा ?
सते, नफे, फते, सविता, कविता, सरिता धापां हरके घरां कट्ठे होगे। सरिता माड़ा मुंह लटका री थी। सविता बोली - सरिता के बात बेबे मुंह क्यूं लटकारी सै? सरिता बोली - सुभाष की चिट्ठी आई सै। उसनै लिख्या सै अक आड़ै फौज मैं चरचा सै कि आणे वाले टेम म्हं कदै बी अमरीका आला बुश म्हारे देश की सरकार कै दाब लावैगा अक भारत की फौज इराक मैं भेजी जावै। उनकी बटालियन का नंबर आवण की बात वो लिख राखी सै। नफे - इसमैं मुंह ढीला करण की कौनसी बात सै? आच्छा इराक की सैर करकै आवैगा। थारे ताहिं तो किमै ल्यावैएगा उड़े तै। सरिता - उड़ै तो छापामार लड़ाई छिड़री बताई अमरीकियां मैं अर इराकियां मैं? उड़ै जाकै उल्टा क्यूंकर आवैगा म्हारा फौजी।
सविता बोली - फौज मैं माणस कद कुर्बाण होज्या या बात तो न्यारी सै पर असली बात तो या सै अक भारत की फौज इराक मैं क्यूं जावै? सते बीच मैं बोल्या मनै तो इसा लागै सै कि म्हारी फौज नै इराक मैं नहीं जाणा चाहिए। पहलम तो बुश नै बिना बात हथियारां का बाहणा करकै इराक पै हमला बोल दिया। सारा इराक तहस-नहस करकै गेर दिया। हजारां लोग मारे गये। बाकी नुकसान हुया वो अलग। फत्ते तै नहीं डट्या गया अर बोल्या - अर जिन हथियारां का बाहणा ले कै इराक पै हमला करया था बुश नै वे हथियार तो टीवी पै कदे बी कोन्या दिखाये बुश महाराज नै। सविता बोली - दिखावै कड़ै तै था। हों तो दिखावै।
कविता घणी वार तै चुपचाप उनकी बात सुणण लागरी थी वा बोली - इराक आले अपणे तेल के भंडारां पै अपणा कब्जा क्यूं छोड़ैंगे? सत्ते बोल्या - वे कड़ै छोड़कै राज्जी सैं। बुश नै उड़ै अपणी पिट्ठू सरकार बणवा ली। ईब या पिट्ठू सरकार बुश के कहे तैं तेलां के भंडार बेच्चण लागरी सै उन कंपनियां ताहिं जिन ताहिं बुश अर उसके चेले चान्टे इशारा करैं सैं। वे क्यूकर इशारा करैं सैं या लांबी कहाणी सै।
फत्ते बोल्या ज्यूकर म्हारली सरकार नै बी अमरीका के कहे तैं मुनाफा कमावण आली बाल्को बरगी कंपनी बी कौड़ियां के भा बेच दी थी। तो म्हारी जनता नै वा सरकारै मूंधी मारदी। सविता बोली - इराक के लोग मनै तो सही लागे। वे अपणे तेल के भंडारां पै कौड़ियां के दामां पै अमरीकी कंपनियां का कब्जा क्यूं होवण देंगे? वे अमरीकी फौज पै दा लाकै हमला बोलैं सैं तो सही करैं सैं? अमरीकी सेना के फौजी मारें जावैं सैं। ईब अमरीका मैं लैक्शनां आण वाले अर बुश नै धरती भीड़ी होन्ती आवै सै। बुश चाहवै सै कि अमरीकी फौज नै तो वो उल्टी बुला ले अर भारत देश की फौज नै इराक मैं भेज दे। धापां कदे-कदे बोल्या करै वा बी सारी बात सुण कै बोली - यो आच्छा तमाशा, इराक के तेल के भंडारां पै कब्जा तो अमरीका का अर उसकी रुखाली करैगी भारत की फौज। या बात तो कतिए गलै ना उतरकै देती। सत्ते बोल्या - सरिता के फौजी सुभाष की बात मैं दम लागै सै। भारत की सरकार इराक मैं अपणी फौज ना भेजै इस खातर हमनै किमै करणा चाहिए। धापां बोली - हम के कर सकां सां? सविता बोली - ताई हम के नहीं कर सकदे? हम म्हारे देश की सरकार बदल सकां सां तो के सरकार नै इराक मैं फौज भेजण तै नहीं रोक सकदे?
धापां बोली - वा बात न्यारी थी या बात न्यारी सै। सत्ते बोल्या - कति न्यारी कोण्या। दिल्ली मैं हथियारां की दौड़ के खिलाफ एक संस्था सै वे पूरे हिंदुस्तान के लोगां तै अपील करण लागरे सैं अक जद बी फौज भेज्जण की बात उठै तो थाम इस बात के खिलाफ आवाज ठाइयो। इस बारे म्हं सारा देश एकमत सै अक अमरीका की गाद्दड़ भबकी तै डरण की जरूरत ना सै। म्हारा देश कोय मोम की गुड़िया कोन्या जो बुश की घुड़की तै पिंघल ज्यागा। ईब तो समझ गए मेरे भाई। इसमैं हरियाणा के समझदार लोगां नै हिस्सेदारी करणी चाहिए।






मार गई सरसों की मार

मार गई सरसों की मार
आज शहरां म्हं भीड़ तो सै फेर पहलम तै कम सै। कारण सै लामनी का। सरसों तै किसान नै काट ली अर काढ़ कै मंडी म्हं लियाया अर गिहूंआ की लामणी आधी अक होली अर आधी रैहरी सै। सरसों का भा केंद्र की सरकार नै काढ्या सतरा सौ तीस रपईये क्वींटल।
हरियाणा की सरकार नै भा गिरा दिया सतरा सौ का। किसान जिब मंडी म्हं पहोंचया तो उड़ै कोए खरीदणिया ए कोन्या पाया। सरकारी खरीद की एक दुकान अर तीन कर्मचारी वे किस किसकी सरसम खरीदें? आढ़तियां नै पन्दरा सौ तै ऊपर की बोली लाई ना। ऊपर तैं पचास रपिए आढ़त कै और मांगै किसानां पै। जाम लाया। सरकार धोरै बात पहोंची अर सरकार नै बी हुकम दे दिया फेर बात तो उड़ै की उड़ै खड़ी सै आज तेरा तारीख ताहिं। आढ़त का पीस्सा तो सरकार नै देणा चाहिए पर कूण समझावै?
अखबारां मैं खबर थी अक कन्फैड की साथ-साथ हैफेड बी खरीदैगी। किसान सुखपुरे चौक पै पहुंचे तो उड़ै बी दिखावा ए सा पाया। फेर मंडी म्हं ल्याये। कई किसान तै तीन दिन तै पड़ै सैं मंडी म्हं अर अपनी सरसों नै पन्दरा सौ म्हं अर उसतै बी तलै बेच कै जाण नै तैयार सैं फेर कोए सूंघता ए कोन्या उनकी सरसों नै अर आड़े ताहिं दुखी हो लिया अक जै कोए उनकी खात्तर आवाज बी ठावै सै तो उसनै भय लागै अक कदे या पन्दरा सौ म्हं बी ना बिकै। सुन्या सै दिल्ली का किसान बी दुखी होकै अपनी सरसों रोहतक लियाया तो और भीड़ मचगी अर अफसरां नै फरद मांगनी सुरू कर दी किसानां धोरै। एक संकट और बधा दिया।
किसान की दिक्कत या सै अक आगे पाछे की सोचना उसने बंद कर राख्या सै। करै तो के करै? एक औड़ नै कुंआ सै अर दूजे औड़ नै खाई। ताजे-ताजे लैक्सन होए थे कई-कई हजार की माला घाली थी कईयां नै तो कर्ज पै पीस्सा ठाया था। एकै म्हिने भीतर किसान ताहिं तो ट्रेलर दिखा दिया अर बाकी बी सहज सहज देख लेवांगे। किसानों नै कट्ठे होकै मिल बैठ कै सोचना पड़ैगा। यो बस सिरसम का रोला नहीं सै। गिहूं आण लागरी सै अर उसकी गेल्या बी इसी ए बणती दिखै सै। तो के करया जा? दो बात सैं।
एक तो तत्काल के करया जा अर एक लाम्बे दौर म्हं के करया जा अक किसान इस मंडी की लूट तै क्यूंकरै निजात पावै। बेरा ना वे किसानों के हितैसी यूनियनां आले कित सैं? किसान खड़या पिट्टण लागरया अर वे बेरा ना कित किसके आदर सत्कार म्हं लागरे सैं अर कै घणी कसूती योजना बनावण म्हं मसगूल सैं। एक बात तो किसान नै या समझनी पड़ैगी अक इस सारे मामले के तार डब्ल्यूटीओ तै जुड़रे सैं। क्यूंकर?
इसकी चरचा होक्यां पै बैठ कै करियो अर ईब हारे औड़ कै जीते औड़ जिब धन्यवादी दौरे पै आवैं तो इन धोरै बूझ कै देखियो अक यो डब्ल्यूटीओ किस बला का नाम सै? हमनै इसकी पहलम बी चरचा करी सै अर फेर बी करल्यांगे। सौ का तौड़ यो सै अक लड़ाई लाम्बी लड़नी पड़ैगी ये तास गेरकै।
दूसरी बात या सै अक यो जागां-जागां मंडी क्यों खोल राखी सैं सरकार नै? डीघल म्हं मंडी, बेरी म्हं मंडी, महम म्हं मंडी और तै और मदीने म्हं मंडी तो फेर किसान रोहतक क्यूं आवैं? अर कै झज्जर क्यूं जावैं? रोजगार बी बधैगा अर किसानां नै संकट तै बी छुटकारा मिलैगा। जै इन मंडियां म्हं सरसों की खरीद सरकार करले तो। तेजी तै पहलकदमी करकै कदम ठावण की जरूरत सै। इसतै हरियाणा के च्यार बालकां नै रोजगार बी मिलैगा अर किसान नै बी राहत मिलैगी।
दूसरी बात अक सरसों की खरीद की कोए पक्की रसीद किसानां ताहिं कोन्या दी जान्ती। एक परची पै लिखकै दे दें सैं। पक्की रसीद मिलनी चाहिए। फेर किसान नै या साफ समझ लेनी चाहिए अक हिम्मती का राम हिम्माती हो सै, तास खेलण आले आलसी माणस का नहीं। एक बै सोचना सुरू कर ले फेर राह गोन्डे तो आप पाज्यांगे। रै बीरा! हाम नै तै दूर के ढोल सुहावने लागते दिखाई देवैं सैं। जिब परदेस म्हं ‘चौटाला एंड संस’ की सरकार की डुगडुगी बाज रही थी अर हर किसान की नाक म्हं दम आ राक्ख्या था तै सोच्चा कर दे अक ओ सुभदिन कदसिक आवैगा जद इस ‘प्राइवेट लिमिटेड’ सरकार तै पिंड छुट्टैगा अर चैन की सांस लेवैंगे। अब जिब योह नवी सरकार आई तै किसानां नै फेर वही धक्के खाणे पड़ रये सैं। इस लियो फेर समझाऊं सूं अक -
चूची बच्चा तैयारी करल्यां यो रस्ता बिना लड़ाई कोन्या
सरसों पीट दी क्यों म्हारी ईब बची कति समाई कोन्या
खूनी कीड़े खावैं चौगरदे क्यों देता कति दिखाई कोन्या
आगली पीढ़ी गाल बकैगी जै तसबीर नई बनाई कोन्या
अपने पाह्यां चाल पड़ां क्यों टोही असली राही कोन्या