शनिवार, 15 जुलाई 2017

मेरे बीरा! देखियो के होगा

मेरे बीरा! देखियो के होगा
     आज के दिन संसार की आबादी 6.3 अरब सै। एक ताश खेलणा छोड़ कै मेरे बीरा अंदाजा लाइयो अक 2050 मैं दुनिया की आबादी कितनी हो ज्यागी? ‘गेर रै गेर पत्ता गेर। इस खूंटा ठोक नै और किमै कोण्या, म्हारे ताशां के पाछै पड़या रहवै सै सारी हाण।’ दूसरा - ‘फेर गलत तो किमै कैहन्ता ना। म्हारे थारे हक की ए बात करै सै ओ सारी हाण।’ पहला - ‘कड़े के हकां की बात औ तो कै तो महिलां नै बिगाड़ण मैं लाग्या रहवै सै अर कै दलितां नै सुसकारण मैं लाग्या रहवै सै।’ दूसरा - ‘महिलावां के अर दलितां के अक जो उन्नै हजारां सालतै नहीं मिले उनकी बात करना क्यूंकर गलत होग्या भाई?’ पहला - मेरे अर तेरे बीच मैं पाले बंदी करवा दी इसनै तो? दूसरा - के गलत कर दिया जिब? या पाले बंदी तो खूंटा ठोक के बिना बी बणदी आवै सै अर म्हारे समाज की कड़वी सच्चाई सै या। पहला - जिकरा तो जनसंख्या पै था। बतादे कितनी हो ज्यागी 2050 मैं। दूसरा - जो हिसाब खूंटा ठोक नै लाया सै इस हिसाब तै तो या दसियां अरब हो ज्याणी चाहिए। पहला - ‘इतनी जनसंख्या कड़ै नावड़ैगी?’
     खणखरे बुद्धिजीवी इसनै 9 अरब मानैं सैं। 9 अरब इन्सान हो ज्यांगे। म्हारे प्रकृति के संसाधनां पै ईबै बहोत घणी दाब पड़री सै। सबते फालतू भूखे लोग 23‑3 करोड़ भारत मैं रहवैं सैं। पूरे दक्षिण एशिया मैं हर चौथा माणस भूखा सोवै सै। मानव विकास सूचकांक के हिसाब तै संसार के 175 देशां मैं विकास के हिसाब तै भारत का स्थान 127 है? सै ना कितनी श्यान की बात। देखो कितने गर्व करण की बात सै। हरियाणा का छोरियां नै मां के पेट मैं मारण मैं भारत मैं सबतै ऊपर नाम आवै सै। देख्या कितनी श्यान अर इज्जत की बात सै म्हारी खातर। दुनियां के तीन सौ करोड़ लोग दो अमेरिकी डालर पै जिंदगी गुजारैं सैं। अर जै इनमां तै किसे नै बूझो - सुणा रिसाले के हाल सै? तो सैड़ दे सी कहवैगा - बस बूझै ना तीजां केसे कटरे सैं। ईसे आडू. बी हरियाणा मैं ए पा जा सकैं सैं ना तो माणस तो न्योंए कहवैगा - बहोत मुश्किल तै गुजारा होवे सै।
     जै सारी दुनिया मैं पैदा खाद्यान्न समान रूप तै सबमैं बांट दिया जावै तो हरेक माणस नै 2760 कैलरी का खाणा मिल सकै सै। भूख का मतलब सै जै माणस 1960 कैलरी का भोजन नहीं खा सकै तो भूखा सै। मतलब साफ सै अक दुनिया के काम करणिया नै (किसान, मजदूर कर्मचारी) नाज पैदा करण मैं कसर कोण्या छोड्डी फेर कसर रैहगी इसके बंटवारे की।
     आज के वैश्वीकरण के जमाने मैं सार्वजनिक संसाधनां का निजी हाथां मैं हस्तान्तरण तेजी तै होवण लागरया सै। देश आजाद हुये पाछै लोगां धोरै लेकै म्हारी सरकार नै जो सार्वजनिक संपत्ति बनाई थी ईब वा कौड़ियां के मोल देशी बदेशी कंपनियां ताहिं बेची जावण लागरी सैं (रिश्वत खाकै)। म्हारे बिजली घर म्हारे तेल के भंडार जिननै विकसित करण मैं लाखां-करोड़ां रुपइये खर्च हुए थे वे भी बेचे जावण लागरे सैं। यू सारा काम अमेरिका की दाब मैं होवण लागरया सै। यूं धंधा तीसरी दुनिया के सारे देशां मैं चला राख्या सै अमेरिका नै अपणे याड़ी देशां की साथ मिलकै।
     आज दुनिया के 20 प्रतिशत लोगां धोरै, दुनिया के 80 प्रतिशत संसाधन सैं। हैरानी की बात या सै अक इन संसाधनां मैं भी इन 20 प्रतिशत लोगां का पूरा कोण्या पाटरया। जै हम चाहवां सां कि म्हारे संसाधनां पै म्हारा अधिकार रहवै तो यू पंूजीवादी विकास का मुनाफे अर खुले बाजार पै टिक्या औड़ विकास का माडल बदलणा पड़ैगा। आज जो लोग संसाधन कै सबतै नेड़े रैहके भी सबतैं दूर सैं उनके बारे मैं सोचणा पड़ेगा। पाणी म्हारा अर उसनै काढ़कै म्हारे ताहिं बेचै नेस्ले। यू समालखा मैं होर्या, यू पूरी दुनिया मैं होरया। लेल्यो रै ईबी सम्भाला अर बगाद्यो इन ताशां नै, अर बूझो ये सवाल अक हमनै इतना कमाया फेर बी हम गरीब क्यूं?





यह सोच सै औरत नै ‘देवी’ मानण आलां की

यह सोच सै औरत नै ‘देवी’ मानण आलां की
     आज धार्मिक परंपरावा अर संस्कृतियां खासकर हिंदू धर्म तै जड़ै कर्मकांडा के नाम पै महिलावां के संवैधानिक अर कानूनी अधिकारां पै कसूता हमला बोल्या जावण लागरया सै। आज यो बहोत जरूरी होग्या सै अक हम संस्कृति नै झाड़-पोंछ कै उस पक्ष नै समझां अर देखां अक वो किस स्तर ताहिं महिला विरोधी सै। पुत्री का कत्ल करकै घर-घर म्हं पुत्र-प्राप्ति होवण लागरी सै। इसकी जड़ बहोत घणी डूंघी सैं।
     म्हारे समाज की पितृ सत्तात्मक व्यवस्था म्हं धन दौलत के वारिस के रूप म्हं पुत्र की कामना करी गई है। ऋग्वेद म्हं पुत्रां की खात्तर तीन शब्दां का प्रयोग पाया जावै सै - वीर, पुत्र अर सूनु। ऋषि कक्षीवत एक सुक्त म्हं कहवैं सैं अक ‘पतिः स्यां सुगवः सुवीरः’। पुत्रां की लालसा आले दंपत्ति प्रार्थना करैं सैं - ‘कामोरायः सुवीर्यस्य’ अर प्रजापति उननै आश्वासन देन्ते औड़ कहवैं सैं मनै पृथ्वी पै प्रजा को पैदा किया सै, इब स्त्रियां द्वारा पुत्रां नै उत्पन्न करूंगा। ‘अहम जनिभ्यो अपरीषु पुत्रान’ यो कर्मकांड गर्भाधान संस्कार का एक हिस्सा हुया करदा। सप्तसदी के बाद मैंहे वधू ताहिं आर्शीवाद दिया जाया करदा अक इंद्र उसनै दस पुत्र प्रदान करै। ‘दशस्यां धेही’ आज भी हिंदू धर्मानुसार विवाह म्हं सात फेरयां अर कन्यादान के पाछै ऋग्वेद का वोहे मंत्र दोहराया जावै सै। ‘ओम् इमां त्वमिन्त्र मीरः सुपुत्रात् सुभगात कधि दशास्यत धेहि पतिमेका दशत कुरु’। अर्थात् इब इस स्त्री नै तुम योग्य पुत्रवती एवं सौभाग्यवती बनाओ। इसनै दस पुत्रां की जननी बनाओ। बृहदारण्यक उपनिषद म्हं याज्ञवल्क्य नै मनुष्य की तीन इच्छयावां म्हं पुत्रेषणा, वित्तेषणा अर लोकेषणा का उल्लेख करया सै। अर्थात् पहलम पुत्र अर फेर उसकी खात्तर धन अर पुत्र के कामां तै लोक मैं सम्मान पाते हुए अंत मैं स्वर्ग प्राप्ति।
     विष्णु धर्म सूत्र कहवैं सैं - पुत्र पुत नामक नरक तै पिता का उद्धार करै सै। मनु के विधान म्हं ज्येष्ठ पुत्र के जन्म की साथ-साथ पुरुष पितृ ऋण तै मुक्त होकै अमृतत्व लाभ करै सै। पौत्र समस्त पापां तै मुक्त करै सै अर प्रपौत्र सूर्यलोक म्हं वास का कारण बणै सै। अर्थात् पुरुष की वंस रक्षा परंपरा की खात्तर बेटे तै लेकै बेटे के बेटे अर उसके बी बेटे मतलब तीन पीढ़ी ताहिं पक्की शास्त्रीय व्यवस्था करी गई सै। पुत्र लालसा ताहिं बड़ी मनोवैज्ञानिक चतुराई से शास्त्रकारां नै माणस के मन की गहराई म्हं रोप देवण की चेष्टा मैं स्वर्ग अर नरक की कल्पना करी अर या विधान सबकै योह आतंक कायम कर दिया अक पुत्रहीन की खात्तर नरक अवश्यंभावी सै। ऐतरेय ब्राह्मण कहवैं सै ऋणमस्मिन्त संतयति अमृतत्व च गच्छति, पिता पुत्रस्य जातस्य पश्येत चेत जीवतो मुखं’। जै पिता जिवित पुत्र का मुख देख ले तो वो अपने सारे ऋणां तै मुक्त होज्या सै अर अमृतत्व को प्राप्त कर लेवै सै। ‘यावतः पृथिव्यां भोगाया वंतो जात वेदसि, यावंतः अप्सु प्राणिनां भूयान पुत्रे पितुः ततः’। इस संसार म्हं पैदा होवण आले जीवा की खात्तर जितने भी भोग अर सुख के साधन धरती अर अग्नि अर जल म्हं सैं उनतै भी फालतू पिता की खात्तर पुत्र म्हं सैं। शाश्वत पुत्रेण पितरः अति आयन बहुलं तमः, आत्मा हि जज्ञ आत्मनः स इरावती अति तारिणी’। पिता सदा पुत्र द्वारा ही विपत्तियाँ नै पार करै सै। आत्मा-आत्मा तै पैदा होकै पुत्र कहलावै सै अर वाहे संसार कै पार ले जावण आली श्रेष्ठतम नाव सै। ‘सखा है जाया कृपणं ह दुहिता ज्योतिहं पुत्रः परमे व्योमन। स्त्री सखा है, पुत्री दुख का कारण, पुत्र परलोक मैं भी ज्योति दिखावण का काम करै सै।
     इन उदाहरणां पै गौर करां तो बड़ी हैरानी होवै सै। मां के शरीर का एक अंस उसतै उत्पन्न पुत्र पिता तै स्वर्ग, अमृतत्व, इहलोक, परलोक, सब कुछ देवै सै फेर माता को देवण की खात्तर कोए शास्त्रीय विधान क्यों नहीं सै? पितृसत्ता नै शाश्वत बनाए राखण खात्तर औरत के लिए एकमात्र आदर्श पुत्र की माता होना था। मनु न और अनेकां ने उसे केवल खेत मान्या, जिस म्हं पुरुष बीज बोवण का काम करै सै। मनु ए नहीं कौटिल्य नै भी स्वीकृति दी ‘पुत्रार्थे क्रयते भार्या’। अर्थात् पुत्र की खात्तर ही पत्नी की जरूरत सै। ऐतरेय ब्राह्मण नै बार-बार कहया सै अक पुरुष नै खुस अर संतुष्ट राखण का सर्वोत्तम उपाय सै पुत्र को जनम देना। मनु नै कहया जै ब्याह के आठ बरस पाछै बी स्त्री संतान नै जनम ना दे अथवा दस बरस ताहिं जै कन्या नै जनम दे अथवा मृत पुत्रां नै जनम दे, तो पुत्र लाभार्थ पति दूसरा ब्याह करै। क्योंकि पुत्र जनन तै न्यारा स्त्री का कामै के था? ‘प्रजनार्थ स्त्रियः सृष्टा’। गर्भाधान पाछै पुंसवन संस्कार मैं गर्भ को पुत्र म्हं बदलण की खात्तर प्रार्थना का विधान बी सै। अभागे का बैल मरे। सुभागे की बेटी। या कहावत के दर्शावै सै? जै लड़की का, औरत का अस्तित्व बचाना सै तो इस ‘पुत्र लालसा’ कै खिलाफ जंग का बिगुल बजाना ए पड़ैगा। फेर न्यों ना कहियो म्हारी पुरानी परंपरावां पै चोट करै सै यो खूंटा ठोक।

किसान की गाढ़ी कमाई के दावेदार

किसान की गाढ़ी कमाई के दावेदार

माणस सामाजिक पशु सै। मनुष्य अर पशु मैं योहे फरक सै अक माणस अपने भले अर बुरे की खातर अपणे समाज पै बहोत निर्भर रहवै सै। असल मैं पशु जगत के घणे ठाड्डे-ठाड्डे बैरिया कै रैहन्ते अर बख्त-बख्त पै आवण आले हिम युग जीसे भयंकर प्राकृतिक उपद्रवां तै बचण मैं, उसके हाथां नै अर फेर दिमाग नै जो उसकी मदद करी सै उसमैं मनुष्य का समाज के रूप मैं संगठन बहोत घणा सहायक हुया सै। इस समाज नै शुरू मैं कमजोर माणसां की ताकत को सैकड़यां माणसां की एकता द्वारा बहोत घणा बढ़ा दिया। ईसे ताकत के दम पै माणस नै अपणे प्राकृतिक अर दूसरे बैरियां तै रक्षा पावण मैं मदद देते होंए भी अपणे भीतर तै ईसे बैरी पैदा कर दिये जिननै उन प्राकृतिक अर पाशविक बैरियां तै भी फालतू माणस की जिंदगी नरक बणावण का काम करया सै। समाज का अपणे भीतर के माणसां के प्रति न्याय करणा पहला फरज सै। न्याय का मायना यो होणा चाहिए अक हरेक माणस अपने श्रम के फल का उपयोग कर सकै। लेकिन आज हम उल्टा देख रहे सां। धन वोह सै जो आदमी के जीवन की खातर बहोत जरूरी सै। खाणा, कपड़ा, मकान ये सारी चीज सैं जिन को असली धन कहणा चाहिए। असली धन के उत्पादक वेहे सैं जो इन चीजां नै पैदा करैं सैं। किसान असली धन का उत्पादक सै क्योंकि ओह मिट्टी नै अपणे श्रम तै गिहूं, चावल, कपास के रूप में बदल दें सैं। दो घंटे रात रैहन्ते खेतां मैं पहोंचना। जेठ की तपती दोफारी हो चाहे पोह का जाड्डा हो, ओ हल जोतै कै ट्रैक्टर चलावै, पाणी लावै, जमीन नै कस्सी तै एकसार करै अर उसके हाथां मैं कई कई आट्टण पड़ज्यां सैं फेर बी ओ मेहनत तै मुंह नहीं चुरान्ता। क्योंकि उसनै इस बात का बेरा सै अक धरती माता के दरबार मैं रिश्वत कोन्या चालती अर ना चाल सकती। धरती स्तुति - प्रार्थना तै अपणे दिल नै खोल कोण्या सकदी। या निर्जीव माट्टी सोने के गिहूं, बासमती चावल अर अंगूरी मोतियां के रूप मैं जिब बदलै सै जिब धरती माता देख लेवै सै अक किसान ने उसकी खातिर अपणे खून के कितने घणे पसीने दिये, कितनी बार थकावट करकै उसका बदन चूर-चूर होग्या अर कस्सी चाणचणक उसके हाथ तै छूटगी।
गिहूं बण्या बणाया तैयार एक-एक जागां दस बीस मण धरया औड़ कोण्या मिलता। यो पन्दरा-पन्दरा, बीस-बीस मण की ढेरी एक जागां देख कै एक बर तो उसका जी खिले उठै सै। महीन्यां की भूख तै अधमरे उसके बालक बड़ी चाह भरी नजरां तै उस ढेरी नै देखैं सैं। वे समझैं सैं अक दुख की अंधेरी रात कटण आली सै अर सुख का तड़का साहमी सै। उननै के बेरा अक उनकी या ढेरी जो उनके मां-बाप नै इतने कष्टां तै पैदा करी सै या उनके खावण खातर कोण्या। इसके खावण के अधिकारी सबतै पहलम वे स्त्री-पुरुष सैं जिनके हाथ मैं एक बी आट्टण कोण्या, जिनके हाथ गुलाब जिसे लाल अर मक्खन बरगे मुलायम सैं, जिनकी जेठ की दोफारी ए.सी. तलै कै शिमला मैं बीतै सै। जाड्डा जिनकी खातर सर्दी की तकलीफ नहीं ल्यान्ता बल्कि मुलायम ऊन अर कीमती गर्म कपड़यां नै सारे बदन नै ढक कै आनन्द के सारे राह खोल दे सै। निठल्ले अर निकम्मे ये बड्डे आदमी, जमींदार, महाजन, मिल मालिक, बड्डी तनखा आले नौकर, पुरोहित अर दूसरी कई ढाल की जोंक किसान की कष्ट कमाई के भोजन का सबतै पहलम हक राखैं सैं। अर यू किसान आत्महत्या करण ताहिं फांसी खातर जेवड़ी टोहन्ता हांडै सै। कै सल्फास की गोली खाकै निबटारा पाले सै। फेर एक पार्टी ब्यान दे सै अखबार मैं अक हम आगे तो सारे कर्जे माफ कर द्यांगे। को इनतै न्यों तो बूझ ले अक ये इसा राह क्यूं ना बांध देवैं अक किसान पै कर्ज चढ़ैए कोण्या। छोटूराम नै हरियाणा के किसान का करजे अर कुड़की तै पैंडज्ञ एक बै छटवाया। 50-60 साल मैं फेर उड़ै पहोंच लिया किसान। ईब ली सरकार नै लोन की खातर बजट बधा दिया। मतलब किसान और करज़ा लेगा अर बहुराष्ट्रीय कंपनियां के बीज खरीदैगा अर करजे मैं गले ताहिं डूबैगा अर फेर फंासी खावैगा।





दिन म्हं तारे दीख ज्यां, जिब पड़ै वोट की चोट

दिन म्हं तारे दीख ज्यां, जिब पड़ै वोट की चोट
     सत्ते, फत्ते, नफे, सविता, कविता, अनिता अर भरतो ईब के शनिचर नै कट्ठे हुये तो चर्चा हाल के चुनावां पै चाल पड़ी। नफे अनिता तै बूझण लाग्या - ईबकै थारले किंघाण गेरैंगे वोट? अनिता बोली - म्हारल्यां का मन तो ईबकै बदलण का बणरया सै। नफे बोल्या - क्यूं? ईसा क्यूं? अनिता बोली - म्हारे प्रदेश की हालत के किसे तै ल्हुकारी सै। जनता आज खेती बाड़ी, उद्योग अर रोजगार की चौतरफा तबाही के बिचालै किस अपमान, दहशत अर असुरक्षा के माहौल मैं जीवन लागरी सै इसका तो सबनै बेरा सै। पहरावर के सरपंच जो दलित था का आज ताहिं कोए बेरा कोन्या। ऊं सबनै बेरा सै अक कौन ठाकै लेगे अर किसनै मारया होगा, फेर पुलिस नै बेरा कोन्या पाटया। ना नौकरी, ना दिहाड़ी, ना पढ़ाई अर ना दवाई का इंतजाम, ना बिजली, पानी, खेती मैं छोटे किसान कै कोए बचत ना, कर्जे का बोझ बढ़ता आवै, ना इज्जत-आबरू बची और तै और पीवण का पाणी ताहिं बिकण लागरया सै। हो सकै सै थोड़े से दिनां मैं सांस लेवण ताहिं हवा बी बिकण लागज्या। नफे बोल्या - विकास कितना होग्या यो तो दीखता ए ना थमनै। जै राज की बदल होगी तो हरियाणा उजड़ ज्यागा। ताऊ का बालक सै हरियाणा। इसनै जवान हो लेवण दयो। कविता बोली - अनिता नै सौलां आने सही बात कही सै। थारे घरां मैं उस छोरी गेल्यां के बणी उसका हुया किमै? तनै बी जोर लाया थारे एमएलए ने बी एड्डी-चोटी ताहिं का जोर लाया अर मंत्री नै बी पां पीटिया खूब करे फेर बलात्कारी के तो और ऊपर ताहिं तार जुड़रे थे। थाम सारे हारकै नहीं बैठे थे उस केस मैं। सत्ते बोल्या - इन बातां पै तो नफे कै सांप सूंघ ज्यागा। अर जो या बात कही अक हरियाणा ताऊ का बालक सै तो भाई हम तो ईब ताहिं न्योंए मान्या करते अक हरियाणा का बालक ताऊ सै। अर जै बदल नहीं होई ते जो किमै थोड़ा घणा उजड़ण तै बचरया सै ओ और उजड़ ज्यागा। गामां मैं कस्ब्यां मैं सत्ता के मलंगां की धींगामस्ती, छीना-झपटी, बेहया किस्म की लूटखोरी का आलम चारों कान्ही सै। हफ्ता वसूली, हेरा-फेरा अर रिश्वतखोरी की गैल अय्यासी मैं डूबी सत्ता की पतनशील राजनीति हरियाणा की इस तबाही का रोजाना जश्न मनावै सै। लोकराज का यो भी एक रूप सै अक लोकलाज की चादर बगा कै धड़ल्ले तै बेलगाम हो कै राज चलाओ।
     कविता बोली - सत्ते नै सही बात कही। गुंडे, हत्यारे, तस्कर, भूमाफिया चलावण आले बिल्डर्स, ठेकेदार, कमीशन खोर, भ्रष्ट अफसर, व्हीलर डीलर अर नीचै पंचायत लुग हराम की कमाई पै पलण आले दूसरे गुर्गे, भाई-भतीजे, जात-गोत के मुखिया जो सब उनकी छत्रछाया मैं मलाई खा-खा कै मोटे होवण लागरे सैं सारे उनकी गेल्यां सैं। फत्ते बोल्या - फेर बी उननै डर सै अक कदे हरियाणा के किसान, मजदूर, खेतीहर, कर्मचारी अर छोटे दुकानदार वोट की कसूती चोट ना मारदें। सविता बोली - फेर देवां किसनै वोट? फत्ते बोल्या - बदल तै जरूर ल्याणी सै इबकै, वोट चाहे काले चोर ताहिं देणी पड़ियो। सविता बोली - न्यूं क्यूंकर एक चोर नै हटा कै दूसरे चोर नै बिठाएं क्यूंकर काम चालैगा? अनिता बोली - ज्यूकर 312 गण्डे कै कनसूआ लागे पाछै पूरे हरियाणा तै खातमा करणा पड़या था न्योंए इन चोरां की राजनीति का खात्मा तो करना बहोत जरूरी होग्या। यू खरणा तो बदलणा पड़ैगा। नया खरणा टोहना पड़ैगा। पीस्से आल्यां की पार्टी बहोत देख ली ईब तै इसी पार्टी देखनी पड़ैंगी जो म्हारे दुख-सुख मैं, म्हारी बीमारी मैं, म्हारी गेल्यां रहन्ती हों। उनकी ताकत बढ़ानी पड़ैगी अर ज्यूकर केंद्र मैं डाकू ताहकै छोटे चोर जनता लियाई अर उनके लगाम घालण ताहिं वामपंथ नै बी जिता ल्याई, कोए इसा ए सा जुगाड़ आड़ै भी देखणा पड़ैगा। पांच-च्यार लगाम कसणिया भी हमनै विधानसभा मैं भेजणे पड़ैंगे। चोरों मैं भी सारे एकसे कोन्या, देखना पड़ैगा कि बदल खातर कोण जीत सकै सै उसनै बणावां।
     फत्ते बोल्या - ये पोलिटिशियन अपने आप नै घणे तीस मारखां समझैं सैं ना तो इननै इस बात का बी बेरा होवणा चाहिए अक जनता बी ईब खूब स्याणी होरी सै। खूब सोच-समझ कै वोट गेरेंगी। कई साल पहलम की बात सै जिब चौ. रणबीर सिंह का बडला छोरा खड़या था, बाबा मस्तनाथ के बाबा जी खड़े थे अर हरीचंद हुड्डा किलोई तै खड़े थे। रोहतक तै कप्तान की कार मैं बैठदा, बोहर अस्थल जा कै हलवा बाबा का खान्दा अर भालौट धोरै कार मैं तै उतर कै न्यों कैहन्दा - कार किसे की, हलवा किसे का अर वोट किसे की। कविता बोली - जनता अपने गाम की, अपने मोहल्ले की, अपने शहर की, अपनी सुरक्षा की बातां पै जरूरतां पै बात करै उम्मीदवार तै, अर सोच समझ कै वोट दे म्हारा तो योहे कहणा सै। सत्ते बोल्या - जनता इतणी स्याणी होन्ती तो फेर के कैहणे थे। सविता बोली - संसद के चुनावां मैं के आपां गये थे जनता नै बतावण ताहिं। ना किसे और नै बताया तामिलनाडू अर आंध्र प्रदेश मैं जाकै अक हरियाणा मैं सूपड़ा साफ करैगी जनता। पूरे देश की जनता जनार्दन ने पूरी तरियां सोच-समझ कै संसद के चुनाव मैं बदलाव ल्याया था जो यूपीए के तहत काम करै सै। मेरै पूरा यकीन सै अक हरियाणा की जनता आड़ै बी सही सोच-समझ कै इस मौके पै भी आपणे वोट की सही चोट करैगी।





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म्हारे हरियाणा की लड़कियां

म्हारे हरियाणा की लड़कियां
युवा लड़कियां आज हरियाणा के समाज म्हं सबतै असुरक्षित नागरिक सैं। इन युवा लड़कियां नै ईसी परिस्थितियां क्यूंकर मिलैं अक ये अपने नागरिक अधिकारां का इस्तेमाल कर सकैं अर हर बख्त डरी औड़, असुरक्षित अर कुचली हुई ना रहवैं।
जै रूचिका बरगी युवा लड़की नै बखत रहते न्याय मिलता तो उसनै आत्महत्या ना करणी पड़ती। वा बहोत संघर्षशील युवा लड़की थी। इस केस के पाच्छे की परिस्थितियां का दबाव आज हरियाणा की लाखों युवा लड़कियां झेलण लागरी सैं। हर युवा लड़की अपणी ढाल के न्यारे संघर्ष की तसवीर सै। महिलाएं बड़े पैमाने पै छेड़खानी, अपहरण अर बलात्कार जीसे अपराधां का शिकार होवण लागरी सैं। तमाम युवा लड़कियां जो सार्वजनिक स्थलां अर संस्थावां म्हं रहवैं सैं वा भी सर्वव्यापी असुरक्षा तै घिरी सैं।
इन लड़कियां के माता-पिता स्वयं बी मानसिक तनाव अर असुरक्षा मैं रहवण लागरे सैं। कम अवसरां के बावजूद युवा लड़कियां खेल-कूद, पढ़ाई अर साक्षरता बरगे सामाजिक कामां म्हं बहोत आच्छा प्रदर्शन करकै दिखावण लागरी सैं। गरीब युवा लड़कियां अनेक छोटे-मोटे रोजगार करकै घरां नै चलावण म्हं आर्थिक मदद बी करैं सैं। सौ का तोड़ यो सै अक लड़कियां म्हं सामाजिक भागीदारी अर आर्थिक संकट तै घिरे परिवारां मैं एक रचनात्मक सक्रिय भूमिका निभावण की गहरी इच्छा पैदा हुई सै।
एक कान्हीं तै वे बाल श्रमिक के रूप म्हं, घर मैं छोटे-बाहण भाइयां की देखभाल करते हुए ईंधन अर पानी जुटाते हुए, असंगठित क्षेत्र में अनेक ऊबाऊ काम करते हुए, आर्थिक संकट तै घिरे परिवारां नै चलावण म्हं महत्वपूर्ण योगदान देवण लागरी सैं। दूजे कान्हीं समाज म्हं इन ताहिं बोझ के रूप मैं देख्या जावै सै। घर-परिवार, शिक्षा संस्थावां आदि म्हं कितै बी इसा माहौल कोन्या अक वे अपना दुखड़ा किसे नै सुणा सकैं, अपनी समस्या सांझी कर सकैं। सांप्रदायिक अर जातिवादी ताकतें खासतौर पै इन लड़कियां नै एक तरफ तो ‘भारतीय नारी’ और ‘मर्यादा’ का पाठ पढ़ाण मैं लागरी सैं अर दूसरी तरफ वैश्वीकरण तै जुड़ी अन्ध उपभोक्तावादी संस्कृति के अंदर युवा लड़कियां सबतै आसान शिकार के तौर पै देखी जा रही हैं।
राजनीति का अपराधीकरण, दलाली, भ्रष्टाचार अर रिश्वतखोरी तै पीस्सा कमावण आले नवधनिक वर्ग अर उनके लड़के खासतौर पै अपराधियां की ढाल साहमी आवण लागरे सैं। युवा लड़कियां केवल बाहर ही नहीं परिवार के अंदर ‘परिजनों’ के द्वारा भी यौन हिंसा और दहेज हत्या का शिकार हो रही सैं।
छोटी बच्चियों के साथ भी परिवारां म्हं पड़ौसियां अर कै ‘विश्वसनीय’ लोगां द्वारा यौन उत्पीड़न का चलन ही चाल पड़या सै। म्हारा समाज घटिया फूहड़ फिल्मां, छेड़खानी, मीडिया मैं पोर्नोग्राफी, यौन उत्पीड़न और रईसजाद्यां की निरंकुशता के खिलाफ तो चुसकता ना, कोए विरोध अभियान नहीं छेड़ता।
हां युवा लड़कियां के पहनने-औढ़ने, हंसने-बोलणे पै कड़ी नजर राखना चाहवै सैं।
युवा लड़कियां घोर यातना अर घुटन के बीच जीवण लागरी सैं। एक कान्हीं उन ताहिं ‘ब्यूटी पैकेज’ दिया जाण लागरया सै, उपभोग की चीज की छवि बनाई जारी सै, दूसरी कान्हीं संस्कृति, जाति अर परिवार की लाज के रूप म्हं उनके तमाम मानवीय अधिकार छीने जावण लागरे सैं। उन ताहिं तरहा-तरहां तै दंडित करया जा सै, उनका चरित्र हनन करया जारया सै अर गुंडे लफंगे खुल्ले घूमैं सैं। हरियाणा मैं लड़कियां के मामले मैं खासतौर पै शरीफ अर बदमाश लोगां के बीच की दूरी जणो मिटती जाण लागरी सै। बीमार सामाजिक वातावरण का इलाज करण की बजाय लड़कियां का इलाज करया जाण लागरया सै, उनकी भ्रूण हत्या करी जावण लागरी सै।
इन युवा लड़कियां की खात्तर नागरिक समाज, नागरिक अधिकार एक मुख्य एजेंडा सै। पाछले सालां म्हं युवा लड़कियां म्हं गहरा आक्रोश पैदा हुया सै। उनकी मांग सै अक म्हारी खातर न्याय की मांग का निषेध क्यंू अर ‘धरती पुत्रां’ नै स्वेच्छाचारिता की पूरी छूट क्यों? जातिवादी ताकतों द्वारा मनमाने ढंग तै फतवे जारी करणा अर युवा लड़के-लड़कियों की हत्या जारी सै।
बतावण की जरूरत नहीं अक हम आपणी प्रगतिशीलता की, उच्च विचारों की, संस्कारवान होणे की मुनादी करण म्हं सब तै आग्गै खड़े दिखाई देवैं सैं। बेसक किसी मुद्दे तै म्हारा दूर का बी नाता-रिस्ता ना हो, फेर बी हम उस म्हं पंजा फंसावण नै तैयार रहवैं सैं। पर जिब कोई मसला, समस्या अपणे घर-परिवार नै समझावण-बुझावण की, उन्हें पटरी पै ल्यावण की सामने खड़ी दीखै सै, तो उस बखत हम उस तै कन्नी काटण म्हं आपणी भलाई समझैं सैं अर मौन साध ले सैं। योहे कारण सै अक आज म्हारी बाहण-बेटियां अपणे अनिश्चित भविष्य के बारे म्हं सोच-सोच कै सिर धुणती नजर आवैं सैं।


गोदामां मैं सड़ता नाज अर भूखे मरते लोग

गोदामां मैं सड़ता नाज अर भूखे मरते लोग

एक कान्हीं देश के तीन चौथाई लोगां नै पेट भर भोजन नहीं मिलता अर दूजे कान्हीं सरकारी गोदामां मैं 630 लाख टन के लगभग नाज पड़या सै। इसमैं तै कुछ नाज तो 3-4 साल तै लेकै 16 साल ताहिं का पुराणा नाज सै अर लगभग 75 करोड़ रुपइयां का नाज सड़ लिया ईब ताहिं। हैरानी की बात या सै अक जो सरकार बड़ी मुश्किल तै संपूर्ण ग्रामीण योजना के तहत च्यार हजार च्यार सौ चालीस करोड़ रुपइये उपलब्ध करवारी सै, वाहे सरकार गोदामां मैं नाज दबाए राखण की खातर इसकी च्यार गुणा राशि 17000 करोड़ तै फालतू खर्च करण लागरी सै।
म्हारी या प्यारी सरकार रोज लगभग 48 करोड़ रुपइये बस नाज के रख रखाव पै खरच करण लागरी सै। देख्या कितनी चिंता सै म्हारी सरकार नै म्हारे नाज की। नाज धरण खातर जागां थोड़ी पड़गी अर बहोत सारा नाज खुले मैं पड़या सै। गोदामां मैं बंद नाज मां तै लगभग एक चौथाई किसे मुसीबत के बख्त ताहिं बचा कै राख्या जा अर बाकी बच्या औड़ नाज (तीन चौथाई) सस्ती दरां पै राशन की दुकानां पै अर गामां मैं रोजगार की खातर दिया जाणा चाहिए। फेर दिया तो कोण्या। उल्टा इस नाज नै ध्यान मैं राख कै जो स्कीम (सरकारी) बनाई जावण लागरी सै उनतै तो यो साफ जाण पाटै सै अक म्हारी प्यारी सरकार किसानां नै अर ग्रामीण मजदूरां नै छोड़ कै बड्डी कंपनियां अर पीस्से आले सरमायेदारां के हितां की खातर फालतू काम करण लागरी सै। सरकार नै रोला राला पड़े पाछै बड़ी मुश्किल तै थोड़ा सा नाज (50 लाख टन) संपूर्ण रोजगार योजना के तहत रोजगार मूलक कामां पै क्यूकरै खरच करण की इजाजत दी सै।
दूजे कान्ही याहे म्हारी प्यारी फील गुड सरकार इसतै दुगणा नाज सस्ते दामां पै विदेशां मैं बेचण की खातर बड्डी कंपनियां के हवाले कर चुकी सै। ईबै और कोशिश करी जावण लागरी सै अक विदेशां मैं नाज का निर्यात और बढ़ाया जा। देखो रै किसा बुरा जमाना आग्या कि गामां मैं उगाया औड़ नाज गाम नै भुखमरी तै बचावण कि जागां विदेशी व्यापार करण आली कंपनियां की मुनाफाखोरी खातर दिया जावण लागरया सै अर हम बैठे ताश खेलण लागरे सां। अर कहवां सां गेर रै गेर पत्ता गेर। सबतै कसूती बात या सै अक इन कपंनियां ताहिं गरीबी की रेखा की दर तै नाज दिया जावै सै उसे दर पै दिया जावण लागर्या सै। यो नाज बहोत दिनां ताहिं तो गरीबी रेखा की दर तै भी कम कीमत पै इन कंपनियां ताहिं दिया गया। दूजे कान्हीं सरकार नै दो साल पहलम आधे तै भी घणे गरीबां ताहिं गरीबी की रेखा तै ऊपर बता कै उन ताहिं राशन की दुकानां पै सस्ता नाज देवणा बंद कर दिया था। इसमैं सरकार का यो कहणा था कि इन गरीबां नै सस्ता नाज देवणा सरकार नै बहोत खर्चीला पड़ै सै। पर बड्डी कंपनियां द्वारा बड्डे मुनाफे पर विदेशां मैं नाज बेचण की खातर सरकार यो खर्च ठावण नै त्यार सै। इन कंपनियां ताहिं सबतै बढ़िया नाज दिया जावैगा पर इस नाज नै पैदा करण आली ग्रामीण जनता नै राशन मैं कै मजदूरी के बदले मैं कीड़े पड़े औड़ सड़या औड़ नाज दिया जावण लागरया सै। ईबै हाल मैं यू तय करया सै म्हारी सरकार नै अक बड्डी कंपनियां नै उनके अपणे गोदामां मैं 8 लाख टन नाज धरण की खातर 720 करोड़ रुपइये सालाना का ठेका दिया जावैगा।
इस नाज के रख रखाव पै सरकारी गोदामां मैं जो लागत सै उसतै तीन चौथाई फालतू इन कंपनियां ताहिं दिये जावैंगे। ऊपर तै इन कंपनियां ताहिं कई करां मैं छूट दी जागी वा न्यारी। म्हारी प्यारी फील गुड सरकार नै कंपनियां ताहिं यो भी आश्वासन दिया सै अक इन गोदामां मैं जै किसे साल नाज नहीं धरया गया तो भी सरकार उन ताहिं 20 साल ताहिं किराया अर करां मैं छूट देवैगी। आई किमै समझ मैं कि कुणसी तुरूप चाल खेली जावण लागरी सै म्हारी गेल्यां कि न्यों ए पत्ता दाब कै सीप मैं बख्त बिराण करें जाओगे?
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रै देख लिये पंचाती पत्नी नै बाहण बणावैं

रै देख लिये पंचाती पत्नी नै बाहण बणावैं
     सविता, कविता, नीलम, भरपाई, सत्ते, फत्ते, कर्मबीर बैठे टीवी देखण लागरे थे। टीवी पै आसंडा कांड की रील चढ़ा राखी थी जी टीवी आल्यां नै। सारी बात देख-सुण कै बहोत शर्मसार हुये अक यू कीसा फैसला सुणा दिया पंचात नै? सविता बोली - या चुणी होई पंचात सै के आसंडे की? कविता बोली - ना या चुणी औड़ कोण्या या तै स्वयंभू पंचात सै। खाप पंचात का हिस्सा।
     भरपाई बोली - फेर यू सोनिया अर रामपाल का ब्याह तो कोर्ट मैं नहीं होरया के? कविता नै बताया - कोर्ट मैं दर्ज होरया सै। भरपाई बोली तो फेर या पंचात उस सोनीपत आले कोर्ट तै बड्डी होगी के? सत्ते बोल्या - वा कचहरी तो म्हारे संविधान की कचहरी सै अर धर्मसिंह, कांशीराम अर कलाधारी आली कचहरी खाप आली कचहरी सै। भरपाई फेर बोली - मैं भी तो याहे बूझूं सूं अक इस हरियाणा मैं अर इस आसंडे मैं कूणसा कानून लागू होवैगा? भारत के संविधान का कानून अक इन पंचातां का कानून? कविता बोली - योहे तो देखणा सै 22 नवंबर नै, अक भारत का संविधान जीतैगा अक इन पंचातियां के पति-पत्नी नै भाई-बाहण बणावन आले फतवे की जीत होवैगी?
     नीलम बोली - मनै अखबार मैं पढ़या था अक दिल्ली मैं निजामपुर गाम सै उड़ै राठी अर दहिया दोनू गोतां के लोग बसैं सैं अर आपस मैं ब्याह पै कोए रोक टोक नहीं। दहिया की दूसरा गाम की छोरी राठियां कै ब्याही आवैं सैं अर राठिया के दूसरे गाम की छोरी दहिया कै ब्याही आवैं सैं। भरपाई बोली - तो इस आसंडे कै पागलपन क्यूं उठग्या? सत्ते बोल्या - यू समचाणा गाम रहया। इसमैं दहिया, मलिक अर हुड्डा तीनों गोत सैं अर दूसरे गामां मां तै तीनों गोतां की छोरियां के ब्याह इसे गाम मैं होवण लागरे तो ये आसंडे आले इसे आन्डी क्यूं पाकैं सैं? कर्मबीर बोल्या - गुगाहेड़ी मैं मेरे मामा सैं। उड़ै कई गोत सैं अर खेड़े का गोत दलाल सै। फेर दूसरे गामां की दलाल गोत की छोरी म्हारे मामा के गाम के दूसरे गोतां मैं ब्याही जावण लागरी। उड़ै तो कोए बंदिश कोन्या। कविता बोली - हरेक गाम मैं 15-20 गोत आगे सैं, जै इन गोतां आले, खेड़े आले, गोत की दाब मान कै ब्याह करैंगे तो हो लिया ब्याह। एक तो छोरियां नै पेटै मैं मार-मार कै इनकी संख्या घटा दी। 1000 पुरुषां पै 861 औरत रैहगी। हरियाणा मैं अर एक कसूता चाला और कर दिया पढ़े-लिख्यां नै।
     पढ़े लिख्यां 1000 पुरुषां पै 617 औरत रैहगी बताई। पढ़ाई औरत नै पेट मैं मारण के कसूते गुर सिखावै सै। सविता बोली - ये पंचात उन लोगां नै गाम लिकाड़ा क्यूं ना देती जो इन छोरियां नै पैदा होवण तै पहलम मार दें सैं? सत्ते बोल्या - पुराणा समों बदल गया। ईब तो या गोतां की पाबंदी किसे गोत मैं नहीं रैहणी चाहिए अर किसे गाम पै नहीं रैहणी चाहिए। फत्ते बोल्या - या तो म्हारी पुरानी परंपरा सै। राठी की छोरी आसंडे मैं बहू बणकै क्यूंकर आ सकै सै? कविता बोली - म्हारी परंपरा मैं तो बुलधां की खेती कदे कदीमी तै थी। इन पंचातियां तै बूझो इननै बुलधां की खेती की परंपरा तोड़ कै ट्रैक्टर की खेती क्यूं शुरू करदी? अर पहलम रिवाज था अक बालक पैदा होवण पै ओरनाल जंग लागे औड़ चाकू तै के दरांत तै काटया करते अर टैटनस होकै घणे बालक मर जाया करदे। म्हारी परंपरावां तै इतना ए प्यार सै चौ. धर्मसिंह जी नै अर कांशी राम जी नै तो इननै अपणे घर मैं या परंपरा क्यों छोड़ दी? कविता बोली - न्यूं सुण्या सै अक रामपाल के कुनबे के एक दहिया माणस नै या आग लाई सै उल्टी सीधी बात कैहके? भरपाई बोली - तो गाम लिकाड़ा तो पंचात नै उस ताहिं देवणा चाहिए था, ये सोनिया-रामपाल भाई-बाहण किसे बणावैं थे। जे इन पंचातियां कै थोड़ी घणी बी सरम-लिहाज सै तो इननै अपणी मूछां का सवाल छोड़ कै, सोनिया नै मैडीकल मां तै बाइज्जत आसंडे मैं ल्यावैं। नहीं तो हमनै बी चंडीगढ़ के कोर्ट मैं पार्टी बणकै सोनिया का केस लड़णा चाहिए अर इन पंचातियां की एक नहीं सुणणी चाहिए।



कीसी हो केंद्र की सरकार

कीसी हो केंद्र की सरकार
सत्ते फत्ते अर नफे सत्ते हर कै घरां बैठे बतलावण लागरे थे। सते की बहू सविता अर नफे की भाभी कमला भी उड़ै आगी। नफे अर उसकी घर आली खजानी राजस्थान मैं तीन चार दिन ला कै आये थे खजानी के पीहर मैं। सत्ते बोल्या - सुणा कमला के हाल चाल सैं? कमला बोली - लैक्शनां का चर्चा जोरां पै था इबकै तो।
राजस्थान के लोग कीसी सरकार चाहवैं सैं? कमला बोली - राजस्थान आल्यां का तै मनै ना बेरा वे कीसी सरकार चाहवैं सैं फेर सविता अर गाम की कई और लुगाई एक दिन बैठ के जरूर बतलाई थी अक म्हारे देश की कीसी सरकार होणी चाहिए?
सत्ते बोल्या तो आज थाम अपनी भड़ास काढ़ल्यो। फत्ते बोल्या - या तो आच्छी बात सै, हमनै तो ताश खेलण तै फुरसत ना ईसी बातां पै विचार करण की। हां बोलो। कमला अर सविता बोली - हमतै ईसी सरकार चाहवां सां जो -
अमरीका कै आगै गोडे ना टेकै
इराक मैं सेना नहीं भेजै
आजाद अर गुटनिरपेक्ष बिदेशी नीति अपनावै
पूरे देश के हितां की रुखाली हो
धार्मिक कट्टरवाद फैला कै लोगां नै ना जलवावै
दुलीना कांड ना होवण दे। जाति-विद्वेष ना पैदा करै
भाषा के नाम पै लोगां नै ना लड़वावै
गरीबी का पक्का इलाज करण की गारंटी करै
भूख तैं मरण आल्यां का पूरा हांगा लाकै राह टोहवै
बेरोजगार छोरे-छोरियां ताहिं बेरोजगारी भत्ता देवै
भ्रष्टाचार नै जड़ तै पाड़ बगावै
देश के कानून बिदेशियां के हक मैं ना बदलै अर देश की आम जनता के हकां की रुखाली करै
सार्वजनिक क्षेत्र के मुनाफे मैं चालण आले कारखाण्यां नै कति ना बेचै
काला बाजारियां नै जेल मैं ठोक दे
खेती मै सरकारी निवेश ताहिं बढ़ावा देवै
सिंचाई सूखा राहत का इंतजाम करै अर गाम मैं रहणियों के रोजगार का इंतजाम करै
फसल की ठीक कीमत तय करै
डब्ल्यू टी ओ की दाब मैं ना आवै
खेत मजदूरां खात्तर संसद मैं कानून पास करै
भूमि-सुधार कानून का सही इस्तेमाल करै
जन-वितरण प्रणाली नै ठीक तै हटकै चालू करै
सबके स्वास्थ्य की गारंटी दे
बारहवीं ताहिं की शिक्षा सबनै मुफत देवै
संसद मैं अर विधानसभा मैं महिलावां खातिर एक तिहाई सीट रिजर्व करवावै
हड़ताल का अधिकार बरकरार राखै
बिजली का निजीकरण रोकै
नदी का कटाव रोकण की खात्तर पूरा ध्यान देवै। अर दूरगामी योजना बनावै।
फत्ते बोल्या - ईसी सरकार के न्योंए थोड़े बणज्यागी? इसकी खात्तर तो कसूते पापड़ बेलने पड़ैंगे। सविता बोली - हम तो त्यार सैं थाम आपणी बताओ? नफे कै गलै नहीं उतरी ये सारी बात। उसकी पार्टी का ब्योंत नहीं था इन बातां मां तै दो बी पूरी करण का। बात नै घुमा कै बोल्या - कड़ै सै ईसा राज? कमला सहज दे सी बोली - जिब देखण का मन बणावैगा तो ईसा राज कड़ै सै इस बात का बी बेरा तो लाए लेगा। सते बोल्या - जो इसी सरकार कितै नहीं बी सै तो के होग्या। सोच्चण मैं अर बिचार करण मैं के हरजा सै। देश आजाद करावण की बात भी तो पहलम बिचार मैं आई होगी उसतै पाच्छै अमल शुरू हुया होगा?
सविता बोली - आज नहीं तो काल इन बातां पै गौर तो करणा ए पड़ैगा। ये जो सोच्चण के नाम पै दिमागां कै ताले ला राक्खे सैं ये खोलने तो जरूरी सैं। नफे बोल्या - के धिंगताने खुलवावैगी? कमला बोली - पहलम तै मिलकै सोच विचार करांगे अर फेर सबनै साथ ले कै चाल्लांगे। कोए एतराज? नफे बोल्या - फेर कीसा एतराज।


म्हारा स्कूल क्यूंकर बचै ?


रमलू एक दिन स्कूल मैं चाल्या गया। उड़ै नेता जी आरे थे। बड़ी-बड़ी बात मारी नेता जी नै। रमलू नै स्वाद कोण्या आया। ओ स्कूल की बिल्डिंग कान्हीं देखण लाग्या। मंडेरयां की ईंट झड़ली। रेही नै ईंट खाली। चारदीवारी का खण्डर होग्या। रमलू कै ध्यान आया कि स्कूल की या बिल्डिंग तो म्हारे दादा हर नै गाम मैं चन्दा करकै बणवाई थी। सरकार नै नहीं लाया पीला पीस्सा बी। फेर सरकार नै ये बिल्डिंग ले ली। स्कूल के नाम का पीस्सा बजट मैं आन्ता अर बी डी ओ अर दो च्यार गाम के सफेदपोशां की गोज मैं चाल्या जान्ता। रमलू बहोत दुखी हुया स्कूल की इमारत की हालत देख कै नै। उसने अपणे आप पै बहोत गुस्सा आया कि इन बातां का बेरा क्यूं ना लाया? रमलू तै बैठया नहीं रहया गया। उसनै सोच्ची कि एक बै पेशाब करयाऊं हो सकै सै इतनै नेता जी का भाषण खत्म होले। पेशाब करण गया तो कितै पेशाब घर टोहया ना पाया। 600 बालक (छोरे-छोरी) पढ़ैं स्कूल मैं अर 22 अध्यापक पढ़ावैं, जिनमैं पांच तो गाम की बहु सैं।
बिना पेशाब घर क्यूकर काम चाल रहा सै? फिर रमलू कै तावला सा ख्याल आग्या कि गाम मैं भी तो दो च्यार घरां नै छोड़ कै शौचालय कोण्या किसे बी घर मैं फेर बी काम चालरया सै। यो स्कूल मैं भी गाम का असर सै, गाम की परछाई सै। फेर रमलू के मन मैं आया अक स्कूल का असर गाम पै होणा चाहिए था यू गाम का असर स्कूल पै क्यूकर आग्या? रमलू नै बहोत सोच्या फेर उसकी पकड़ मैं कोनी आई बात।
जितने मेरे मास्टरजी अर बहन जी सैं उननै तो सोचना चाहिए। हो सकै सै कई जणे पढ़कै न्यों कैह देंगे कि म्हारे स्कूल मैं तो पेशाब घर अर शौचालय सैं। फेर जित सै उसका के हाल सै इसपै लिखण खातर जागां की कमी सै। थोड़े लिखनै ज्यादा समझियो। रमलू नै हिसाब लाया उनके अपने गाम मैं च्यार प्राइवेट स्कूल खुलगे। किसे स्कूल मैं 200 बालक सैं। किसे मैं 120 सैं जड़ सौ तै घाट किसे स्कूल मैं बालक कोण्या। सरकार स्कूल मैं कै तो दलितों के बालक रैहगे।
अर कै घणे गरीब ब्राह्मण अर जाट के बालक, कै जित दूसरी स्वर्ण जात सैं उनके गरीब तबक्यां के बालक। रमलू नै नजर मारकै देख्या कि जो पांच बहु इस स्कूल में पढ़ावैं सैं उनके बालक बी कोण्या पढ़ते स्कूल मैं। दो च्यार भट्ठे आले सैं उनके बालकां खातर कस्बे के स्कूल की बस आया करै। रमलू का ध्यान गया कि ईबबी गाम मैं इसे 70-80 बालक पाज्यांगे जिनमैं स्कूल का मुंह नहीं देख लिया सै।
रमलू तै टिक्या कोण्या गया अरै औ सरपंच धोरै चाल्या गया। सरपंच बी जणू तै भरया बैठया था। पाछले सरपंच के चिट्ठे खोल कै धर दिये। स्कूल की चारदीवारी के दो बर पीस्से आये फेर बनी तो एक बर बी कोण्या (उसनै या नहीं बताई कि पीस्से तो हटकै फेर आरे सैं स्कूल की चारदीवारी बनावण के)। यो तालाब के घाट बणावण का पीस्सा आया था। घाट बण्या देख्या सै के जोहड़ पै? खुदाई का पीस्सा आया फेर कड़ै खुदाई हुई?
जड़ रमलू कै या बात पक्की जंचा दी कि पहलड़े सरपंच नै यू गाम मूंधा मार दिया। रमलू पहलड़े सरपंच धौरे गया। ओ ईब आले सरपंच के कारनामे लेकै बैठग्या। जड़ रमलू चाहवै था तो स्कूल के बारे में कुछ करना फर भूतपूर्व अर वर्तमान सरपंचां नै उसकी भम्भीरी बणा दी।
सांझ नै सरिता बोली - के बात आज तो किमै घणा ए दुखी होरया सै? रमलू नै सारा किस्सा सुणा दिया। सरिता बोली - इतना माड़ा मन क्यूं करै सै। गाम मैं स्कूल का भला चाहवण आले बी बहोत सैं फेर वे न्यारे-न्यारे सैं। वा अपनी आंगनबाड़ी वर्कर, वा सरला बहिन जी, वो थाम्बू का राजबीर। इन सबनै कट्ठै करकै एक मीटिंग करांगे। अर उसमैं बिचार करांगे कि स्कूल यो म्हारा स्कूल क्यूंकर बचै? और किसेनै चिन्ता कोण्या इस बात की।



खाप कितै सुणती हो तै


आजकाल खापां का खूबै रोला सै अखबारां मैं। आज फलाणी खाप नै जौन्धी मैं पत्नी-पति ताहिं राखी बान्ध कै बाहण बणकै रहवण का फतवा दे दिया। आज राठधाने मैं तथाकथित पंचातीयां नै छोरा-छोरी ताहिं फांसी लाकै मारण का फतवा दे दिया। कितै की खाप की पंचायत नै श्योरान अर काद्यान के ब्याह शादियां के मामले पै फतवे सुणा दिये। कदे खाप की पंचायत नै महिला के सासरे अर पीहर की जायदाद मैं हक कै खिलाफ फतवे जारी कर दिये। कहवण नै हो सकै सै इन खापां की हरियाणा में किसै बख्त पै कोए सकारात्मक भूमिका भी रही हो पर ईब पाछले 15-20 साल के अरसे पै नजर मारकै देखी जावै तो दिल कांप ज्या सै। मध्य युग के बर्बर समाज की याद ताजा होज्या सै। ये खाप घणखरे मामल्यां मैं महिला के हकां के विरोध मैं खड़ी दिखाई देवैं सै। बेरा ना के कारण सै। तालिबान के फतव्यां नै तो आपां सारे रोज रोवां सां पर इन खापां के 16वीं सदी के फरमाना नै आपां सराहवां सां। बात किमै जंची नहीं। कितै ना कितै किमै ना किमै खोट तो जरूरै सै। इन खापां का विकास विरोधी अर महिला विरोधी अर म्हारे नागरिक समाज के भीतर दिये म्हारे हकां का विरोध करण आली मानसिकता नै कोए भी इन्सानियत का मानवता का थोड़ा-सा भी गुर्दा राखणिया माणस क्यूंकर ठीक बता सकै सै? आपां इन खापां की तरफ तै पगड़ी बांध कै अपणी झूठी शान शौकत की गफलत तै 2001 की जनगणना की मैं पूरी दुनिया मैं उछाल ली। इनकी न्यों की न्यों कै कोली भरकै अर इननै जारी राखणा घणा घटिया काम सै अर जिब इसकी कोली पढ़े-लिखे माणस अर बुद्धिजीवी अर वायस चान्सलरां बरगे लोग भरकै खड़े हौज्यां तै समझो नागरिक समाज नै बहोतै भार्या खतरा सै।
पड़ाणा (जींद के एक गांव में) बड्डे गोत की छोरी अर छोटे गोत का छोरा कितै चले गये। बड्डे गोत आल्यां नै बदला लेवण खात्तर छोटे गोत आल्यां (छोरे की बाहण) की छोरी गेल्यां सबकै साहमी गाम बिचालै बलात्कार कर्या। इसतै नीच काम यू गोत के कर सकै था। अर ये गोत अर खाप की पंचात आले अर म्हारे नेता जो इन खापां के रूखाले सैं कति दड़ मारगे अर इस बर्बर कांड पै एक शब्द भी नहीं बोले। इस वोट की घटिया राजनीति नै उनके मुंह कै ताले ला दिये थे। आज हरियाणा मैं 2001 की जनगणना के हिसाब तै महिलावां की संख्या घटती जावण लागरी सै। अल्ट्रासाउण्ड तैं बेरा पाड़ कै छोरी नै पेट मैं ए खत्म करण का घटिया काम हरियाणा आले बड़ी श्यान तैं करैं सैं। इसपै ये गोतां की अर खापां की पंचायत क्यूं ना बोलती? ये पंचाती न्यों कहवैं सैं के होग्या ये थोड़ी होगी तै आच्छा ए सै कीमत बध ज्यागी। ईब इननै कूण समझावै अक इनपै अत्याचार बधैंगे इनकी कीमत नहीं बधै। भाली गाम मैं सुण्या सै तीन जणे मध्य प्रदेश तै पीस्से देकै बहू ल्याये सैं। औरत की भी गां-भैंस की ढालां बोली लागण लागगी इसनै कीमत बधणा मान्या जा सै तो इसे माणसां की बुद्धि का दिवाला ए पिट लिया। जो माणस हरियाणा के समाज मैं सुधार चाहवै सैं उननै सोचणा तो चाहिए अक इन गोत अर खापां की पंचातां गेल्या दो-दो हाथ करे जावैं ताकि इनकी सोच ठीक होज्या।

नाश क्यूकर होग्या


रमलू एक दिन ठमलू नै बोल्या - मेरे एक बात समझ म्हं नहीं आन्ती अक ये वामपंथी इन आर्थिक नीतियां के पाछै क्यूं हाथ धोकै पड़रे सैं? ठमलू बोल्या - ‘बेरा तो मनै बी कोण्या घणा-सा एक बात सै इनकी बात ईब साची सी लागण लागली। पहलम तो जंच्या नहीं करदी फेर ईब जेजावट होन्ती आवै सै।’ रमलू - वा क्यूकर भाई? दीखै सै थोड़ा घणा असर इन वामपंथियां का तेरै भी हो लिया। ठमल्यू बोल्या - ‘मैं तो वामपंथी कोण्या।’ तो फेर ’’ यू आर्थिक सुधार, सुधार की जागां समाज म्हं बिगाड़ पैदा कररे सैं तूं इस बात की हिम्मात क्यूं करै सै? रमलू नै फेर टोक दिया ठमलू। सारे गाम पै नजर मारकै देख्ख ली जो इन आर्थिक सुधारां के नफे नुकसान के बारे म्हं बता सकै फेर कोए माणस नहीं पाया। रमलू बोल्या - चाल रोहतक चालांगे उड़ै ज्ञान-विज्ञान आल्यां धोरै बूझकै आवांगे इनके बारे म्हं। ठमलू बोल्या - रोहतक जावण का भाड़ा लेरया सै? रमलू चुप होग्या। थोड़ी-सी वार म्हं फेर बोल्या - अपणे गाम की वा सुरते की बहू नहीं सै हो सकै सै उसनै किमै बेरा हो इसके बारे म्ह। ठमलू बोल्या - गाम के किसी बी मर्द नै नहीं बेरा तो उस बहू नै क्यूकर बेरा हो सकै सै? रमलू बोल्या - मेरे पक्की जंचै सै, उसनै बेरा सै पर उसतै बात क्यूकर करांगे? ठमलू बोल्या - बात तो कर ल्यांगे फेर करण कूण देवै सै? पांच मिनट चुपचाप बैठे रहे। रमलू बोल्या - रै ठमलू भाभी नै ले चाल अपणी गेल्यां फेर कोए कुछ ना कहवै। तीनूं चाले गये सरोज के घरां। बात शुरू होगी। सरोज नै टूटी फूटी भाषा म्हं बताया। फेर जो बताया उसनै रमलू ठमलू के दिमाग के सारे पट खोल दिये। बेरा ना थारे खुलैंगे अक नहीं खुलैंगे।
एक बात या अक 1998 के जुलाई के महीने ताहिं 1308 आइटमां पर तै आयात पाबंदी हटा ली थी जिसका घरेलू उत्पादन पै सत्यानााशी असर पड़या। दूसरा बीमा, दवा, होटल, पर्यटन, हवाई अड्डे, बंदरगाह आदि म्हं सौ फीसद बदेशी पूंजी की लूट खात्तर दरवाजे खोल दिये। दूरसंचार म्हं 75 फीसद अर बैंकां म्हं 49 फीसद प्रत्यक्ष बदेशी निवेशां की इजाजत दे दी। रक्षा उत्पादन म्हं भी बाड़ ली ये बदेशी कंपनी 26 पीस्से का हिस्सा दे कै। यू तो घणा नाजुक मसला हो सै। तीसरा, कोयले के बेरोक-टोक आयात की इजाजत दे दी। म्हारी अपणी खानां के बंद होवण का खतरा पैदा होग्या। बदेशी कंपनियां ताहिं कोले की खाण अर कोले के उत्पादन के अधिकार भी थम्बा दिये शेरां नै। चौथी बात अक इस्पात मतलब स्टील के आयात की इजाजत देकै स्टील कंपनियां कै कंपकंप चढ़ा दी। पांचवीं बात अक बिजली की जो दुर्गति करी सै वा सबकै साहमी सै। एनरॉन नै किसी लूट मचाई अर फेर भाज खड़ी हुई। 13 दिन के शासन काल म्हं हटकै इस कंपनी ताहिं यू ठेका दिया था भाजपा नै। छठी बात अक तेल की खोज की खात्तर 48 ब्लाक बदेशी कंपनियां कै हवाले कर दिये। घरेलू उत्पाद घटग्या अर बाहर तै तेल मंगवाण के कारण भुगतान संतुलन की दाब बधगी। जो पेटेंट का कानून हटकै बणाया सै उसतैं दवाईयाँ की कीमत खासकर बधगी। लघु उद्योग तो धड़ाधड़ बंद होवण लागरे सैं। इन सारी बातां के असर का अंदाजा इस बात तै लाया जा सकै सै अक वित्त वर्ष दो हजार के आखिर म्हं भारत सरकार की कुल देनदारियां 11,20,049 करोड़ रुपइयां की थी। मतलब देश के सकल घरेलू उत्पाद के 57.23 फीसद कै बरोबर। पाछले तीन बरस म्हं ए इन देनदारियां म्हं तीस हजार करोड़ रुपइयां की बढ़ोतरी होगी। इन देनदारियां पै ब्याज-ब्याज का भुगतान 12,20,00 करोड़ रुपइये सालाना तै ऊपर जा लिया। रमलू और ठमलू सरोज की बात सुणकै ठगे सै रैहगे। उल्टे आवन्ते आवन्ते सोचैं थे अक के बेरा था इतना कर्जा होरया सै म्हारे देश पै। चालदा रमलू बोल्या - भाई ज्ञान विज्ञान की कार्यकर्ता नै ज्ञान बहोत सै। न्यों काई सी छांटदी। ईब तै म्हारे पै सै इसका समाधान टोहवण का काम।


समाज मैं योह के होवण लाग रया सै ?


सत्ते, फते, नफे, कविता, सविता अर सरिता फेर शनिवार नै कट्ठे होगे धापां की बैठक मैं। बात चाल पड़ी नई सरकार पै अक इसनै के के काम जनता के करने चाहियें। कविता बोली - म्हारे गाम मैं च्यार सौ किल्ले धरती है गाम की पंचायत धोरै। पर इसपै किसे ना किसे का कब्जा सै। यू कब्जा हटा कै गरीब किसानां मैं अर मजदूरां मैं या धरती बांट देनी चाहिए। कई किल्ले बणी मैं भी धरती के पड़े सैं पर या बंजर धरती सै। या बी बांट देनी चाहियें मजदूरां मैं अर इस बंजर जमीन की खातर उन ताहिं जरूरी साधन बी दिये जाने की जरूरत सै। नफे एक दम बोल्या - या श्यामलात की जमीन तो उनमैं बंटनी चाहिए जिनके धरती सै। म्हरी पुरानी परम्परा तो याहे मांग करै सै। सत्ते बोल्या - थाम न्यूं कहो सो अक या इनमैं क्यूकर दे सकै सै सरकार। या सरकार कौडियां के दामां पै बदेशी कम्पनियां नै, अम्बानी अर टाटा बिड़ला नै अर धन्ना सेठां नै क्यूकर दे दे सै? फत्ते बोल्या इन सड़कां पै काम करणिया, खेत क्यार मैं काम करणिया, होटलां पै काम करणिया जड़ इन खेत मजदूरां खातर कानून बनना चाहिए जिबै इनकी दुर्गति का किमै इलाज हो सकै सै। नफे बोल्या - इनके मुंह पहलमै ऊपर नै चढ़रे सैं, यू कानून बना के इननै म्हारे सिर पै बिठवा दियो। सविता बोली - केरल मैं सन् 1974 मैं इन खातर कानून पास करया था उड़ै तो कोण्या बैठे ये किसे के सिर पै। आड़ै क्यूकर बैठ ज्यांगे? फेर ईब तो कई बार इनकी गेल्यां डांगर तै बी घटिया ब्यौहार हो सै। कई जागां पै तो इननै बन्धुआ मजदूर राखैं सैं रोटियां मैं। मेरे मामा का कुण्बा फतेहाबाद के एक गाम मैं दस साल बन्धुआ रहया। म्हारी मामी गेल्या के के करी उड़ै मालिक नै ये बतावण की बात कोण्या समझण की बात सै। भला हो अग्निवेश का उसनै मुश्किल तै छडवाया था म्हारा मामा। सत्ते बोल्या - एक बात पर और गौर करण की जरूरत सै मन मोहन सिंह की सरकार नै। सामाजिक न्याय का मामला कसूता उलझता जावै सै अर दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक अर महिलावां पै अत्याचार, हिंसा, वर्ण-लिंग भेद बढ़ता जावै सै। करनाल मैं बाल विवाह का मामला पाछै सी छोरियां नै हौंसला करकै रोक्या था। महेन्द्रगढ़ मैं तो रोज थाली मैं बिठा कै आज बी प्रसासन के अर पुलिस के नाक तलै फेरे दिये जावैं सैं। बेरा ना क्यूं ना दिखते ये बाल विवाह म्हारे परसासन नै। दुलिना काण्ड, हरसौला काण्ड दलितां पै अत्याचार बढ़ते जावैं सैं। महिलावां का तो जिकरा ए कोण्या मार पिटाई, छेड़छाड़, बलात्कार, रोज अखबार अटे पड़े रहवैं सैं खबरां तै। बालक तो होटलां पै अर इन परसासनिक अधिकारियां के घरां बी खूब काम करते देखे जा सकैं। अनुसूचित जाति-अनुसूचित जन जाति अत्याचार निरोधक कानून की धज्जियां उड्डण लागरी सैं। सरिता बोली - सत्ते की बात कुछ तो ठीक सै फेर छुआछात तो ईब कड़ै रैह री सै? सत्ते एक दम बोल्या - जै नहीं रैहरी तो अपणी छोरी का ब्याह सविता के मामा के छोरे गेल्यां करदे नै। नौकरी बी लागरया सै ओ। सरिता बोली - न्यूं क्यूकर ब्याहद्यूं? नफे बोल्या - मेरी बी सुणियो। एक टेम का हिसाब सा बिठाकै जितनी अक खेती आली धरती मैं सिंचाई का परबन्ध करना चाहिये म्हारी सरकार नै। एक इसी वैज्ञानिक जल परबन्ध प्रणाली लागू करनी चाहिये जो म्हारी धरती अर पाणी नै ढंग तै संयोजित करती हो। सविता बोली - खेती खातर सुरक्षित अर विकसित बीज, खाद, कीटनाशक सस्ते दामां पै मिलने चाहियें। नई तकनीक बी ल्याई जा। सत्ते बोल्या - इसमैं कोए सक की गुंजाइस नहीं अक म्हारी सरकार नै खेती खातर, सिंचाई खातर, शिक्षा खातर, सेहत खातर, विज्ञान अर तकनीक खातर और घणा सार्वजनिक निवेश करना चाहिये। जिबै तो कृषि उत्पादन बधैगा, किसान खुशहाल होगा। खेतों मैं नई खोज होणी चाहिये। किसानां ताहिं पूरी ट्रेनिंग देनी चाहिये। सामाजिक कल्याण के काम ज्यूकर पढ़ाई, सेहत, साफ पाणी, शौचालय अर पंचायतां की बी सुध लेवै सरकार। इनका ख्याल करै। दो च्यार गामां मैं और इस पर्चे नै पढ़वा दियो, ज्यूकर हुक्के पै सरकार पै दबाव बणावण की बात चाल पड़ै।

जात के ठेकेदारों की लीडरी के ओछे हथियार ये हथकंडे


जोंधन खुर्द में जो कुछ हुआ उससे सभी पढ़ा लिखा वर्ग वाकिफ है। इससे घटिया और पिछड़ी मानसिकता का प्रतीक शायद ही पिछले बीस साल मैं हरियाणा में देखने को मिलता हो। बहुत से गांव में महिलाएं जागरूक हुई हैं और अपनी बातें कहने के लिए मुंह खोला है उन्होंने। जोंधन खुर्द की इस घटना को पिछड़ी विचार व सोच वालों ने तो खत्म सी ही मान लिया। परन्तु यह खत्म होने वाली घटना या बात नहीं है। यह पिछड़े और अगाड़ी विचारों का संघर्ष है जो पहले भी समाज में चला है, आज भी चल रहा है और आगे भी जारी रहेगा। एक महिला गांव के एक पंचाती से कुछ सवाल जवाब इस बारे में करती है और क्या कहती है भला -
सन्तरा -
जोंधन खुर्द मैं के हौया मनै खोल बतादे सारी आज
पंचाती -
रिवाज तोड़ कै घणी पुराणी जात तारली म्हारी आज। (टेक)
वार्ता - दो गोतों में पांच सौ साल पहले यदि भाईचारे की कोई बात हुई थी तो इसका मतलब यह तो नहीं की वह पत्थर की लकीर हो गई। पहले बहुत सी बातें हम अज्ञानवश करते थे मगर अब ज्ञान का फैलाव होने के कारण हम उन्हें छोड़ रहे हैं। पहले दूसरी जात में शादी करना बहुत बुरा माना जाता था मगर अब हम कर रहे हैं। क्या ऐसा करने से कोई पहाड़ टूट पड़ा? सन्तरा गांव के पंचाती से पूछती है कि गांव में रोजाना बलात्कार हो रहे हैं तो इन पंचायतियों को सांप क्यूं सूंघ जाता है? तब गांव की इज्जत का सवाल क्यूं पीछे चला जाता है? गांव में सबसे ज्यादा जमीन पर कब्जा करने वाला जात बाहर क्यों नहीं किया जाता? गांव पंचायत का सारा पैसा हड़प कर जाने वाले लोगां का सामाजिक बहिष्कार ये पंचायतें क्यों नहीं करती? क्या कहती है भला -
दो गोतां का किमै जिकरया होया
खोल कै मनै बात बता
गामां के मां बलात्कार रोज़ाना
क्यों ना होती पंचात बता
पंचात होज्या तो छोरी नै
दाबैं करैं ठाडडे की हिमात बता
जमीनां पै नाजायज कब्जे
इनकी ऊंची क्यों जात बता
बीर मरद के रिश्ते पै ढाया
जुल्म कितना भारी आज
उनके हक मैं मत ना बोलै
बणकै सेठ कुठारी आज
पंचाती
वार्ता - सन्तरा के सवाल सुनकर पंचाती गांव की इज्जत की दुहाई देने लगता है और कहता है कि एक ही गांव में यदि शादियां होने लगेंगी तो गांव उजड़ जायेंगे तबाह हो जायेंगे। हमें गोत नात का ध्यान तो रखना ही पड़ेगा ना। इस अधर्म के होते हुए कोई भी सच्चा इंसान कैसे चुप रह सकता है। यह पूरे जाट समुदाय का मामला था और दो गोतों के भाईचारे का सवाल था।
वह पंचाती क्या कहने लगा भला:
पुराने रूढ़िवादी विचार बता
क्यों मखौल उड़ावै म्हारा
म्हारे साहमी मत ना पड़ो
तम हौ ज्याओ नौ दो ग्यारहा
पाणी मैं बैर मगरमच्छ तै
थमनै पटज्या बेरा सारा
पांच सौ साल पुराणा इन
दो गोतां का यो भाइचारा
आपस मैं ब्याह रचा लिया क्यूं
अकल मारगी थारी आज
सही और नई-नई बातां की
जनता लेरी सै उडारी आज
सन्तरा -
वार्ता: सन्तरा पंचाती की बात सुणकर पूछती है कि तुम्हें अपनी कौम के गोत नातों की इतनी चिन्ता क्यों है? हमारे ही हरियाणा में जिस कौम में चाची और बुआ की लड़की से शादी करना गौरव समझा जाता है उस कौम का सामाजिक सम्मान पिछले पचास साल में बढ़ा है कम नहीं हुआ है। हमारी ही जाटों की कौम में गाम की गाम में बसने वाले गोतों में आज शादियों का रिवाज है जिसका जीता जागता उदाहरण चौटाला गांव है। इस जोंधन गांव के मामले पर ताऊ की चुप्पी बहुत अखरने वाली है। हमारी ही जाटों की कौम में पंद्रह बीस साल पहले तक नानी का गोत भी ऊकाया जाता था। मगर आज नहीं क्यों? नये बास में कुछ घर दहिया के हैं मगर वहां के मुख्य गोत के लोगों की शादियां दहिया में होती थी और हो रही हैं। भाई और बहिन दहिया में ब्याहे जाते रहे हैं वहां तो फिर जोंधन खुर्द में यह बवाल क्यों? सन्तरा पूछती है कि नानी का गोत ना ऊकाने का फैसला करने के लिए कौणसी पंचायत हुई थी? क्या कहती है भला-
कई कोमां मैं चाची बुआ के घर मैं
ब्याह कराया जावै
इसतै हटकै ब्याह होवै तो
छोरी मैं कोए खोट बताया जावै
आज किस फैसले तहत
नानी का गोत ना ऊकाया जावै
चौटाला गाम मैं आपस मैं क्यों
उड़ै ए ब्याह रचाया जावै
दुनिया चाँद पै जाली जोंधन
खुर्द पाछै जाती जारी आज
पंचाती -
वार्ता: पंचाती के पास कोई ठोस तर्क या बात नहीं मिलती संतरा के सवालों का जवाब देने के लिए। और हरियाणा का मर्द जब निरूत्तर हो जाता है तो वह मार पिटाई पर उतर जाता है। पंचाती भी जिद्द में आकर यही कहता है कि पंचात का फैसला सही है उसे अब नहीं बदला जा सकता। संतरा कहती है कि इस फैसले से वह पूरा परिवार तबाह हो जाएगा। रोजगार है नहीं, गांव से पंचायत ने निकाल दिया तो अब वह परिवार कैसे जिन्दा रहेगा? पंचाती जिद्द पे अड़ जाता है आर क्या जवाब देता है।
भाई बाहण की ढालां रहवैं
गाम नै फैसला सही सुनाया था
कुछ जात गोत बिगाड़ आगे
उननै फैसला यो उल्टाया था
बीर मरद बणे रहवैंगे
बहिष्कार का यो ठप्पा लाया था
रीत पुरानी बचा लई जिनपै
थमनै यो तीर चलाया था
सुणकै थारी बात संतरा मेरी
तबीयत होगी खारी आज
थारे इन पिछड़े विचारां नै
समाज की इज्जत तारी आज
सन्तरा
वार्ता: सन्तरा पंचाती से पूछती है कि क्या हाथ गल जाने पर मानव की जिन्दगी बचाने के लिए उसके हाथ को काट कर अलग नहीं कर दिया जाता? समाज विकास का दस्तूर है कि जो पुरानी चीजें आज प्रासंगिक नहीं हैं उनका खत्म होना लाजमी बात है उनके बारे में भावुकता से काम नहीं चल सकता। बैल की खेती थी हरियाणा में। बैल गऊ का जाया था तो कौन सी पंचायत में फैसला हुआ था कि बैल की खेती नहीं करेंगे और ट्रेक्टर की खेती किया करेंगे? यह पंचायत क्यों चुप रही उस वक्त और अब बखेड़ा खड़ा कर रही है। क्या पूछती है भला -
इतना खयाल राखिये पंचाती
पुराणा सही ना होता सारा
हाथ जै गल ज्या जा तो
पूरे शरीर नै खतरा होज्या भारया
सौला हाथ भी पड़ज्या
काटना चाहे हो कितना ए प्यारा
कानून भी म्हारा साथी सोच ले
भूंडा सै जेल का नजारा
रणबीर सिंह बरोने आले की
या कलम पुकारी आज
मनै थारी बात ठीक लागती
पर जागी रोटी मारी आज
पंचाती -
वार्ता - संतरा थारी सारी बात ठीक सै फेर भी गोत नात का मामला इबै चालैंगा। काल अखबार मैं थी अक श्योरान खाप में भी ऐसा ही कुछ हो रहा है और लोग इकट्ठे हो रहे हैं। संतरा कहती है कि ये वे जात के ठेकेदार कट्ठे हो रहे हैं जो मेडिकल में आने के बाद खून चढ़वाते हुए उन खून देने वाले की जात के बारे में कभी तहकीकात नहीं करते। ऐसे लोगों ने अपनी लीडरी चमकाने के लिए हमारी भावनाओं से खिलवाड़ करने का ओछा काम अपने हाथ में लिया हुआ है और इसमें सबसे ज्यादा उत्पीड़न महिलाओं का किया जा रहा है। देखना यही है कि हमारी राजनेता और हमारा कानून कब तक चुप्पी साधे रहता है।
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रै आर्यभट नै क्यों भूलगे ?


सते, फत्ते, नफे, कविता, सरिता, सविता, आये शनिवार की ढालां ईबकै बी धापां की बैठक में कट्ठे होगे। बात सत्ते नै शुरू करी अर बोल्या - नफे सिंह भाई के रहया थारे उस मामले का। नफे बोल्या - के रहया छोरा छोरी का तो बेरा नहीं पाट लिया अर पंचायत नै दोनूं घरां का होक्का पाणी बंद कर दिया अर पिटाई करी। दोनूं घर-गाम छोड़गे। सरिता बोली - फेर न्यूं गाम की गाम मैं क्यूंकर काम चालैगा? सविता बोली - चौटाला गाम के गाम मैं जिब ब्याह होवण लागरे तो म्हारे गामां मैं क्यूं नहीं हो सकदे? फत्ते बोल्या - बात तो बिचार करण की सै। जिस बात नै आपां इतनी घटिया मानां सां उसे बात नै करणिया गाम नै हरियाणा ताहिं दो मुख्यमंत्री अर एक डिप्टी प्राइम मिनिस्टिर दिया सै। पुरानी परंपरावां नै बी आज एक बै हटकै सोच्चण का अर उनपै बिचार करण का बख्त तो आ ए गया। सविता बोली - याहे तो कमजोरी सै म्हारी। सत्ते बोल्या - आर्यभट्ट प्राचीन भारत का पहला गणितज्ञ-ज्योतिषी था जिसनै पूरी दुनिया ताहिं जीरो का ज्ञान दिया। आर्यभट की सबतै बड्डी बात या थी अक उसनै भूभ्रमण का सिद्धांत सबतै पहलम भारत मैं दिया। नफे बोल्या - होगा इसका म्हारे तै के लेना देना?
सत्ते बोल्या - यू ए तो रोला सै। हम प्राचीन संस्कृति, प्राचीन परंपरा की बात करां अर उसके बारे मैं जानकारी जीरो हो तै हमनै कोए बी भका सकै सै इस पुरानी परंपरा के नाम पै। अर सबतै दिलचस्प बात आर्यभट के बारे मैं या सै अक जो कुछ आर्यभट नै अपणी किताब मैं कहया उसनै तोड़-मरोड़ कै पेश करण की बहोत कोशिश करी। आर्यभट के ग्रंथ मैं जड़ै-जड़ै भूः अर कु (पृथ्वी) शब्द थे उड़ै-उड़ै वे भं (तारामंडल) मैं बदल दिया गया। दूसरी बात या सै अक उसके ग्रंथ की हस्त लिपियां देश के अधिकतर भागां मैं तै गायब कर दी। उसकी बातां का जिकरा दूसरे बुद्धिजीवियां नै भी करना बंद कर दिया। लोकभय के कारण भास्कर प्रथम (समकालीन या बाद के बुद्धिजीवी) अर दूसरयां नै भी आर्यभट के नये सिद्धांतों की व्याख्या भिन्न प्रकार तै करी।
सोच्चण की बात सै अक यू लोकभय किन लोगां का था? यू भय समाज के उस हिस्से का था जिसके हित साधन मैं आर्यभट का भू-भ्रमण का सिद्धांत बाधक बनकै खड़या होग्या था। यू वर्ग था पुरोहित वर्ग, जिसका हित वेदां, धर्म शास्त्रां अर आर्यभट के एक दो सदी पहलम तैं लिखी जावण लागरी नयी नयी पुराण पोथियों के वचनां की रक्षा के साथ जुड़या औड़ था। आर्यभट का नया भूभ्रमण का सिद्धांत पुरानी मान्यताओं का खंडन करै था। वेदां के अर धर्मशास्त्र के हवाले दे कै ‘अचला’ मतलब ‘पृथ्वी’ का जो लोक विश्वास कायम करया गया था उसनै टिकाए राखण मैं सबतै फालतू हित पुरोहित वर्ग का था। इसे करकै समाज के इस प्रभावशाली वर्ग नै आर्यभट के भू-भ्रमण के सिद्धांत का हर तरियां तै विरोध करया। फेर आर्यभट के सिद्धांत का यूरोप मैं भी प्रसार हुया अर उड़ै कोपर्निकस का सूर्य केंद्र सिद्धांत भी उभर कै आया अर ब्रूनो नाम के बुद्धिजीवी नै घूम-घूम कै यूरोप के नगरां मैं इसका प्रचार करया। रोम के ईसाई धर्माचार्यां के हुकम तै 1600 मैं ब्रूनो को जिन्दा जला दिया गया। आर्यभट के सिद्धांत का भारत मैं विरोध अर यूरोप मैं ब्रूनो का जलाया जाना एकै बात सैं। फत्ते बोल्या - सरिता आई किमै समझ मैं सत्ते की बात अक नहीं? सरिता बोली - समझ मैं आवण की हो तै आवै। सविता बोली - आर्यभट का उदाहरण दे कै सत्ते न्यूं कहणा चाहवै सै अक नये विचार का विरोध हमारे समाज की पुरानी परम्परा मैं भी था चाहे आगै चाल कै उस नये विचार नै कितनाए समाज का भला करया हो। आज यू जो अंतरजातीय ब्याह का मामला सै यू एक नया विचार सै। इसे तरयां गाम की गाम मैं ब्याह का मामला सै। सत्ते का कहवण का मतलब सै कि ये आज के छोरा छोरी तो आर्यभट सैं अर ज्यूकर आर्यभट का विरोध पुरोहितां नै करया वेदां का हवाला दे कै, न्यौए ईसे ब्याहयां का विरोध ये तथाकथित सामन्ती सोच के माणस वेदां कै, पुरानी परंपरा के हवाले दे कै करण लागरे सैं इस पर।

के धरया इन बात्तां म्हं, जिब पत्ते ले लिए हात्था म्हं


हरियाणा के एक गाम का किस्सा है। इस गाम का कोए भी नाम हो सकै सै। मान लिया इस गाम का नाम रामपुर सै। इस गाम की आबादी 2000 के लगभग सै। इसमैं 35 प्रतिशत जाटां के घर सैं, जिनमैं 16 गोतां के लोग शामिल सैं। इनै गोतां मां तै एक गोत के नाम तै यू गाम गुहांड मैं जाण्या जावै सै। बाकी पन्दरा गोत इस गोत के मातहत सैं ज्यूकर कबील्यां मैं सारा कबीला कबीले के सरदार के मातहत हुया करदा। बाकी बाहमणा के गोतां का कोए जिकरा ना, दलितां के गोतां की कोए बूझ ना पर बिचारे कुम्हारां नै अर धानक भाइयां की तो बूझ करै ए कूण था। जबकि 15 प्रतिशत जनता ब्राह्मण परिवारां तै सै अर 26 प्रतिशत लोग दलित भाई सैं। दस प्रतिशत के लगभग पिछड़े वर्ग के लोग बी सैं। छह सात घर पंजाबियां के बी सैं अर तीन घर मुसलमानां के सैं। कुछ परिवारां नै छोड़ के जाटां के घरां मैं ईब टयूबवैल के पानी के कनैक्शन आगे।
इन परिवारां नै पानी की खात्तर ईब डिग्गी के पानी के नलक्यां पै घंटों पानी के आवण का इंतजार कोनी करना पड़ता। ईब तो कुछ परिवारां की भैंसां की बी चान्दी होगी। गाल मैं ए नहवाई जावैं सैं। गरीब जाट परिवारां धोरै पानी का यू जुगाड़ कोन्या। उन धोरै कनेक्शन के 4000 कै पांच हजार रुपइये कोन्या। आए मिहनै दो सौ तीन सौ रुपइये खर्च बी उन धौरै कोन्या। कुछ परिवारां नै खाते पीते परिवारां धोरै एक घंटे पानी के 50 रुपइये मिहना के हिसाब तै पानी ले राख्या सै। गाम के बहोत से घर अर खास करकै दलित अर कमजोर तबक्यां के लोग सैं जिननै के तो डिग्गी के पानी तै काम चलाना पड़ै सै अर कै नलके के पानी तै अर कै एकाध कुआं बचरया हो तै उसके पानी तै।
डिगियां का जो हाल सै वो सबनै बेरा से। जंगल के हाथ बी उसमैं धौवैं, डांगर बी उसमैं नहावैं, मरे औड़ कुत्ते उसमैं पड़े रहवैं अर और बेरा ना के के। धरती तै तले के पानी का बी सत्यानाश करण मैं कसर नहीं रैहरी। हमनै रासायनिक खाद अर कीटनाशक दवाईयां तै खेत जमा आंट दिये। ये कीटनाशक धरती तले के पानी नै भूंडी ढाल खराब करण लागरे सैं। इस धरती तै तले के पानी करकै बी गाम के हर घर मैं खाज, कालजा दुखना, पेट का दर्द, खांसी बरगी बीमारी पलाथी मारकै बैठगी। कई बै तो पानी दो तीन किलोमीटर तै ल्यावणा पडै़ सै। कमजोर परिवारां की महिला कै बालक अपने-अपने बर्तन ठाकै पाणी ल्यावंते पा ज्यांगे। कई गामां मैं तो धरती तै तले के पाणी का चौआ भी तले नै ए जावण लागरया सै। ये पाणी प्यावण आले ट्यूबवैल कदे बी बैठ सकै सै फेर पाणी कित तै आवैगा गाम मैं, या किसे की चिन्ता कोन्या। बिसलेरी का पानी खरीदण का ब्यौंत नहीं अपने पाणी का ख्याल नहीं, ठीक सै गेर रै पत्ता गेर, इस खूंटा ठोक की तो आदत होरी सै, हमनै बिसरावण की। दस्तां मैं, पेट दरद मैं, खांसी मैं डॉक्टर कै म्हिने के दौ सौ चार सौ रुपइये पूज के आवण मैं कोए एतराज नहीं, फेर खूंटा ठोक की बिना पीस्से की सलाह मानन ताहिं फुरसत कोन्या ताश खेल्लण तै। ठीक सै। इन टयूबवैलां का पानी टैस्ट तो करवा कै देखल्यो हो सकै सै इस खाज अर पेट दरद का कारण इसमैं पाज्या।
हम बदेशी कम्पनियां के घर भरण लागरे सां अपनी कमाई तै। बिशलेरी का पानी बदेशी कम्पनी का, सबमरसिबल पम्प सैट बदेशी कम्पनी का, कीटनाशक बदेशी कम्पनी का, शरीर म्हारा, अर बीमारी म्हारी फेर इन बीमारियां खात्तर दवाई बदेशी कम्पनियां की। हम फेर बी ताशां पै बैठे न्यो कैहद्या सां म्हारै ये बदेशी के सेहद करैं सैं? अर यो बुश इन कम्पनियां का सरदार। यो हटकै फेर आग्या अमरीका का राष्ट्रपति बणकै अर हम फेर कैह द्यां सां आग्या तो आग्या हमनै के लेना-देना इसतै। मेरे बीरा लेना देना सै। म्हारे पानी के प्रदूषण तै, म्हारी पेट की बीमारी तै इसका लेना-देना सै। किल्ला एक खरीद के सारे गुहांड के पाणी पै बी कब्जा कर लिया अर हम बैठे-बैठे कहवां सां ‘‘गेर रै गेर पत्ता गेर, के समाधान हो इसका’’? पहली बात तो इन बातां पै आप्पां सोचना शुरू करां। हरियाणा मैं छह हजार तै फालतू गाम सैं। एक जवाब तै सारे गामां का काम कोन्या चालै। छह हजार गामां नै अपने-अपने ढंग तै सोचना पड़ैगा।

अपनी मर्जी का मतलब


सत्ते, फत्ते और नफे, कविता, सविता अर सरिता धापां की बैठक मैं शनिवार की सांझ कै फेर कट्ठे होगे। नफे का मुंह किमैं उतरया उतरया सा था। सत्ते बोल्या - के बात नफे आज किमै ढीला-ढीला सा नजर आवै सै? इतना उदास तो नफे कदे बी कोण्या देख्या। बस कविता का तो न्यों कैहणा था अर नफे तो फफक-फफक कै रो पड़या। सारे हैरान अक या के बणी? फत्ते बोल्या - भाई नफे बात बता किमै तो जी हलका होवैगा। नफे बोल्या के बताऊं बूझै मतना। ओ छोटना भाई नहीं सै सज्जन, उसनै पुलिस पाकड़ लेगी अर उसकी बहोत पिटाई करी। बिना बात पुलिस नै पीट्या या तो माड़ी बात सै नफे, सरिता बोली पर बिना बात पुलिस क्यों पीट्टण लाग्गी। नफे बोल्या ओ सज्जन अपणी बुआ कै जा रया था गाछरौली। उड़ै म्हारी बुआ का छोरा सै श्यामलाल उसपै गाम आल्यां नै इल्जाम ला राख्या था अक पड़ौस की गोसाइयां की छोरी भजा लेग्या श्याम लाल। सरिता बोली - गाम की गाम मैं यू काम बहोत माड़ा करया श्याम लाल नै। नफे बोल्या फेर आगै तो इसतै बी माड़ी बात हुई। सत्ते बोल्या के बात हुई? नफे बोल्या श्यामलाल के बाबू गणेशी नै अर श्याम लाल के छोटे भाई नै अर मेरले छोटे भाई सज्जन नै पुलिस पाकड़ कै लेगी। थानेदार न्यों कहवै था अक इनकी मिलीभगत तै भजा कै लेग्या सै श्यामलाल छोरी नै। सरिता बोली, जिसकी छोरी चाली गई वो फिकर तो करैगा अर न्यों बी चाहवैगा अक या तावली सी पाज्यां। कविता बोली - श्यामलाल की उमर कितनी सै? नफे बोल्या - उसकी बी 20-21 बतावैं सैं। कविता के मुंह तै एक दम लिकड़ग्या जिब मियां बीबी राज्जी तो के करैगा काज्जी। नफे सिंह बोल्या - ले मनै राम की सूं उननै कति नहीं बेरा था उनका अक वे कित चले गये।
सविता फेर पुलिस आले उननै क्यों पाकड़ कै लेगे? नफे बोल्या - पूछताछ खातर थाणे मैं बुलावैं तो देखी जा। थानेदार नै तो म्हारा फूफा उन बालकों कै साहमी उघाड़ा करकै पुलिसिया पिटाई करी छिककै। बालक बोले तो वे दोनूं बालक बी धुन दिये। नफे सिंह बोल्या - जिब ऊपरले अफसरां धोरै गए तो उननै बी सीधे मुंह बात कोण्या करी। उननै अपणे निशान दिखाये अर थानेदार कै खिलाफ कार्यवाही की मांग करी। फेर गाम का सरपंच अर और गाम के छटैल एसपी कै जा पेश हुए थानेदार के हक मैं। एसपी बी करै तो के करै? सत्ते - एसपी नै तो सही बात की तरफदारी करनी चाहिए थी। सविता बोली - ईब पहलम आले अफसर कड़े रैहरे सैं? नफे सिंह बोल्या - उनका मैडिकल करवावण खातर बी कोर्ट की शरण मैं जाणा पड़या। डाक्टरां नै बी कई बै मसकोड़े से मार कै पर्चा काट्या। पर्चा कटग्या तो पुलिस नै केस दर्ज नहीं करया। उल्टा पुलिस नै दूसरी ढालां का दबाव और बनाना शुरू का दिया। ईब पुलिस कै खिलाफ इस्तगासां करां तो इतना फूफां का ब्योंत कोण्या पीस्यां का। ऊपर तै गाम की इज्जत कै बट्टा लावण के नाम पै रोज गाम मैं पंचायत होवण लागगी। पंचायत नै कहया अक कै तो छोरे छोरी नै इनके मां बाप पेश करैं नहीं तो इनका हुक्का पाणी बंद करांगे। कविता बोली - नफे एक दिन जनवादी महिला समिति का बी किमै ब्यान था अक बालिग छोरा छोरी सैं जे वे अपणे हिसाब तै ब्याह करकै रैहणा चाहवैं सैं तो भारत का संविधान इसकी इजाजत देवै सै तो गाम आल्यां नै बीच मैं रोड़ा नहीं बनना चाहिये।
नफे बोल्या - समिति आली बहनजीयां करकै तो उनका डाक्टरी पर्चा कट्या ना तो हमनै के राह पावै था। भला हो उनका। फेर गाम आले ये पंचायती तो उनकै बी खिलाफ होरे सैं। सते बोल्या - लुहार के छोरे नै अर गोसाई की उसे गाम की छोरी नै साथ रैहवण का मन बना लिया तो इसपै कई सवाल खड़े हों सैं। इन सवालां पै बहस होनी चाहिये अर उनकै खिलाफ पंचायत जो फतवे जारी करैं सैं उनपै प्रशासन नै हरकत मैं आणा चाहिये। पुलिस नै बेकसूरां की पिटाई करी उसपै पुलिस कै खिलाफ एक्शन हो अर छोरा छोरी ताहिं प्रशासन नै सुरक्षा देनी चाहिए ना तो ये तालिबानी दिमाग उननै फांसी दिये पावैंगे।

हमनै तो ताश खेल्लण तैए फुर्सत कोन्या


            हरियाणा मैं आज के दिन महिलावां की जिंदगी तनाव, असुरक्षा, अभाव अर असहायता मतलब लाचारी मैं डूबती जावण लागरी सै। कोए कैह सकै सै महिलावां नै खेलां मैं खूब खंबे गाड़ दिये। पर वे इस करकै नहीं गाड़ पाई अक हमनै गामां मैं खेलण कूदण का उन ताहिं कोए माहौल बणा कै दिया हो, वे अपणी खुबात तै जीत ल्याई मैडल। औरत पै तो शिंकजा और मजबूत होन्ता आवै सै। स्त्री भ्रूण हत्या, दहेज हत्या, इज्जत के नाम पै हत्या का ग्राफ ऊपर नै जावण लागरया सै। यौन उत्पीड़न, बलात्कार, डराना, धमकाना, घरेलू हिंसा, औरतां का अपमान, असुरक्षा अर घुटन इस हद ताहिं बधगी कि लोगां नै न्यूं मान लिया अक ये तो आम बात सैं। आर्थिक संकट दरवाजे पै आण खड़या हुया अर परिवार टूटते जावण लागरे सैं। जीवन के साधन बचे नहीं तो खुली-छुपी वेश्यावृत्ति कान्हीं भी औरत अकेली जावण लागरी सैं। ईब गामां मैं भी इस वेश्यावृत्ति नै तेजी तै अपणे करतब दिखाने शुरू कर दिये।
अराजकता अर मनमानेपन का जो माहौल आड़ै बण्या सै उसमैं महिलावां नै ‘सस्ते मैं उपलब्ध’ अर ‘आसानी तै उपलब्ध शिकार’ की शक्ल मैं देख्या जावै सै। इस आर्थिक असमानता और सामाजिक असमानता के चालते ताकतवर तबके महिलावां की गेल्यां कुछ बी कर सकैं सैं। कुल मिला कै सौ का तोड़ यू सै अक महिलावां का अवमूल्यन हुया सै। गरीब तै गरीब तबक्यां मैं भी अपणे समुदाय अर परिवार के बीच मैं इन महिलावां पै अत्याचार बढ़ै सैं। औरतां नै ‘क्षणिक मजे’ की चीज की ढालां देखना अर इस मजे की खातर इन औरतां ने मौका लागते की साथ घेर लेना बड़ी आसान बात होगी। पाछले दिनां मैं हरियाणा मैं परित्यक्ताओं अर औरतां की साथ संबंधां मैं धोखाधड़ी बहोत बधी सै। ब्याह के दो दिन पाछै के कुछ दिन बाद लड़कियां नै छोड़ देवण की घटना बधण लागरी सैं।
दूजै कान्हीं लिंग अनुपात मैं विषमता के कारण, लड़कियाँ दूर-दूर तै खरीद कै ल्याई औरत पसंद नहीं आई तो उसनै उल्टी छोड़ आये अर उसकी बाहण नै लियाये उसकी जागां। ईब तै औरतां की खरीद फरोख्त के धंधे मैं दलाल बी पैदा होगे। या खरीद फरोख्त तेजी तै रफ्तार पकड़ण लागरी सै। जिब औरतां के हक मैं बोलणिया माणस कै संस्था दीवा लेकै टोहें भी पावणे मुश्किल सैं। हरियाणा के समाज मैं संघर्ष करण आली महिलावां की खातर ‘सपोर्ट सिस्टम’ की जरूरत सै। परित्यक्ताओं, एकल मांओं, अविवाहित महिलाओं, यौन उत्पीड़न की शिकार उजड़ी औड़ महिलाओं, बच्चियों की जरूरतों नै ध्यान मै राख कै समझ कै समाज मैं उनका स्थान बनाना बहोत जरूरी होग्या सै। शार्ट स्टे होम, कामकाजी महिला होस्टल, लड़कियों के होस्टल, मुफ्त जच्चा बच्चा केन्द्र, कानूनी सहायता केंद्र, सलाह केंद्र, तनाव मुक्ति केंद्र, मनोचिकित्सा केंद्र, कौशल विकसित करण आले कार्यक्रम, एकल मांओं के बच्चों की शिक्षा के लिए अनुदान और कर्ज की सुविधा, महिला स्वास्थ्य केंद्र, व्यायामशालाएं, सामूहिक रसोईघर, हिंसा की शिकार महिलावां की खातर कानून अर स्वास्थ्य से संबंधित आपातकालिक व जल्द सेवाओं की मांग समाज मैं ठावणी बहोत जरूरी होगी। ज्योण बी जड़ै सै उसनै इसे सपोर्ट सिस्टम के खड़या करण मैं आपणी मदद जरूर करनी चाहिए अर सरकार पै भी दबाव बढ़ाणा चाहिए इस सपोर्ट सिस्टम के विकास की खातर।
हरियाणा मैं पढ़े लिखे लोगां मैं लिंग अनुपात एक हजार पुरुषों मैं छह सौ सतरह महिलावां का पहोंच लिया था एकबै। या खतरे की घंटी बाज ली हरियाणा मैं, पर लोगों नै ताश खेलण तै फुरसत कोण्या, कै गाल की दो फुट जमीन पै कब्जा करण की जुगाड़ बाजी मैं सैं। इन सारी बातां पर गाम अर शहर के लोगां नै अर महिलावां नै गंभीरता तै सोच्चण की जरूरत सै।

असली पुलिस ?


कर्म सिंह नया-नया पुलिस असफसर बन्या था। उसके मन मैं देश प्रेम अर दिल मैं ईमानदारी थी। जनता की सेवा करना वो अपना धर्म समझया करता। एक दिन पड़ौस के एक गाम का लड़का भाजता भाजता आया। उसनै देख कै कर्म सिंह नै बूझया - के बात? इतना क्यूं हांफै सै बेटा? लड़का बोल्या - जल्दी चालो थानेदार साहब, मेरे घर मैं चोरी होगी। कर्म सिंह सैड़दे सी उसकी गेल्यां चाल पड़या।
कर्म सिंह गाम मैं आकै एक बूढ़े तै बूझण लाग्या - बोल्या - हां बाबा जी थारे तै बूझूं सूं चोरी कद हुई? इतनी सुणकै बूढ़ा गिड़गिड़ावण लाग्या अर बोल्या - माफ कर दयो साहब। लड़का नादान सै। इसी गलती फेर कदे नहीं करैगा। जै मैं होन्ता तो हरगिज रिपोर्ट नहीं करण देन्ता अर ना आप नै इतनी तकलीफ होन्ती। कर्म सिंह हैरान होकै बोल्या - या बी के बात कही बाबा जी? जै आप चोरी की रिपोर्ट नहीं करोगे तो हम चोर नै किस तरियां पकड़ैंगे? आप न्यों बताओ अक चोरी मैं के के गया। बूढ़ा बोल्या - छोड्डो नै साहब क्यूं खामैखा परेशान होवण लागरे सो। ल्यो दूध पीओ। दूध का गिलास बूढ़े नै हाथ मैं ले कै कहया। कर्म सिंह बोल्या - ना मैं तो ईब ड्यूटी पै सूं अर मैं कुछ नहीं ल्यूंगा। बाबा जी थाम खड़े क्यों सो बैठ जाओ। कर्म सिंह की बात सुणकै बूढ़ा आसपास के लोगां गेल्यां कुछ काना फूसी करकै अर फेर कर्म सिंह धोरै आकै हाथ जोड़ कै बोल्या - साहब कुछ रुपये राखल्यो अर इस बात नै आडैए रफा दफा करद्यो। मैं मानूं सूं थामने बहोत तकलीफ होई सै। आपका इतना कीमती बख्त बरबाद हुआ। यू उसै का हर्जाना सै। कर्म सिंह बात सुणकै चकरा ग्या फेर अपने आप नै सम्भाल सी कै बोल्या - बाबा थारी बात मेरी समझ तै बाहर सै। रुपइये क्यूं ल्यूं? हमनै सरकार तनख्वाह क्यां नाम की देवै सै। कर्म सिंह के न्यों कहवण की देर थी अर बूढ़ा चिल्लाया - क्यूं भाइयों ईब बी कोए शक की गुंजाइश सैके? पकड़ल्यो इसनै अर कसकै रस्सी गेल्यां जूड़दयो। माड़ी सी वार मैं लोगां नै कर्म सिंह जूड़ दिया। बूढ़ा बोल्या - यू कोए ठग सै। यो पुलिस का आदमी हो ए कोनी सकदा। बूढ़़े नै एक छौरे ताहिं कह्या - जा तावला सा असली पुलिस आले नै बुलाल्या। कर्म सिंह बोल्या - अरै मैं ए सूं पुलिस आला। बूढ़़ा गुस्से मैं बोल्या - बहोत हो लिया तेरा नाटक। अरै मैं तो तनै जिबै पिछाण गया था जब तनै मेरी ताहिं बाबा कहया। पुलिस आले इसे थोड़े ए ना हुआ करैं। थोड़ा सी वार मैं पुलिस आला पान चबाता हाथ मैं डंडा घुमान्ता आया अर कर्म सिंह नै रस्सी मैं बंध्या देख के गुुस्से मैं बोल्या - क्यों बे स्साले बूढ़े इन्हें क्यों बांध राख्या सै? गाली सुनते की साथ बूढ़ा बोल्या - यो सै असली पुलसिया। कितने वार तैं बाबा-बाबा करण लागरया सै। उसनै सोच्ची पुलिस की ट्रेनिंग अधूरी रैहगी लागै सै। यो सब देख कै कर्म सिंह कै तो सन्नपात सा मारग्या। उसनै सोच्ची अक पुलिस की ट्रेनिंग अधूरी रहेगी पूरी कोना हुई। उस दिन पाछे ओ एक महीने की छुट्टी पै घरां चाल्या गया। कर्म सिंह ईब रोज अपणे बड़े बुजुर्गों नै उनकी तसबीर कै साहमी बैठ कै गाली देन्ता। उसनै सोच समझ कै अपने दोस्त के घर मैं गांजा धर दिया अर दूसरे दिन पुलिस बुलवा कै उस ताहिं नशीली दवा राखण के जुर्म मैं पकड़वा दिया अर तीस हजार रिश्वत के चढ़वा कै उसका केस रफा दफा बी करवा दिया। किसे का शक उसपै नहीं गया। उस दिन कर्म सिंह नै सोच्ची अक आज मेरी पुलिस की ट्रेनिंग पूरी होई सै। जनता के सोच्चण की गड़बड़ करकै आच्छे बीच्छे माणस बी अपनी राह बदल ज्यावैं सैं। इस करकै जनता का चौकस होना बहोत जरूरी सै। यो बी जरूरी सै अक चोर लोग साह का रूप धारकै जिब आवैं तो हाम उनकी पिछाणै ना कर सकां। दूसरी बात म्हारे पुलिसिया भाइयां की बी सोच्चण की सै, अक वे असली पहलम आले कर्म सिंह नै मानैं सैं अक बाद आले कर्म सिंह नै?

सर्वनाश करने वाले अब निर्माण करेंगे इराक में


अमरीका ने अपनी फौजों द्वारा इराक पर एक तरफा हमला किया। इसको इसमें ब्रिटिश सरकार का समर्थन व सहयोग भी प्राप्त था। इस हमले और कब्जे का सबब यह था कि अमरीका और ब्रिटेन इस अरब देश इराक से बहुत खतरा महसूस करते रहे हैं। यह एक ऐसा झूठ व मनगढंत दावा है जैसा कि मालदीप से हमला होने के डर के बहाने भारत मालदीप पर हमला करदे। नोम चोमस्को ने कहा है कि चुनाव में बुश के प्रशासन को अमरीकी जनता धाराशायी कर देती यदि सामाजिक और आर्थिक मुद्दे चुनाव में प्राथमिकता पर रहते तो, मगर बुश की सरकार ने इन मुद्दों को पीछे धकेल दिया और सुरक्षा के मुद्दों को उभारकर लोगों को प्रभावित किया। लोग ताकत की छतरी के नीचे खींच लिए गए।
महज एक सामाजिक मुद्दे को विस्तार से विश्लेषित करने पर ही बुश के प्रशासन की चाल की पोल स्पष्ट रूप से खुलकर सामने आ जाती है। उदाहरण के लिए यदि शिक्षा के मुद्दे को ही लें, तो इसी से काफी कुछ तोड़ खुलासा हो जाता है। दुनिया के इस सबसे अमीर देश में यह एक शर्मनाक सच्चाई है कि 280 मिलियन की जनसंख्या में से 40 मिलियन से ज्यादा लोग नहीं पढ़ सकते, वे मुश्किल से अपना नाम अटक-अटक कर पढ़ सकते हैं, 50 मिलियन लोग पांचवीं की किताब ही पढ़ सकते हैं और 60 मिलियन लोग ऐसे हैं जो आठवीं से आगे की किताब नहीं पढ़ सकते। वहां की शिक्षा प्रणाली ने इतना गलत माहौल बना दिया है कि 96 प्रतिशत लोगों में अपना दिमाग लगाकर इस प्रकार के गंभीर मुद्दों पर दिमाग लगाकर, सोच कर सही नतीजों पर पहुंचने की क्षमता ही नहीं विकसित हो सकी है।
काले अमरीकनों को, जो कि 15 प्रतिशत हैं उचित शिक्षा सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं जिसके कारण इनमें से 44 प्रतिशत अनपढ़ हैं। भूख, आवास, इलाज आदि पर सोचकर समाधान ढूंढने का काम लोगों को सौंप दिया जाए तो इन मुद्दों के समाधान के लिए निष्कर्षों पर नहीं पहुंचा जा सकता। ऊपर से खास ढंग से लोगों का ध्यान असली मुद्दों से हटाने की बुश की यह सोची समझी चाल थी। जिसका शिकार अमरीकी जनता हुई। सन् 1980 के दौर में भी रीगन व सीनियर बुश ने ऐसी नीतियों का पालन किया जो आम अमरीकी नागरिक के खिलाफ जाती थीं। मगर लोगों में भय पैदा करके उन्होंने अमरीकी नागरिकों को नियंत्रण में रखा। अमरीकनों को बताया गया कि निकारगुआ की फौजों को टैक्सास से चलकर अमरीका पर कब्जा करने के लिए दो दिन का समय काफी है। प्रशासन द्वारा अमरीकनों को यह बताकर भी डराया गया, कि ग्रेनेडा के एयर बेस से रशियन उन पर हमले करेंगे।
इराक पर हमले का एक और कारण यह भी है और वह है अपने आप में पूंजीवाद। चीजों के उत्पादन की क्षमता तथा लोगों की चीजों का इस्तेमान कर पाने की क्षमताओं के बीच गहरा अंतर्विरोध है। इस अंतर्विरोध के चलते इस व्यवस्था में आर्थिक संकट से उभरने के लिए युद्धों व इस प्रकार के एकतरफा हमलों का सहारा लेना एक अनिवार्य पहलू है। जब बड़े और ज्यादा कीमत वाले मिल्ट्री के उपकरणों का इस्तेमाल युद्धों में होता है तो व्यापक पैमाने पर ये हथियार व उपकरण युद्ध में नष्ट होते हैं। तभी तो इन उपकरणों व हथियारों के बनाने वाले कारखानों को और अधिक सामरिक हथियार व उपकरण बनाने का अवसर मिलता है। इसी प्रकार जब हजारों इमारतें तथा आवासीय स्थान तबाह होते हैं तो इनसे पूंजीवाद के ठेकेदारों को कंस्ट्रक्शन करने और ठेके मिलने का रास्ता साफ हो जाता है। इसलिए जब सैकड़ों हजारों इराकी इराक में मारे गये तो सभी पूंजीवादी देशों में पूंजीपति अपने हाथ इस उम्मीद में रगड़ रहे हैं कि उन्हें बहुत से ठेके मिलेंगे। इस सबके बावजूद इस हमले ने पूरी दुनिया में लोगों ने भारी प्रदर्शनों के माध्यम से दबाव बनाकर अपने देशों की सरकारों को बुश और ब्लेयर के खिलाफ पोजीशन लेने पर मजबूर किया है। यही वह दूसरा ध्रुव (पोल) है जो सोवियत यूनियन के ढहने के बाद उभर कर आया है। यह एक सच्चाई है कि यदि हम चुंबक की छड़ी को तोड़कर दो हिस्से कर देते हैं तो उनकी पोलेरिटी खत्म नहीं हो जाती। दोनों टुकड़ों में नये पोलों का निर्माण हो जाता है। यह डायलैक्टिस का सिद्धांत है। इराक पर अमरीका और ब्रिटेन के द्वारा किए गए हमले ने एक नई संभावना को जन्म दिया है, फासीवादी पूंजीवादी विश्व में इसके वर्चस्व के खिलाफ दुनिया के लोगों की एकता।
एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात और है वह यह है कि अमरीका की कुछ संस्थाओं ने अनुमान लगाये हैं कि इराक पर हुए इस हमले में 100 अरब डालर से लेकर 200 अरब डालर तक का खर्च होने के अनुमान लगाए हैं। यदि हम सबसे नीचे के आंकड़े को भी लेकर चलें तो यह 100 अरब डालर की रकम बराबर है - जर्मनी के कुल संघीय बजट के 40 फीसदी हिस्से के सौ-सौ डालर के नोट एक के ऊपर एक रखें तो 100 किलोमीटर ऊँची गड्ढी बने। के-12 शिक्षा पर अमरीकी संघीय सरकार के कुल खर्च से तीन गुणा के1 अमरीका के अंतरराष्ट्रीय मामलों से संबंधित बजट के चार गुणा से ऊपर के। अमरीका की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (ई.पी.ए.) के बजट से 12 गुणा के1 या यों भी कहा जा सकता है कि इस सौ अरब डालर से अमरीका या ब्रिटेन में बनाए जा सकते हैं एक लाख पैंतालीस हजार किंडर गार्डन इस समय जर्मनी में 2 लाख बच्चों के लिए किंडर गार्डन सुविधा की कमी है।
अमरीका में तमाम एक करोड़ दस लाख गैरबीमित बच्चों के लिए पांच वर्ष के लिए स्वास्थ्य बीमा, अमरीका में एक करोड़ 40 लाख से ज्यादा बच्चों के लिए स्कूल-पूर्व तैयारी स्तर का प्रबंध, अमरीका में जितने स्कूलों के निर्माण की जरूरत है उनमें से लगभग हरेक का पुनर्निर्माण। अमरीका के चार लाख छात्रों के लिए एक सौ तेईस वर्ष की फीस का इंतजाम। निम्न आयु वर्ग परिवारों के इतने ही बच्चे हैं जो आर्थिक असमर्थता के चलते स्कूल नहीं जा पाते हैं। अमरीका में ही चौदह लाख 30 हजार परिवारों के लिए ऐसी आवास व्यवस्था जिसका वे खर्च उठा सकते हों। अमरीका में उन्नीस लाख एलीमेंटरी शिक्षकों के लिए एक वर्ष की तनख्वाह। जाहिर है कि गरीब देशों में इससे 20 से 50 गुणा तक लोगों की तनख्वाह बनती है।
अमरीका में तैंतीस लाख नर्सों, वृद्ध जनसेवकों या समाजसेवियों की एक साल की तनख्वाह। 35 लाख रोजगार प्रशिक्षण स्थलों के लिए या रोजगार निर्माण योजनाओं के लिए तीन वर्ष का खर्चा। या फिर इसी राशि से दुनिया के पैमाने पर, यूनिसेफ के अनुसार सभी बच्चों के लिए सवा तीन वर्ष के लिए पर्याप्त भोजन, बुनियादी स्वास्थ्य रक्षा, प्राइमरी शिक्षा तथा पीने के स्वच्छ पानी की व्यवस्था की जा सकती है। संयुक्त राष्ट्र संघ के समूचे बजट की 13 वर्ष तक भरपाई की जा सकती है और इसमें शांति का पालन कराने की तथा अन्य विशेषीकृत संस्थाओं के खर्चे भी शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के तमाम शांति रक्षा मिशनों (1966 के पैमाने से) का 80 वर्ष का खर्चा दिया जा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के 250 वर्ष के खर्चे की भरपाई की जा सकती है। यूरोपीय सुरक्षा व सहयोग संगठन (ओएससीई) का 540 वर्ष का खर्चा दिया जा सकता है। ग्रीनपीस इंटरनेशनल के 700 वर्ष के काम के लिए साधन जुटाए जा सकते हैं।
गरीब देशों में एक बच्चे को बचाए रखने के लिए कितनी मदद की जरूरत होगी? 100 डालर प्रति वर्ष। इसलिए अगर इस हमले पर 100 अरब डालर ही खर्च खर्च होते हैं तब भी इतनी रकम से एक अरब बच्चों को एक वर्ष तक बचाए रखने का इंतजाम तो किया ही जा सकता था। इस हमले के गंभीर परिणाम महज इराक तक ही सीमित नहीं रहेंगे, इस साम्राज्यवादी हमले की मार पूरी दुनिया को झेलनी पड़ेगी। बुश ने दुश्मनों की अपनी लंबी सूची को स्पष्ट करने में देर नहीं की और ‘पाप की धुरी’ का ऐलान कर दिया। याद रहे कि 1999 से 2003 के बीच यानी चार वर्ष के इस अर्से में ही, यह चौथा युद्ध है जो एक स्वतंत्र देश के खिलाफ अमरीका ने लड़ा है।

चोर कोण साह कोण


रमलू: पहलम जो रिश्वत लेवणिया माणस था उसनै म्हारा समाज अर म्हारा शहर अर गाम बहोतै खराब माणस मान्या करता। सहज रिश्वत नै जोर पकड़या तो समाज मैं फजीहत होई। रिश्वत का नाम बदनाम होगा।
ठमलू: इस बदनामी तै बचण का राह मिनटां मैं टोह लिया होगा बट्या नै। घणै कसूते बटमार होरे सैं।
रमलू: रिश्वत के इन ठेकेदारां नैं एक सभा बुलाई।
ठमलू: के बात इनकी भी यूनियन सै के कोए। ये म्हारी यूनियन कै तो हाथ धोकै पीछै पड़े रहवैं सैं।
रमलू: इनकी यूनियन घणे गजब की सै वा रजिस्टर करवावण की भी जरूरत कोन्या। वा नम्बर दो के खात्यां मैं चलती बताई। हां तै इननै फैंसला कर लिया अक रिश्वत नै म्हारा समाज खोखला कर दिया इसका जड़ तै खात्मा कर देना चाहिए।
ठमलू: या बात उननै कही जो सोवन्ते बी अर खान्ते बी रिश्वत के सपने लेवैं सैं।
रमलू: हां अर म्हारी या आडू. जनता भी बहौत राजी होरी थी अक रिश्वत का साच माच मैं खात्मा होवण आला सै। (सभा का सीन)
सभा मैं सबतै बड्डा रिश्वतखोर खड़या होकै बोल्या - हम कसम खावां सां अक हम रिश्वत नहीं लिया करांगे आज तैं पाछै।
दूसरे दो तीन जणे बोले: तो खा कमा लिये हमतो अर कसम तोड़ी तो मुसीबत।
बड्डा रिश्वतखोर: फेर हम रिश्वत कोनी लेवां आज तै हम कमीशन लिया करांगे। तो रिश्वत तो आपै ए खत्म हो ज्यागी।
(सबनै तालियां तै स्वागत करया)
चार पांच साल मैं रिश्वत का नाम लेणा भूलगे लोग। कमीशन छाग्या सारे कै।
एक कमीशन एजेंट: आज काल कमीशन पै काम करवाणा बहोत आसान होग्या।
दूसरा: और के यार इस रिश्वत नै तो किते कै बैठण जोगे नहीं छोड्डे थे समाज मैं ईब तै ठाठ तै दुकान पै लिखवा कै काम करां सां कमीशन एजेंट फलाणा फलाणा।
तीसरा: फेर इन पाछले दस सालां मैं इस कमीशन की बी घिस काढ़ कै धरदी म्हारे यारां नैं। राव साहब, चौधरी साहब, मेहता साहब, यादव साहब, स्वामी जी तै लेकै खुराना जी ताहिं किस किस का नाम गिनाया जा सब कमीशनदार होगे।
दूसरा: यो कमीशन भी बहोत बदनाम हो लिया भाई।
पहला: तो ईब के करया जा। लोग बात तै म्हारे म्हां कै चलावैंगे अर फेर सीधी बात जा करैं सैं। हमनै फेर इसे ढाल बिचाले तै काढ़ बगावैं सैं जिसी दूध मां तै माक्खी।
तीसरा: इस कमीशन का बी किमै सोचना पड़ैगा। हमने अपने भाइयां की एक पंचायत बुलानी पड़ैगी। उसमैं फेर कोए सर्व सम्मति से फैसला करणा पड़ैगा।
(पंचायत सीन)
एक: सोचो भाइयो पाछली पंचायत के बाद दस साल म्हारे बड़े सुख तै गुजरे। ईब फेर सोचो अक इस कमीशन एजेंटी तै क्यूंकर पैंडा छूटै म्हारा।
दो: कुछ ना होरया थाम ऊंए घबरारे सो। कमीशन तै बड़े-बड़े तोपां के अर हवाई जहाजां के सौद्यां मैं बी लिया जा सै। हम तै मामूली सा कमीशन लेवां सां।
तीन: वा बात तै सही सै फेर समाज मैं कमीशन एजेंटां की इज्जत तै दो आने की बी कोन्या रहरी। बद तै बदनाम भूण्डा आली बात होरी सै म्हारी गैल्यां।
एक: वा तो बात ठीक सै हम तो मेहनत करकै या कमीशन कमावां सां। ऊपर तै बिना हाथ पां हिलाए उनके हिस्से का कमीशन उनके धोरै पहोंच ज्या सै।
दो: ईबै इतनी तावल मतना करो थाम। और सोचल्यो थोड़ा बहोता।
तीन: वा बात सै ना अक काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल मैं परले होयेगी बहुरि करैगा कब।
एक: रै न्यों करो भाई इस कमीशन नै सर्विस चार्जिच का लत्ता उढ़ा द्यो। दस बीस साल इसमैं लिकड़ ज्यांगे। आगे की आगै देखी जागी।
तीन: सही बात कही भाई ईब तै आगै सर्विस चार्जिज नाम होग्या। एजेंटी सब खत्म। कमीशन की टांग ईस पंचायत मैं तोड़ दी सै।
दो: ठीक सै जो कमीशन एजेंट रैहणा चाहवैं सैं इबै उसनै जात बाहर मतना करियो। (फैसला होग्या सब चले जाते हैं)
रमलू: सुण्या सै इन रिश्वत खोरां की भी कोए पंचायत हुई थी।
ठमलू: रिश्वत खोर नहीं कमीशन एजेंट बोल कमीशन एजेंट।
रमलू: हां वोहे कमीशन एजेंटों के फर्क पड़ै सै।
ठमलू: फरक तो पड़ै ऐ सै भाई। एक तै एक माणस नै न्यों कहवैं अक तेरे पिता जी आए थे अर एक न्यों कहवैं अक तेरी मां का लोग आया था। बात तो वाहे सै पर फरक तो घणा ए सै ना।
रमलू: चलो तूं अपणी बात मनवाएं बिना के मानै सै। फेर इन्हें बातां करकै चोर अर साह मैं फरक कर पाणा बहोतै घणा मुश्किल होरया सै।
ठमलू: या तो मैने बी लागै सै। चोरां नै आजकल यो प्रचार बड़े जोर शोर तै चला राख्या सै अक आज की दुनिया मैं कोण ईमानदार रहरैया सै।
रमलू: म्हारे दफ्तर मैं जो धापकै पीस्से खावै सै ना ओ बी एक दिन न्यों बोल्या अक हमाम मैं सब उघाड़े हो लिए।
ठमलू: मनै लागै या बात सही कोण्या। असल बात या सै अक उघाड़े माणस अपणा उघाड़ापन लहकोवण खातर सबनै उघाड़ा बतादें सैं अर आप्पां बी इसे आडू. सां अक सैड़ दे सी दो सेर का सिर हां मैं हिलाद्या सां।
रमलू: दिमाग तै काम लेणा तो आप्पा नै कई बरस तै छोड्डै राख्या सै। झूठ साच का भेद करण का म्हारा ब्यौंत कोण्या बचरया आज।
ठमलू: और के जिब घोटाल्यां का जिकर चालै सै तो न्यो कहया जा सै अक कौन बचरया सै इनतै?
अर म्हारी फेर हां मैं हां। हम न्यों सोचण का माड़ा सा बी कष्ट नहीं करदे अक कौण बचरे सैं इनतैं। कौण जनता के मैं सै अर कोण खिलाफ सैं?
रमलू: फेर एक बात सै ठमलू चोर कूण सै अर साह कूण सै इसका बेरा लाणा भी तो मुश्किल होंता आवै सै।
ठमलू: सही बात सै अर म्हारे बरगी मोटी बुद्धि आल्यां के तो बसका कतिए कोण्या। म्हारे बरगे कई बार मार खाज्यां सैं।
एक बै म्हिने की पहली तारीख नै रलदू नै तनखा मिली थी। रलदू सोचदा जावै था। डीटीसी की बस मैं चढ़ लिया। भीड़ चौखी थी। सोचदा चाल पड़या अक ब्याह होए नै तीन साल हो लिए पर घर आली ताहिं कुछ बी खरीद कै नहीं लेग्या। आज एक बढ़िया सी साड़ी खरीद कै ले ज्यांगा। कन्डक्टर नै टोक दिया अक टिकट? रलदू बोल्या अक एक शाहदरा की। कन्डक्टर टिकट पकड़ा कै बोल्या अक तीन रुपये। रमलू नै पाछली गोज पै हाथ मारा अर भाई कै पसीना आग्या।
रमलू: क्यों पसीना क्यों आग्या हार्ट अटैक तै नहीं होग्या था उसकै।
ठमलू: कन्डक्टर बोल्या - अक पीस्से दे था। गौज कटगी भाई। रलदू मरियल सी आवाज मैं बोल्या। कन्डक्टर बोल्या रै मैं जाणूं सूं थारी बाहणे बाजी। तीन सौ साठ देखूं सूं तेरे बरगे रोज।
रमलू: कन्डक्टर बी के करै?
ठमलू: रलदू नै कटी औड़ गोज दिखाई पर कन्डक्टर बोल्या के बेरा घर तै काट कै ल्यारया हो। तबै एक आदमी कंडक्टर तै बोल्या अक कितने पिस्से। कन्डक्टर बोल्या तीन रुपये। उसनै पांच का नोट दिया अर बोल्या मार सिट्टी।
रमलू: देख्या मैं कहूं था ना अक ईबी इन्सानियत बचरी सै। भला हो उसका। औरां का बी बखत बरबाद होण तै बचा लिया उसनै। बड़ा देवता माणस था ओ तै।
ठमलू: घणखरी सवारी भी उसके गुण गावण लागगी। फेर बेरा सै असल मैं ओ कूण था।
रमलू: कोए हो, था भला माणस।
ठमलू: ओ ओए जेब कतरा था जिसनै रलदू की गौज काटी थी। अर रमलू इतना स्याणा होकै तूं भी गच्चा खाग्या। तो भाई इन देवता किसम के जेब कतरयां तै बचियो लैक्शनां मैं।

मंगलवार, 30 मई 2017

अपनी मर्जी का मतलब

सत्ते नफे कविता सविता अर सरिता धापां ताई की बैठक मैं शनिवार की साँझ कै फेर कठ्ठे होंगे | नफे का मुँह किमै उतरया उतरया सा था | सत्ते बोल्या -- के बात नफे आज किमै ढीला ढीला सा नजर आवै सै ? कविता --इतना उदास तो तूँ कदे बी कोण्या देख्या | बस कविता का तो नयों कहना था अर नफे तो फफक फफक कै रो पड़या | सारे हैरान अक या के बणी ? फत्ते बोल्या -- भाई नफे बात बता किमैं तो जी हलका होवैगा | नफे बोल्या -- के बताऊँ  बूझै मतना | ओ छोटना भाई नहीं सै सज्जन उसनै पुलिस पकड़ कै लेगी अर उसकी बहोत पिटाई करी | सरिता बोली-- बिना बात पुलिस नै पिटया या तो माड़ी बात सै नफे | बिन बात पुलिस क्यों पीट्टण   लागी ?  ,नफे बोल्या--ओ सज्जन अपनी बुआ कै जारया था माछरौली | उड़ै म्हारी बुआ का छोरा सै श्यामलाल उसपै गाम आल्यां  नै  इलजाम ला राख्या था अक पड़ौस की गोसाइयाँ की छोरी भजा लेग्या श्यामलाल | सरिता बोली -- गाम की गाम मैं यू काम बहोत माड़ा करया श्यामलाल नै | नफे बोल्या -- फेर आगै तो इसतैं भी माड़ी बात हुई | सत्ते बोल्या-- के बात हुई? नफे-- श्यामलाल के बाबू गणेशी नै अर श्यामलाल के छोटे भाई नै अर मेरले  भाई सज्जन नै पुलिस पाकड़ कै लेगी |  थानेदार नयों कहवै था अक इनकी मिलीभगत तैं भजा कै लेग्या सै श्यामलाल छोरी नै | सरिता-- जिसकी छोरी चाली गई वो फ़िक्र तो करैएगा अर नयों भी चाह्वैगा अक वा तावली सी पाज्या |
कविता -- श्यामलाल की उम्र कितनी सै ? नफे बोल्या -- 21 -22 बतावैं सैं | कविता के मुँह तैं एकदम लिकड़ग्या जिब मियां बीबी राजी तो के करैगा काज्जी | नफे -- ले मनै राम की सूँह सज्जन नै कटी नहीं बेरा उनका अक  चाले गए |
   सविता -- फेर पुलिस आले उणनै क्यों पकड़ कै लेगे ? नफे -- पूछ ताछ खातर थाणे मैं बुलावैं तो देखी  जा |  थानेदार नै तो म्हारा फूफा उन बाळकां कै साहमी उघाड़ा करकै पुलिसिया पिटाई करी छिक कै | बालक बोले तो वे दोनूं भी धुन दिए अच्छी तरियां | नफे -- जब उपरले अफसरां धोरै गए  तो उणनै भी सीधे मुँह बात कोण्या करी | उणनै अपने निशान दिखाए पिटाई के अर थानेदार के खिलाफ कार्यवाही की मांग करी |  फेर गाम का सरपंच अर और पांच छह छटैल एसपी कै जा पेश हुए थानेदार के हक़ मैं |  एसपी भी करै तो के करै ? सत्ते -- एसपी नै तो सही बात की तरफदारी करनी चाहिए थी | सविता -- ईब पहलम आले अफसर कड़ै रैहरे सैं |  नफे -- उनका मैडीकल करवावण खातर भी कोर्ट की शरण मैं जाना पड़या | डॉक्टरां नै भी कई बै मसकौड़े से मार कै पर्चा काटया | परचा कटग्या तो पुलिस आलयाँ नै केस दर्ज नहीं करया | उल्टा पुलिस नै दूसरी ढालां का दबाव और बनाना शुरू कर दिया |  ईब पुलिस कै खिलाफ इस्तगासा करां तो फूफा का इतना ब्योंत कोन्या पीस्याँ का |
ऊपर तैं गाम की  इज्जत कै बट्टा लावण के नाम पै रोज गाम मैं पंचायत होवण लागरी सैं |  पंचायत नै कह्या अक कै तो छोरे छोरी नै इनके माँ बाप पेश करैं नहीं तो इनका होक्का पाणी बंद | कविता- नफे  जनवादी महिला समिति का बी किमै ब्यान था अक जै बालिग छोरा छोरी सैं अर जै वे अपने हिसाब तैं ब्याह करकै रैहना चाहवैं सैं तो भारत का संविधान इसकी इजाजत देवै सै तो गाम आलयाँ नै बीच मैं रोड़ा नहीं बनना चाहिये |
  नफे -- समिति आली बहनजियां करकै तो उनका मैडीकल का परचा बणया ना तो हमनै के रह पावै था | भला हो उनका | फेर  गाम आले  ये पंचायती तो उनकै भी खिलाफ होरे सैं | सत्ते -- लुहार के छोरे नै अर गोसाईं की उसे गाम की छोरी नै साथ रैहवन का मन बना लिया तो इसपै कई सवाल खड़े होंसें |  इन सवालों पै बहस होनी चाहिए अर उनके खिलाफ पंचायत जै कानून अपने हाथ मैं लेवै सै तो प्रशासन नै हरकत मैं आणा चाहिए | पुलिस नै बेकसूरों की पिटाई करी उसपै पुलिस कै खिलाफ एक्शन हो अर छोरा छोरी ताहिं प्रशासन नै सुरक्षा देनी चाहिए | कदे वे रेल तलै कट्टे पावैं |
खूंटा ठोक उर्फ़ रणबीर